तालझारी से दुमका के आगे कुसुमडीह


18 मार्च 23

तालझारी के महाकल मंदिर के प्रमुख प्रकाश जी ने प्रेमसागर को रोकने की कोशिश की। कहा कि नवरात्रि तक वहीं रुकें। पर प्रेमसागर ने बरसात के पहले पहले बंगाल-असम की शक्तिपीठ पदयात्रा पूरा कर लेने की जरूरत बताई। उनका काम ही चलना है। ज्यादा दिन रुक जाने पर चलने की मशीन का तेल शायद जाम हो जाने का खतरा हो जाता हो।

वे रुके नहीं। सवेरे की पूजा अर्चना के बाद निकल लिये। प्रकाश जी ने अपने हितैशी शंकर जी को फोन लगाया। शंकर जी की धर्मशालायें हैं सुल्तानगंज-बाबा धाम के रास्ते में। उनके बहनोई जी का दुमका के आगे एक होटल है। रिया रमन होटल। वहीं रुकने की व्यवस्था कर दी है शंकर जी ने।

सवेरे तालझारी में प्रकाश बाबा के आश्रम से विदा लेने के पहले का ग्रुप फोटो।

पहले तालझारी से निकलने के तीन घण्टे बाद पड़ा बासुकीनाथ। प्रेमसागर बार बार कहते हैं – भईया, बाबा धाम हाईकोर्ट है तो बासुकीनाथ सुप्रीमकोर्ट। बाबाधाम के दर्शन के बाद बासुकीनाथ का दर्शन करना ही होता है। वहां उन्होने दर्शन किया। प्रसाद इत्यादि लिया होगा। मार्केट का चित्र भी भेजा है।

बासुकीनाथ का बाजार

नक्शे के अनुसार बासुकीनाथ और दुमका के बीच प्रेमसागर ने मयूराक्षी नदी पार की होगी। पानी से भरी नदी जैसा कुछ नजर नहीं आया उनके चित्रों में। रेत ही दीखती है। और एक क्षीण सी धारा। ताराशंकर बंद्योपाध्याय के उपन्यास गणदेवता में मयूराक्षी बड़ी नदी है। अब शायद सौ साल बाद वह क्षीण हो गयी हो। नदियों का, बरसात के मौसम से इतर बुरा हाल होता जा रहा है। नदी पर डैम/बैराज बने हैं। शायद पहले पानी रुक गया हो। आगे भी एक जगह मसंजोर डैम दिखाई पड़ता है नक्शे में। पर प्रेमसागर का वहां से गुजरना नहीं होगा।

मयूराक्षी नदी

दामोदर नदी पहले बंगाल का काल कही जाती थी। बाढ़ से बहुत तबाही होती थी। वैसा ही कुछ हाल मयूराक्षी का भी रहा है। दामोदर नदी पर बांध और पानी के दूसरे प्रयोगों से वैसी भीषण बाढ़ अब दामोदर में नहीं आती। शायद वैसा मयूराक्षी के साथ भी हो। अंतिम बाढ़/तबाही कब लाई थी मयूराक्षी? … नेट पर बहुत सामग्री नहीं मिलती। भारतीय मानस नेट पर उथली बातें ठेलता है| जो कुछ मिलता है उसमें बहुधा गहराई नहीं होती। :sad:

दुमका के पहले नंगे पैर चलते प्रेमसागर के पांव में खजूर का कांटा गड़ गया। खुद निकाल नहीं पाये तो रास्ते में एक स्वास्थ्य केंद्र पर डाक्टर साहब से निकलवाया। वहां की पर्ची के चित्र में जगह का नाम लिखा है – सामुदायिक स्वास्थ केंद्र, जामा। वहां पेन किलर भी दिया गया उन्हे। वहीं कांटा निकालने के लिये प्रेमसागर ने सेफ्टीपिन का गुच्छा खरीदा और एक जोड़ी चप्पल भी।

चप्पल पहले क्यूं नहीं खरीदा? कांटा गड़ने का इंतजार क्यूं किया?

