जमानिया से गहमर-बारा


4 मार्च 23

कल यात्रा रोक कर अपने लिये रात में रुकने का डेरा ढूंढने प्रेमसागर जमानिया आये थे किसी वाहन से। आज सवेरे जमानिया के लॉज से पीछे जा कर वापस पैदल लौटने का कृत्य किया होगा। फिर उस स्थान से पैदल वापस आ, सामान ले कर सात बजे लॉज से निकले। सवेरे की रोशनी में उन्होने कुछ चित्र जमानिया के भेजे हैं। कस्बे के पास कोई नहर जाती है। उसके बैकग्राउण्ड में सेल्फी। नहर की बगल से सड़क का दृश्य। सवेरे की चहल पहल और सड़क सफाई करते कर्मचारी।

जमानिया से गहमर कुल तीस किमी है, जो आज प्रेमसागर को चलना है। ये दोनों गंगा किनारे हैं और दोनो को जोड़ती सड़क धनुष की डोरी की तरह है।

कस्बा जाग गया है। जमानिया से गहमर कुल तीस किमी है, जो आज प्रेमसागर को चलना है। ये दोनों गंगा किनारे हैं। गंगा कमान की तरह हैं और दोनो को जोड़ती सड़क, जिसपर प्रेमसागर को चलना है, धनुष की डोरी की तरह है। धनुष की डोरी और गंगाजी की कमान दर्शाती है कि घुमक्कड़ी के कारण कुछ दूरी बचा लेने का लाभ मिला है।

गंगाजी सर्पिल आकार में आगे बढ़ती हैं। उनपर मौजूद अनेक पीपे के पुल हैं। पैदल यात्री उनका प्रयोग करता आगे बढ़े तो उसके कई लाभ हैं; जो मैंने पहले नहीं सोचे थे। हाईवे से इतर चलने पर पैदल चलने वाले को सड़क ज्यादा गर्म नहीं लगती। उत्तर प्रदेश में तो एक बस्ती से अगली बस्ती, गांव लगभग सटे हैं। लोग मिलते हैं और थकान कम महसूस होती है। यह मेरा नहीं, प्रेमसागर का अनुभव है। इसके अलावा पीपे के पुल अनेकानेक नये रास्ते खोलते हैं। घुमक्कड़ी और रोचक हो जाती है – यह मैंने महसूस किया नक्शे पर अपना माउस फेरते हुये।

जमानिया के चित्र

सवेरे पौने नौ बजे प्रेमसागर से बात हुई। उनकी आवाज में उत्फुल्लता थी। पहली चाय पी चुके थे। दुकान वाले लड़के (नाम बताया अनिल) ने उन्हें पैदल शक्तिपीठ यात्री जान कर चाय के साथ जलेबी भी खिलाई थी और पैसा भी नहीं लिया था। प्रेमसागर ने उन नौजवान का चित्र भी खींच लिया। साधारण सी दुकान और प्रसन्न दीखता नौजवान या किशोर। पिछली रात प्रेमसागर को भोजन नहीं मिला था तो आज नाश्ते में माई ने जलेबी का प्रबंध कर दिया! बालक अनिल जिंदाबाद!

मेरी पत्नीजी ने इस जलेबी खिलाने को सुना तो टिप्पणी की – प्रेमसागर तुम्हारी तरह घोंघा नहीं है। तुम तो अपना नाम-काम बताते भी लजाते हो। प्रेमसागर को अपनी बड़ी यात्रा के बारे में बताने और उसके द्वारा लोगों में श्रद्धा जगाने का गुण है। तुम तो लैपटॉप पर बैठे खीझ सकते हो। वह मजे से आगे बढ़ रहा है!

