सेमरी के आगे से बिक्रमगंज


7-8 मार्च 23

सेमरी/माल्याबाग के आगे किसी लॉज में रुके थे प्रेमसागर। तबियत कुछ ठीक नहीं थी। पर लगता है वह जगह ज्यादा जमी नहीं। सवेरे सवा पांच बजे उठ कर चल दिये। लगभग पंद्रह किलोमीटर चल कर बिक्रमगंज पंहुच गये। मुझे फोन किया तो सवेरे के सवा आठ बजे थे। बीमार होने के बावजूद भी तेज ही चले होंगे। अजीब मनई है यह प्रेमसागर। हरारत या बुखार होने पर मैं तो कमरे के साथ अटैच्ड बाथरूम जाने के पहले सोचता हूं। ये सज्जन पंद्रह किमी चल लिये।

उनकी सांस भारी थी। तबियत वास्तव में खराब ही होगी। अकेला पदयात्री। अनजान जगह और टेंट में मुद्रा भी सीमित। मैं होता तो यात्रा को इतिश्री कह घर लौटने की सोचता। वैसा कुछ प्रेमसागर के मन में आया ही नहीं होगा।

रास्ते में खींचा सूर्योदय का चित्र।

“भईया, रस्ता में कुछ फोटो खींचे हैं। आपको भेज दिये हैं। यहां ठीक होटल मिल गया है। पांच सौ किराया है। आज दिन भर आराम करूंगा और कल छ बजे निकलूंगा आगे के लिये।” – प्रेमसागर आगे की यात्रा की बात कर रहे हैं। तबियत ठीक नहीं है। होली का मौसम है। लोग रास्ते भर हुड़दंग करने वाले होंगे ही। पर उनको तो चलना है। चरैवेति, चरैवेति!

मैंने दिन भर कोई सम्पर्क नहीं किया उनसे। आराम मिलना चाहिये। शाम सात बजे से आधा आधा घण्टे पर तीन फोन किये पर कोई जवाब नहीं मिला। घण्टी पूरी बज कर बंद हो गयी। मुझे फिक्र लगी – तबियत ज्यादा न बिगड़ गयी हो।

उनकी सांस भारी थी। तबियत वास्तव में खराब ही होगी। अकेला पदयात्री। अनजान जगह और टेंट में मुद्रा भी सीमित। मैं होता तो यात्रा को इतिश्री कह घर लौटने की सोचता। वैसा कुछ प्रेमसागर के मन में आया ही नहीं होगा।

अगले दिन, आज 8 मार्च को, सवेरे आठ बजे फोन आया प्रेमसागर का – “कल नींद में थे भईया। दवाई ले कर सोये थे। रात में इग्यारह बजे देखा कि आपकी मिस कॉल हैं। उस समय फोन करना ठीक नहीं समझा। आज तबियत बेहतर है पर गला अकड़ गया है। दूसरे आज बारिश भी हो रही है। होटल के मालिक को मैंने बोल दिया है कि एक दिन और रुकना होगा।”

मैंने उन्हें कहा कि अगर सम्भव हो तो बिक्रमगंज चौक का एक फोटो खींच लें। प्रेमसागर ने बताया कि उनका होटल चौक के ही पास है। आधे घण्टे में चौक के चित्र भेज दिये। चित्र से अंदाज लग गया कि अभी सवेरे होलीमय नहीं है वातावरण। बारिश से सड़क गीली है। लोकल नेताओं के नव वर्ष, ईद, मकर संक्रांति और होली की बधाई के पोस्टर लगे हैं। चहल पहल है। पर बहुत चेंचामेची नहीं है। जो जानकारी नेट पर है, उसके अनुसार यह चौक बिहार के इस हिस्से – रोहतास जिले के पश्चिमी भाग का बड़ा रूरर्बन केंद्र है। इसी लिये मैंने इसका चित्र लेने को कहा था प्रेमसागर को।