प्रेमसागर का तर्क अजीब है। “पहले मंहगा मिल रहा था भईया” … यात्रा की कुछ बेसिक जरूरतें हैं। जूता नहीं पहनना, चट्टी पहनना या नंगे पैर चलना। चप्पल भी सस्ता लेना – कई कई तरह की ग्रंथियां हैं! इन ग्रंथियों के बावजूद (या उनके साथ अपनी श्रद्धा का सम्बल जोड़ कर) प्रेमसागर की लदर-फदर यात्रा चल रही है।

दुमका के बारे में बताते प्रेमसागर कहते हैं – भईया, साफ सुथरी जगह है। लोग भी सीधे हैं और सहायता करते हैं। ज्यादा फोटो नहीं ले पाया। कई जगहों पर फोटो लेने की मनाही थी।

सिद्धू और कानू मुर्मू पर डाकटिकट। Post of India – https://colnect.com/en/stamps/stamp/158245-Sido_Murmu_-_Kanhu_Murmu-History-India, GODL-India, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=98713604 द्वारा

दुमका संथाल परगना का एक प्रमुख शहर है। आदिवासी संथालों की बहुतायत है। सिद्धू और कानू मुर्मू का नाम आजकल बहुत से लोगों ने, राष्ट्रवादी भावनाओंं के उफान युग में बहुत से लोगों ने सुन लिया होगा। पर शायद इतिहास जानने की उत्सुकता उतनी न हो। उन्होने सन 1855-56 में संथाल हूल के नाम से स्वतंत्रता का युद्ध लड़ा ईस्ट इण्डिया कम्पनी और शोषक महाजनों के खिलाफ। साठ हजार संथाल इकठ्ठे हुये। उन्होने इलाके को मुक्त कर लिया। अपनी टेक्स व्यवस्था भी लागू की। अंग्रेज हतप्रभ रह गये थे। पर अंतत: जीत उनकी टेक्नॉलॉजी – गोला बारूद – और तीर कमानों के असमान युद्ध के कारण संथाल विद्रोह दबा दिया गया। सिद्धू और कानू को फांसी दी गयी।

प्रेमसागर की पदयात्रा में इतिहास जानने की और आसपास के स्थानों की घुमक्कड़ी की गुंजाइश नहीं है। डियाकी (डिजिटल यात्रा कथा लेखन) में है। कुछ वर्षों पहले मेरे दामाद ने मालूती की यात्रा की थी। यह मिट्टी से बने अनेक मंदिरों का गांव है और दुमका जिले में ही है। उनके खींचे कई चित्र काफी समय तक मेरे मोबाइल में रहे भी। कभी यह नहीं सोचा था कि प्रेमसागर के साथ डिजिटल यात्रा में उनके पास से गुजरना होगा। विवेक (मेरे दामाद) कामकाजी जीव हैं। मेरे कहने पर वे पुन: मालूती की यात्रा करने से रहे! कितनी जगहें स्मृति में यूं ही धुंधलाते हुये गुम हो जायेंगी। फिलहाल, प्रेमसागर के बहाने उनकी याद हो आयी!

प्रेमसागर ने सोचा कि रिया रमन होटल शायद पातबारी में है। वह जगह उन्हें गूगल मैप पर नजर नहीं आई। मैप अपड़ेट नहीं होता – उसके लिये कामचलाऊ इण्टरनेट कनेक्शन चाहिये। वह शायद नहीं था। सो, अंदाज से ही निकल लिये थे तालझारी से प्रेमसागर। यह सोचते हुये कि शायद पचास साठ किलोमीटर चलना हो। लेकिन दुमका पास होते ही कुसुमडीह में पड़ा रिया रमन होटल।

