नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न – प्रेमसागर पर अंतिम पोस्ट


24 दिसम्बर 21 –

बीस दिसम्बर को दिन सवेरे प्रेमसागर ने बताया था कि वे पोरबंदर से आगे निकल लिये हैं। पोरबंदर से द्वारका 106 किमी और नागेश्वर तीर्थ 118 किमी है नक्शे के अनुसार। मेरे अनुमान से इस यात्रा में प्रेमसागर को तीन दिन लगने चाहिये थें। बाईस दिसम्बर को उन्हें गंतव्य पर पंहुचना था और तेईस को उन्हें नागेश्वर तीर्थ के दर्शन करने चाहिये थे।

दिलीप थानकी जी द्वारा भेजा नागेश्वर तीर्थ का चित्र।

वैसा ही हुआ। कल दोपहर में तीन बजे प्रेमसागर का फोन आया कि उन्होने नागेश्वर ज्योतिर्लिंग दर्शन सम्पन्न कर लिया है। सोमनाथ में वे अकेले थे। यहां उनके साथ दिलीप थानकी जी, उनके जीजा जी, उनके परिवार-कुटुम्ब के कई सदस्य और दिलीप जी की बहन का वह बालक (जिसका चित्र पोरबंदर के समुद्र तट पर प्रेमसागर के साथ है) भी थे। प्रेमसागर अपनी इस उपलब्धि पर हर्षित दिख रहे थे। इसमें दिलीप थानकी जी और उनके कुटुम्ब की महती भूमिका है। उन्होने प्रेमसागर का सोमनाथ और उससे आगे न केवल पूरा ध्यान रखा, उन सब ने प्रेमसागर को उसी तरह का आतिथ्य दिया, जैसी छपिया के घनश्याम पाण्डे को नीलकण्ठ वर्णी के रूप में सौराष्ट्र ने दिया होगा। दिलीप जी और उनका कुटुम्ब प्रेमसागर के प्रति जो श्रद्धा व्यक्त कर रहा है वह अभूतपूर्व है। वे लोग प्रेमसागर की आगे की द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा का सारा आर्थिक और लॉजिस्टिक सपोर्ट सिस्टम बनाने और उसे सुचारु रूप से सतत जारी रखने के लिये कृत संकल्प हैं। महादेव की असीम कृपा प्रेमसागर पर है।

प्रेमसागर को, यह स्पष्ट हो गया है कि उन्हें मेरी लेखन सहायता की आवश्यकता आगे नहीं है। उन्होने इस को स्पष्ट शब्दों में नहीं कहा, पर उन्होने यह जरूर किया कि बीस दिसम्बर के बाद मुझे जानकारियां देना बंद कर दिया।

बाईस दिसम्बर को प्रेमसागर का फोन आया दिन में। उन्होने बताया कि पिछले दिन उनके पैर में कांटा चुभ गया था, सो चलने में पीड़ा थी। इस कारण वे बातचीत या चित्र नहीं दे पाये थे। यह वाजिब कारण लगा। पर उन्हें बिना जूते चलने की जरूरत क्यों हुई? प्रेमसागर ने बताया – “भईया, जूता टूट गया था। नया जूता मन माफिक मिला नहीं जो कपड़े का ही हो, जिसमें चमड़ा न इस्तेमाल हुआ हो।” यह कारण मुझे कुछ अजीब लगा। छोटे स्थानों पर भी प्रेमसागर को जूता या सेण्डिल मिल जा रहा था। पोरबंदर में न मिलना उचित नहीं प्रतीत होता, वह भी तब जब दिलीप जी प्रेमसागर की सब जरूरतें सहर्ष पूरी कर रहे हों। प्रेमसागर शायद जूता छोड़ कर चलना चाहते हैं और मुझे “नाराज” भी नहीं करना चाहते थे। पहले मैं नाराज भी होता और उनकी “जड़ता” या “लोग क्या कहेंगे” की भावना को निरर्थक ठहराने का प्रयास करता। पर इसबार मैंने ऐसा कुछ नहीं किया।

