मुहम्मद दाऊद अंसारी की गुमटी


नौजवान है वह। बताता है कि वैशाली, बिहार का है पर पूर्वांचल के इस एरिया में पिछले दस बारह साल से है। मेरे साले साहब का पेट्रोल पम्प कमीशन होने वाला है। उसकी सम्भावना के अनुसार ही बगल में उसने गुमटी खोल ली है। चार चक्का और मोटर साइकिल में हवा चेक कर भरना और यदा कदा पंक्चर बनाने का काम करता है। अभी, जब पेट्रोल पम्प चालू नहीं हुआ है, उसे “कामचलाऊ काम” मिल रहा है। खाने भर को हो जा रहा है, बस। कमाई नहीं है।

अपनी गुमटी के सामने मुहम्मद दाऊद अंसारी। बांई ओर मेरे साले साहब का पेट्रोल पम्प है।

जितना इंतजार हमें है कि पेट्रोल पम्प चालू हो, उतना ही उसे भी है। मेरी बजाय उसे शायद ज्यादा मालुम हो कि एनएचएआई के किस दफ्तर में किस बारे में मिसिल अटकी पड़ी है! मेरे साले साहब एनएचएआई से नो ऑब्जेक्शन सर्टीफीकेट लेने के लिये कोई सत्त की लड़ाई नहीं लड़ रहे, पर उस विभाग की नौकरशाही की तुनुकमिजाजी से निपटने में पसीने जरूर छूट रहे हैं। उस चक्कर में, उनके बिजनेस पर पिग्गीबैकिंग करने वाला यह नौजवान – मुहम्मद दाऊद अंसारी – भी लटक गया है।

पूरी सर्दी, कोहरे में गुमटी का शटर गिरा कर अंदर सोते पाया है सवेरे मैंने। आजकल भी, जब बिजनेस मामूली ही है, उसे देर से उठते पाता हूं। साइकिल से मैं गुजरता हूं तो मुस्कुरा कर वह हाथ हिलाता है। मैं भी उसका प्रत्युत्तर देता हूं। मित्र हो गया है वह मेरा।

स्मार्ट लगता है वह। पैण्ट-टीशर्ट और हूडी पहने। हाथ में स्मार्टफोन और गले में ब्ल्यूटूथ वाला नेकबैण्ड। गठा हुआ शरीर। किसी रोमान्टिक उपन्यास या फिल्म का पात्र हो सकता है।

पहली बार जब उससे मैंने साइकिल रोक कर बात करने की गर्ज से कुछ पूछा था तो वह अनमना सा उत्तर दे रहा था। उसके साथ मोबाइल पर वीडियो देखते गांव के दो और लड़के थे। उनमें से एक ने मुझे प्रणाम किया और इस बंदे को कोहनियाया – अबे, पेट्रोल पम्प के मालिक हैं, बे!

तब वह उठ कर मेरे पास आया और अपना परिचय भी दिया। ब्लॉगपोस्ट लिखने के लिये फिट पात्र था वह। पर न जाने कैसे महीने गुजर गये और उसपर लिखना रह गया। आज वहां से गुजरा तो सोचा, लिख ही दिया जाये मुहम्मद दाऊद अंसारी पर।

उससे मैंने टायरों की मीनार के बारे में पूछा। मुहम्मद दाऊद ने कहा कि वह तो केवल साइन बोर्ड जैसा है। लोगों को पता चले कि यहां हवा भरने का और पंचर बनवाने का साधन मौजूद है। बस।

मेरे वाहन में यदाकदा हवा भरानी होती है। मैं उसे पैसा देने की कोशिश करता हूं। उसकी गुमटी में ‘फोन पे’ की स्कैन करने वाली तख्ती दिखती है। तख्ती लाने को कहता हूं, पर वह पैसा लेने से मना कर देता है। “आप से क्या लेना। … लेना होगा तो फिर कभी। … पैसा आ जायेगा चच्चा; आप टेंशन न लो!” – वह इस तरह का कुछ न कुछ कहता है। अच्छा नहीं लगता मुझे। पर बार बार कोशिश करने पर भी उसे पेमेण्ट नहीं कर पाता।

