रविशंकर मिश्र, 62+


मेरे ब्लॉग के पढ़ने वाले (मेरा अनुमान है) नौजवान और 30-50 की उम्र वाले अधिक होंगे। उन्हें सीनियर सिटिजंस के मसलों में शायद बहुत दिलचस्पी न हो; पर जिंदगी के खेल के हाफ टाइम की सीटी कब बज जाती है, वह खिलाड़ी को ध्यान ही नहीं रहता।

उतरती बाढ़ और लोगों के सुख दुख:


मुझे कोई इस तरह की घरेलू बात कहे, सुनाये – यह कुछ अटपटा लगा। और वह भी एक महिला? शायद बाढ़ की विभीषिका अपने घर के आगे देख कर व्यक्ति सन्न हो जाता है और एक अपरिचित से भी मुखर हो जाता है अपना दुख सुख बताने के लिये।

“जिल्ला टाप” नचवैय्या रहे नगीना


बात करने के लिये मैंने उनसे पूछा – कुछ लहा (कुछ हाथ लगा?)
नगीना ने जवाब दिया – “अबहीं का? अबहीं तो आ के बैठे हैं। घण्टा डेढ़ घण्टा बैठेगे। तब पता चलेगा। कौनो पक्का थोड़े है। लहा लहा नाहीं त दुलहा!”

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