थानकी जी का भेजा नागेश्वर तीर्थ का एक और चित्र

उसके बाद भी प्रेमसागर का नियमित फीड बैक – चित्र, फोन या लाइव पोजीशन शेयरिंग नहीं हुई। यह साफ हो गया, उनके बिना बोले कि वे आगे कोई सहयोग नहीं चाहते। वह सहयोग मैंने उन्हे जो दिया था, उसमें उनपर अपने स्नेह के अलावा जो गुस्सा, नारजगी या उनकी सोच पर व्यंगोक्तियाँ रही हैं, वे अब उन्हें अधिक चुभ रही हैं। वे शायद पहले भी कष्ट देती रही हों, पर तब उन्हे मेरे सहयोग, लेखन और लोगों से बातचीत कर उनकी सहायता करने आदि की आवश्यकता रही थी। अब उनके पास विकल्प हैं।

खैर, जो भी हो; पिछले लगभग चार महीने प्रेमसागर के साथ यात्रा जुगलबंदी ने मुझे बहुत फायदा दिया है। उनकी यात्रा न होती तो मैं रीवा, शहडोल, अमरकण्टक और नर्मदीय क्षेत्र, भोपाल, उज्जैन, माहेश्वर, गुजरात और सौराष्ट्र की मानसिक यात्रा कभी न कर पाता। कांवर यात्रा का उन्होने मुझे सहभागी बनाया, अपने सुख दुख – लगभग पूरी तरह – मुझसे बांटे, मेरे ब्लॉग को नया आयाम दिया; उसके लिये प्रेमसागर को धन्यवाद।

पोरबंदर से नागेश्वर तीर्थ की यात्रा के मेरे पास कोई चित्र या और जानकारी नहीं है। परसों प्रेमसागर ने यह जरूर बताया था कि यह यात्रा भाग उन्होने कांवर को केवल प्रतीक के रूप में ले कर सम्पन्न किया है। प्रतीक के रूप में थोड़ा जल अपने कंधे पर लिये चले वे। बाकी सामान और जल के लोटे या तो पोरबंदर में रहे या द्वारका में। यात्रा के तीन दिनों में रातें उन्होने पोरबंदर (एक दिन) और द्वारका (दो दिन) रुक कर बिताईं। दिलीप थानकी जी के कुटुम्ब के लोग उन्हें यात्रा स्थल से वाहन द्वारा रात बिताने के लिये ले जाते थे और अगले दिन उन्हें वापस उसी स्थान पर छोड़ते थे, जहां से रात्रि विश्राम के लिये वे विराम लिये थे। इस प्रकार नवी बंदर से नागेश्वर तीर्थ की यह यात्रा पारम्परिक तरीके से कम प्रतीकात्मक तरीके से ज्यादा हुई। पर परम्परा पालन प्रेमसागर का ध्येय होना भी नहीं चाहिये। क्या होना चाहिये, उसपर कहने में इससे पहले मैं प्रवचनात्मक मोड में आ जाऊं, मैं इस ट्रेवलब्लॉग को यहीं विराम देता हूं।

मेरे ब्लॉग की पोस्टों के साथ 2654 किलोमीटर चले हैं। यह कोई कम पद यात्रा नहीं है। मुझे उसके साथ जुड़ने में ‘सेंस ऑफ प्राइड’ है; जिसे मैं लिखे बिना यह 90 पोस्टों की सीरीज बंद नहीं करूंगा। यह सब सम्पादित कर कभी पुस्तक का रूप लेगा या नहीं, मैं नहीं कह सकता। ब्लॉग से पुस्तक के रूपांतरण के लिये मैं निहायत आलसी हूं। अन्यथा “मानसिक हलचल” से पांच सात पुस्तकें दुह लेता। :lol:

देवाधिदेव महादेव प्रेमसागर का कल्याण करें। हर हर महादेव!