मैंने आसपास के पांच छ और हवा भरने वाली गुमटियां देखीं। वे सभी बिहार के नजर आये। मुजफ्फरपुर या वैशाली के। उनमें से एक, अशरफ, ने बताया कि पुराने टायर नये करने (रीट्रेडिंग) का काम भी वह करता है।

उसके बारे में जानने पर मैंने आसपास के पांच छ और हवा भरने वाली गुमटियां देखीं। वे सभी बिहार के नजर आये। मुजफ्फरपुर या वैशाली के। उनमें से एक, अशरफ, ने बताया कि पुराने टायर नये करने (रीट्रेडिंग) का काम भी वह करता है। पुराने टायर बनारस की कम्पनी को भेजता है। कम्पनी वाला आ कर पुराने टायर ले जाता है।

पर मुहम्मद दाऊद ने कहा कि वह रीट्रेडिंग का काम नहीं करता। शायद रीट्रेडिंग भी उस टायर की होती हो, जिसमें थोड़ी जान बची हो!

खैर, मुहम्मद दाऊद के बहाने एक नये प्रकार के नौजवानों के बारे में जानने की जिज्ञासा जगी है। अगर मैं पेंशनयाफ्ता न होता और पढ़ाई कर रहा होता तो इन लोगों के समाजशास्त्रीय अध्ययन के लिये कोई पीएचडी-सीएचडी करने की सोचता। फिलहाल तो देखें कब मुहम्मद दाऊद के साथ उठना बैठना होता है। टुन्नू पण्डित का पेट्रोल पम्प चलने लगे और वहां एक दो घण्टे गुजारने के लिये एक कुर्सी और एक दो कप चाय का जुगाड़ होने लगे तो शायद उससे कोई लम्बी बातचीत हो। फिलहाल इंतजार किया जाये! :-D


ईंटवाँ के बऊ यादव


मडैयाँ डेयरी के कलेक्शन सेण्टर पर मैं सवेरे नौ बजे के आसपास दूध लेने जाता हूं। बहुत कुछ उस तरह जैसे सवेरे अपने बंसी-कांटा लिये लोग गंगा किनारे जाते हैं। वे वहां त्राटक साध कर मछली पकड़ते हैं और मैं डेयरी की गहमागहमी, लोगों की चेंचामेची में ब्लॉग लिखने के विषय और चरित्र तलाशता हूं। मेरे लिये मेरे स्मार्ट फोन और फीचर फोन मेरे बंसी-कांटा हैं। वहां के चरित्र और उनकी बातचीत मेरे लिये मछलियाँ हैं। उन्हें दर्ज करने के लिये जेब में एक नोटबुक और कलम भी होती है।

लोग जान गये हैं कि मैं वहां “मछली पकड़ने” आता हूं। दूध लेना तो निमित्त भर है।

आज के चरित्र थे बऊ यादव। पास के गांव इंटवाँ के हैं। साथ में पांच छ डिब्बे, प्लास्टिक के बर्तन आदि ले कर आये थे।

बऊ यादव

तीन चार बर्तन एक प्लास्टिक के रीसाइकिल्ड झोले में रख साइकिल के हैण्डल में लटका कर और पीछे दोनो ओर पांच सात किलो के बाल्टे कैरीयर से बांध कर लाने की तकनीक मझोले आकार के बाल्टा वालों की है। पहले ये हैण्डल से छोटे डिब्बों के झोले ले कर नहीं चलते थे। तब वे सारा दूध बाल्टे में उंडेल लेते थे। रास्ते में पानी के साथ भी दूध मिश्रण के प्रयोग करते थे। अब तकनीक में परिवर्तन आया है। अब वे हर गोरू का दूध अलाग अलग डिब्बों में लाते हैं। और बीच में पानी के साथ दूध की छेड़छाड़ बंद हो गयी है। डेयरी के कलेक्शन सेण्टर पर लैक्टो-स्कैनर को धता बताने की कोई तकनीक अभी विकसित नहीं हुई। सो दूध शुद्ध ही आ रहा है कलेक्शन सेण्टर पर।