बिक्रमगंज चौक। रूरर्बियन सेण्टर। चौक कस्बाई बिजनेस सेण्टर जैसा दीखता है।

चौक कस्बाई बिजनेस सेण्टर जैसा दीखता है। कोई नेता जी हैं घनश्याम कुमार। उनके बड़े बड़े पोस्टर हैं। एक डाक्टर साहब के आरोग्यम ईएनटी अस्पताल का पोस्टर है। कोचिंग क्लासेस वाले के पर्चे खम्भे पर चिपके हैं। चौक के बीचोंबीच कोई नेता जी नहीं, कोई मॉर्डन आर्ट का स्कल्प्चर है। बिक्रमगंज का रूरर्बिया, रूरल कम अर्बन ज्यादा बनने का प्रयास कर रहा है।

मैं यह सोच रहा हूं कि यात्रा किसकी है – प्रेमसागर की या मेरी? प्रेमसागर का तो कहना है कि उन्हें नींद आ गयी तो कोई चार लाठी भी मारे तो नींद नहीं खुलती। मेरी मनस्थिति दूसरी है। रात लघुशंका के लिये नींद खुलती है; और उम्र के साथ ज्यादा ही खुलती है; तो प्रेमसागर के यात्रा विवरण के शब्द गढ़ने का भाव बना रहता है। इस तरह की डिजिटल यात्रा किसी ने की है – इस तरह के घर के कमरे में रहते हुये यात्रा कथा लिखने के प्रयोग। मुझे यह अलग तरीके की चीज लगती है और इसके लिये भी एक शब्द गढ़ता हूं मैं – डियाक (डिजिटल यात्रा कथा)

डियाक लेखन में मूल तत्व प्रेमसागर के फोन पर दिये इनपुट्स और ह्वाट्सएप्प/टेलीग्राम पर भेजे चित्र हैं। उनके अलावा गूगल मैप, विकिपेडिया और गूगल सर्च द्वारा खंगाली जानकारी बैकग्राउण्ड को गाढ़ापन देती है। कभी कभी मुझे कुछ पुस्तकें भी खरीदनी पड़ती हैं। पर वह खरीद भी डिजिटल माध्यम – किण्डल पर ही होती है। कागज का प्रयोग तो शायद ही होता हो। इसलिये इसे डिजिटल यात्रा कथा लेखन या डियाक लेखन कहा जा सकता है। डियाक में अभी मैंने कभी भी फिक्शन का प्रयोग नहीं किया। पर कभी कभी लगता है विभिन्न स्थानों के बारे में इण्टरनेट पर इतनी जानकारी, इतने चित्र बिखरे हैं कि एक फिक्शनल यात्री गढ़ कर पॉल थरू की टक्कर का ट्रेवलॉग – डियाक ठेला जा सकता है। कोई न कोई कर देगा। या ऊर्जा बनी रही तो कभी मैं ही डियाकी में नये प्रयोग कर गुजरूं! :lol:

फिलहाल, इस डियाक लेखन ने बहुत कुछ होल्ड पर डाल दिया है। बहुत कुछ लिखना है। सुरेश पटेल दो बार मिलने आ चुके हैं। उनके सब्जियों की खेती और विपणन के प्रयोग में बहुत कुछ है जिसपर लिखा जाना चाहिये। मेरे नाती, विवस्वान के जनेऊ संस्कार पर बहुत कुछ सोचा है। कुछ नोट्स भी हैं और ढेरों चित्र भी। मेरी बिटिया बोलती नहीं, पर उसे भी लगता होगा कि बाहर के चिड़िया कौव्वा दीखते हैं, पर विवस्वान पर लिखना नहीं सूझता। विवेक ने साइकिल चलाना शुरू किया है और स्वास्थ्य पर नये प्रयोग कर रहे हैं। राजकुमार उपाध्याय और उनका परिवार एक अलग तरीके से मुझे प्रभावित कर चुका/रहा है। … बहुत कुछ है, जिसपर लिखा-कहा जाना है। पर वह सब नहीं हो रहा। डियाक चल रही है। डिजिटल यात्रा कथा!