दुकान वाले लड़के (नाम बताया अनिल) ने उन्हें पैदल शक्तिपीठ यात्री जान कर चाय के साथ जलेबी भी खिलाई थी और पैसा भी नहीं लिया था। प्रेमसागर ने उन नौजवान का चित्र भी खींच लिया। साधारण सी दुकान और प्रसन्न दीखता नौजवान।

आज यात्रा ठीक ही रही होगी। गंगाजी का मैदानी इलाका है। आबादी भी ज्यादा है। गांव एक दूसरे में घुसे हुये हैं। और मुख्य बात यह कि आज यात्रा में अनिश्चितता या सरप्राइज के तत्व नहीं थे। मैंने रास्ते का नक्शा और प्रेमसागर की यात्रा प्रगति का अवलोकन किया। आज इण्टरनेट अपेक्षाकृत ठीक काम कर रहा था प्रेमसागर के छोर पर और सामान्यत: लोकेशन अपडेट मिलती जा रही थी।

दिलदार नगर के आगे मैंने नक्शे में स्थानों को ध्यान से देखा – पुलीस चौकी, मेडीकल स्टोर, रेलवे स्टेशन, मंदिर – सब तरह के स्थान। मंदिरों में शैव और शाक्त दोनों की बहुतायत थी। वैष्णव मंदिर इक्का-दुक्का दिखे। इन शैव और शाक्त मंदिरों में रात गुजारना कठिन नहीं होना चाहिये। पर कई शाक्त मंदिर अघोरपंथी हैं। एक आश्रम तो गुरु कीनाराम के नाम से था। इन जगहों पर जहां मांस-मदिरा का प्रयोग पूजा-अर्चना का अंग हो, वहां प्रेमसागर ठहरने से रहे।

गहमर रेलवे स्टेशन के आसपास

और अंतत: जो स्थान तलाशा; या यूं कहें माता ने सुझाया वह अत्यंत उत्तम था। गहमर में उन्हें पता चला कि कामाख्या मंदिर, जहां रहने की अच्छी व्यवस्था होती, वह पीछे छूट गया है। वहां वापस जाने की बजाय वे आगे चले। बारा की ओर। और बारा में एक शिव मंदिर में रहने को स्थान मिल गया। जमीन पर बिछाने के लिये तिरपाल और ओढने के लिये कम्बल का इंतजाम था। मंदिर के भईया जी ने कहा कि वे प्रेमसागर के लिये भोजन भी बना देंगे। चहकते प्रेमसागर ने बताया – “मेन बात भईया कि पीपा पुल, जिसे कल सवेरे पार करना है, वह बगल में ही है।”

ॐ मात्रे नम:! माता जी ने कल प्रेमसागर को हैरान परेशान कर परीक्षा ली। लॉज में किराये के पैसे भी खर्च हुये और रात का भोजन भी नहीं मिला। आज उन्होने योग बनाया और शिवालय में आसरा दिया; कम्बल भी और भोजन भी। घुमक्कड़ी में यह मूल तत्व है – जब आप हैरान परेशान होने लगें तो बादल छंटते हैं और रोशनी नजर आने लगती है। आगे बढ़ने का जोश आ जाता है।

बारा में एक शिव मंदिर में रहने को स्थान मिल गया। जमीन पर बिछाने के लिये तिरपाल और ओढने के लिये कम्बल का इंतजाम था।

शिवाला के उस डेरा में क्या मच्छर नहीं होंगे? मैंने प्रेमसागर से पूछा। “पता करता हूं भईया। अगर हों तो पास की किसी दुकान से मच्छर की अगरबत्ती खरीदने की कोशिश करूंगा। वैसे एक बार नींद आ जाये तो कोई पांच सात लाठी भी मारे, मेरी नींद नहीं खुलती। मच्छर क्या असर करेंगे?” – प्रेमसागर के कथ्य में इस पक्ष से बेफिक्री झलकती थी। पर शायद उन्हे अपनी पोटली में मॉस्कीटो क्वाइल या ओडोमॉस जैसी क्रीम रखनी चाहिये। डेंगू-मलेरिया से बच कर ही यात्रा करनी चाहिये।

कल प्रेमसागर को नोटबुक – कलम न रखने पर मैंने सुनाई थी। आज उन्होने खरीद कर चित्र भेजा। उसमें उन जगहों के नाम लिखे हैं, जहां से वे आज गुजरे। दिनांक डालने की आदत अभी नहीं पड़ी। अलबत्ता ‘श्री गणेशाय नम:’ लिख दिया है! :-)

