दो शक्तिपीठ – फुल्लारा देवी और कंकालिताला देवी दर्शन


21 मार्च 23

कल प्रेमसागर ने बीरभूम जिले में नंदिकेश्वरी देवी के दर्शन किये थे। उनका नौवां शक्तिपीठ दर्शन। अब वे आगे के शक्तिपीठों की ओर चल रहे हैं।

चैत्र नवरात्रि दो दिन बाद प्रारम्भ होने जा रही है। बंगाल में लोगों के वेष बदलने लगे हैं। लोग लाल धोती और लाल कुरते में नजर आने लगे हैं। प्रेमसागर ने अपना एक जोड़ी लाल कुरता धोती पानी में भिगो कर साफ करने छोड़ दिया है। यात्रा के दौरान वे साबुन का प्रयोग नहीं करते, सो कपड़े साफ करने के लिये मात्र पानी का ही प्रयोग होता है। उनके पास एक दूसरी जोड़ी लाल टी-शर्ट और धोती है। वही पहन कर आज पदयात्रा को निकले।

रुके वे लड्डू शाह के मौचक रेजीडेंशियल लॉज में हैं। यह सैंथिया रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के पास है। वहां से सवेरे पौने छ बजे निकल कर; मयूराक्षी के बगल से दो किलोमीटर चलते हुये अट्टहास के फुल्लारा देवी शक्तिपीठ के लिये दक्षिण की ओर मुड़े। बारिश हुयी है। मौसम में धुंध है। दृश्यता कम है। चित्र साफ नहीं आ रहे।

बारिश हुयी है। मौसम में धुंध है। Slide Show

ताल और कुंये ज्यादा दीख रहे हैं। हर सम्पन्न ग्रामीण के पास एक ताल है। ताल का रखरखाव अच्छा है। ताल सिंचाई और मत्स्य पालन – दोनो के लिये है। जगह जगह धान की बुआई की गतिविधियां चल रही हैं।

चलते चलते प्रेमसागर बताते हैं – “भईया बंगाल भोजन के लिये बहुत सस्ता है। तीन रुपये की चाय है। वही चाय हमारे इलाके में पांच-दस रुपये की है। और क्वालिटी में यह चाय बीस ही होगी, उन्नीस नहीं। रसगुल्ला पांच रुपये में है। जिस साइज का रसगुल्ला हमारे यहां पंद्रह से पच्चीस रुपये का होता है, वह यहां दस रुपये का है। मन होता है फ्रिज की सुविधा हो तो ढेर सारा खरीद कर यहां से ले जाया जाये। मैंने दूध का भाव पता नहीं किया; पर सस्ता ही होगा।”

“आज निकलने के दस पंद्रह किलोमीटर पर अजीब घटना हुई। एक पुलिया पर मैं सुस्ताने बैठा था तो मेरा वेश देख कर दो तीन खेत मजदूर मेरे पास आये। मेरे बारे में पूछने लगे। बताने पर कि मैं लम्बी लम्बी पदयात्रायें कर रहा हूं, उनका भाव बदला। वे कहने लगे कि वे मुसलमान हैं, पर उनके पूर्वज तो हिंदू ही थे। ज्यादा टाइम नहीं हुआ। उनके बाबा 18-20 साल के थे तब धर्म बदला। उनके घर में रामायन-गीता है पर उसके बारे में बोल नहीं पाते। उस सब के बारे में बोलो भी तो धमकी मिलती है। मैं उनका फोटो लेने लगा तो उन्होने मना किया कि बाबा वह मत करिये और हमारे बारे में भूल कर भी कहियेगा नहीं।”

जगह जगह धान की बुआई की गतिविधियां चल रही हैं।

“भईया वे सरल लोग थे। मुझे बताया कि रास्ते की बजाय इस खेत खेत निकलेंगे तो तीन किलोमीटर चलना बच जायेगा। अगर खेत के बीच चलने में अड़चन लगती हो तो कुछ दूर वे साथ चल सकते हैं। उनके मुसलमान होने से मैं असहज था पर उन्होने बहुत अच्छे से बात किया और कोऑपरेट किया।”