मैं बिक्रमगंज को बारीकी से देखता हूं। यहां रेलवे स्टेशन है। एक नहर भी दीखती है। चौक से सड़कें जाती हैं बक्सर, सासाराम, पटना और डेहरी को। बढ़िया कनेक्शन है बिहार के बाकी हिस्सों से। बिहार में, अगर रिहायश बनानी ही हो (और वह बड़ा अगर है – बिहारी भी बिहार छोड़ देस परदेस जा रहे हैं :-( ) तो बिक्रमगंज बढ़िया जगह हो सकती है। फिलहाल तो यह डियाकी सोच है। :lol:

मैं प्रेमसागर पर लौटता हूं। मेरा सोचना है कि अस्वस्थ प्रेमसागर को मदद की जरूरत है। यात्रा कितनी भी फ्रूगल क्यों न हो, उसके लिये कुछ न कुछ आर्थिक सहयोग तो चाहिये। जिसका भी फोन मेरे पास आता है उन्हें घुमा-फिरा कर प्रेमसागर को सहायता करने की बात कहता हूं। मेरे ख्याल से पाठकगण भी वैसा कुछ कर सकते हैं। थोड़ा बहुत अंशदान उनके एक दिन लॉज का किराया या भोजन का खर्चा अदा कर सकता है। पता नहीं, प्रेमसागर को मेरा यह कहना कैसा लगेगा, पर प्रेमसागर को आर्थिक योगदान करना पुण्य का काम है।

बिक्रमगंज का होटल और 500रुपये रोज का कमरा।

आज बिक्रमगंज में एक दिन और रुकने के बाद (आशा है) कल प्रेमसागर दाऊद नगर के लिये निकलेंगे। वह सोन नदी पर जगह है। तीस किमी आगे। दाऊद नगर से गया है 70 किमी दूर। गया में मंगलागौरी शक्तिपीठ है। प्रेमसागर का अगला महाशक्तिपीठ।

आज होली है। रंगों का त्यौहार मंगलमय हों!

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

बक्सर से सेमरी – सोन नहर


6 मार्च 23

बक्सर से सवेरे रवाना होने पर गूगल ने प्रेमसागर को गोल गोल घुमा दिया। दो बार एक ही जगह वापस आ गये तो लोगों से रास्ता पूछा और आगे बढ़े। उन्हें नवानगर की ओर चलना था। जहां तक चल सकें, वहां तक। दोपहर में तीन-चार बजे से रात गुजारने की जगह तलाशने की सोच बना ली थी। जहां मिल जाये, वहीं डेरा जमाया जाये। सब महादेव पर छोड़ रखा था, पर राह चलना और जगह तलाशना उनका कर्म है – इसे वे बखूबी समझते हैं। इसके अलावा ब्लॉग पर लिखने लायक सामग्री उपलब्ध कराना भी शायद वे अपने कामों में महत्वपूर्ण समझते हैं।

बक्सर सोन नहर, उसकी बगल से जाती सड़क और नहर पर पुराना पुल

रास्ता एक नहर के किनारे किनारे चलता है। नक्शे में मैं पाता हूं कि वह सोन मेन कनाल है। एक पुल का चित्र देख कर लगा कि वह बहुत पुराने तरह का है। मुझे 80-100 साल पुराना लगा। यह जिज्ञासा हुई कि शायद यह सड़क और यह नहर अपने में पुराना इतिहास समेटे है। करीब दो घण्टे नेट पर ‘सोन मेन केनाल’ तलाशने पर सन 1853-55 का समय नजर आया। उस समय ब्रिटिश शासन नहीं था। ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से एक सेना के इंजीनियर लेफ्टीनेण्ट डिकेंस शाहाबाद (आरा) आये। उन्होने लोगों को कुंये से पुरवट/मोट से पानी निकाल कर बड़े श्रमसाध्य तरीके से खेती करते देखा।

