गया – मंगला गौरी दर्शन


11 मार्च 23

शाम होते होते प्रेमसागर ने अष्टादश शक्तिपीठों में से तीसरे महाशक्तिपीठ का दर्शन सम्पन्न कर लिया। गया में वे मंगलागौरी मंदिर हो आये। इससे पहले उन्होने प्रयाग में ललिता देवी/अलोपी माता और वाराणसी में विशालाक्षी देवी के दर्शन कर लिये हैं। उनके अलावा कई अन्य शक्तिपीठों पर भी वे जा चुके हैं। अब तक शक्तिपीठ पदयात्रा में वे सात सौ किलोमीटर के आसपास पैदल चल चुके हैं।

उनका शक्तिपीठ पदयात्री का दर्जा ऊंचा हो गया है।

गया के रास्ते सवेरे चाय की दुकान पर बैठे जंच रहे हैं प्रेमसागर। चाय की दुकान रफीगंज में है।

सवेरे, भेजे चित्र में गया के रास्ते चाय की दुकान पर बैठे जंच रहे हैं प्रेमसागर। चाय की दुकान रफीगंज में है। दुकान वाले सज्जन को करसारा के प्रमोद जी ने सहेज दिया था। सो चाय के पैसे नहीं देने पड़े। आगे रास्ते में नहरें और सूखी नदियाँ पड़ीं। चौड़ा पाट और केवल रेत। सरपत उगा होगा बीच बीच में, जिसे लोग काट ले गये हैं। नक्शे में फालगू तो नहीं पड़ती रफीगंज और गया के बीच। कौन नदियां हैं ये? गूगल मैप को जूम कर देखने पर भी कोई अंदाज नहीं लगा। बरसात में शायद इनमें खूब पानी आ जाता होगा। उथली और चौड़ी नदी लगती हैं ये। शायद फालगू ही हो।

रेत की नदियां।

जो चित्र भेजे और जो विवरण दिया, उससे यह पूरा इलाका मुझे मनहूस लगा। कोई आश्चर्य नहीं कि इस फालगू नदी को सीता जी का शाप लगा है। यह राम द्वारा उनके पूर्वजों के पिण्डदान के समय उग्र हो गयी थी।

महाभारत काल का भी यहां से जुड़ाव रहा है। भीम वेदी और भीम मंदिर हैं यहां। पर वह सब प्रेमसागर ने देखा नहीं। उनके रात गुजारने का कोई इंतजाम नहीं हुआ था तो उन्हें गया छोड़ आगे बढ़ने की जल्दी थी। “भईया सभी मंदिरों-सरोवरों को मैंने मन ही मन में प्रणाम कर लिया है। अब आगे बढ़ कर नेवादा जिला में कोई जगह तलाशता हूं रात में रुकने के लिये।” – प्रेमसागर ने कहा।

गया धर्म का केंद्र रहा है आदि काल से। पर वहां धर्म कम, धर्म का व्यवसाय ज्यादा दिखा। मंगला गौरी मंदिर के दर्शन और उसके साथ शिव/भैरव मंदिर के दर्शन के अलावा प्रेमसागर ने कुछ खास देखा नहीं। किन्ही सुरेंद्र गिरि जी का नाम लिया, जिन्होने मंगला गौरी के दर्शन कराये। उसके अलावा शाम हो जाने के कारण वे चार पांच आश्रमों में गये कि रहने को कोई ठौर मिल सके। वहां बताया गया कि पांच छ हजार डोनेशन दें तो व्यवस्था हो सकेगी। आश्रम भी व्यवसाय बने हुये हैं। एक होटल ने कहा कि वहां शादी की बुकिंग है, वर्ना उन्हें जगह दे देते। प्रेमसागर ने कहा – भईया, लोग पिण्डदान को आते हैं और वे इन्हें मनमांगा मोटा पैसा देते हैं। मेरे जैसे के लिये जिसे चार पांच सौ निकालना कठिन है, कोई जगह नहीं है गया में।”

मंगलागौरी और भैरव मंदिर

कहीं चाय पी और मीठा खा कर प्रेमसागर आगे बढ़े। फालगू पार कर नेवादा जिले की ओर। अंत में पच्चीस किमी और चले तो वजीरगंज में किसी सुमन गेस्ट हाउस में रुकने को कमरा मिला। “भईया, न मिलता तो रात भर चलता ही रहता मैं।” – प्रेमसागर का कहना था। किसी भी समस्या के निदान के लिये प्रेमसागर के पास एक ही उपाय है – चलना!