इस घटना से मुझे गाजीपुर जिले की प्रेमसागर की कही बात याद आयी। उत्तरप्रदेश के उस जिले से गुजरते हुये प्रेमसागर ने मुझे बताया था कि जब भी वे किसी चाय की दुकान पर बैठते थे तो वहां मुसलमान और समाजवादी पार्टी वाले उनका वेश देख कर मुख्तार अंसारी के खिलाफ की गयी कार्रवाई को ले कर बहुत आक्रोश जताते मिलते थे। वे कई बार प्रेमसागर को उकसा कर प्रतिक्रिया करने को बाध्य भी करते थे। “पर भईया हम तो चुपचाप चाय पी कर पैसा दे कर वहां से चल देते थे। उनसे उलझने की कभी कोशिश नहीं की। हमें तो अपनी यात्रा निर्विघ्न पूरी करनी है। अपने आचरण को मुझे बहुत संयत रखना होता है भईया। कोई भी गलत बात बोलना परेशानी में डाल सकता है। कई बार तो एक शब्द हमारी भाषा में सही होता है पर दूसरे लोग उसका उलटा ही अर्थ लेते हैं।”

फुल्लारा देवी के दृश्य – स्लाइड शो।

दोपहर बारह बजे प्रेमसागर ने पच्चीस किलोमीटर चल कर फुल्लारा मां के दर्शन किये। “भईया छोटी जगह है। साफ सुथरा है। शांति है। बहुत अच्छा लगा वहां। यह जान कर कि मैं पदयात्री हूं, यहां और आगे कनकलिताला में भी पुजारी महराजों ने मेरा तिलक किया और आशीर्वाद के रूप में पीठ पर हाथ रखा। कहा कि सनातन धर्म के लिये यह करते रहो।”

अट्टहास (फुल्लारा) में सती के नींचे का ओठ गिरा था। फुल्लारा का अर्थ है पुष्प की तरह खिलना। यहां विश्वेश भैरव हैं। देवी यहां सभी कामनायें पूरा करती हैं – ऐसा पीठ निर्णय तंत्र में है। पता नहीं प्रेमसागर ने क्या कामना की। मैंने पूछा नहीं उनसे। अगली बार पूछूंगा कि शक्तिपीठों में सिर नवा कर ध्यान करते समय उनके मन में क्या कामना/आशा रहती है।

छोटी शांत जगह है अट्टहास और जंगल का इलाका था। यहां आने पर मन स्वत: अंतर्मुखी हो जाता है। बाहरी शोर खत्म हो जाता है। तभी सुनाई देता होगा माई का अट्टहास और तभी उनका खिलना महसूस होता होगा। मैं गूगल मैप पर लोगों की टिप्पणियाँ पढ़ता हूं, और उनमें कुछ ऐसे ही भाव हैं।

फुल्लारा माता के दर्शन के बाद प्रेमसागर ने पंद्रह बीस मिनट वहां विश्राम किया। मुझे फोन किया। उनके स्वर में उपलब्धि का भाव था। यहां दर्शन पर दस शक्तिपीठ वे सम्पन्न कर चुके। आगे चल कर शाम के पहले वे कंकालिताला माता के भी दर्शन कर लिये। इग्यारहवें शक्तिपीठ के दर्शन हो गये।

कंकालिताला माता के दृश्य। स्लाइड शो।

कंकालिताला में माता का वपु काली का है। वे मानस और मसान – दोनो में निवास करती हैं। यह स्थान बोलपुर में है। शांतिनिकेतन से आठ दस किमी दूर। यहां सती की कमर की अस्थियां गिरी थीं। अस्थियां इतनी जोर से गिरी थीं कि वहां गड्ढा बन गया। जो सरोवर (कुण्ड) के रूप में विद्यमान है। यह कुण्ड ही वास्तव में शक्तिपीठ है। पर इसके पास ही पूजा के लिये पार्वती जी का मंदिर बना है।

स्थान को “कंकाली” कहा जाता है। कंकाल अर्थात शरीर का अस्थि-ढांचा। भक्तों को विश्वास है कि सती की अस्थियां इस कुण्ड में अभी भी विद्यमान हैंं!

