रात में रुका था अस्पताल में। केबिन में मरीज के साथ का बिस्तर संकरा था – करवट बदलने के लिये पर्याप्त जगह नहीं। बहुत कुछ रेलवे की स्लीपर क्लास की रेग्जीन वाली बर्थ जैसा। उसकी बजाय मैं जमीन पर चटाई-दसनी बिछा कर सोया था। रात में दो तीन बार उठ कर जब भी मरीज (अम्माजी)Continue reading “फाफामऊ, सवेरा, कोहरा, सैर”
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घटहा (?) कुकुर
कई कुत्ते दीखते हैं गंगा के कछार में। रोज सवेरे इधर उधर चक्कर लगाते हैं। लोग जो स्नान करते समय पूजा सामग्री चढ़ाते हैं, उसमें से खाद्यपदार्थ उनके काम आता है। गंगा में कोई मरा हुआ जीव बहता दीखता है तो उसे ये पानी में हिल कर खींच लाते हैं। अगर वह सड़ा हुआ नहींContinue reading “घटहा (?) कुकुर”
मेरे भाई लोग
आज सवेरे अचानक मेरे तीन भाई (मेरी पत्नी जी के भाई) घर पर आये। वे लोग भदोही से लखनऊ जा रहे थे। रास्ते में यहां पड़ाव पर एक घण्टा रुक गये। इनमें से सबसे बड़े धीरेन्द्र कुमार दुबे बेंगळूरु में प्रबन्धन की एक संस्था से जुड़े हैं। उनसे छोटे शैलेन्द्र दुबे प्रधान हैं। पिछला विधानसभाContinue reading “मेरे भाई लोग”