करसारा से वजीरगंज तक दिन भर में कुल चौहत्तर किलोमीटर चले प्रेमसागर। मुझे लगता था कि वे गया भी नहीं पंहुच पायेंगे और पंहुच भी गये तो रात में आराम कर अगले दिन दर्शन करेंगे मंदिरों के। पर धर्म के व्यवसाय के नगर गया में उन्हें रुकने की जगह नहीं मिली! शायद इसका अंदाज प्रेमसागर को था। इसलिये शुरू से ही वे तेज चाल में चलते ही रहे। दिन में कहीं आराम नहीं किया।

बड़ी जगह है गया। पर रात गुजारने को ठौर नहीं मिला प्रेमसागर को।

अब वजीरगंज के रास्ते वे देवघर पंहुचेंगे और वहां से वाया वासुकीनाथ बंगाल में प्रवेश करेंगे। देवघर उनका जाना पहचाना है। सुल्तानगंज से बैजनाथधाम की सैकड़ों पदयात्रायें वे कर चुके हैं। सो यह रूट पकड़ना उन्हें सही लगा। बंगाल में कई शक्तिपीठ हैं। उनके दर्शन कर अगर बरसात का समय नहीं हुआ तो वे कामाख्या मंदिर के दर्शन के लिये गुवाहाटी निकल जायेंगे। यह डेढ़ दो महीने का कार्यक्राम होगा। यह सब निर्भर है कि लोगों से उन्हें अंशदान मिलता रहे जिससे उनके रात गुजारने और भोजन का खर्चा निकल आये।

उनके पास पैसा नहीं है। साधन नहीं हैं। लोग जुड़े हों और सहायता कर रहे होंं- वह बहुत नहीं दिखता। प्रेमसागर मध्यप्रदेश-गुजरात में कई लोगों की बात किया करते थे। वैसी बातें अब सुनने में नहीं आतीं। शायद माता और महादेव सही में उनकी कड़ी परीक्षा ले रहे हैं। या फिर व्यर्थ ही एक नया प्रॉजेक्ट हाथ में ले कर चल दिये हैं वे।

मैं उनकी सहायता के लिये लिख सकता हूं। वही किये दे रहा हूं। पाठक से मैं अपील ही कर सकता हूं कि प्रेमसागर को उनके यूपीआई पते पर जो सहयोग कर सकते हों, करने का कष्ट करें। पर मेरी भी अपनी सीमा है।

गया के प्रकरण ने मुझे मायूस किया है। मुझे एक तुकबंदी सुनने में आई थी – गया में दया नहीं। पुरी में जात नहीं। कलकत्ता में रात नहीं। पुरी और कलकत्ता का पता नहीं, पर गया में सही मायने में दया नहीं नजर आई। विंध्याचल और बनारस में शक्तिपीठ पदयात्री होने के कारण आदर मिला था। माई की चुनरी उढ़ाई गयी थी। उसके उलट गया में यहां उन्हें टके सेर जवाब मिला – रुकने की जगह चाहिये तो पांच हजार का डोनेशन लाओ!

गया के बारे में एक और तुकबंदी है – बिना पानी की नदी, बिना पेड़ का पहाड़ और बिना दिमाग का आदमी। जरूर गया होगा!

शायद तुकबंदी में दिमाग की जगह दिल होना चाहिये था। हृदयहीन नजर आया गया।

सरकार बनारस और विंध्याचल के पर्यटन विकास के लिये बहुत कर रही है। उसकी कुछ सृजनात्मक शक्ति गया में भी लगनी चाहिये। हिंदू धर्म का व्यवसाय भले रहे; वहां आश्रम वाले मौज करें या भाड़ में जायें; पर प्रेमसागर जैसे साधन हीन श्रद्धालु के लिये वहां स्पेस बने! आगे कोई पदयात्री आये तो उसे रुकने को एक बिस्तर और सस्ता साधारण भोजन तो मिल सके।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