रिया रमन होटल रास्ते में ही सड़क पर है। “शंकर जी के बहनोई जी के होटल में शाकाहारी-मांसाहारी दोनो तरह का भोजन होता है। मीट मुरगा सब होता है। पर बहनोई जी ने अपने घर से साफ सुथरे भोजन की व्यवस्था की। पनीर की सब्जी, दाल, चावल। हमको कमरे में ही भोजन कराया। बहनोई जी काफी बिजी थे। होटल रात इग्यारह बजे तक चलता रहता है। काम धाम वे संभालते हैं।”

रिया रमन होटल रास्ते में ही सड़क पर है।

कुछ अलग सा नाम है रिया रमन। कोई कृष्ण भक्त तो रखेगा राधारमण। शायद बहनोई जी के बेटी-बेटा हों रिया और रमन। प्रेमसागर को यात्रा में यह जिज्ञासा भी होनी चाहिये कि किसी जगह को कोई नाम क्यूं दिया जाता है। वैसे अपनी मेमोरी में नाम न रजिस्टर करना या गलत रजिस्टर करना प्रेमसागर का बड़ा कमजोर पक्ष है। इसलिये वे नामों और शब्दों को रखने की ओर ध्यान देंगे – मुझे नहीं लगता। उनकी इस कमजोरी के साथ ही मुझे डियाक (डिजिटल यात्रा कथा) लेखन करना है! :lol:

आज छियालीस किलोमीटर चले। आगे करीब 65 किमी बाद नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ है। बंगाल में। कल वहां पंहुचेंगे या रास्ते में कहीं पड़ाव होगा? समय ही बतायेगा।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
*****
प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

देवघर से तालझारी


17 मार्च 23

कल सवेरे साढ़े छ – पौने सात बजे प्रेमसागर ने बाबा धाम दर्शन किये। मंदिर खुला था तो विधिवत दर्शन हुये। मुझे दर्जन भर चित्र ह्वाट्सएप्प पर ठेले और फिर फोन किया। मैं साइकिल चला रहा था। किनारे लगा उनकी बात सुनी – “आज अभी बाबा धाम के दर्शन किये हैं। अभी घण्टा भर बाद निकलूंगा एक टैबलेट ले कर।”

टेबलेट काहे?

“कुछ खास नहीं भईया। हरासमेण्ट है।” – प्रेमसागर का हिंदी शब्द हरारत (थकान, हल्का ज्वर और सामान्य शिथिलता) का शायद अंगरेजी या शहरी तर्जुमा है हरासमेण्ट। तबियत नरम होने पर इस शब्द का प्रेमसागर बहुधा उपयोग करते हैं। अंग्रेजी शब्दकोश में शरीर की दशा के अर्थों में सम्भवत: उसका प्रयोग न होता हो।

सवेरे साढ़े छ – पौने सात बजे प्रेमसागर ने बाबा धाम दर्शन किये।

जब तबियत नरम है तो एक दिन आराम कर लीजिये। मोनू पण्डा और यहां की व्यवस्था तो आपकी जानी पहचानी है। रुकने में कोई परेशानी थोड़े होगी?

प्रेमसागर शायद रुकना चाहते भी थे। उनकी भावना पर एक हामी मेरी ओर से मिली और उन्होने रुकने का निर्णय ले लिया। कल आराम ही किया। बाद में दिन भर के बारे में बताते हुये मुझे बताया – “खूब सोया दिन भर भईया। बीच में जब उठता तो बाबाधाम में जा कर बैठ जाता। फिर वापस आ कर सो जाता। शरीर को जो चाहिये था, वह आराम मिल गया।”

आज सवेरे साढ़े तीन – पौने चार बजे ही निकल लिये प्रेमसागर वासुकीनाथ के लिये। जब आठ बजे मुझसे चित्र भेजने के बाद बात की तो करीब बीस किमी चल चुके थे। घोरमारा में बैठ चाय पी रहे थे। दिन की पहली चाय।