डिकेंस वास्तव में गजब के इंसान थे। वे सेना में आर्टिलरी शाखा के अफसर थे और उनका जल प्रबंधन से कोई लेना देना नहीं था। पर लोगों के खेती के तरीके से द्रवित – प्रभावित हो कर उन्होने आसपास के बड़े भू भाग के जल संसाधनों का सर्वेक्षण किया। उन्होने पाया कि इलाके की दो बड़ी नदियां – सोन और गंगा के तल में काफी अंतर है। सोन का पानी अंतत: गंगा में ही जाता है। उनकी सोच थी कि सोन के पानी पर बैराज बना कर उससे नहरों द्वारा एक बड़े इलाके – उत्तर प्रदेश में कर्मनासा के पश्चिमी भाग से ले कर बक्सर और आरा के बड़े ग्रामीण इलाके को सींचा जा सकता है।

इण्टरनेट से ही मुझे गगन प्रसाद जी की एक पुस्तक/रिपोर्ट – हिस्ट्री ऑफ इर्रीगेशन इन बिहार की 200 पेजों की पीडीएफ कॉपी मिल गयी। इस पुस्तक में प्राचीन काल से लेकर ब्रिटिश काल तक का सिंचाई का इतिहास है। पुस्तक के सोन नदी की नहरों पर लिखे अध्याय के बीस-तीस पेज मैने ब्राउज किये। (आप यह रिपोर्ट इण्डिया वाटर पोर्टल के इस पेज पर दिये लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं)।

डिकेंस ने 1855 में अपनी रिपोर्ट बना कर ईस्ट इण्डिया कम्पनी को पेश की। उसके अनुसार सिंचाई की नहरों और बैराज पर 61 लाख रुपये का खर्च आना था और आधा काम होने पर रेट ऑफ रिटर्न 11 प्रतिशत था। काम पूरा होने पर 19 प्रतिशत आमदनी का आकलन था। निश्चय ही ईस्ट इण्डिया कम्पनी कोई काम धर्मादे खाते में नहीं करने वाली थी। कम्पनी के डयरेक्टर्स नें डिकेंस की बहुत प्रशंसा की, लेकिन रिपोर्ट पर काम तुरंत शुरू नहीं हुआ।

उसके बाद 1857 का स्वतंत्रता संग्राम हुआ। कुंवर सिंह के विद्रोह से बिहार का यह इलाका तो बहुत प्रभावित था। अंग्रेज सिमट गए पर जल्दी ही संग्राम दब गया। डिकेन्स वापस आए। तब तक वे शायद लेफ्टीनेण्ट कर्नल बन गये थे। उन्होंने आगे सोन नदी का सर्वेक्षण किया। कालांतर में डिकेंस की रिपोर्ट में सोन नदी के पूर्वी भाग की नहरेंं जो गया और पटना जिलों को भी सिंचित करतीं, जोड़ी गयीं। अंतत: 1868-69 में, जब देश कम्पनी के नहीं, ब्रिटिश सरकार के शासन में था, काम शुरू हुआ।

White Board पर मेरे द्वारा बनाया नहर सिस्टम का स्केच। सोन नदी में डेहरी के पहले इंद्रपुरी में डैम है। वहां से नहर अकोढ़ी गोला तक जाती है। अकोढ़ी गोला से दो नहरें बक्सर और आरा को निकलती हैं। अंतत: ये नहरें गंगा नदी में मिलती हैं। सोन नदी खुद भी अंतत: गंगा में पटना में मिलती है।

डेहरी ऑन सोन से 11 किमी पहले इन्द्रपुरी डैम बना। इंद्रपुरी डैम से अकोढी गोला तक नहर बनी और वहां से पश्चिमी सोन नहर बक्सर में गंगा तक आयी। पूर्वी सोन नहर अकोढी गोला से आरा जिले में गंगा तक पंहुची। दोनो नहरें करीब 100 किमी लम्बी हैं। इससे बक्सर और आरा जिलों का बड़ा खेती का इलाका सिंचित होता है।

