नेवादा – सिकंदरा – टोला डुमरी


13 मार्च 23

प्रेमसागर में चलने का उत्साह बरकरार है, या यूं कहा जाये कि उठना और निकल लेना उनकी आदत बन चुकी है। चार बजे सवेरे उठ कर रवाना हो गये हैं। सवेरा होने पर एक चाय की दुकान का चित्र है। खास बात यह है कि एक महिला दीखती है दुकान में चाय बनाते हुये।

उसके बाद उनके लाइव लोकेशन के सेम्पल, जब कभी नेट ठीक होने पर ही मिलते हैं, उससे उनकी चाल काफी तेज होने का आभास होता है।

सवेरा होने पर एक चाय की दुकान का चित्र है। खास बात यह है कि एक महिला दीखती है दुकान में चाय बनाते हुये।

लाइव लोकेशन आज कम ही मिली। नेटवर्क शायद ठीक काम नहीं कर रहा था। दोपहर तीन बजे रास्ते से दूर किसी और जगह नजर आयी उनकी लोकेशन। फोन कर पता किया तो बताया कि सिकंदरा में टनटन मुंशी जी मिल गये थे। मुंशी जी लखीसराय में कोर्ट के मुंशी हैं और बाबाधाम के प्रेमसागर के सोमवारी कांवर जोड़ीदार रहे हैं। उन्होने ने प्रेमसागर को अपनी मोटर साइकिल से लखीसराय ले जाने और कल भोर में वापस सिकंदरा छोड़ने को राजी कर लिया। अपने घर पर बढ़िया, शुद्ध चने का सत्तू बनवाये हैं मुंशी जी ने प्रेमसागर के लिये। यात्रा में सत्तू साथ होना जरूरी है।

लोकेशन में वे सिकंदरा से लखीसराय के रास्ते पर थे, टनटन मुंशी के साथ उनकी मोटर साइकिल पर।

इलाका प्रेमसागर के परिचित कांवर-संगी लोगों से भरा है। जैसे जैसे देवघर पास आयेगा, और भी लोग मिलेंगे! प्रेमसागर 101 बार सुल्तानगंज से बैजनाथ धाम कांवर ले कर जल चढ़ा चुके हैं। यह काम वे दो साल तक प्रति सोमवार करते रहे हैं। इसके अलावा तीन बार दण्ड यात्रा – लेट लेट कर दूरी पार करना – भी कर चुके हैं। इसलिये इलाके में लोग उन्हें सुम्मारी (सोमवारी) बाबा या दण्डी बाबा के नाम से भी सम्बोधित करते हैं।

टनटन मुंशी को रास्ते में ही कोई अर्जेण्ट काम आ पड़ा। वे सुम्मारी बाबा को वापस सिकंदरा ला कर छोड़े। सिकंदरा में प्रेमसागर को मिले ललन मिश्र। ललन मिसिर भी कांवर यात्री रह चुके हैं। वे हर पूर्णिमा को जल चढ़ाने बाबा धाम जाते रहे। ललन मिसिर सिकंदरा में हनुमान मंदिर के पुजारी हैं। चित्र में काफी बड़ा दीखता है हनुमान मंदिर। प्रेमसागर ने बताया कि मंदिर परिसर में पांच कमरे हैं जिनमें गंगोत्री यात्रा करने वाले श्रद्धालु लौटानी में विश्राम करते हैं या शादी-ब्याह में उन कमरों की बुकिंग होती है। वहीं प्रेमसागर के रहने का इंतजाम हुआ है।

जगत जननी जगदम्बा की काले रंग की प्रतिमा बहुत सुंदर है। बहुत सुंदर हैं उनकी आंखें।

ललन मिश्र जी ने प्रेमसागर को जगत जननी जगदम्बा मंदिर के दर्श भी कराये। सन 1977 में बना है यह मंदिर और माँ की काले रंग की प्रतिमा बहुत सुंदर है। बहुत सुंदर हैं उनकी आंखें। माथे पर तीसरा नेत्र भी है। उतने सुंदर तरीके से चित्र आ नहीं पाया।