दाऊदनगर से करसारा के प्रमोद कुमार सिंह के यहाँ


10 मार्च 23

गूगल मैप था या प्रेमसागर की पगडण्डी के रास्ते चल कर शॉर्टकट तलाशने की प्रवृत्ति; कह नहीं सकते। दाऊदनगर से बरास्ते गोह सीधा साट रास्ता था गया का। मैप के हिसाब से 71 किमी। प्रेमसागर पगडण्डी पकड़ कर चल दिये। कोई प्वाइण्ट पगडण्डी पर आया होगा कि गूगल उन्हें गोह होते सीधे रास्ते की बजाय रफीगंज की ओर जाने को दिखाने लगा।

मैंने पौने आठ बजे उनसे बात की थी। उन्ही का फोन आया था। उसके बाद उन्होने अपनी लोकेशन शेयर की। उससे लगा था कि वे 2 किमी अलग चले थे, पर मेरा अंदाज था कि वे कोर्स करेक्शन कर सही रास्ते चलेंगे। उसके बाद बात नहीं हुई और पगडण्डी के रास्ते उनकी लोकेशन भी अपडेट नहीं हुई। शाम चार बजे के बाद देखा तो वे रफीगंज से कुछ किमी पीछे थे। अर्थात रास्ता बदल चुके थे। वाया रफीगंज गया 82 किमी पड़ता है दाऊदनगर से। उन्हें रास्ता बदलना 11 किमी अतिरिक्त चलायेगा!

पर जो हुआ, अच्छा ही हुआ। पगडण्डी के रास्ते ज्यादा लोग मिले, ज्यादा अनुभव। और अंत में एक सज्जन प्रमोद कुमार सिंह जी ने बड़े आदर से अपने घर रात गुजारने को रोका। “जै सियाराम जी! बाबा यहां चरन रखे मेरे यहां सब ऊपर वाले की किरपा है। मेरे धन्य भाग कि रास्ता चलते बाबाजी मेरे यहां पंहुचे। मेरा नाम प्रमोद कुमार सिंह है। गांव करसारा। ओबरा-रफीगंज रास्ते पर रफीगंज से पांच किलोमीटर पहले है।” – प्रमोद जी ने मुझे फोन पर कहा। प्रेमसागर ने जगह और मेजबान का नाम खुद बताने की बजाय फोन ही उनके हाथ दे दिया था। जिस श्रद्धा से प्रमोद जी ने जै सियाराम कहा, उससे मेरे प्रति उनकी श्रद्धा और प्रेम, दोनो प्रकट हो रहे थे। ज्यादा चलना हुआ तो हुआ; पर अच्छी बात यह हुई कि प्रमोद जी का आतिथ्य मिला।

गिरींद्रनाथ झा की पुस्तक “इश्क में माटी सोना” का एक स्क्रीनशॉट

रास्ते में लोगों से हुई बात में प्रेमसागर ने बताया कि लोग सम्पन्न मिले। मकान पक्के और बड़े। ज्यादातर के घर से कोई न कोई परदेश में है। शिक्षा का स्तर अच्छा है। लोग बच्चों को पढ़ा-लिखा कर बाहर जाने को प्रेरित करते हैं और इस बात को फख्र से बताते हैं कि उनका बेटा फलाँ जगह पर है।

मुझे ट्विटर-मित्र गिरींद्रनाथ झा की याद हो आई। पुस्तक “इश्क में माटी सोना” में जिक्र है कि उनके पिताजी हमेशा उनको पढ़ लिख कर बिहार से बाहर जाने की कहते रहे। शायद लोग ज्यादातर गिरींद्र के पिताजी की तरह हैं! अपने बेटे को दिल्ली-बम्बई-परदेश जाने को प्रेरित करने वाले। गांवगिरांव के लोग रूमानियत नहीं, ठोस अर्थशास्त्र पर जीते हैं। असुविधा में जी कर भी बेटे को बाहर भेजते हैं। और उस सोच का अच्छा परिणाम भी यहां दिखा – दाऊदनगर के पास गांव की अपेक्षाकृत सम्पन्नता में, जो प्रेमसागर ने बताई।