कंकालीताला को अन्य मंदिरों की तरह मुगल काल में नष्ट किया गया था। दिल्ली की मुगलिया सरकार के सेनापति काला पहाड़ (जो धर्म परिवर्तन के पहले राजीबलोचन राय था) ने जगन्नाथ पुरी, कामाख्या और कंकालीताला को क्षतिग्रस्त किया था।

कंकालिताला दर्शन के बाद वे रेलवे स्टेशन पर पंहुचे तो ट्रेन पंद्रह मिनट में आने ही वाली थी। जल्दी से टिकट लिया। तीस रुपये का टिकट। उसके बाद एक घण्टे से पहले ही वे सैंथिया जंक्शन के पास मौचक लॉज में आ चुके थे। तेरह चौदह घण्टे की यात्रा, जिसमें वे पैंतालीस किलोमीटर पैदल चले; करने से वे दो शक्तिपीठों के दर्शन सम्पन्न कर पाये। एक दिन में इतनी प्रगति, इतने व्यवस्थित तरीके से शायद ही हो।

दोनो शक्तिपीठों के इतिहास की जानकारी बढ़ा कर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। पर उतना शायद ब्लॉग में सम्भव न हो सकेगा। कभी पुस्तक लिखने का नम्बर लगे तो पुनर्लेखन की मेहनत होगी!

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

कुलुबंदी से नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ, बीरभूम, बंगाल


20 मार्च 23

झारखण्ड – बंगाल सीमा से नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ 25-26 किलोमीटर पर है। प्रेमसागर अगर वहां चट पट दर्शन कर अगले शक्तिपीठ की ओर निकलने की उतावली न दिखायें और दिन भर शक्तिपीठ का वातावरण समझने-सूंघने में लगायें तो इतनी लंबी लंबी पदयात्रा करने का ध्येय सार्थक हो सकेगा।

इतने दिन बाद भी मैं समझ नहीं पाया कि प्रेमसागर का यात्रा ध्येय क्या है। पदयात्रा ध्येय है या पदयात्रा जल्दी जल्दी पूरा करना ही ध्येय है। पिछली द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा में संकल्प का बंधन था। यात्रा पूरा करना ध्येय था। यह यात्रा तो स्वप्न की प्रेरणा से है। मातृशक्ति ले जा रही हैं यात्रा पर। कहां कहां ले जायेंगी और कैसे ले जायेंगी, माता पर ही छोड़ना चाहिये।

पर मै प्रेमसागर का कोई यात्रा सलाहकार नहीं हूं। बड़े बड़े पण्डित-भक्त लोग उनको गाइड करने वाले हैं। हर विद्वान उन्हें अपने सुझाये तरीके से यात्रा करा रहा है!

खैर, अगर यात्रा ही अपने आप में ध्येय है तो यात्रा को ही उन्हें माता का प्रसाद मान कर उसमें रस लेना चाहिये। पर मेरी सलाह तो खांटी धरम-करम वाली सलाह नहीं है। देखें, वे क्या करते हैं। वैसे आज मेरी सलाह मान कर वे नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के समीप लॉज में ही रुक गये। आज ही आगे बढ़ कर 50-60 किलोमीटर चलने की जल्दी नहीं दिखाई। मंदिर, परिवेश और वातावरण को देखने समझने का प्रयास किया।