प्रेमसागर को इस तरह की डायरी का अधिकाधिक प्रयोग करना सीखना चाहिये। यह उतनी ही जरूरी है (मेरे हिसाब से), जितना मोबाइल।

अगले दिन की यात्रा –

प्रेमसागर को पीपा का पुल पार कर गंगा किनारे चलते जाना है – बीरपुर से चाक छुटी तक करीब पांच-छ किमी। चाक छुटी में पुन: गंगा पार कर उत्तर प्रदेश से बिहार के बक्सर जिले में प्रवेश करना है। गंगा पार करने पर स्थान नक्शे में दीखता है मदनपुरा। मदनपुरा से बक्सर 8-9 किमी की दूरी पर है। बक्सर को प्रेमसागर “अपनी जान पहचान की जमीन” मानते हैं। :-)

गंगाजी को दो बार पांच किमी में पार कर U टर्न लेने से वे कर्मनासा नदी लांघने से बच जाएंगे. इस बीच कर्मनासा गंगाजी में मिल कर पवित्र हो चुकी होंगी.

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:।


(ॐ मात्रे नम: – माता का मंत्र है। यह कुछ वैसा ही है जैसे गायत्री मंत्र। तांत्रिक साधना का मंत्र नहीं।

श्री अरविंद आश्रम के संत हीरालाल माहेश्वरी जी को मैं जब भी पैर छूता था तो वे आशीर्वाद स्वरूप यही कहते थे – मात्रे नम:! माहेश्वरी जी अब नहीं हैं। पर उनकी याद यह मंत्र लिखते समय बरबस हो आती है।)

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

वाराणसी से जमानिया – विशुद्ध घुमक्कड़ी


3 मार्च 23

सवेरे छ बजे के बाद का चित्र है वाराणसी केंट के आनंद लॉज का, जिसमें वहां से रवाना होते समय प्रेमसागर की लोगों के साथ एक सेल्फी है। सो माना जा सकता है कि सवेरे सवा छ बजे तक उन्होने अपनी यात्रा प्रारम्भ कर दी थी। उन्होने बताया कि राजवाड़ी में सुधीर पाण्डेय जी के घर (?) तक चलेंगे आज। वहां उनके रात्रि विश्राम की व्यवस्था है। एक जगह उन्होने सड़क खराब होने का जिक्र किया। सड़क रेलवे की जमीन पर है और रेलवे को फिक्र नहींं सड़क ठीक करने की। उत्तर प्रदेश प्रशासन या राष्ट्रीय सड़क विकास निगम उस सड़क के सुधार पर हाथ नहीं लगाता। यह दो अलग व्यवस्थाओं के बीच फंसा मामला है। सड़कों के विकास में यह झोल मेरे घर के पास भी है, जहां रेलवे कटका स्टेशन के पास छ सौ मीटर की सड़क बना ही नहीं रही।

आनंद लॉज से निकलने के पहले सवेरे छ बजे का चित्र

प्रेमसागर को सीधे रजवाड़ी की ओर निकलना था पर दस बजे उनका फोन आया कि लोगों ने उन्हे शॉर्टकट बता दिया है। उन्होने बलुआघाट पर पुल से गंगा पार कर ली है। लोगों का कहना है कि वे सीधे चलते चले जायें। उन्हें कर्मनासा नहीं पार करनी होगी और वे सीधे बक्सर पंहुच सकते हैं। “भईया जरा नक्शा में देख लीजिये हम ठीक जा रहे हैं या नहीं?”

रेल की पटरी के समांतर रेल की जमीन पर सड़क की दुर्दशा।

यह विचित्र लगा मुझे। गांव के लोगों के कहने पर वे अपना रास्ता बदल चुके हैं। उन्हें बेसिक भूगोल मालुम होना चाहिये कि बक्सर के पहले कर्मनासा गंगाजी में मिलती हैं। अब वे बिना गंगा एक बार फिर पार कर उत्तरी भाग में गये बक्सर कैसे पंहुच सकते हैं कि कर्मनासा नदी को लांघ कर उनके सारे पुण्य नाश न हो जायें? मेरे स्वर में झुंझलाहट स्पष्ट थी। उनको कहा कि लोगों से पूछें कि आगे किस स्थान पर वे गंगा पुन: पार कर सकते हैं। ग्रामीण ने किसी स्थान का नाम बताया जिसे उन्होने मुझे दोहराया – “भईया जिगिना पर पीपा पुल से पार करने की बात कह रहे हैं.”