ललन मिश्र जी ने प्रेमसागर को रहने का इंतजाम किया। भोजन उनके घर पर नहीं हो सका। सूतक में था ललन का परिवार। आगे यात्रा के अगले दिन के पड़ाव का इंतजाम उन्होने कर दिया है। सिकंदरा से 44 किमी आगे टोला डुमरी में।

ताड़ के कई गाछ दीखते हैं

इलाके की बात करते प्रेमसागर बताते हैं कि ताड़ के कई गाछ दीखते हैं इस रास्ते पर। सरकार ने सड़क किनारे साखू (सागौन) और सफेदा भी लगाया है। पेड़ बड़े हो गये हैं। खेती तो सामान्य सी है। सड़क किनारे पेड़ हैं तो छांव मिलती जाती है।

14 मार्च 23

गया के आसपास की धरती शापित है। प्रेमसागर यह बार बार कहते हैं। नदियों में पानी नहीं है। पर शाप का असर बहुत धीरे धीरे कम हो रहा है। लोग कहते हैं कि बीस कोस तक शाप था सीता माई का। पर उससे ज्यादा दीखता है।

आज कुछ देर से निकले प्रेमसागर। शायद छ बजे। उन्हें सिकंदरा से खैरा के रास्ते जमुई जिले में दक्षिण की तरफ उतरते टोला डुमरी तक जाना है। खैरा के आगे पड़ता है मंगोबदर और फिर सोने तहसील। किसी बर्नार नदी के समांतर चलना है। सोने के पहले बर्नार पार होती है। नक्शे में बड़ी नदी दीखती है। पर नदी क्या है? रेत की नदी। एक बूंद पानी नहीं। रेत ही रेत। लोगों को रेत उत्खनन के पट्टे मिले हैं। जेसीबी मशीन और ट्रेक्टर-डम्पर काम पर लगे हैं। कई जगह लोगों के रेत के जखीरे लगे हैं।

सीता माई का शाप एक तरफ; इस रेतीले फिनॉमिना का कोई भौगोलिक कारण तो होगा? गया, नेवादा, लखीसराय का दक्षिणी भाग, जमुई, खैरा और अब यह सोने-टोला डुमरी – यहां जमीन पर पानी नहीं पर पचास फिट नीचे पानी है। मॉनसून का मौसम नदियों में बाढ़ लाता है। पर बाढ़ से उपजाऊ मिट्टी नहीं आती। रेत भर आती है। उस रेत में ताड़ के पेड़ उगते हैं। या सरपत। कुल मिला कर वही जी रहा है जो रेत से जद्दोजहद करने का माद्दा रखता है।

प्रेमसागर की यह यात्रा नहीं होती तो मैं इस फिनॉमिना को महसूस ही नहीं कर पाता। मैं तो यही मान कर चलता कि बरसात में बाढ़ आती है और उसके बाद खूब अच्छी फसल लेते हैं बिहारी। पर गरीबी का एक बड़ा घटक – फालगू और बर्नार जैसी नदियों का शापित होना है।

यहां नहरें क्यों नहीं आयीं? नहरें शायद सही विकल्प नहीं होतीं। सोन नदी – या जो भी नदी हो, उसका, पानी यहां आते आते 20-30 प्रतिशत सूख जाता नहरों में। शायद बड़ी पाइप के जरीये पानी आ सकता था या आ सकता है। बड़ी पाइप की नहरों का जाल!

रुक्ष भूगोल के बावजूद जीवन है। खेतों में गेंहू पक गया है। कटाई हो रही है। पिछली फसल का पुआल दीखता है। चीजें उतनी खराब नहीं, जितनी मैं सोचता हूं।

मैंं जिला भदोही के एक गांव में बैठा डियाकर (डिजिटल यात्रा कथा लेखक) सोचे जा रहा हूं। कहीं बेहतर सोचा होगा जल प्रबंधन करने वाले विद्वानों नें। पर हुआ कुछ नहीं। बरनार जैसी नदियां रेत की नदियां हैं।