आज का दिन वैसे भी उत्फुल्लता का था। रात में बारिश हुई थी। सवेरे सड़कें गीली थीं।

आज का दिन वैसे भी उत्फुल्लता का था। रात में बारिश हुई थी। सवेरे सड़कें गीली थीं। बीरभूम जिले का जंगली इलाका था। बढ़िया लगा चलने में। बीरभूम बंगाल के बर्दवान डिवीजन का उत्तरी-पश्चिमी जिला है। संथाल आदिवासी बहुल। संथाली भाषा में बीर का अर्थ वीर नहीं, जंगल होता है। बीरभूम यानी जंगल की भूमि। अपने नाम को सार्थक करता जिला है। और यह शाक्त श्रद्धा का गढ़ है। कई शक्तिपीठ हैं यहां। अगले सप्ताह भर में प्रेमसागर उन्ही के दर्शन करेंगे।

झारखण्ड के छोटा नागपुर पठार के इलाकों की तरह यहां भी जमीन में कोयला बहुत है। कोयले की खदाने और रेल के वैगनों-रेकों में कोयले का लदान होता है। नंदिकेश्वरी मंदिर के समीप ही रेल का जंक्शन है। सैंथिया जंक्शन।

झारखण्ड-बंगाल की सीमा से पैदल आते हुये प्रेमसागर को कई जगह चूने पत्थर के ढेर नजर आये।

झारखण्ड-बंगाल की सीमा से पैदल आते हुये प्रेमसागर को कई जगह चूने पत्थर के ढेर नजर आये। लाइमस्टोन भी निकलता होगा खदानों से और अगर वह है तो सीमेण्ट बनाने वाले कहां चूकेंगे। उसके लिये दो जरूरी तत्व – चूना और कोयला तो एक ही जगह उपलब्ध है। मैंने जानकारी अभी तलाशी नहीं, पर बीरभूम जिले में ताप विद्युत, सीमेण्ट बनाने और कोयले की खदानों के बारे में काफी जाना जा सकता है।

वैसे बीरभूम जिले की सरकारी वेबसाइट ने (आम तौर पर जैसा होता है) निराश ही किया। विकिपेडिया उससे कहीं बेहतर सोर्स है जानकारी का।

प्रेमसागर ने रास्ते में धान की रुपाई करते किसान-श्रमिक देखे।

जिले की पचहत्तर फीसदी आबादी, बावजूद खनिज सम्पदा के, कृषि पर अवलम्बित है। प्रेमसागर ने रास्ते में धान की रुपाई करते किसान-श्रमिक देखे। लोगों ने बताया कि कोई कोई दो और कोई तीन धान की फसल भी लेता है खेत से। आबादी का दबाव है और खेतों की जोत बड़ी नहीं है। बावजूद इसके कि दशकों यहां साम्यवादी विचारधारा की सरकारें रही हैं, खेती सामुदायिक नहीं, व्यक्तिगत दीखती है।

धान बहुत दीखा प्रेमसागर को रास्ते में। जगह जगह बड़ी बड़ी धान की बोरियां। “एक राइस मिल तो इतनी बड़ी थी, भईया जैसे कोई बहुत बड़ी फेक्टरी हो।” – प्रेमसागर ने बताया।

मयूराक्षी के बगल से चलना हुआ काफी हिस्से में। इस नदी को पार कर सैंथिया स्टेशन के पास नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ पड़ा। “भईया मेन ब्रिज की मरम्मत चल रही थी। एक दूसरे छोटे पुल से आना पड़ा। नदी का पाट बहुत बड़ा है पर पानी बहुत कम है।” – प्रेमसागर ने बताया।

मौचक लॉज और लड्डू शाह जी का धुंधला चित्र। इस लॉज में प्रेमसागर अगले कुछ दिन रुकने की सोच रहे हैं।

नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ, बस अड्डे और सैंथिया जंक्शन के पास ही है मौचक लॉज। मौके की जगह पर। इसके मालिक बनारस में वाराही माता जी के दर्शन की लाइन में प्रेमसागर के आसपास ही खड़े थे। यहां उन्होने प्रेमसागर को पहचान लिया। फिर तो प्रेमसागर को आश्वासन मिल गया कि जितने दिन भी रहना है, वे यहां रह सकते हैं। “कुल चारसौ अस्सी रुपया किराया है दिन भर का और साथ में भोजन चाय भी उपलब्ध हो रही है। बहुत साफ सुथरी और अच्छी जगह है। कहीं से भी ट्रेन या बस से आ कर आसानी से लॉज में पंहुचा जा सकता है।” – प्रेमसागर ने लॉजिस्टिक फायदे गिनाये। लॉज के मालिक लड्डू शाह जी का अच्छा चित्र नहीं ले पाये प्रेमसागर। जो धुंधला और हिला हुआ चित्र खींचा, वही ब्लॉग में लगा दिया है मैंने।

मंदिर परिसर में वृक्ष भी है और उसपर लिपटे मनौती के धागे भी। भक्तिमय वातावरण है वहां। भक्ति है, भय नहीं है।

नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के बारे में कहा जाता है कि यहां सती का हार गिरा था। सती के हार गिरने की कथा मैहर (माई का हार) में भी है। सती क्या एकाधिक हार पहने थीं? कहीं कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। शक्तिपीठ स्त्रोत के अनुसार यहां के भैरव नंदिकेश्वर हैं – नंदी के देव। नंदिनी माता का शाब्दिक अर्थ है ‘जो आनंद की देवी हैं’। और आज प्रेमसागर जाने अनजाने में आनन्दित ही लगे अपनी बातचीत में मुझे। एक बड़ा सा प्रस्तर खण्ड है, गोल सा, जिसपर सिंदूर पुता है कि सब कुछ लाल नजर आता है। देवी का वही प्रतीक है। उसी की पूजा करते हैं भक्त।

[Slide Show] माता पार्वती के उदात्त और प्रेममयी स्वरूप नंदिनी की पूजा का स्थल है नंदिकेश्वरी मंदिर। दीवारों पर माता के विभिन्न रूपों के बड़े सुंदर चित्र उसी तरह सजाये गये हैं, जिस तरह की कल्पना उनकी पुराणों में की गयी है।

मंदिर परिसर में वृक्ष भी है और उसपर लिपटे मनौती के धागे भी। भक्तिमय वातावरण है वहां। भक्ति है, भय नहीं है। माता पार्वती के उदात्त और प्रेममयी स्वरूप नंदिनी की पूजा का स्थल है नंदिकेश्वरी मंदिर। दीवारों पर माता के विभिन्न रूपों के बड़े सुंदर चित्र उसी तरह सजाये गये हैं, जिस तरह की कल्पना उनकी पुराणों में की गयी है।

कल प्रेमसागर अपना सामान यहीं रख कर आसपास के एक दो अन्य शक्तिपीठों की पदयात्रा करेंगे और वहां से किसी वाहन द्वारा वापस लॉज में लौट आयेंगे। “भईया, सामान नहीं रहेगा तो चलना भी तेज तेज हो पायेगा।” – प्रेमसागर ने मुझे अपनी कल की स्ट्रेटेजी बताई। वे ट्रेनों और बसों के समय की जानकारी और किराया भी पता कर चुके हैं।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

कुसुमडीह से कुलुबंदी – झारखण्ड बंगाल बॉर्डर


19 मार्च 23

कुसुमडीह में रिया रमन होटल से सवेरे रवाना होते समय अंदाज नहीं था कि शाम तक कहां होगा पड़ाव। झारखण्ड में या बंगाल में? कोई मंदिर मिलेगा या धर्मशाला या होटल या फिर पीपल का पेड़।

होटल से सटी है वह ट्विन दुकान – बाबा बासुकी पान भण्डार प्लस बाबा बासुकी चाय भण्डार।