बाहर रह रहे बेटे यहां की डिजिटल मनी ट्रांसफर इकॉनॉमी से परिदृश्य बदल रहे होंगे, पर गिरींद्रनाथ की तरह रीवर्स माइग्रेशन कर बिहार के आसपास के इलाके को ट्रांसफार्म कर यहां का सोशियो-इकनॉमिक डेवलेपमेण्ट कर रहे होंगे? मुझे नहीं लगता। उत्कृष्टता के द्वीप कम ही हैं बिहार में। अन्यथा आंकड़े कुछ और बताते।

नदी-नहर-खेत-खलिहान के ढेरों चित्रों की बजाय पगडण्डी का वह साधारण सा चित्र मुझे भा गया जो प्रेमसागर ने राह चलते क्लिक किया था।

नदी-नहर-खेत-खलिहान के ढेरों चित्रों की बजाय पगडण्डी का वह साधारण सा चित्र मुझे भा गया जो प्रेमसागर ने राह चलते क्लिक किया था। पगडण्डी सही में घुमक्कड़ी है। मेरा बस चले तो प्रेमसागर दूरी न नापें। यात्रा-आनंद तलाशें। यह न गिनें कि कितने शक्तिपीठ पूरे हुये। यह देखें कि पगडण्डी कैसी है और कितने प्रमोद सिंह जैसे जै सियाराम कहने वाले लोग मिलते हैं!

दाऊदनगर के किनारे ग्रामीण इलाके में प्लास्टिक से नहर के जल का प्रदूषण नजर आ गया। मेरे ख्याल से प्रेमसागर ने यह जानबूझ कर नहीं खींचा होगा। पर यह बयान करता है कि इस कचरे के माध्यम से खेत की सिंचाई और उससे उपज का चना-सरसों-धान-गेंहू, सब प्रदूषित हो रहा है। प्लास्टिक और थर्मोकोल का प्रयोग बंद भी हो जाये तो भी जीवों की कोशिकाओं में हजारों साल बाद भी प्लास्टिक के सूक्ष्म कण गुणसूत्रों में समाये मिलेंगे।

दाऊदनगर के किनारे प्लास्टिक से नहर के जल का प्रदूषण नजर आ गया।

और यह सब किसी प्रचंड औद्योगिक जगह पर नहीं, बिहार के तथाकथित पिछड़े इलाके का हाल है। प्लास्टिक सर्वयापी हो गया है। मेरे बचपन में यह बिल्कुल नहीं था। अब यही भर है!

प्रमोद सिंह जी के यहां मजे से रहे प्रेमसागर। उनका आतिथ्य भरपूर था। हर जगह कमरा तलाशने और होटल से भोजन का जुगाड़ करने वाले प्रेमसागर को तो अचानक ही आनंद मिल गया होगा। दस किमी अतिरिक्त चलने पर मिला आनंद!

मुझे प्रेमसागर से ईर्ष्या हुई। मैं भी चलने वाला जीव होता, त्रिपुण्ड लगाये गेरुआ पहने, तो मेरा भी ठाठ होता। और बंधुवर क्या गजब का ट्रेवलॉग निकलता उससे! उस ट्रेवलॉग की और इस डियाकी (डिजिटल यात्रा कथा लेखन) की कोई तुलना ही नहीं! मैं एक डियाकर की बजाय एक सशक्त हस्ताक्षर बन जाता ट्रेवलॉगर की दुनियाँ में! :lol:

प्रमोद जी के चार बेटे हैं। एक शादी शुदा है। सो एक बहू। बहू ने खाने में लिट्टी-चोखा, साग, भुजिया सब बनाया था। सबका स्वाद पाये प्रेमसागर! रात इग्यारह बजे तक प्रमोद जी के यहां “बाबाजी” के साथ बतकही चलती रही। बगल के गांव मुखिया जी भी चर्चा में आ गये। एक सज्जन तो रात में प्रेमसागर की बगल में जमीन पर बिस्तर बिछा सोये। बोले – बाबाजी आपको अकेला नहीं छोड़ेंगे।

खड़े हैं प्रमोद कुमार सिंह। बीच में मुखिया जी। बांये वाले सज्जन रात में प्रेमसागर जी के पास ही जमीन पर बिस्तर लगा कर सोये। “बाबाजी को अकेला नहीं छोड़ सकते”।