बक्सर सोन नहर से निकली एक उप नहर। दूसरा चित्र नहर पर बनाये ग्रामीण पैदल पुल का है।

सो, आज यात्रा में, प्रेमसागर जिस नहर और उसपर बने पुल का चित्र भेज रहे थे, वह 1874 की बनी है। मैंने प्रेमसागर को कहा कि वे लोगों से पता करें कि नहर आज भी कितनी प्रभावी है। पदयात्रा करते हुये प्रेमसागर ने इस पश्चिमी सोन नहर पर अपनी यात्रा के दौरान चार बड़ी नहरें और पैंतीस छोटी नहरें निकलती देखीं। इन छोटी-बड़ी नहरों से यह पश्चिमी सोन नहर एक बड़े भू भाग को सिंचित करती है। किसानों ने प्रेमसागर को बताया कि पूरे साल नहर में पानी रहता है। किसी किसी साल पानी की कमी होने पर फरवरी-मार्च में पानी नहीं होता, अन्यथा हमेशा सिंचाई के लिये पानी मिलता है। इन नहरों के कारण लोगों ने कुंये या ट्यूब वेल का प्रयोग नहीं किया। हाल में नीतिश सरकार ने जब बोरिंग करने पर पचहत्तर प्रतिशत की सबसिडी दी, तब कुछ लोगों ने ट्यूब वेल लगाए। अन्यथा सारी सिंचाई इसी नहर से होती है।

नहर के पार जो दो छोटे कमरे दिख रहे हैं, उनमें पिपरमिण्ट का आसवन होता है।

प्रेमसागर ने कई तरह की खेती देखी। धान, गेंहू, चना, सरसों तो होता ही है। उसके अलावा कमलगट्टा और मखाना व्यापक तौर पर होता है। एक जगह प्रेमसागर को पिपरमिण्ट की खेती और उसके आसवन का एक प्लाण्ट भी दिखा।

प्रेम सागर ने ही गुजरात यात्रा के दौरान मुझे नर्मदा नहरों के द्वारा गुजरात की ग्रामीण खुशहाली दिखाई थी। कुछ वैसा ही कर्नल डिकेंस और कर्नल रेण्डाल के इन सोन नहरों से भी हुआ होगा। इन नहरों से ग्रामीणों को लाभ हुआ होगा पर लाभ ब्रिटिश लोगों ने कमाया भी खूब कमाया होगा।

पूरे दिन मैं बक्सर की इस सोन नहर और प्रेमसागर के दिये इनपुट्स से चमत्कृत होता रहा। प्रेमसागर की इस यात्रा से न जुड़ा होता तो मुझे डेढ़ सौ साल पहले का यह सिंचाई इतिहास, जो आज भी प्रभावी है; पता ही नहीं चलता।

सोन नहर के सहारे प्रेमसागर बक्सर से सिकरौड़ तक 18 किलो मीटर चले। आगे वे नवानगर/बिक्रमगंज की ओर मुड़ गये। यह रास्ता आगे दाऊद नगर में सोन नदी पार करता है।

शाम चार बजे प्रेमसागर नवानगर पार कर चालीस किमी चल कर सेमरी के आगे रात्रि विश्राम के लिये रुके। खुले में या किसी मंदिर में रुकना खतरे से खाली नहीं था। मंदिर वालों ने बताया – “बाबा, होली का मौसम है, नौजवान बदमाशी कर सकते हैं। रात में होलिका जलनी है। खुले में सोने पर कोई हो सकता है आपका सामान उठा कर होलिका में डाल दे”।