सवेरे रिया रमन होटल से निकलते ही चाय की दुकान मिल गयी। होटल से सटी है वह ट्विन दुकान – बाबा बासुकी पान भण्डार प्लस बाबा बासुकी चाय भण्डार। आगे के रास्ते के बारे में प्रेमसागर ने बताया कि घर ज्यादातर खपरैल के हैं। उन्होने दूर बैलगाड़ी चलती देखी। लोग सामान ढोने में और बांस आदि ले जाने में बैलगाड़ी का इस्तेमाल करते हैं। सागौन के ज्यादा वृक्ष हैं। लोग सीधे हैं। जो दुकान इत्यादि लगाये हैं, वे कुछ चालाक भी हैं।

घर ज्यादातर खपरैल के हैं।

दुमका झारखण्ड के जंगल भी समेटे है। जैसे जैसे आगे बढ़ रहे हैं प्रेमसागर, जंगल भी बढ़ रहा है। आदिवासी घर भले ही खपरैल के हों, उनमें सुविधायें कम हों, टीवी के एण्टीना ज्यादा न दीखते हों, पर घर साफ दीखते हैं। घर के बाहर की जमीन बहुधा मिट्टी से लीपी हुई होती है। उनकी मुर्गियां और बकरियां सड़क पर भी आ जाती हैं। इक्कीसवीं सदी में भी उनका जंगल से समीकरण (बदला भले है) गड़बड़ाया नहीं है।

हाथियों के एक स्थान से दूसरे में आने-जाने का रूट यहीं से है। झुण्ड में चलते हैं। चेतावनी के बोर्ड जगह जगह लगे हैं। लोग अपने पास मशाल-ढोल और पटाखों का इंतजाम करते हैं। हाथियों से दूर रहना चाहते हैं। उन्हें छेड़ने पर खुद का ही नुक्सान है – यह लोग भली तरह जानते हैं। पर हाथी और मनुष्य में इलाके के वर्चस्व की लड़ाई तो है और उसे नकारा नहीं जा सकता। चेतावनी बोर्डों पर हाथी दीखने पर वन विभाग को सूचित करने का संदेश लिखा रहता है।

अजगर? प्रेमसागर को लोगों ने चेताया कि अजगर भी दिख सकते हैं रास्ते में। छोटे जीव, मसलन बकरी का बच्चा उनके शिकार होते हैं। उन्हे बता दिया है कि अजगर दिखे तो घबराना नहीं है। दूर से बचते हुये निकल जाना है।

दिन भर चलते रहे प्रेमसागर और शाम चार बजे से रात के पड़ाव तलाशने की कवायद शुरू हो गयी। मंदिरों में पूछना शुरू किया गया। मैंने उनकी लाइव लोकेशन देखी तो वे किसी रानीश्वर नामक जगह के समीप थे। जो रास्ता उन्हें नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ के लिये लेना था उससे थोड़ा हट कर थे पर ज्यादा हट कर नहीं। उनके दांई ओर मयूराक्षी नदी थी। लगभग समांतर चल रहे थे वे नदी के। गूगल मैप पर मैंने देखा कि रानीश्वर में एक बड़ा शिव मंदिर था – रानीश्वर नाथ मंदिर। जो चित्र उस मंदिर के गूगल मैप पर थे, उसमें एक बड़ा नंदी मंदिर के बाहर चबूतरे पर बैठे थे। लगभग उसी आकार के जैसे काशी विश्वनाथ मंदिर में ज्ञानवापी को फेस करते बड़े नंदी हैं। मैंने प्रेमसागर को सुझाव दिया वहां पंहुच कर कोशिश करें रात्रि विश्राम की। वह जगह नक्शे के हिसाब से एक डेढ़ किलोमीटर दूर थी।

