चकरी तैयार कर गया शारदा परसाद


इस तरह हमारी चकरी, सात साल बाद फिर से तैयार हो गयी। अब दाल दलने के लिये गांव में औरों से मांगनी नहीं पड़ेगी। इसके उलट आस पास के लोग गाहे बगाहे मांगने आते रहेंगे और हमें ध्यान रखना होगा कि कौन ले कर गया।

सामुदायिक शौचालय – शोचालय


अभी तक तो पांच साल में कोई विधायक या सांसद मुझे दिखा नहीं (आम आदमी के पास आने की उनको क्या जरूरत?!) पर अब शायद नजर आयें। पूछने का मन है कि सामुदायिक शौचालयों के सफेद हाथी बने पर एक भी दिन चले नहीं, क्यों?

शारदा परसाद बिंद – चकरी कूटने वाला


गरीब आदमी शारदा। शायद उसे आठ दस हजार का माइक्रो फाइनांस मिले तो वह उपयुक्त औजार खरीद कर अपनी आमदनी बढ़ा सके। पर कोई भी कर्ज किसी काम के लिये लिया जाये, किसी न किसी और मद में खर्च हो ही जाता है।

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