टोला डुमरी बड़ा गांव है। दस हजार की आबादी होगी। खास बात यह है कि बहुत भव्य मंदिर हैं यहां पर। देवी पार्वती और शंकर भगवान का मंदिर। और भी देव हैं। विष्णु भी हैं, लक्ष्मी भी और हनुमान जी भी। एक सज्जन को फोन थमा देते हैं प्रेमसागर। वे मुझे बताते हैं टोला डुमरी का प्राचीन इतिहास। यह जगह आदि काल में कंचनपुर था। शिव जी का जो मंदिर है वह कंचनेश्वर महादेव है। अभी का मंदिर नया है। पर यह तीन बार विस्थापित होने पर बना है। पास में किसी पुराने मंदिर के भग्नावशेष हैं। एक पत्थर भी है वहां जिसपार पाली (?) में कुछ लिखा है। वे बताते हैं कि औरंगजेब काल में इसे तोड़ा गया। नया मंदिर किसी गिद्दर महराज ने बनवाया।

प्रेमसागर ने मंदिर और वहां के लोगों के चित्र भेजे हैं। ज्यादा न जोड़ते हुये वे मैं यहां प्रस्तुत कर देता हूं।

आज रास्ते में सिकंदरा से निकलते ही प्रेमसागर का पिट्ठू फट गया। गमछे से बांध कर वे पंद्रह बीस किमी चले। फिर खैरा में नया बैग खरीदा। “भईया, पहला बैग कपड़े का था। चार सौ किलोमीटर साथ दिया। मेंअ बात है कि पीठ पर पसीने और रगड़ से फट गया। अब यह नया बेहतर है। साढ़े आठ सौ का है। चमड़ा और रेक्सीन लगा है। मजबूत दीखता है।”

फटे पिट्ठू पर ट्वीट

पदयात्रा में एक अच्छा पिट्ठू और अच्छी लाठी – यही प्रेमसागर की जरूरत है।

नया पिट्ठू

टोला डुमरी में बहुत लोग मिले प्रेमसागर को। पुजारी जी ने उनके लिये दूध-चिवड़ा का इंतजाम किया। एक और उम्रदराज सज्जन बोले – बाबा, मेरे घर में लहसुन प्याज के बिना भोजन बनता है। वहीं से आपके लिये रोटी-सब्जी ले कर आया हूं।

दूध चिवड़ा, रोटी सब्जी और मंदिर के फर्श पर डेरा। प्रेमसागर के लिये तो इस जगह पिकनिक मन गयी!

कल देवघर का रास्ता लम्बा है। रास्ते में जंगल भी है। शायद सीता माता का शाप पूरी तरह खत्म हो जाये तब तक। कल बिहार से झारखण्ड में घुस जायेंगे प्रेमसागर।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

दिनेश पगला



सवेरे मडैयाँ डेयरी का दृश्य। दूध के बाल्टों, ड्रम तथा दूध देने आये किसानों से भरी जगह के बीच छोटे से स्पेस में वह उछल कर, आगे कूद कर, हाथ लहरा कर, नमस्कार कर और मेरे बारे में पता चलने पर मुझे बार बार चरण छूने का प्रयास कर जो कुछ कर रहा था, वह बहुत रोचक था। डेयरी के उस दूध कलेक्शन सेण्टर पर उजाला बहुत ज्यादा नहीं था। चित्र बहुत साफ नहीं आये। एक छोटे वीडियो में उसकी आकृति भी धुंधली है। पर उसका चरित्र बहुरंगी था।

पास के गांव का रहने वाला है वह। नाम है दिनेश बिंद। मुझे चलते समय वह अपना परिचय देता है – आप को कौनों काम हो, पता कर लीजियेगा। लोग मुझे दिनेश पगला के नाम से जानते हैं। हर कोई मेरे बारे में बता देगा।

डेयरी के उस मेक-शिफ्ट रंगमंच पर जो प्रहसन वह कर रहा था उसकी स्क्रिप्ट में कोई ट्रक या वाहन था। उसका यह क्लीनर। कट्टा लहराते लुटेरे थे और इसने मालिक का “इतना-इतना (वह हाथ से बहुत मोटी गड्डी नोटों की बना कर दिखाया)” पैसा बचा लिया। उस प्रहसन से जो निकल कर आया वह यह कि दिनेश पगला ईमानदार, कर्मठ और दिलेर है।

