पचीसा


“पचीसा।” उन्होने खेलते खेलते, बिना सिर उठाये जवाब दिया। बताया कि चौबीस गोटियोँ का खेल है। दो खिलाड़ी होते हैं। काली और सफेद गोटियों वाले। हर एक की बारह गोटियाँ होती हैं।

सूर्यमणि तिवारी, हर्ष मिश्र और नचिकेता


हर्ष को देख कर मुझे लगा कि कठोप्निषद मात्र काव्य कल्पना नहीं। ऐसा पात्र, ऐसा नायक, हो सकता है।

घटहा (?) कुकुर


कई कुत्ते दीखते हैं गंगा के कछार में। रोज सवेरे इधर उधर चक्कर लगाते हैं। लोग जो स्नान करते समय पूजा सामग्री चढ़ाते हैं, उसमें से खाद्यपदार्थ उनके काम आता है। गंगा में कोई मरा हुआ जीव बहता दीखता है तो उसे ये पानी में हिल कर खींच लाते हैं। अगर वह सड़ा हुआ नहींContinue reading “घटहा (?) कुकुर”

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free