जिगिना तो प्रयाग-विंध्याचल के बीच है। ग्रामीण कुछ और बोल रहा था, प्रेमसागर कुछ और रजिस्टर कर रहे थे। उन्होने फोन उस ग्रामीण को दे दिया। ग्रामीण नगवाँ के पॉण्टून पुल की बात कर रहे थे। नगवाँ और जिगिना में बहुत अंतर होता है. मेरी झुंझलाहट और बढ़ गयी। मैंने नक्शे में देख प्रेमसागर को सुझाव दिया कि वे सीधे जमानिया-दिलदार नगर की ओर चलते रहें। आगे कहीं कोई पीपा का पुल मिले तो उससे कर्मनासा के गंगाजी में मिलने के पहले गंगा पार कर लें। दो तीन बार यह कहा पर मुझे लगा कि प्रेमसागर उसे ठीक से सुन नहीं रहे हैं। मैं उन्हें कुछ सुझा रहा था, ग्रामीण कुछ और सुझा रहे थे।

बलुआघाट पर गंगा पार की प्रेमसागर ने

प्रेमसागर की इस भारत दर्शन यात्रा के बहुत झोल हैं। कई हैण्डीकैप। वे नक्शा देखने में दक्ष नहीं हो पाये हैं। कोई भी व्यक्ति शॉर्टकट की बात कहता है तो उनका मन मयूर हो उठता है। यह शायद नेचुरल भी है। लम्बी यात्रा पर निकला आदमी एक एक इंच बचाना चाहता है। पर उसके साथ उनका नक्शा देखना और आगे की यात्रा का नियोजन उनका बहुत कमजोर पक्ष है। वे लोगों और स्थानों के नाम भी स्पष्टता से रजिस्टर नहीं करते। एक सज्जन ने ट्विटर पर टिप्पणी की थी कि प्रेमसागर आपके चांद पर लैण्डरोवर जैसे हैं। पर वैसा बिल्कुल नहीं है। वे मनमौजी ढंग से यात्रा मार्ग बदल लेते हैं और आगे के बारे में मुझसे कहते हैं – भईया जरा देख लीजिये कि रास्ता ठीक जा रहे हैं न?

मैंने कई बार उन्हें दिलदारनगर-गहमर की ओर बढ़ने को कहा। तब तक मैंने नेट पर छान लिया था कि गहमर के बाद बारा में पिछले साल पीपा का पुल बना है गंगा नदी पर। बारा उस स्थान से दो किमी पहले है जहां कर्मनासा गंगा में जा कर मिलती हैं। बारा में पीपा पुल पार कर वे कर्मनासा लांघने से बच जायेंगे। यह दो तीन बार बोलने पर प्रेमसागर नोट करने के लिये साथ के ग्रामीण से कागज कलम मांगने लगे। “भईया, मेरे पास डायरी थी बैग में पर रास्ते में वह रखे रखे खराब हो गयी है।”

प्रेमसागर की यात्रा बिना नोटबुक के और एक खराब मेमोरी के साथ हो रही है! मेरी झुंझलाहट पर वे सीधे प्रतिक्रिया नहीं करते पर कुछ देर बाद बोले – “अब भईया, निकल लिये हैं तो आगे महादेव जाने, माई जानें। वे ही कोई न कोई बेवस्था (व्यवस्था) करेंगे।”

और सभी हैण्डीकैप हैं प्रेमसागर के – विपन्न, साधन हीन, यात्रा नियोजन पक्ष की कमजोरी और नोटबुक-कलम जैसी बेसिक चीज का भी न होना! पर उनका एक सशक्त पक्ष है – ईश्वरीय सत्ता में अटूट विश्वास, आस्था और श्रद्धा! यही विश्वास, आस्था और श्रद्धा का फल है कि वे भारत दर्शन कर ले रहे हैं और मेरे जैसा व्यक्ति की-बोर्ड के सामने केवल खीझ रहा है!