*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

जैतूना से बदामा खातून – मनिहारिन की पीढ़ियाँ


मनिहारिन/चुड़िहारिन का पेशा अभी भी गांव में जिंदा है और पीढ़ियों से महिलायें उस काम में लगी हैं। पांच अप्रेल को मैंने नूरेशाँ मनिहारिन के बारे में एक स्टेटस पोस्ट लिखी थी। अब मेरे घर पर बदामा मनिहारिन दो बार आयी है।

Maniharin
दऊरी उठाये महिहारिन

मेरी पत्नीजी के बचपन में जैतूना खातून आया करती थी। वह सीधे घर के आंगन में जाती थी – जनानखाने में। उसे घेर कर सभी महिलायें, लड़कियां आसपास इकठ्ठा हो जाती थीं। सभी को चूड़ी पहनाती थी। उनके मांग के अनुसार लिपिस्टिक, स्नो (क्रीम) आलता-सिंदूर-ईंगुर, बिंदी, आईना, पाउडर आदि दिया करती थी। फीता या लाल रिबन का चलन था। काला परांदा भी बिकता था। घण्टा डेढ़ घण्टा मजमा लगता। दाम चुकाने में रुपया पैसा तो चलता ही, अनाज के साथ बार्टर भी होता था।

मनिहारिन-चुड़िहारिन का लोक संस्कृति में बड़ा स्थान था।

मुझे अच्छा लगा कि वह स्थान अब भी कमोबेश कायम है। बदामा मनिहारिन ने बताया कि जैतूना उसकी अजिया सास थीं। इसका मतलब कम से कम तीन पीढ़ी से उसके परिवार की महिलायेंं इस व्यवसाय में हैं। बदामा विधवा है। नूरेशाँ भी विधवा थी। बदामा बताती है कि उसका आदमी अठारह साल पहले गुजर गया था। उसकी जेठानी भी विधवा है और इसी तरह मनिहारिन का काम करती है। मुझे याद नहीं रहा नूरेशाँ के बारे में अपनी पुरानी पोस्ट का अन्यथा पूछता कि वही तो नहीं है इसके जेठानी। वह भी अपने को वहीं – महराजगंज के आसपास का बताती थी।

नूरेशां मनिहारिन
नूरेशाँ मनिहारिन

नूरेशां और बदामा – दोनो में कई समानतायें हैं। दोनो महिलाओं के सामान का सेगमेण्ट डील करती हैं। दोनो महिलायें हैं तो उनसे महिलायें सहजता से बातचीत करती हैं। कुछ सामान – जैसे सेनिटरी पैड्स या अण्डरगारमेण्ट्स – जो महिलायें अभी भी गांव/कस्बे के जनरल स्टोर्स से लेने में झिझकती-शर्माती हैं उन्हें ये सहजता से उपलब्ध करा देती हैं। बदामा ने बताया कि वह सेनीटरी पैड्स ला कर देती है। कीमत पैंतीस से ले कर सत्तर रुपये तक होती है। गांवदेहात में भी, उत्तरोत्तर सेनीटरी पैड्स का प्रयोग बढ़ रहा है। सरकार अगर महिलाओं का सशक्तीकरण करना चाहती है तो उसके फुट-सोल्जर ये मनिहारिनें हो सकती हैं जो हाइजीन की बातें महिलाओं से करें और उन्हें सेनीटरी पैड्स के प्रयोग को प्रेरित करें।

बदामा मनिहारिन
वाणी पाण्डेय ने आसपास की तीन चार महिलाओं – बच्चियों को बुला कर उन्हें अपनी ओर से चूड़ी पहनवाई। मनिहारिन बदामा है।

मेरी बिटिया वाणी पाण्डेय आयी हुई है। वह बोकारो में एक महिला सशक्तीकरण ग्रुप – साथ फाउण्डेशन का काम देखती है। उसने आसपास की तीन चार महिलाओं – बच्चियों को बुला कर उन्हें अपनी ओर से चूड़ी पहनवाई। पैर में काला धागा, जिसमें नकली मोतियां लगी होती हैं और जिसे बच्चे, महिलायें नजर न लगने के लिये पायल की तरह पहनते हैं; ‘काला धागा नजरिया वाला’ कहा जाता है; वह भी (उनकी फरमाइश पर) पहनवाया। छोटे शिशुओं के लिये ये मनिहारिने करधनी भी बेचती हैं।