दिनेश ‘पगला’ बिंद और मैं।

ऐसे चरित्र रोज रोज नहीं मिलते। पहले मुझे लगा कि वह कुछ मानसिक रूप से सरका हुआ है। पर उसने बताया कि गांव के आसपास के भगत लोगों के साथ उत्तराखण्ड, झारखण्ड, गया आदि कई जगहों पर पैदल यात्रा कर चुका है। भगत लोग अपने साथ उसे सामान ले कर चलने या छोटा मोटा काम करने के लिये साथ ले कर जाते हैं। कुल मिला कर उनका कुली होता है वह। … मैं अगर (और यह शेखचिल्ली सोच है) साइकिल से भारत भ्रमण पर निकलूं तो साथ में इस जोकर को बतौर कुली एक साथ की साइकिल पर ले कर चल सकता हूं। मैंने सोचा!

उसके साथ मैंने एक चित्र खिंचवाया। डेयरी के सुभाष ने खींचा। पर रोशनी अच्छी न होने और शायद क्लिक करनें में सुभाष के दक्ष न होने से चित्र अच्छा नहीं आ पाया। … ऐसे लोगों के साथ यादगार बनी रहनी चाहिये।

डेयरी से निकल साइकिल पर भी हाथ लहराते, अपने से कुछ बोलते बड़बड़ाते वह जा रहा था। साइकिल बढ़िया चला रहा था। मुझे फिर लगा कि वह मेरा यात्रा-कुली बन सकता है।

पर अगले दिन सुभाष ने मेरी सोच पर पानी फेरा – “दिनेश बिंद है तो ठीक पर हमेशा नशे में रहता है। नशे के लिये कुछ भी मिल जाये उसे। किसी भी चीज से परहेज नहीं। काम मन लगा कर करता है। पर कहीं टिकता भी नहीं। मर्जी का मालिक है।”

अब यात्रा कुली साथ ले कर हमेशा उसके नशे का इंतजाम तो कर नहीं सकता। और कभी वह टुन्न हो कर गरियार बरदा (वह बैल जो कोंचने और डण्डे से मारने पर भी हल चलाने को तैयार न हो) की तरह अड़ जाये तो बहुत बड़ी लायबिलिटी होगा।

पर, फिलहाल, उस दिन उसका प्रहसन बहुत रोचक लगा। वह डेयरी पर किस लिये आया था, पता नहीं। शायद पता करने आया था कि डेयरी पर दूध दिया जा सकता है या नहीं।

हो सकता है, वह वहां दूध ला कर देते रोज दिखने लगे! संभावना कम है।

गांवदेहात में कोई थियेटर या सिनेमा तो है नहीं। दिनेश पगला जैसे लोग उसकी कमी पूरी करते हैं। उसके पांच मिनट के प्ले से मजा भी आया और आईडियाज भी आये दिमाग में! :-)

फिर मिलना चाहिए, दिनेश पगला!


वजीरगंज से नेवादा


12 मार्च 23

गया का अनुभव पार करने के बाद आज सवेरे सामान्य लगे प्रेमसागर। वजीरगंज में सुमन गेस्ट हाउस से निकल चुके थे। पांच किलोमीटर चलने के बाद मुझसे बात हुई। उनका कहना था कि प्लानिंग में चेंज है। वे नेवादा की बजाय पहले ही मुड़ कर वाया गोविंदपुर आगे निकलेंगे। गूगल नक्शे के हिसाब से वह रास्ता छोटा है।

अलग अलग रास्ते मैं कम्प्यूटर पर छान चुका था। मैंने उन्हे कहा कि ज्यादा दूर तक जाने में रास्ते की लम्बाई एक घटक जरूर है पर यह भी देख लें कि रास्ता कैसा है। गोविंदपुर वाला रास्ता पहाड़ी है। हो सकता है जंगल भी हों। जंगल में अकेले जाना दुरूह होगा। झारखण्ड में वैसे भी, अपेक्षाकृत, वन ज्यादा हैं। उसकी बजाय नेवादा-अलीगंज-सिकंदरा का रास्ता नक्शे के अनुसार अधिकतर मैदानी है। और उसपर दूरी का अंतर मात्र सात किमी है।