बांये से चौथे बऊ यादव। बाकी लोग उनसे ठिठोली करने वाले।

अधेड़ हैं बऊ यादव। शायद उनकी सिधाई के कारण नौजवान उनसे ठिठोली करते हैं – “आ गये हैं असल धनी दूध ले कर। इनका फोटो खींचिये।” बऊ ने बताया कि उनके पास एक ही गाय है। बाकी दूध आसपास वालों से संग्रहित कर यहां ले कर आते हैं। कुल 15 लोगों का परिवार है। उसमें से एक बम्बई में और एक यहां नौकरी करते हैं। बाकी सब इधर उधर खेती-किसानी में लगे हैं। कुल बारह बिस्वा अपनी जमीन है। अंदाज है कि लोगों की जमीन ले कर खेती करते होंगे। … सुबह शाम इस कलेक्शन सेण्टर पर आते हैं वे।

“एन्हने सब आईसई कहथिं (ये नौजवान ऐसे ही कहते हैं)। मरता मनई हई हम (गरीब आदमी हूं मैं)।” – बऊ यादव ने कहा।

मेरे बार बार उनके चित्र लेने पर बऊ यादव ने जोड़ा – “हम निछौंछे (फालतू, गरीब) क का फोटो लेत हयअ। एनकर (इनका; हाथ से डेयरी के मालिक अजय पटेल को दिखा कर) फोटो खींचअ। मारि एतना बड़ा खोले हयें। सगरौं अरररर होत बा एनकर। [मुझ निरीह का क्या चित्र खींच रहे हैं बार बार। इस डेयरी के मालिक का खींचिये। इतनी बड़ी डेयरी लगाई है इन्होने कि पूरे इलाके में वाह वाह – अरररर – हो रही है।]”

बऊ यादव के द्वारा अपने बारे में अरररर सुन कर डेयरी के मालिक ने धीरे से जोड़ा – “ऐसे ही कहते हैं बऊ। महीना में चालीस हजार बचाते हैं!” हो भी सकता है। यहां यादव लोग बहुत फ्रूगल जिंदगी जीते हैं। और पैसा बचाने, खेत लिखाने में महारत है उनको। बाभन ठाकुर जमीन बेच-खा रहे हैं; यादव खरीद रहे हैं।

गांव का आदमी बऊ! एक छोटी सी वार्ता में मुझे कई शब्द सिखा दिये – मरता, निछौंछे, अरररर!

खांटी देसी जीव। बहुत माई-डीयर आदमी निकले बऊ यादव। उनके पास सट कर एक फोटो खुद अपने फीचर फोन से ‘हईंच लिहा हम!’ :lol:

बहुत माई-डीयर आदमी निकले बऊ यादव। उनके पास सट कर एक फोटो खुद अपने फीचर फोन से ‘हईंच लिहा हम!’ :lol:

आज तो परिचय हुआ है। आगे मिलते रहेंगे बऊ यादव से। वे मेरी प्राइज-कैच हैं डेयरी पर! गंगा तट पर जाना नहीं हो रहा तो डेयरी ही सही! :lol:

बऊ यादव की जय हो!