शाम चार बजे मैंने उनकी लोकेशन देखी। वे किसी धनपुर के पास थे। आसपास कई मंदिर दीख रहे थे नक्शे में, गंगा किनारे। लगभग एक किमी पर एक मंदिर। मैंने प्रेमसागर को सुझाव दिया कि अब सांझ होने को है। अब वे किसी मंदिर या किसी और जगह अपने रात्रि विश्राम की जगह तलाशना शुरू कर दें। बेहतर हो ऐसी जगह तलाशें जो वीरान न हो। अब आगे यात्रा जारी रख कर जमानिया या दिलदार नगर नहीं पंहुचा जा सकता।

जमानियां में साढ़े पांच सौ किराये का कमरा, रात्रि विश्राम के लिये।

पर प्रेमसागर ने अपने हिसाब से किया। उन्होने जमानिया से सात किमी पहले अपनी यात्रा को आज का विराम दिया। एक वाहन से जमानिया पंहुच कर कोई लॉज/गेस्ट हाउस तलाशा और साढ़े पांच सौ में रुकने के लिये कमरा लिया। “सवेरे पांच बजे वापस उस जगह पर जा कर वहां से पदयात्रा शुरू कर दूंगा।” – प्रेमसागर का कहना था। उन्हें कमरा तो मिल गया पर भोजन का प्रबंध नहीं हो पाया। अपनी पोटली में जो रखा था उसी को खा कर पानी पी दिन पूरा हुआ।

जब ज्योतिर्लिंग यात्रा प्रारम्भ की थी तो प्रेमसागर कहा करते थे – “भईया किसी मंदिर के ओसारे में जमीन पर या किसी पीपल के नीचे भी रुकने में कोई दिक्कत नहीं है मुझे।” पर अब लगता है कि मंदिरों और पीपल के पेड़ के नीचे घोर असुविधा का अभ्यास नहीं रहा उनका। अपेक्षायें बढ़ गयी हैं। लोगों के सहयोग ने अपेक्षायें बढ़ाने में पर्याप्त योगदान किया है। महादेव और माई उनकी इन अपेक्षाओं को उचित ही मानते होंगे, जो वे इंतजाम किये जा रहे हैं।

लेकिन, मैं सोचता हूं – महादेव और माई बहुत खेला करते हैं। बिना प्लानिंग के चलने की, बिना नोटबुक कलम के यात्रा करने की जो बेफिक्री प्रेमसागर में है; उसे झटका देने के लिये किसी भी दिन वे पीपल के पेड़ के नीचे यात्रा विश्राम को उतार सकते हैं उन्हें! :lol:

आगे कैसे और क्या होता है, देखना रोचक होगा। फिलहाल तो प्रेमसागर का कहना है – भईया एक बार बक्सर पंहुच जायें, फिर तो रास्ता भी जाना पहचाना है और लोग भी।

उनकी बक्सर की यात्रा अगले दो तीन दिन में होगी। इंतजार किया जाये। अभी तो, आप कृपया प्रेमसागर की साधन विपन्न घुमक्कड़ी के लिये उनके यूपीआई पते पर अंशदान करने की सोचें; महादेव और माता आपका भला करेंगे।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

वाराही, विशालाक्षी, विश्वनाथ और वाराणसी


2 मार्च 2023, वाराणसी –

मेरी पत्नीजी ने इंतजाम किया प्रेमसागर के वाराणसी ठहराव का। उनके भाई के आभा ट्रेवल्स के सामने है आनंद लॉज। आनंद लॉज में कमरा मिल गया। रात नौ बजे के आसपास पंहुचे होंगे प्रेमसागर लॉज में। मैंने पुस्तक में पढ़ा था कि वाराणसी में दो शक्तिपीठ हैं – मानमंदिर घाट पर वाराही माता और दुर्गाकुण्ड में विशालाक्षी देवी। ये दोनों और बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने थे प्रेमसागर को।