रानीश्वर नाथ मंदिर

पांच बजे फिर पूछा तो प्रेमसागर के स्वर में निराशा थी – “मंदिर में पुजारी नहीं हैं, पण्डा हैं। वे मंदिर बंद कर अपने घर चले जाते हैं। परिसर में किसी पेड़ के नीचे भी रात गुजारना ठीक नहीं था। चार पांच विक्षिप्त से लोग वहां दिख रहे थे। पागल से। उनके बीच रुकना ठीक नहीं है। लोगों ने बताया है कि पास में एक किलोमीटर पर लक्की हार्डवेयर स्टोर है। उसके मालिक आने जाने वाले यात्रियों के रहने का इंतजाम करते हैं। अब वहीं जा रहा हूं।”

घण्टे भर बाद और भी निराशा – “आगे कोई लाइन होटल (ढाबा) तलाश रहा हूं। लक्की हार्डवेयर के यहां बात नहीं बनी। उसके मालिक जी, जो इंतजाम करते थे, गुजर गये हैं।”

उसके आधे घण्टे बाद – “झारखण्ड-बंगाल बॉर्डर की ओर चल रहा हूं भईया। एक जगह मिली थी वह पांच सौ मांग रहे थे रात भर रुकने का। उसमें तो कोई तकलीफ नहीं थी, पर उनके पास पेटीएम नहीं था। मेरे पास कैश में दो-तीन सौ भर ही था। ज्यादा पैसा जेब में रखना ठीक नहीं समझता मैं। अब झारखण्ड बॉर्डर पर कोई न कोई होटल मिल जायेगा। आप फिकर न करें भईया।”

रानीश्वर का एक दृश्य

प्रेमसागर की आवाज में अनिश्चय था और बेचैनी भी। पर मैं उन्हें बार बार फोन कर रहा था तो उन्हें लगा कि मैं शायद ज्यादा व्यग्र हूं। वे मुझे ढाढस बंधा रहे थे। मैं, जिसके पास घर की पूरी सुविधायें और आराम था। उनके पास तो उनकी लाठी, पिट्ठू और मोबाइल भर था। गूगल मैप पर शेयरिंग बता रही थी कि उनके मोबाइल की बैटरी भी 34 प्रतिशत बची है। इससे पहले कि बैटरी डाउन हो जाये, उन्हें कोई न कोई जगह मिलनी ही चाहिये।

सात बजे वे झारखण्ड – बंगाल सीमा पर थे। जगह का नाम था कुलुबंदी। एक ठिकाना मिला – शांति होटल एण्ड रेस्टोरेण्ट। कमरे का रेट पांच सौ का है। पास की एक दुकान से प्रेमसागर ने सात सौ रुपये निकाल लिये हैं। दुकान वाले ने पेटीएम पर ऑनलाइन ले कर कैश दे दिया है।

“रात का इंतजाम हो गया भईया। कल सवेरे पार करूंगा झारखण्ड-बंगाल बॉर्डर। अभी तो झारखण्ड है। आगे बंगाल में कैसे टाइम कटेगा, वह माई जानें, महादेव जानें। हम क्या फिकर करें भईया।” – प्रेमसागर ने कहा।

होटल वाला बमुश्किल तैयार हुआ कमरा देने को। उसने बताया – “बाबा लोग आते हैं रुकने के लिये और बहुत नौटंकी करते हैं।”

इतने सारे मंदिर हैं। उन मंदिरों में रुकने की जगह की कमी नहीं। लोगों में शायद श्रद्धा भाव भी पूरी तरह मरा नहीं है। ताली दोनो हाथों से बजती है। बाबाओं-साधुओं ने अपनी साख गंवा दी है जन मानस में। वह आसानी से वापस नहीं आ सकती। :-(