दक्षिणेश्वर से भ्रामरी मेलाई चण्डी शक्तिपीठ


01 अप्रेल 23

जहां पूछो, वहीं बारिश हो रही है। बे मौसम की बारिश है। कहीं यह स्वागत योग्य होगी, पर ज्यादातर यह खेती किसानी पर तनाव का कारण है। प्रेमसागर की यात्रा के लिये यह स्वागत योग्य भी है और कठिनाई भी उपजा रही है।

सवेरे उन्होने बताया – बारिश है, मौसम ठण्डा है तो सड़क तप नहीं रही। उमस भी नहीं है। कभी कभी बारिश से रुकना पड़ रहा है।

मौसम ठण्डा होने से तेज तेज चल ले रहे हैं प्रेमसागर। आज अपना सामान रमाशंकर जी के यहां ही रख छोड़ा है। थोड़े सामान के साथ चलना हो रहा है। सात घण्टे में वे पैंतालीस किलोमीटर चल कर आम्टा/भ्रामरी शक्तिपीठ पंहुच गये।

दोपहर एक बजे के पहले उन्होने भ्रामरी शक्तिपीठ के दर्शन कर लिये। इस स्थान को मेलाई चण्डी शक्तिपीठ भी कहा जाता है। मांं महाकाली के वपु को समर्पित शक्तिपीठ। हावड़ा जिले के उलुबेरिया तहसील में आम्टा जगह है। वहां है यह मंदिर। वैसे भ्रामरी देवी के नाम से एक अन्य शक्तिपीठ जलपाईगुड़ी में भी है। गीताप्रेस की शक्तिपीठ दर्शन पुस्तक में इस स्थान का नहीं, जलपाईगुड़ी के त्रिस्त्रोता का जिक्र है।

भ्रामरी देवी के नाम से एक अन्य शक्तिपीठ जलपाईगुड़ी में भी है। गीताप्रेस की शक्तिपीठ दर्शन पुस्तक में इस स्थान का नहीं, जलपाईगुड़ी के त्रिस्त्रोता का जिक्र है।

प्रेमसागर तो मगन हो कर चल रहे हैं। उनके शक्तिपीठ दर्शन के प्रेरक विद्वत गण भी पूछ खबर नहीं रखते प्रतीत होते। प्रेमसागर मुझसे पूछते हैं शक्तिपीठों की भौगोलिक स्थिति। और मुझे उनकी इस पदयात्रा के पहले शक्तिपीठों से कुछ खास लेना देना नहीं था। मैं इन जगहों को पशु बलि से जोड़ कर देखता था। माता का केवल महासरस्वती वाला वपु ही मुझे लुभाता रहा है। पर अब प्रेमसागर के चक्कर में मैं पुस्तकों और वेबसाइटों को छान रहा हूं।

गांवदेहात में एक कहावत है – तेली क बरदा कोहांइन लई क सती होइ। तेली गांव के बाहर गया तो अपने बैल की देखभाल के लिये पड़ोसी कुम्हार को सहेज गया। बैल बीमार पड़ा तो उसकी देख रेख, दवा दारू का जिम्मा कुम्हार की पत्नी के जिम्मे आया। मेरी पत्नीजी कहती हैं कि मेरी दशा कुछ कुछ उस कुम्हार की पत्नी की तरह है! :lol:

एक एक शक्तिपीठ दो दो स्थानों पर होने के कई उदाहरण हैं। पड़ोस के रत्नावली शक्तिपीठ जो हुगली जिला में है और जिसके प्रेमसागर कल दर्शन करेंगे, वह इस जगह की बजाय चेन्नै में बताया जाता है। वह स्थान जहां माई का हार गिरा था, वह मैहर में भी है और सईंथिया के नंदिकेश्वरी में भी। शक्तिपीठों का कोई मानक नहीं है। अष्टादस शक्तिपीठों की चर्चा भी की जाये तो उसमें से एक शक्तिपीठ – शृन्खला देवी – अब है ही नहीं। वहां बेचारे प्रेमसागर गये तो उग्र विधर्मी भीड़ ने उन्हें लखेद लिया। उस शक्तिपीठ की जगह अब एक मीनार है।

ज्योतिर्लिंगों के पुनरुद्धार के लिये तो अहिल्याबाई होलकर (और अब नरेंद्र दामोदरदास मोदी) आगे आये। पर शक्तिपीठों की सुध लेने वाले कोई नहीं हैं। जनता अपने स्तर पर जो कर रही है, वही भर है।