“घोरमारा का पेड़ा एक नम्बर का होता है।”

“घोरमारा वह जगह है जहां बासुकीनाथ जाने वाले यात्री रुक कर बासुकीनाथ का प्रसाद लेते हैं। अभी तो मैं आज की पहली चाय की दुकान देख कर रुक गया हूं। प्रसाद की दुकानें कुछ आगे हैं। बहुत सी हैं। पचास ठो से ऊपर ही होंगी। मेन बात है भईया कि नम्बर एक का दूध का पेड़ा मिलता है वहां। कभी मैं आपको खिलाऊंगा।” – प्रेमसागर ने अपनी कमेण्ट्री दी।

“सवेरे जल्दी निकलना बहुत फायदेमंद है भईया। अब गर्मी हो गयी है। दिन में सड़क तपने लगती है तो चलने में मुश्किल होती है। सवेरे सवेरे खूब चला जा रहा है। अब आगे यही करूंगा। सवेरे जितना हो सके चल कर दिन में आराम और फिर शाम को चलना हुआ करेगा। आगे बंगाल में तो और भी गर्मी होगी। मैं बासुकीनाथ में एक चप्पल खरीदूंगा। बनारस से चलने पर खरीदी पहले वाली चप्पल तो टूट गयी। अब नंगे पैर चल रहा हूं। ज्यादा मंहगी नहीं, पचास – साठ की खरीदूंगा। जितना चले चले, फिर दूसरी।”

जूता क्यों नहीं खरीदते?

“जूते से चलने में थकान ज्यादा होती है। गर्मी का मौसम है। सर्दी का होता तो ज्यादा ठीक रहता जूता। अब चप्पल ही ठीक है।” – प्रेमसागर कहते हैं।

“भईया, बंगाल के शक्तिपीठ तो आप देख लिये होंगे नक्शे में। एक लिस्ट बना लिये होंगे न?” – उनका यह कहना मुझे मनोरंजक लगता है। यात्रा वे कर रहे हैं। प्लानिंग उनकी होनी चाहिये पर धीरे से यात्रा का प्लानिंग वाला पार्ट मेरी ओर सरका दे रहे हैं – मेरी तरफ, जिसने बिहार-बंगाल का यह हिस्सा कभी देखा नहीं। कभी मानसिक रूप से जिस इलाके की कोई छवि भी नहीं बनी। :lol:

प्रेमसागर रास्ते में पड़े त्रिकूट पर्वत की बात किये। रास्ते से तीन किलोमीटर हट कर पर्वत है। “चित्र में आप जरा जूम कर देखियेगा। लगता है पहाड़ को किसी ने तरवार से फारा हो। … मैं वहां कभी गया नहीं। वहां माई का मंदिल है। जब बुलावा आयेगा, तब शायद जाना हो पाये।” त्रिकूट पर्वत के दूर से अनेक चित्र भेजे हैं प्रेमसागर ने। एक चित्र में तो इकहरी रेल लाइन के अंत में क्षितिज पर दीखता है त्रिकूट।

एक चित्र में तो इकहरी रेल लाइन के अंत में क्षितिज पर दीखता है त्रिकूट।

घोरमारा से आगे बढ़ने पर ढाई घंटे बाद फिर फोन आया प्रेमसागर का। कोई जगह है तालझारी। वहां के प्रकाश बाबा ने उन्हें आज के लिये रोक लिया है। प्रकाश बाबा भी कांवर यात्री रह चुके हैं।

“मैं डब्बा में जल ले कर चलता था और प्रकाश बाबा सुराही (मिट्टी के संकरे मुंह वाले बर्तन) में जल ले कर चला करते थे। उन्होने यहां महाकाल शिवजी का मंदिल (मंदिर) और आश्रम बनाया है। एक गौशाला भी है। बाउण्ड्री का काम अभी होना है। प्रकाश बाबा दरभंगा जिला के हैं। वे उज्जैन से शिवलिंग ला कर यहां स्थापित किये हैं। भजन-पूजन और यज्ञ आदि करते हैं। मेरे लिये बहुत स्नेह है। उन्होने कहा तो रुक ही गया हूं। मोटामोटी अठ्ठाईस किलोमीटर चल चुका हूं।” – प्रेमसागर ने बताया।