बदामा के दो लड़के सूरत में काम करते हैं। सरिया ढलाई (?) का काम करते हैं। घर का खर्चा बदामा अपने बल पर चलाती है। चूड़ी, कंगन, क्लिप, आलता, ईंगुर सिंदुर, बिंदी, अण्डर गारमेण्ट्स आदि लिये चलती है अपनी दऊरी में। ग्राहक उसके महिलायें किशोरियाँ ही हैं। बता रही थी एक मरसेधू उससे सेफ्टी रेजर पूछ रहा था। वह मना करने पर पत्ती (ब्लेड) पूछने लगा। उसका मनचलापन देख कर बदामा में जवाब दिया – “तोहरे बदे कुच्छो नाहीं बा। तूं जा महामाई के (तुम्हारे लिये कुछ भी नहीं है, तुम्हें महामाई – संक्रामक बीमारी – खायें!)!”

बदामा मनिहारिन - मनिहारिनों की समाज में आदर इज्जत पहले भी थी, अब भी है।
बदामा मनिहारिन – मनिहारिनों की समाज में आदर इज्जत पहले भी थी, अब भी है।

आजकल लड़कियों महिलाओं की पसंद में पहले से अंतर आया है। अब रिबन या परांदा नहीं बिकता। अब लड़कियां रबर बैण्ड मांग करती हैं। बुकनी की मांग कम हो गयी है। कान नाक में बुंदे पहनने वाली महिलायें भी अब नहीं हैं। अब सेनीटरी पैड्स, रुमाल और अण्डर गारमेण्ट्स बिकते हैं। नकली मोतियों की माला, सस्ती ज्वैलरी, काजल के पेंसिलें बिकती हैं। अब महिलायें घर के जनानखाने में, आंगन में नहीं बाहर ओसारे में भी बैठक लगाती हैं। आंगन का कॉन्सेप्ट उत्तरोत्तर खतम होता जा रहा है।

मेरी पत्नीजी बताती हैं कि पहले चूड़ी पहनाये जाने पर वे मनिहारिन की दऊरी को धरती छू कर प्रणाम करती थीं। ज्यादातर उनके पास पैसा नहीं होता था, वे बदले में अनाज देती थीं। अब वह प्रणाम करना या अनाज से बार्टर करना खत्म हो गया है। पर मनिहारिनों की समाज में आदर इज्जत पहले भी थी, अब भी है।

गांव में तरह तरह के फेरीवाले मुझे दिखते हैं। तरह तरह का फेरी का नये प्रकार का बाजार बढ़ा है। कोरोना लॉकडाउनके दौरान वे कम दिखते थे, पर अब तो बहुत से दिखते हैं। उनके बीच यह मनिहारिन सेगमेण्ट बहुत अर्से से चल रहा है, और आगे भी चलता रहेगा। बदामा की अगली पीढ़ी भी इस बिजनेस में तैयार होगी, इसकी आशा और यकीन है।

Bangles
मनिहारिन की दऊरी का सामान

पोरबंदर के आसपास कांवर यात्रा पर विचार


20 दिसम्बर 21 –

नवी बंदर से नागेश्वर तीर्थ की कांवर यात्रा एक अलग प्रकार से हो रही है प्रेमसागर की। यह सब दिलीप थानकी जी के काठियावाड़ी आतिथ्य का प्रभाव है। काठियावाड़ का स्वागत सत्कार भगवान को भी उनका स्वर्ग भुला देता है तो प्रेमसागर की यात्रा का स्वरूप बदलना तो छोटी बात है। प्रेमसागर की कांवर से उनका बीस तीस किलो का बोझा हट गया है। वह दिलीप के जीजा जी के घर पर रखा है। कांवर में केवल जल ही है। जल के लोटे। कोई फोटो नहीं है जिससे पता चले कि दोनो ओर कांवर बैलेंस कैसे की है। शायद जल के लोटे ही आधे एक ओर आधे दूसरी ओर लटका रखे हों। अब वजन केवल तीन किलो का होगा।