मेलाई चण्डी मंदिर बड़े परिसर में है पर वहां पंहुचने का रास्ता संकरा है।

शक्तिपीठों की पदयात्रा की भी कोई परम्परा नहीं है। प्रेमसागर अपनी तरफ से एक कोशिश कर रहे हैं। वह साधन विपन्नता की दशा में कब तक कितनी चलेगी; माई ही जानें।

अरिमित्र बसु

मेलाई चण्डी मंदिर बड़े परिसर में है पर वहां पंहुचने का रास्ता संकरा है। चार चक्का गाड़ी वहां तक नहीं जा सकती। मंदिर के परिसर में बैठने, घूमने की अच्छी व्यवस्था है। सब कुछ बढ़िया है। रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद और मां शारदा की वहां प्रतिमायें स्थापित हैं और उनके चित्र भी प्रेमसागर ने भेजे हैं।

पर इस मंदिर के आसपास रुकने की व्यवस्था प्रेमसागर को नहीं मिली। नेट पर मिली जानकारी के अनुसार सन 2011 में आम्टा की आबादी 16 हजार से अधिक थी। अब यह पच्चीस हजार से ज्यादा होगी। धार्मिक महत्व की जगह है पर कोई धर्मशाला, लॉज या होटल नहीं है।

एक स्थानीय युवक – अरिमित्र बसु ने रुकने की जगह तलाशने में प्रेमसागर की बहुत सहायता की। पर कहीं बात बनी नहीं। एक सज्जन तो किराये पर देने को तैयार भी हुये तो बोले कि एक महीने भर के लिये कमरा देते हैं। उससे कम पर दिया और कोई और ग्राहक आया तो वे क्या करेंगे?

भ्रामरी मेलाई चण्डी शक्तिपीठ


हार कर प्रेमसागर आम्टा से वापस दक्षिणेश्वर लौट आये। शाम लगभग चार बजे उनकी लोकेशन मुझे हुगली नदी के तट पर नजर आई। उन्हें रत्नावली और विभाष की यात्रा सम्पन्न कर लौटना था। यह लौटना जमा नहीं। लगता है कि बारिश के मौसम, कमरा देने के बारे में हुई हील-हुज्जत से उनका मन खट्टा हुआ होगा। उनके पास विकल्प था आगे बढ़ने और किसी और जगह रुकने की सम्भावना तलाशने का। पर दक्षिणेश्वर लौटना ही उन्हें ज्यादा सुविधाजनक लगा होगा।

रमाशंकर जी के यहां वे तीन दिन रुक चुके हैं। तीन दिन और रुकना उनको और उनके परिवार को कैसा लगेगा? मेरे विचार से, किसी के आतिथ्य को ज्यादा दिन खींचना ठीक नहीं है। लेकिन, शायद प्रेमसागर के पास विकल्प नहीं हैं। या शायद मैं किसी के घर रुकने में मेजबान को होने वाली असुविधाओं को ले कर ज्यादा ही सेंसिटिव हूं। यही हाइपर सेंसिटिविटी जिम्मेदार है कि मैं यात्रा पर निकलता नहीं!

बंगाल के मंदिर आगंतुक पदयात्री को रात बिताने को जगह नहीं देते; यह जानना अच्छा नहीं लगा। बंगाल में लोग किसी पदयात्री को अपने ओसारे में एक रात गुजारने को आमंत्रित नहीं करते, यह भी अजीब बात है। बंगला संस्कृति की उदात्तता की खूब बात होती है। पर वह शायद मात्र बांगला भाषियों के लिये ही है। बंगाल को भारत के सभी हिस्सों के लिये खुलना चाहिये।

अब कल प्रेमसागर कैसे यात्रा करते हैं और कहां जाते हैं, वह मुझे भी जानना है।

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

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