यह घटना सुन कर मेरी पत्नीजी याद करती हैं। पंद्रह बीस साल पहले प्रयाग के शिवकुटी में हाथी पर सवार साधू लोग आते थे। जोर जोर से चिल्ला कर मांगते हुये। उन्हें देख लोग अपने घर-दरवाजे-खिड़कियां बंद कर लेते थे। वे भिक्षा न देने पर बहुत अपशब्द कहते थे। शाप देते थे – जा मर जा। तेरा वंश नाश हो जाये। … मुस्टण्डे साधुओं को, जो हाथी पर सवार हों, यह नौटंकी करने की क्या जरूरत? उन्ही की नौटंकी के कारण हिंदू धर्म में से पदयात्रियों के प्रति अश्रद्धा और अविश्वास बढ़ा है। लोग अर्थ के युग में स्वार्थी तो वैसे भी हो गये हैं। हिंदू धर्म का धर्म और अर्थ का बैलेंस बुरी तरह गड़बड़ा गया है। काम का उद्दीपन हो गया है और मोक्ष तो लोगों के ध्येय के राडार पर रहा ही नहीं!

प्रेमसागर अपने परिचय के रूप में होटल वाले को मेरे ब्लॉग दिखाते हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा के और इस शक्तिपीठ यात्रा के। उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि बाबा प्रेमसागर जेन्युइन पदयात्री हैं; नौटंकीबाज नहीं। और उससे होटल वाले का पैराडाइम बदल जाता है। बदले नजरिये से उसमें श्रद्धा भाव आ जाता है। वह कमरे का किराया – 500 रुपया – तो कम नहीं करता; पर प्रेमसागर को अपनी ओर से रोटी दाल (बघारी हुई), आलू की भुजिया और एक ग्लास दूध देता है।

प्रेमसागर ने जब यह बताया तो मुझे अपने डियाक लेखन की सार्थकता का अहसास हुआ। उसी के माध्यम से लोग प्रेमसागर को उनके यूपीआई पते पर अंशदान भी कर रहे हैं। अनेकानेक लोगों की शुभकामनायें उनके साथ जुड़ गयी हैं। शांति होटल वाले सज्जन की शुभकामना भी उसमें जुड़ गयी।

होटल वाला बमुश्किल तैयार हुआ कमरा देने को। उसने बताया – “बाबा लोग आते हैं रुकने के लिये और बहुत नौटंकी करते हैं।”
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इतने सारे मंदिर हैं। उन मंदिरों में रुकने की जगह की कमी नहीं। लोगों में शायद श्रद्धा भाव भी पूरी तरह मरा नहीं है। ताली दोनो हाथों से बजती है। बाबाओं-साधुओं ने अपनी साख गंवा दी है जन मानस में। वह आसानी से वापस नहीं आ सकती। :-(

इस जगह से नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ पच्चीस किलोमीटर दूर है। वहां से पच्चीस-तीस-पचास किलोमीटर के अंतराल पर चार और शक्तिपीठ हैं। शक्तिपीठ दर्शन की एक चेन बन जायेगी अगले सप्ताह। गया से ले कर कुलुबंदी तक की यात्रा रोचक रही है। कठिन यात्रा में भी मेरा प्रेमसागर से और प्रेमसागर का मुझसे उच्चाटन नहीं हुआ है। आगे देखें क्या होता है!

इलाका जंगल का है!

आज तक की यात्रा में प्रेमसागर हजार किलोमीटर का आंकड़ा पार कर गये हैं। आजतक का जोड़ बनता है 1020किमी! हजार किलोमीटर पैदल चलना बिना साधन-सम्पन्नता के, कोई मामूली बात नहीं है। मामूली नहीं है, तभी मैं उनकी डियाक (डिजिटल यात्रा कथा) लिखने में दिन में तीन चार घण्टे लगाता हूं, कम से कम! :lol:

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:।

आप तो कृपया प्रेमसागर को रहने और यात्रा की खुराकी के लिये अपने अंशदान की सोचें। उनके यूपीआई एड्रेस पर जो भी दे सकते हैं, देने का कष्ट करें। छोटा अमाउण्ट भी चलेगा। :-)

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

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