मुझे प्रेमसागर से ईर्ष्या हुई। मैं भी चलने वाला जीव होता, त्रिपुण्ड लगाये गेरुआ पहने, तो मेरा भी ठाठ होता। और बंधुवर क्या गजब का ट्रेवलॉग निकलता उससे! उस ट्रेवलॉग की और इस डियाकी (डिजिटल यात्रा कथा लेखन) की कोई तुलना ही नहीं! मैं एक डियाकर की बजाय एक सशक्त हस्ताक्षर बन जाता ट्रेवलॉगर की दुनियाँ में! :lol:

प्रमोद जी के यहां की बतकही से निकला कि पास ही में आदि मानव के प्रमाण हैं। प्रेम सागर सासाराम के ताराचण्डी मंदिर के दर्शन (भले ही लौटानी में) करेंगे। आसपास के इलाके का माइथॉलॉजिकल इतिहास भी बहुत बताया प्रमोद जी ने। मैंने प्रेमसागर को प्रमोद जी का नम्बर ले लेने को कहा, जिससे भविष्य में उस इलाके की जानकारी ली जा सके!

कल शायद प्रेमसागर गया पंहुच जायें। वैसे तेज चल दूरी पार करने की बजाय यात्रा को जीना चाहिये प्रेमसागर को। शक्तिपीठों के दर्शन तो (मेरे अनुसार) एक निमित्त हैं। मुख्य है यात्रा। यात्रा माध्यम नहीं, प्रेमसागर की जिंदगी में मुकाम बनना चाहिये। यात्रा का रस, मंदिर के दर्शन के संतोष से कहीं ज्यादा महत्व का होता है – नहीं?

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
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कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
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बिक्रमगंज से दाऊदनगर


9 मार्च 23

तबीयत का क्या हाल है? पूछने पर कल रात और आज सवेरे एक ही जवाब था प्रेमसागर का – निन्यानबे परसेण्ट ठीक है भईया। बहुत कुछ वैसा जैसा डेटोल के विज्ञापन में सफाई हो जाती है पर एक कीटाणु बचा दिखाया जाता है।

बहरहाल दो रात बिक्रमपुर चौक के होटल में बिता कर आज सवेरे रवाना हुये। आज आठ बजे जब बात हुई तो सात किमी चल चुके थे। उन्होने जो पहला चित्र भेजा वह काव नदी का है, जिसपर एक पुल पर बड़ा ट्रक पास हो रहा है।

बिक्रमगंज के पास काव नदी

सासाराम के पास पहाड़ी स्थान से निकली काव नदी बिक्रमगंज के आसपास कई बार पार करती है। यह नदी गंगाजी में अंतत: मिलती है। इसके उद्गम स्थल जानने की तलाश में मैंने सासाराम जिले के धुआँ कुण्ड और उसके किनारे बने ताराचण्डी मंदिर की डिजिटल यात्रा की। उस डियाक (डिजिटल यात्रा – नेट पर जानकारी छानने की कवायद) में पता चला कि ताराचण्डी मंदिर काव नदी के उद्गम धुआँ कुण्ड के पास है और यह शक्तिपीठ माना जाता है। कहा जाता है कि यहां सती की दांयी आंख गिरी थी।

ताराचण्डी माँ की प्रतिमा। सासाराम। KUMAR AMIT – अपना काम, CC BY-SA 4.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=93282044 द्वारा

शक्तिपीठों की सूची का कोई मानक नहीं है। चार, अठारह, इक्यावन, बावन, चौंसठ और एक सौ आठ पीठों की अलग अलग सूचियाँ हैं। कई बार इसपर भी विवाद है कि माई का अमुक अंग किस जगह गिरा था। इसलिये प्रेमसागर आदिशंकर के अष्टादश महाशक्तिपीठ श्लोक के आधार पर चल रहे हैं। उस आधार पर चलते जितने भी शक्तिपीठ दर्शन हो जाये, वह उनका ध्येय है। ताराचण्डी शक्तिपीठ अलका पाण्डे की ‘शक्ति’ पुस्तक के 51 शक्तिपीठों में भी नहीं है। सो वाराणसी से गया जाते हुये सासाराम जाना नहीं हो पाया। अन्यथा, वे बिक्रमगंज की बजाय धुआँ कुण्ड पर काव नदी को देखते।