तारझारी। वहां के प्रकाश बाबा ने उन्हें आज के लिये रोक लिया है।

पहले इतनी जानकारी लेने के लिये मुझे कम से कम पांच साल सवाल करने होते थे। अब वह प्रेमसागर खुद बता ले रहे हैं। वे समझ गये हैं कि मुझे किस तरह की जानकारी चाहिये और वे शायद अपनी ओर से तैयार रखते हैं। या फिर यह हो सकता है कि देवघर-वासुकीनाथ उनका अपना बैटिंग-फील्ड है और यहां वे ज्यादा सहज महसूस करते हैं।

मैंने पूछा – भजन-पूजन करते हैं प्रकाश बाबा तो कैसी आवाज है गाने में? क्या उनका गायन ह्वाट्सएप्प पर रिकार्ड कर भेज सकते हैं आप?

“हां हां। जब गायेंगे तो भेजूंगा। आप से उनकी बात भी करा दूंगा।” – प्रेमसागर ने कहा। पर उसके बाद पूरे दिन लगता है तालझारी में प्रकाश बाबा के आतिथ्य में मगन रहे प्रेमसागर। मुझे फोन करने का या ह्वाट्सएप्प पर संदेश भेजने का समय नहीं निकाल पाये।

अब कर वासुकीनाथ के लिये निकलना होगा। वह तालझारी से बीस किलोमीटर से कम ही दूरी पर है। कल भी ज्यादा चलना नहीं होगा। कल ही बात होगी प्रेमसागर से।

आप कृपया प्रेमसागर की यूपीआई पते पर सहायता करने पर विचार करें। वे आप जैसों के सहयोग से ही आगे बढ़ रहे हैं। आगे बंगाल में अनजान जगह और भाषाई अपरिचय के कारण उन्हें आर्थिक सहयोग की ज्यादा ही जरूरत होगी।

हर हर महादेव। जय वासुकीनाथ। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
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टोला डुमरी से देवघर


15 मार्च 23

आज रास्ता लम्बा था। छप्पन किलोमीटर का। मुझे यकीन नहीं था कि प्रेमसागर उसे पूरा चल पायेंगे। पर शायद प्रेमसागर को था। सवेरे छ बजे के पहले निकले होंगे वे टोला डुमरी खास से। रेत का इलाका जल्दी ही खत्म हो गया। घण्टे भर में ही। उसके बाद पहाड़ और जंगल। दो घाटियां पड़ीं – चकाई और रांगा। प्रेमसागर के शब्दों में रास्ता अंग्रेजी का डब्ल्यू बनाता था। ऊपर नीचे होता हुआ।

चकई घाटी में एक अजीब घटना हुई। एक बूढ़ा और अपंग आदमी एक लाइन होटल वाले से खाने को मांग रहा था और होटल वाले ने उसे दुत्कार दिया। प्रेमसागर को दुत्कारना बुरा लगा। बूढ़े से बातचीत की तो उसने बताया कि पास के गांव का है वह। उसकी पतोहू जंगल से लकड़ी काट कर लाती है। उसे बेच कर वे भोजन का इंतजाम करते हैं। पतोहू बीमार है। जंगल नहीं जा पा रही। खाने को नहीं है। तो उसने दो दिन से खाना नहीं खाया है।

प्रेमसागर ने अपने पास मौजूद चिवड़ा और चीनी उस वृद्ध को दिया। अपने पास से एक प्लास्टिक की बोतल में उसे पानी भी दिया।