सो प्रेमसागर ने लॉज तलाशी। एक जगह उन्हें कमरा मिला। मांग तो वह एक हजार की कर रहा था, पर प्रेमसागर ने अपना सब सामान दिखा कर बताया कि वे दो सौ ही दे सकते हैं। झिक झिक हुई पर कमरा मिल गया दो सौ में। “भईया पास में ही लाइन होटल (ढाबा) से भोजन मिल जायेगा”। फिलहाल प्रेमसागर ने बताया कि उन्हें हल्की हरारत है। वे मेडीकल दुकान से दवाई ले कर सोने का प्रयास करेंगे।

आगे की यात्रा –

सेमरी से दाऊद नगर करीब 45 किमी है और उसके आगे सत्तर किमी है गया। तीन चार दिन लगेंगे गया पंहुचने में। कल होली के दिन निकलना-चलना शायद ही हो पाये। फिर भी, देखें आगे क्या होता है।

ॐ मात्रे नम:। हर हर महादेव।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रेमसागर की पदयात्रा के लिये अंशदान किसी भी पेमेण्ट एप्प से इस कोड को स्कैन कर किया जा सकता है।

बारा से बक्सर


5 मार्च 23

सवेरे साढ़े छ बजे मैंने ही फोन कर लिया प्रेमसागर को। उस समय यात्रा के लिये प्रस्थान नहीं किया था। तेजू सिंह बिंद – मंदिर के रखवाले – चाय बना लाये थे। प्रेमसागर चाय पी रहे थे। पुजारी – राजकुमार जी ने बिना चाय पिये जाने नहीं दिया।

प्रेमसागर की बहुत खातिरदारी की उन लोगों ने उस शिव मंदिर में। तेजू जी की राशन की दुकान और आटा चक्की भी है, पास में। उन्होने रात में महराज जी (प्रेमसागर) को भोजन भी बना कर कराया और मच्छरों से बचाव के लिये गुडनाइट क्वाइल भी लाये। दो क्वाइल लगा कर आराम से सोये प्रेमसागर।

शिवाला के बगल में ही पीपा का पुल था, पर वह चालू नहीं था।

शिवाला के बगल में ही पीपा का पुल था, पर वह चालू नहीं था। पिछले साल चालू हुआ पहली बार पर फिर सात पॉण्टून पीपों में लीकेज हो गया। बदलने के लिये नये पीपे आ गये हैं और मरम्मत का काम चल रहा है। पता नहीं कब तक पीपे का पुल चालू होगा। गंगा दशहरा के बाद तो उजड़ने ही लगते हैं पीपे के पुल। अब अगर चालू भी हो गया तो दो-ढाई महीना ही काम करेगा।

चाय पीने के बाद राजकुमार जी और तेजू सिंह प्रेमसागर को घाट तक छोड़ने आये। दोनो बिंद हैं – केवट। नाव वाले को उन्होने सहेज दिया – ये हमारे गुरू महराज हैं। ठीक से ले जाना। वे नाव वाले को प्रेमसागर के किराये के लिये पैसा देने लगे तो कई मुस्लिम खेतिहर मजदूर जो उसपार खेती के लिये जा रहे थे, ने कहा कि बाबा जी इस इलाके के मेहमान हैं। उनसे आप कैसे पैसा ले सकते हैं? उन मुस्लिम ग्रामीणों के कहने पर प्रेमसागर बिना किराया दिये गंगा पार किये।

गंगा तट पर विदा लेते समय प्रेमसागर, राजकुमार जी और तेजू सिंह बिंद।

“भईया मुझे तो थोड़ा अटपटा लग रहा था। वे अपने साथ कुदाली, फरसा लिये थे। पर वे बड़ी अदब से मुझे घाट से बीरपुर तक छोड़ने आये।”

जो चित्र भेजे, उसके अनुसार डीजल इंजन से चलने वाली बड़ी नाव थी। दो-तीन दर्जन लोग चढ़े होंगे उसपर। दो साइकिलें भी लादी गयी थीं। मोटर बोट थी तो पांच-सात मिनट में प्रेमसागर नदी के इस दक्षिणी किनारे से उत्तरी किनारे लग चुके थे।

