गांवदेहात डायरी सालों बाद कटका के प्लेटफार्म नम्बर 2 पर गया। वहीं मिला हरिहर। अंधा है वह। हाथ में एक लाठी, बगल में एक झोला—जिसमें बिस्कुट के पैकेट। उन्हीं को लेकर वह ट्रेनों के कॉरिडोर में चलता और बेचता है। हरिहर प्लेटफार्म पर बैठने लगा तो किसी ने आगाह किया—“ट्रेन आवे वाली बा। आगे बैठबेContinue reading “हरिहर से बातचीत”
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गांवदेहात का जेम्स हैरियेट
आज फिर दांतों का फॉलोअप था डाक्टर स्वमित्र के क्लीनिक में। फिर कई रेडियोग्राफिक शूट। फिर थोड़ी दांतों की घिसाई। फिर दांतों के रूट्स तक फाइल चुभाने की फाइन ट्यूनिंग। मैं कुर्सी पर आधा लेटा था। मुंह खुला। भीतर धातु के औज़ारों की खनखनाहट। बोल नहीं सकता था, पर सुन सब रहा था। इसी बीचContinue reading “गांवदेहात का जेम्स हैरियेट”
चारवाक का युग आ गया है!
“जीवन का क्या भरोसा। जितना सामने है, उसका आनंद लो। कुछ नहीं है तो ऋण लेकर घी पियो।” चारवाक ने यह बात बहुत पहले कह दी थी। तब शायद किसी ने गंभीरता से नहीं ली। आज लग रहा है — आदमी नहीं बदला, बस साधन बदल गये हैं। घी अब भी है, ऋण भी है;Continue reading “चारवाक का युग आ गया है!”