नेट छानने में मुझे मुझे यह भी पता चला कि इस नदी के किनारे आदिमानव के रहने के प्रमाण मिले हैं। पर मैं किसी पुरातत्व खोज का कोई लिंक नहीं तलाश पाया। वह अगर मिल पाता तो यह डिजिटल यात्रा कथा (डियाक) और रोचक बन पाती। :-)

काव नदी सामान्य आकार की है – पतली और 200 किमी लंबी। यह इलाके की सिंचाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। बरसात के मौसम में इलाके की अन्य नदियों की तरह यह भी विकराल रूप धारण कर लेती है। इसलिये, बरसात के मौसम के पहले ही प्रेमसागर को बिहार, बंगाल और असम की अपनी शक्तिपीठ यात्रा पूरी कर किसी और इलाके में प्रवेश ले लेना है।

यात्रा पर निकलते ही एक जगह एक छोटा मंदिर दिखा प्रेमसागर को।

सवेरे यात्रा पर निकलते ही एक जगह एक छोटा मंदिर दिखा प्रेमसागर को। नया ही बना है। लोगों ने बताया कि वहां कोई यज्ञ कर मंदिर स्थापित हुआ था। मंदिर में झांकी नुमा प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमायें हैं। एक बाबाजी की भी मूर्ति बनी है। वे ही शायद मंदिर के मुख्य गुरू रहे होंगे।

बिक्रमगंज रेलवे स्टेशन भी है। आरा से सासाराम की इकहरी लाइन को स्टेशन के पास पार किया प्रेमसागर ने। आरा और सासाराम के बीच निश्चय ही माल यातायात नगण्य होगा। बिहार के औद्योगिक विकास की कोई कहानी अभी शुरू ही नहीं हुई है। सो, इकहरी लाइन के दोहरा करने की तो जरूरत ही नहीं होगी। हां यह देख अच्छा लगा कि ट्रैक का विद्युतीकरण हो गया है।

बिक्रमगंज रेलवे क्रॉसिंग से लिया चित्र।

रेल लाइन देख कर मुझे नोश्टाल्जिया होता है, पर सन 2023 में इकहरी लाइन देखने में अच्छा भी नहीं लगता। यह रेल लाइन अपने ऊपर के खर्चे के बराबर कमाई नहीं देती होगी रेलवे को। बिहार दस प्रतिशत सालाना जीएसडीपी वृद्धि करे तो शायद एक दो दशक में इस लाइन के दिन फिरें। वर्ना इस प्रांत ने कई रेल मंत्री दिये हैं जो सिर्फ बिहार से बम्बई-दिल्ली की सवारी गाड़ियों को चला कर ही वाहावाही लूटते रहे। उसके अलावा उन्होने लूटा कुछ और भी! :-(

बिक्रमगंज से आगे सड़क ठीक है। एक दो जगह डायवर्शन है। काम हो रहा है। यह हाईवे नम्बर 120 है। काम करते लोगों ने बताया कि वे कलकत्ता से आये हैं। ठेकेदार के आदमी हैं। काम जल्दी करने का उनपर दबाव है। प्रेमसागर ने जब यह बताया तो अच्छा लगा। वैसे मैंने बनारस-शेरघाटी के बीच ग्राण्ड ट्रंक रोड के काम की दुर्दशा देखी है। जगह जगह पर डायवर्शन हैं और सालों से कोई काम होते नहीं दीखता। कई कई जगह तो अर्थवर्क पर बड़ी बड़ी झाड़ियां उग आयी हैं जो एनएचएआई की अकुशलता दर्शाती हैं।

बिक्रमगंज के आगे सड़क

दाऊदनगर के पहले शोणभद्र (सोन नदी) का पाट काफी चौड़ा है। करीब आठ मिनट लगे प्रेमसागर को पैदल पार करने में। नदी में पानी कम है। अच्छा है – पानी नदी की बजाय सोन की नहरों से डेढ़ सौ साल से सिंचाई के काम आ रहा है। डेढ़ सौ साल के इस सिंचाई चमत्कार से बिहार को गुजरात से आर्थिक रूप से एक सदी पहले ही आगे हो जाना चाहिये था, पर आज वह बीमारू प्रांतों में भी फिसड्डी है। यह एक बड़ा आश्चर्य है। यक्ष प्रश्न। कौन युधिष्ठिर बतायेंगे इस आर्थिक जर्जरता का कारण। बिहार ने बाहरी दुनियाँ को उत्तमोत्तम दिमाग दिये हैं और घटिया से घटिया अर्थव्यवस्था। :-(