नदी का पानी साफ था। इतना साफ कि निर्मल कहा जाये। वातावरण और गंगाजी की विशाल जलराशि देख आनंद आ गया सवेरे सवेरे। उस पार पक्का घाट था। कई सीढ़ियां थीं। एक मंदिर भी था। प्रेमसागर उतर कर एक पगडण्डी पकड़ आगे चलने लगे। आगे एक डेढ़ किलोमीटर पर कर्मनासा नदी के दक्षिणी किनारे पर आ कर मिलती हैं। कर्मनासा के दक्षिणी किनारे पर होने वाले संगम के पहले ही प्रेमसागर उत्तरी किनारे पर आ चुके थे। गंगा पार करने का ध्येय यही था।

डीजल इंजन से चलने वाली बड़ी नाव थी। दो-तीन दर्जन लोग चढ़े होंगे उसपर। दो साइकिलें भी लादी गयी थीं।

मिथक है कि महर्षि विश्वामित्र और इंद्र के बीच की टक्कर में बेचारे त्रिशंकु लटक गये आसमान में उलटे। उनकी लार गिरने से बनी कर्मनासा। कैमूर की पहाड़ी से निकली यह छोटी नदी, जिसमें लगभग हमेशा पानी रहता है, 192 किमी लम्बी है। यह नदी कर्म का नाश करने वाली मानी जाती है। भयंकर अशुभ। पर इस नदी के किनारे कम से कम सौ गांव होंगे – उत्तर प्रदेश और बिहार में। उनके लोग इस नदी के जल को क्या समझते हैं? मैंने गूगल मैप पर लोगों की इस नदी पर रेटिंग देखी।

करीब तीन हजार लोगों ने इसे 4.0/5 की रेटिंग दी है। टिप्पणियों में भी ज्यादातर नदी के किनारे रहने वाले हैं जो इसके पानी को स्वच्छ बताते हैं। वे लोग इसका नित्य इस्तेमाल करते प्रतीत होते हैं। पर ‘त्रिशंकु की लार’ की मिथकीय कथा के कारण इस नदी की बड़ी बेकद्री है। इसी के चक्कर में प्रेमसागर वाराणसी से गया जाने के लिये पचास किलोमीटर लम्बा मार्ग चुनना पड़ा। वे अपने कर्मों के पुण्य का नाश नहीं चाहते!

मेरे कहने पर कर्मनासा में गंगा के संगम स्थल के उत्तरी किनारे से चित्र प्रेमसागर ने भेजे। चित्र में गंगाजी की विशाल जलराशि दीखती है पर कर्मनासा नजर नहीं आती। गंगा नदी के पीछे जहां जमीन नहीं दीखती, वहीं कर्मनासा के गंगा में मिलने का आभास मिलता है। उसके आगे भी गंगा का जल वैसा ही साफ है जैसा कर्मनासा के मिलने के पहले था। सब नदी-नाले गंगा में मिल कर गंगा ही बन जाते हैं!

गंगा नदी के पीछे जहां जमीन नहीं दीखती, वहीं कर्मनासा के गंगा में मिलने का आभास मिलता है।

बीरपुर से चार पांच किमी चल कर चाकछूटी में पुल के रास्ते गंगा पार कर प्रेमसागर को बिहार के बक्सर जिले में प्रवेश करने के लिये मैंने कहा था, पर कर्मनासा के आगे ज्यादा देर प्रतीक्षा नहीं की उन्होने। एक साधारण सी पतवार वाली नाव में बीस रुपया किराया दे कर कर्मनासा-संगम के एक किमी आगे उन्होने गंगा पार कर ली। नाव पर दो ही व्यक्ति थे – नाव वाला और प्रेमसागर।

नाव वाला अपना चित्र नहीं लेने दे रहा था तो प्रेमसागर ने अपनी सेल्फी लेने के बहाने उसे चित्र में ले ही लिया। चित्र ले सकने में यह उनकी सिद्धहस्तता ही मानी जायेगी।