प्रेमसागर ने अपने पास मौजूद चिवड़ा और चीनी उस वृद्ध को दिया। साथ में रोती उसकी पोती को दस रुपये बिस्कुट लेने को दिये। अपने पास से एक प्लास्टिक की बोतल में उसे पानी भी दिया। चिवड़ा-चीनी-पानी का भोजन पा कर वृद्ध ने आशीर्वाद दिया – आगे तुम्हारी यात्रा सकुशल और सफल होगी।

चिवड़ा-चीनी-पानी का भोजन पा कर वृद्ध ने आशीर्वाद दिया – आगे तुम्हारी यात्रा सकुशल और सफल होगी।

सहायता करने और वह आशीर्वाद पाने से प्रेमसागर जरूर रोमांचित हुये होंगे। उन्होने तुरंत फोन कर मुझे इस घटना की जानकारी दी। लगा कि महादेव स्वयम परीक्षा ले रहे हों प्रेमसागर की करुणा और दया की। और वे उसमें पास हो गये हों।

आगे ऊंचाई और नीचाई पड़ी जंगली इलाके की। पलाश फूला था चटका लाल लाल। “भईया, ऐसा लग रहा था मानो माई यात्रा में मुझे आशीर्वाद दे रही हों लाल रंग के फूल बिछा कर।” माता को लाल रंग प्रिय है।

कई जगह सड़क छोड़ पगडण्डी पकड़ चले प्रेमसागर। उससे आराम भी रहा और दूरी भी कुछ कम हुई। “फिर भी बहुत चलना पड़ा भईया आज। और ऊंचाई-नीचाई के कारण मेहनत भी रही। लेकिन गया वाले दिन (उस दिन 74 किमी चलना पड़ा था गया में जगह न मिल पाने से) से कम ही चलना पड़ा। कच्चे रास्ते चलते हुये मैं सीधे माधोपुर पंहुचा। वहां से बिहार-झारखण्ड बार्डर पास ही है। मन में बाबा धाम में पंहुचने का जोश तो था ही।” – प्रेमसागर ने शाम के समय बाबा धाम – देवघर पंहुच कर बताया।

“भईया, ऐसा लग रहा था मानो माई यात्रा में मुझे आशीर्वाद दे रही हों लाल रंग के फूल बिछा कर।”

रास्ते में सड़क किनारे कई जगह टेबल लगाये सत्तू का शर्बत बेचते लोग थे। जहां भी वे मिले, प्रेमसागर ने सत्तू पिया। उससे ऊर्जा भी मिली और शरीर को पानी भी। करीब 8-9 जगह सत्तू का शर्बत पिया होगा, प्रेमसागर बोले। दस रुपये का एक ग्लास सत्तू। उसके अलावा रास्ते में एक जगह रसगुल्ला खा कर पानी पिया। इन्ही के बल पर 56 किमी की यात्रा सम्पन्न की।

देवघर से पहले नदी पड़ती है। मयूराक्षी नाम है गूगल मैप पर। मैंने उसके बारे में पूछा।

“भईया अंधेरा हो गया था सो फोटो नहीं ले पाया। नदी में पानी रहता है पर पहले कहीं पानी रोकने का फाटक लगा है। पानी सिंचाई के काम लाते होंगे। इसलिये पानी कम था। बरसात के मौसम में खूब पानी होता है। और इस साल बारिश भी कम ही हुई है। पानी कम होने का वह भी कारण है।”

मोनू पण्डा जी ने बाबा बैजनाथ के मंदिर पर दण्डवत के बाद पास की दुकान में जलपान कराया।

बाबाधाम में अनेक बार कांवर के साथ आने के कारण बहुत से लोग प्रेमसागर के परिचित हैं। मोनू पण्डा जी ने उनके रहने का इंतजाम किया है। सामान रख बाबा बैजनाथ को प्रणाम करने गये प्रेमसागर। रात हो गयी थी, तो मंदिर बंद हो गया था। बाहर से ही बाबा को दण्डवत किया। कल वे सवेरे पुन: आयेंगे दर्शन करने। दर्शन के बाद ही रवाना होंगे वासुकीनाथ के लिये।