सोन नदी के किनारे दाऊदनगर

दाऊद नगर ठीकठाक विकसित शहर नजर आया। नेट पर यह भी पता भी चला कि यहां के विद्यार्थी मैरिट लिस्ट में काफी आगे रहते हैं। दाऊद नगर के बारे में जानकारी छानने पर पता लगा कि दाऊद खान कुरैशी औरंगजेब का सेना अधिकारी था। सोन के पूर्व का यह इलाका पलामू के राजा से 1664 में जीतने की खुशी में औरंगजेब ने उसे जागीर दी थी और उसने अपने नाम को स्थाई करने के लिये यह नगर बसाया। वह मूलत: हरियाणा के हिसार फौजा का शेखजादा था।

फ्रांसिस बुखानेन का बिहार का सर्वे जर्नल – सन 1811-12

दाऊद नगर का इतिहास जानने में एक और नाम आता है फ्रांसिस बुखानेन (1762-1829) का। ये सज्जन पेशे से डाक्टर थे। लॉर्ड वेलेसली के सर्जन। पर इनकी रुचि जगहों को देखने और उनका दस्तावेजीकरण में थी। वे अठारहवीं सदी के शुरुआत में भारत आये। उन्होने मैसूर और बंगाल/बिहार की जैव विविधता, समाज और आर्थिक दशा का सर्वे जर्नल लिखा था जिसे सन 1930 में एशियाटिक सोसाइटी ने छापा। इस जर्नल की प्रति इण्टरनेट आर्काइव पर दिखती है। दस साल पहले बिहार सरकार ने इसे पुन: छापा है। सन 1800 के आसपास बिहार के पटना, शाहाबाद, भागलपुर, गया और पूर्णिया इलाके कैसे थे जानने के लिये यह जर्नल बड़ा रिसर्च जखीरा है।

मैंने इस जर्नल का टेक्स्ट नेट पर खोल कर उसमें दाऊदनगर को सर्च किया। कुल 29 बार दाऊदनगर का नाम आया है उस जर्नल में। और उससे पता चलता है कि 3 सदी पहले यहां शेर और बघेरे तो नहीं थे, पर भेड़िये जरूर थे। अफीम, बर्तन और कपड़े का उद्योग था। यहां के आढ़तियों का व्यवसाय बनारस तक चलता था और उनकी हुण्डी की बनारस में अहमियत थी। लोग ‘खुशहाल’ थे।

आप यह टेक्स्ट डॉक्यूमेण्ट यहां देख सकते हैं। थोड़ी मेहनत कर पूरे पीडीएफ डॉक्यूमेण्ट को जो लगभग 130MB का है, डाउनलोड भी कर सकते हैं – अगर आप शोध करने में रुचि रखते हैं। वैसे, यह शायद अमेजन पर भी मिल जाए।

फ्रांसिस बुखानेन की इस पुस्तक पर दो तीन घण्टा डियाकी करने के बाद असल पदयात्रा करने वाले प्रेमसागर भले दाऊदनगर को भूल जायें, मैं डिजिटल मशक्कत के बाद नहीं भूल सकता। इस डियाकी में बहुत हल्के से टिप पर भांति भांति से खोजना और गूगल मैप पर उपलब्ध चित्रों के सहारे इलाके की दशा का आकलन करना शामिल है।

अब आप मान सकते हैं कि मैं केवल प्रेमसागर का कहा लिखने भर की कवायद नहीं कर रहा; मैं खुद इस डियाकी में भी एक प्रकार की यात्रा कर रहा हूं। अपने घर बैठे रोज 25-30 किमी की यात्रा! और मुझ पर उसे लेखन में उतारने का दबाव भी है। :-)

प्रेमसागर दाऊदनगर से थोड़ा आगे जा कर रुके हैं। वहां आज भी होली खेली जा रही है। एक कमरा किसी लॉज में उन्हें मिल गया है। अब यहां से गया करीब 70 किमी दूर है। दो दिन में पंहुच ही जायेंगे।

आप उन्हें आर्थिक सहयोग उनके यूपीआई पते पर देने की सोचें! धन्यवाद।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

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