आज सवेरे पूछा तो वे साढ़े छ बजे पोरबंदर से चल कर द्वारका की ओर बढ़ रहे हैं। जहां तक जायेंगे, जायेंगे। शाम को दिलीप जी अपने वाहन से उन्हे वापस पोरबंदर ले आयेंगें रात्रि विश्राम के लिये। अगले दिन फिर उसी स्थान पर जा कर आगे यात्रा करेंगे। द्वारका 106 किमी है पोरबंदर से। तीन दिन लगने चाहियें। पर प्रेमसागर के पास सामान कम है तो हो सकता है यह दूरी वे दो दिन में ही तय कर लें। उन्हें ऐसा करना नहीं चाहिये। पर यह मैंने समझ लिया है कि क्या करना चाहिये और क्या नहीं; उसपर मुझे बहुत माथापच्ची नहीं करनी है। उनकी यात्रा मॉनीटर करने का फेज नहीं रहा। अब उनकी लाइव लोकेशन देखने की भी जरूरत महसूस नहीं होती। वे सौराष्ट्र के आतिथ्यस्वर्ग के आनंदलोक में हैं।

दिलीप थानकी जी के गांव का समुद्र किनारा। प्रेमसागर के साथ बालक दिलीप जी की बहन का पुत्र है।

मैंने प्रेमसागर से पूछा – कोई गांव दिखता है? प्रेमसागर का कहना था कि वे हाईवे पर चल रहे हैं। दोनो ओर दूर दूर तक गांव नहीं है। तटीय इलाका है पर समुद्र के पास से नहीं गुजर रहा हाईवे। जमीन सामान्य है। रेतीली नहीं। हाईवे पर यातायात बहुत है। वाहनों की आवाज फोन पर बात करते समय आती रहती है – लगभग निरंतर।

मेरी पत्नीजी मेरी फोन की बातचीत सुन कर कहती हैं – “इतना जोर जोर से क्यों बात करते हो। वह तुम्हारा कोई कर्मचारी नहीं है जिससे तुम्हें पोजीशन लेनी हो या निर्देश देने हों।” एक सज्जन मुझे फोन कर कहते हैं कि मुझे प्रेमसागर के बारे में लिखते समय उन्हें प्रेमसागर नहीं; “बाबाजी, महराज जी या प्रेम महराज” लिखना चाहिये। लेखन में सम्मान और श्रद्धा झलकनी चाहिये। पर मैं उन्हें मना कर देता हूं। प्वाइण्ट ब्लैंक! साफ साफ। मैं प्रेमसागर से स्नेह करता हूं। वही भाव प्रेमसागर की यात्रा के शुरुआती दौर के हम तीन लोग – प्रवीण दुबे, सुधीर पाण्डेय और मैं रखते हैं। हम तीनों उन्हे सरल, संकल्पित और जुनून वाला व्यक्ति मानते हैं और इस आशंका से ग्रस्त रहे हैं कि कहीं लोग प्रेमसागर को बाबा जी बना कर ऐसा न कर दें कि उनका व्यक्तित्व जाने अनजाने उनके आदर-सम्मान में से कोई ऐसा तत्व सोख कर अहंकार न संग्रहीत कर ले। (हमारे हिसाब से) वह विनाशकारी होगा। भगवान इस प्रकार की कलाकारी करते हैं। … मुझे नहीं लगता कि उन सज्जन को समझ आयी मेरी बात। पर यह जरूर हुआ कि उनके द्वारा बिनमांगी सलाह पर काफी समय तक मुझे क्रोध आता रहा।