नाव वाला अपना चित्र नहीं लेने दे रहा था तो प्रेमसागर ने अपनी सेल्फी लेने के बहाने उसे चित्र में ले ही लिया।

बीस रुपया किराया दे कर प्रेमसागर को बिहार में प्रवेश मिला। “भईया, नदी का जल बहुत ही साफ था। मछलियाँ भी बड़ी बड़ी थीं। पानी से उछलतीं और चित्र लेने की कोशिश करते करते फिर पानी में चली जा रही थीं।”

बड़ी और पानी के बाहर उछलने वाली मछलियाँ? मुझे लगा कि वे सोंईस होंगी। गांगेय डॉल्फिन। जब मैंने पूछा तो प्रेमसागर ने बताया कि नाव वाला भी यही कह रहा था। उसके अनुसार ये मछलियां कभी कभी नदी किनारे बैठी भी दीखती हैं।

मीठे पानी की गांगेय डॉल्फिन बड़ी संख्या में हैं – यह सुन कर मुझे अपार हर्ष हुआ। प्रेमसागर की कर्मनासा समस्या खत्म हो जाने से कहीं ज्यादा खुशी। बस ऐसे ही गंगा का जल निर्मल होता जाये। सोंईस की बड़ी आबादी मैंने अपने बचपन में ही देखी थी। अब साठ साल बाद उनकी गंगाजी में होने की बात मन प्रसन्न कर गयी। मैं डॉल्फिन को ले कर प्रसन्न था और प्रेमसागर चैन की सांस ले रहे थे – “अब करमनासा का झंझट खतम!” अपनी अपनी खुशी के अपने अपने कारण! :-)

बक्सर जिले में उसपार प्रेमसागर ने बताया कि गूगल मैप 11 किलोमीटर की दूरी बता रहा है बक्सर शहर की। उसके बाद लगता है उनकी उत्फुल्लता बढ़ गयी हो। पर वे धीरे चले। पांच घण्टे बाद बक्सर पंहुचे। चाय पानी के लिये लगता है कई जगह रुके।

बक्सर में वे किसी लक्ष्मण जानकी मंदिर में रुके पर वहां की व्यवस्था जमी नहीं। उसके बाद शाम सात बजे बताया कि उनको अयोध्या के किसी पल्टुआ अखाड़े के रामसुमिर दास जी ने शिवशक्ति धर्मशाला में इंतजाम कर दिया है। फिर धर्मशाला के मंजीत जी का भी फोन आया। “यहां सब व्यवस्था है”।

शिवशक्ति धर्मशाला के कमरे का चित्र भेजा प्रेमसागर ने। कल वे बारा के शिव मंदिर में फर्श पर तिरपाल बिछा कर रहे थे। मंदिर में भोजन और एक छत मिल गयी थी रात्रि विश्राम के लिये; वही बहुत आनंददायक था। यहां शिवशक्ति धर्मशाला में डबल बेड और एयरकण्डीशनर भी दिख रहा है। घुमक्कड़ी यात्रा का यही सरप्राइज एलीमेण्ट है। कभी पीपल की छाया, कभी मंदिर की छत, कभी किसी के घर का ओसारा और कभी वातानुकूलित कमरा। क्या पता कभी वह दिन भी आये जब महादेव उन्हें फाइव स्टार होटल की सुविधा भी दिखा दें! … मैं यह यात्रा विवरण लिखने के लिये मेहनत क्यों कर रहा हूं? शायद यह सरप्राइज एलीमेण्ट ही आकर्षित करता है।

प्रेमसागर के साथ शिवशक्ति धर्मशाला के मनजीत जी और प्रेमसागर को मिला कमरा।

शिवशक्ति धर्मशाला में रात गुजार कर कल सवेरे प्रेमसागर गया के लिये निकलेंगे। पचीस तीस किमी चलने का विचार है। आगे के बारे में बार बार वे कहते हैं – “भईया महादेव देखेंगे। माई देखेंगी। हमें तो बस चलना है।”

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा
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