प्रेमसागर रास्ते का चुनाव करने के लिये मुझे कह रहे थे, पर मैंने वह नहीं किया। घुमक्कड़ मैं नहीं, वे हैं। योजना और चुनाव उन्हें करना चाहिये। पर प्रेमसागर में यह कमी है – कोई कुछ समझा देता है और उस हिसाब से चल देते हैं। बहुधा उन्हें ज्यादा श्रम करना पड़ा है। खैर, उन्होने आसपास वाले लोगों से बातचीत की। उन्होने भी समझाया कि नेवादा-सिकंदरा वाला मार्ग बेहतर है। सो उन्होने नेवादा की ओर बढ़ना तय किया।

गया के कटु अनुभव – वहां रात्रि विश्राम के लिये आश्रमों द्वारा डोनेशन मांगने की बात को ले कर सोशल मीडिया पर लोगों ने अपना क्षोभ व्यक्त किया। कई लोगों ने अपना अंशदान किया। कुछ ने नियमित कुछ न कुछ देते रहने की बात की। एक सज्जन ने टिप्पणी की – धंधे मातरम! एक अन्य ने कहा कि उनके भी इसी तरह के कटु अनुभव हैं।

गया तो गया! उसके चक्कर में एक दिन प्रेमसागर को 74 किलोमीटर चलना पड़ा। पर शायद इतना वे पहले भी विकल्पहीनता की दशा में चल चुके हैं। समस्याओं का समाधान उनके पास केवल चलने से है! पर उस चलने का परिणाम यह हुआ कि आज उन्हें कई लोगों की सहानुभूति और आर्थिक सहयोग मिला।

दिन में जो भी नदियां दिखीं, सब बड़े पाट वाली और चौड़ी। सब में एक बूंद पानी नहीं। फालगू नदी को तो सीता जी ने शाप दिया था, पर लगता है आसपास की सभी नदियों को वह शाप कस कर लगा है।

दिन में जो भी नदियां दिखीं, सब बड़े पाट वाली और चौड़ी। सब में एक बूंद पानी नहीं। फालगू नदी को तो सीता जी ने शाप दिया था, पर लगता है आसपास की सभी नदियों को वह शाप कस कर लगा है। नदियों में कुशा, कास, सरपत जैसी वनस्पति दीखती है। उसके अलावा एक जगह कई ट्रेक्टर भी दिखे जो बालू ढोने में लगे थे। बालू खनन जहां भी दीखता है, वह मन में अवैध उत्खनन और बालू माफिया का चित्र ही मन में उपजाता है। वही इन्हें देख भी उपजा। ये सभी नदियां बरसाती होंगी और मॉनसून के मौसम में कहर ढाती होंगी।

वजीरगंज-नेवादा के बीच एक बड़ा, व्यवस्थित तालाब।

मॉनसून के पानी का प्रबंधन लोग करते हैं; ऐसा प्रेमसागर ने कहा। कई ताल हैं। बड़े बड़े तालाब। उनका रखरखाव भी किया जाता है। इसके अलावा तीस से पचास फुट की बोरिंग पर पानी मिल जाता है। लोग पारम्परिक खेती में लगे हैं। हॉर्टीकल्चर का कोई प्रसार नहीं है। दो दिन पहले एक जगह पर मधुमक्खी पालकों के बक्से किसी जगह सड़क किनारे जरूर दिखे थे। मैंने प्रेमसागर को कहा कि आगे अगर उन्हें कुछ अच्छे और सुंदर बने तालाब दीखें तो उनका भी चित्र लेने का प्रयास करें।

नेवादा जिला में एक औद्योगिक विकास प्राधिकार और उसके आसपास कुछ ट्रेनिंग संस्थानों के बोर्ड नजर आये। एक जगह टीसीएस – टॉपर्स कॉन्वेण्ट स्कूल – देखा।

नेवादा जिला में एक औद्योगिक विकास प्राधिकार और उसके आसपास कुछ ट्रेनिंग संस्थानों के बोर्ड नजर आये। एक जगह टीसीएस – टॉपर्स कॉन्वेण्ट स्कूल – देखा। गिट्टी क्रशिंग या बालू उत्खनन के अलावा कोई उद्योग नहीं दिखा। उद्योगों के पनपने के लिये उपयुक्त कानून-व्यवस्था, कुशल और ईमानदार प्रशासन और मनोवृत्ति की उर्वरता है ही नहीं शायद।