किसी ने उन्हें सूचना दी कि वाराही माता का मंदिर सवेरे तीन से पांच बजे ही खुलता है। सो प्रेमसागर लगता है सोये ही नहीं। दो बजे रात में उठ कर जब मंदिर पर पंहुचे तो पता चला कि मंदिर सवेरे साढ़े सात से साढ़े नौ बजे तक खुलता है। उनके पास समय था तो भोर में ही विश्वनाथ मंदिर में दर्शन कर लिये। वहां कोई भीड़ नहीं थी। उसके बाद आ कर वाराही माता जी के मंदिर के दर्शनार्थियों की लाइन में लग गये। लाइन में लगने वाले वे आठवें व्यक्ति थे। बाद में तो बहुत भीड़ लगने लगी।

वाराही माता के दर्शनार्थियों के चित्र भेजे हैं प्रेमसागर ने। वे जो लाइन में लगे प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके चेहरों से लगता है कि दक्षिण भारतीय अधिक हैं। शक्तिपीठ सही में राष्ट्रीय एकीकरण के बड़े कारक हैं। देश में जितने भक्त भगवान विष्णु या शिव के नहीं हैं, उनसे ज्यादा देवी के या हनुमान जी के हैं। व्यक्ति अपने को इनके ज्यादा करीब पाता है।

वाराही माता मंदिर (पंचसागर शक्तिपीठ) वह स्थान है जहां सती के नीचे के जबड़े गिरे थे। यहां के भैरव ‘महारुद्र’ हैं। वाराही माता का अर्थ है वे जिनका मुंह वाराह (जंगली सूअर) के जैसा है। यहां पूजा पद्यति अन्य शाक्तपीठों से कुछ अलग है। वाराही माता की पूजा यहाँ भगवान विष्णु के अधिक करीब लगती है बनिस्पत भगवान शिव के। पुराणों में भी वाराही देवी के मिथक भगवान विष्णु के अधिक करीब हैं। … हर एक शक्तिपीठ की अपनी अलग पहचान है और उस स्थान तथा उस जगह के लोगों के अनुसार पूजा पद्यति भी अलग है। … भगवान विष्णु का एक अवतार वाराह भी है।

वाराही माता के दर्शन के बाद प्रेमसागर ने वाराणसी के घाटों पर चहलकदमी की। उसके कई मनमोहक चित्र भेजे हैं। पर बनारस के घाटों के चित्रों से तो इण्टर्नेट भरा पड़ा है। उन्हें यहां प्रस्तुत करने की आवश्यकता अधिक नहीं है।

दोपहर तक प्रेमसागर विशालाक्षी मंदिर का दर्शन भी कर चुके थे। विशालाक्षी अर्थात बड़े नयनों वाली। तीन महादेवियों की परिकल्पना है नयन को ले कर शाक्त परम्परा में – मीनाक्षी, कमलाक्षी और विशालाक्षी। वाराणसी का विशालाक्षी मंदिर उन 18 महाशक्तिपीठों में से है जिनका उल्लेख आदिशंकर विरचित अष्टादश महाशक्तिपीठ स्तोत्र में है। यहां के भैरव कालभैरव हैं।

इस मंदिर के दर्शन के बाद इन अठारह महाशक्तिपीठों में से दो का दर्शन प्रेमसागर सम्पन्न कर चुके हैं।

प्रेमसागर ने अब तक सात देवी मंदिरों का दर्शन सम्पन्न कर लिया है। अभी वे नंगे पांव चल रहे थे, अब अपने लिये एक चप्पल खरीदी है। इसके बिना उनके पैर में एक जगह कांच भी गड़ चुका है।

शाम के समय प्रेमसागर ने आराम ही किया। अगले दिन उन्हें गाजीपुर-बक्सर के रास्ते गया के लिये निकलना है। वे सीधे रास्ते, बनारस के राजघाट पर गंगा नदी पार कर डेहरी और सासाराम के रास्ते गया की ओर नहीं चलेंगे। “भईया उस रास्ते में कर्मनासा पार करनी होती है, न?” – प्रेमसागर का कहना है। कर्मनासा हमारे मिथकों में अशुभ नदी हैं। सभी शुभाशुभ कर्मों का नाश करने वाली। उसे पार कर प्रेमसागर अपने पुण्य नहीं गंवाना चाहते।

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

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