इस प्रकरण पर मेरी पत्नीजी जोड़ती हैं – “तुम्हारा क्रोध वाजिब है। पर उस क्रोध को प्रेमसागर पर क्यों उतारते हो। मैं तो कहती हूं कि प्रेमसागर के बारे में लिखना बंद कर दो। लेकिन वह भी नहीं करते। कम से कम जो चल रहा है; उसे सहज भाव से तो लो। प्रेमसागर महादेव की कठपुतली है, तुम्हारी तो नहीं। वह तुम्हारा कोई रेलवे का कर्मचारी थोड़े ही है जिसे तुम निर्देश देने की सोचो।” मुझे लगता है कि मेरी पत्नीजी मुझसे बेहतर समझती हैं प्रेमसागर को।

मुझे याद आता है पिलानी में एक बार स्वामी चिन्मयानंद जी ने एक प्रसंग सुनाया था। राम एक दिन हनूमान जी से पूछते हैं – कस्त्वम? तुम कौन हो?

हनूमान जी – कस्त्वम? तुम कौन हो?

हनूमान जी समझ जाते हैं कि यह सरल प्रश्न नहीं है। इसलिये उनका उत्तर हिंदू दर्शन का सार है। हिंदुत्व की सभी शाखाओं का संश्लेषण। वे कहते हैं –

देहबुद्‍ध्या त्वद्दासोऽहं जीवबुद्‍ध्या त्वदंशकः।
आत्मबुद्‍ध्या त्वमेवाहम् इति मे निश्चिता मतिः॥

“यह मेरा निश्चित मत है कि देहबुद्धि से मैं आपका दास हूं। जीव बुद्धि से आपका अंश हूं। और आत्म बुद्धि से तो मैं आप ही हूं।” द्वैत, विशिष्टाद्वैत और अद्वैत तीनो का संश्लेषण है हनूमान जी के कथन में।

[यह महत्वपूर्ण श्लोक श्रीमत शंकराचार्य कृत हनुमत्पंचरत्न स्तोत्र का अंश है।]

प्रेमसागर जिस इलाके में घूम रहे हैं, वह द्वैतवादियों का गढ़ लगता है। स्वामीनारायण सम्प्रदाय भक्ति मार्ग का प्रसार करता है। वहां श्रद्धा और आस्था बहती है। वहां अद्वैत की कठोरता-रुक्षता या अनास्थावादियों का उपहास कत्तई नहीं है। अत: उसमें प्रेमसागर की बाबाजी या महराज जी वाली ईमेज बनना स्वाभाविक ही है। और काठियावाड़ ही नहीं, पूरा देश भी कमोबेश, द्वैत सिद्धांत से प्रभावित है – मूलत:। जीडी, तुम्हें क्रोध-कष्ट-खिन्नता नहीं होनी चाहिये उन सज्जन के “सुझाव” पर!

मंदिर में प्रेमसागर।

प्रेमसागर की यात्रा पर आगे किसी पोस्ट में लिखूंगा। दिलीप थानकी जी ने उनकी सोमनाथ से द्वारका-नागेश्वर तक की यात्रा का विधिवत इंतजाम कर दिया है। नवीं बंदर से पोरबंदर (जिसकी यात्रा वे 18 दिसम्बर को कर चुके हैं) और आगे नागेश्वर तक प्रेमसागर को अपने सामान का बोझ भी उठा कर नहीं चलना है। उसके आगे की यात्रा भी निर्विघ्न हो सके, इसका इंतजाम भी वे सोच रहे हैं। वे और उनके समुदाय के लोग बाबा प्रेमसागर से अत्यंत प्रभावित हैं।

दिलीप थानकी, उनका भांजा और प्रेमसागर।

यूं लग रहा है – उत्तरोत्तर यह प्रकटित हो रहा है – कि दिलीप थानकी का सम्पर्क भी प्रेमसागर की यात्रा में एक चमत्कार ही है। हां, यह जरूर है कि चमत्कार पर जोर दे कर मैं प्रेमसागर को महिमामण्डित करने या ‘महराज’ बनाने का कृत्य नहीं करना चाहता। उन्हें एक सरल कांवर-पदयात्री ही रहना चाहिये।

हर हर महादेव।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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