मेरे अनुसार, प्रेमसागर में लम्बी यात्राओं से बड़े सार्थक परिवर्तन हुये हैं। प्रकृति के दर्शन और ईश्वर के प्रति श्रद्धा में कोई विरोधाभास नहीं है – यह उन्हें समझ में आया है। गूगल नक्शे का बेहतर प्रयोग करने लग गये हैं। भौगोलिक स्थिति का अध्ययन, लोगों का व्यवहार, आदतें आदि देखने समझने की ड्रिल ने उनके व्यक्तित्व को निखारा है।

और दिन यात्रा विवरण लिखने में मुझे बहुत प्रश्न करने होते हैं और बहुत से इनपुट मुझे खुद को खंगालने होते हैं। आज वह उतना नहीं करना पड़ा। बाबाधाम प्रेमसागर का अपना क्षेत्र है और वहां पंहुचने की ललक ने प्रेमसागर को स्वत: मुखर बना दिया है। अपने से ही वे छोटी छोटी जानकारियां देते गये मुझे। इसके अलावा पलाश वन की लालिमा के साथ माई के आशीर्वाद की कल्पना करना अच्छा लगा। प्रेमसागर यात्रा विवरण देने-लिखने की बारीकियां समझने लगे हैं। जानने लगे हैं कि वह मात्र चित्र देना या घटना की बेसिक जानकारी देना भर नहीं होता। उसमें यह भी जानने की जिज्ञासा का भाव लाना होता है कि कोई चीज कैसी क्यों है। मयूराक्षी में पानी अगर कम है तो क्यों है। रास्ता अगर अनड्यूलेटिंग है तो उसे डब्ल्यू कहा जा सकता है। हां, उस बूढ़े की अपंगता नहीं बताई उन्होने अपने से। वह तो चित्र में साइकिल का चक्का देख मैंने पूछा, तब उन्होने बताया कि वह अपंग था और ट्राईसाइकिल से चल रहा था।

मेरे अनुसार, प्रेमसागर में लम्बी यात्राओं से बड़े सार्थक परिवर्तन हुये हैं। प्रकृति के दर्शन और ईश्वर के प्रति श्रद्धा में कोई विरोधाभास नहीं है – यह उन्हें समझ में आया है। गूगल नक्शे का बेहतर प्रयोग करने लग गये हैं। भौगोलिक स्थिति का अध्ययन, लोगों का व्यवहार, आदतें आदि देखने समझने की ड्रिल ने उनके व्यक्तित्व को निखारा है। पर लोगों, स्थानों आदि के नाम सही सही सुनना और याद रखना उनका बहुत ही कमजोर पक्ष सतत बना हुआ है। इसको ले कर कभी कभी बहुत खीझ होती है। इस विषय पर समय मिलता रहेगा लिखने के लिये। :lol:


देवघर में अपने सहायक कुछ मित्रों के साथ प्रेमसागर। बीच में हैं शंकर जी और दांये हैं ताराकांत झा।

मोनू पण्डा जी ने बाबा बैजनाथ के मंदिर पर दण्डवत के बाद पास की दुकान में जलपान कराया। रात में भोजन भी उन्हे के सौजन्य से होगा। रहने की व्यवस्था तो है ही। अगले दिन बैजनाथ धाम दर्शन के बाद आगे निकलेंगे प्रेमसागर वासुकीनाथ के लिये। वासुकीनाथ दर्शन के बाद उन्हें बंगाल में धंसना है।

जब यात्रा प्रारंभ की तो मध्यप्रदेश था. उसके बाद उत्तर प्रदेश और फिर बिहार। अब झारखंड। चार प्रांतों की धरती पर चल चुके हैं प्रेम सागर!

हर हर महादेव! जय बाबा बैजनाथ! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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