द्वारिकापुर – उफनती ही जा रही हैं गंगा


अपनी पैंसठ साल की जिंदगी में बाढ़ें बहुत देख लीं। किसी बाढ़ में फंसा नहीं। पर बाढ़ का कौतूहल और सनसनी हमेशा होती है। अब भी हो रही है।
… जो कुछ सुनने में आ रहा है, वह भयोत्पादक है। गुन्नीलाल जी कहते हैं कि अगियाबीर में लूटाबीर तट की ओर से पानी घुसने की आशंका बन गयी है।

मटर और महुआ उबाल कर खाते रहे हैं अतीत में – सत्ती उवाच


पहले के खाने के बारे में बताती है। दो जून खाना तो बनता ही नहीं था। मटर की दाल के साथ महुआ उबालते थे। वही खाते थे। मौसम में 2-2 बोरा महुआ बीन कर इकठ्ठा किया जाता था। उसी से काम चलता था।

वह फीचरफोन में डूबा नामिलनसार आदमी


एक सामान्य से आदमी ने मुझे बड़े जबरदस्त तरीके से स्नब किया!
कभी कभी ही तुम्हें नहले पर दहला मिलता है। नौकरी-अफसरी के दौरान नहीं मिला; यहाँ गांवदेहात में मिला; जीडी! :-)

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