सवेरे के पौने नौ बजे थे। द्वारिकापुर गंगा-घाट से लौटते समय धूप कुछ उनींदी-सी थी। जनवरी की सुबहें वैसी ही होती हैं—आधी जागी, आधी सपनीली। बिजली की साइकिल पर चलते हुए मुझे हमेशा लगता है कि खेतों की हवा खुद रास्ता बनाती है, और हम बस उसके साथ बहते हैं। मकर-संक्रांति की गंवई भीड़, गंगाContinue reading “बिना शब्दों के मेरी बिजली की साइकिल का प्रशंसक”
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सगड़ी वाला बूढ़ा
इग्यारह बज रहे थे। कोहरे का पर्दा हल्के से ठेल कर कानी आंख से सूरज भगवान ताकने लगे थे। वह बूढ़ा मुझे मर्यादी वस्त्रालय के आगे अपनी सगड़ी (साइकिल ठेला) पर बैठा सुरती मलता दिखा। बात करने के मूड़ में मैने पूछा – आजकल तो बिजली का ठेला भी आने लगा है। वह लेने कीContinue reading “सगड़ी वाला बूढ़ा”
मुन्ना पांडे की प्रसन्नता और मेरा आईना
संभव है कि नागपुर पहुँचते-पहुँचते मैं यह तय कर पाऊँ कि कौन ज़्यादा संतुलित जीवन जी रहा है—
मुन्ना पांडे या मैं। मैं आईने में खुद को निहारता हूं। पर शायद मैं खुद को नहीं, मुन्ना पांडे सरीखे को देखना चाहता हूं।