प्रेमसागर ने मैसेज दिया है कि कोई सोनू जी ने अपने मैरिज हॉल में उन्हें निशुल्क रहने का स्थान दिया है। “मैं भईया मंदिरों को ही तलाश रहा था। पर मंदिरों के आसपास भोजन का कोई प्रबंध नहीं था। तभी एक जगह यह नौजवान मिल गये। बोले बाबा आप मेरे मैरिज हॉल में रह सकते हैं। भोजन आपको बाहर से देखना होगा।” – प्रेमसागर ने बताया।

हूडी पहने सोनू जी हाथ पैर से पोलियोग्रस्त होने के कारण अक्षम भले ही हैं पर संस्कारी नौजवान हैं। वे टचस्क्रीन का मोबाइल बड़ी कुशलता से इस्तेमाल कर रहे थे। उनकी माता जी ने घर से भोजन बना देने की पेशकश जरूर की, पर उन्हें असुविधा होती। प्रेमसागर ने होटल तलाशे जो ज्यादातर नॉनवेज भी बनाते थे। इसलिये एक जगह से लिट्टी-चोखा खरीद कर खाया और रात के भोजन का काम उसी से पूरा हो गया।

गया के धर्म-व्यवसायियों से उलट सोनू जी ने उदात्त भाव से प्रेमसागर की जो सहायता की वह प्रशंसनीय है।

सोनू जी ने अपने मैरिज हॉल में उन्हें निशुल्क रहने का स्थान दिया है।

वैसे, शक्तिपीठ पदयात्रा पर निकले प्रेमसागर को अगर मैरिज हॉल वाले सोनू जी की बजाय किसी मंदिर के प्रांगण में ही रुके होते तो मुझे अच्छा लगता। कमरा, बिस्तर, सफाई और कम्बल आदि का एक बेंचमार्क तो प्रेमसागर ने बना लिया ही लिया है और उससे कमतर में रहने की उनकी अभ्यस्तता कम होती गयी है। पर शायद मुख्य कारण यह है कि जिस भाव से सोनू ने प्रेमसागर को अपने यहां रहने के लिये आमंत्रित किया, वह मंदिरों-देवालयों के लोगों में अब होता ही नहीं!

कुछ दशकों पहले तक मंदिर के ओसारे तीर्थयात्रियों के रहने रुकने के सामान्य ठिकाने होते थे। अब शायद युग बदल गया है। देवालयों में अगर तीर्थयात्री नहीं रुकते, तीर्थयात्रियों को रुकने के लिये वे आमंत्रित नहीं करते तो शायद देवता भी वहां नहीं होते होंगे।

शायद मैं ज्यादा ही अव्यवहारिक बातें कर रहा हूं। अगर मुझे यात्रा करनी हो तो मैं प्रेमसागर से कहीं ज्यादा सुविधाओं की अपेक्षा करूंगा। मैं तो यह मान कर चलता हूं कि देवता देवालयों में नहीं, प्रकृति में या लोगों के उदात्त स्वभाव के बीच रहते हैं। मैं मंदिरों के दर्शन का कोई विशेष प्रयास करता भी नहीं। पर वही एक प्रमुख कारण है कि मैं यात्रा कर नहीं रहा। लिखना मेरे बस का है, डियाकी (डिजिटल यात्रा कथा लेखन) मेरे बस का है। यायावरी मेरे बस की नहीं। यायावर तो प्रेमसागर हैं।

बीस दिन हो गये यात्रा को। अठारह ब्लॉग पोस्टें हो गयीं। सात सौ से ज्यादा किलोमीटर चल चुके प्रेमसागर। मुझे तो डियाक (डिजिटल यात्रा कथा) लेखन में थकान हो रही है। प्रेमसागर की समस्याओं को खुद ओढ़ लेने की थकान। पता नहीं प्रेमसागर को फेटीग (fatigue) हो रहा है या नहीं। मुझे तो मानसिक यात्रा ही करनी हो रही है, पर प्रेमसागर के तो पैर भी दर्द करते होंगे? कौन सा तेल मलते हैं प्रेमसागर पण्डिज्जी?!

ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
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