बाबा मिल गये उर्फ नागाबाबा जीवन गिरि


लगता है जूना अखाड़ा थोक में साधुओं को सधुक्कड़ी का डिप्लोमा देता है और बाद में उन सबको इधर उधर छोटे-बड़े मंदिरों में खाने कमाने की फ्रेंचाइज भी प्रदान करता है।

राघवेंद्र दास – बीजापुर, कर्णाटक के पदयात्री


मैं राघवेंद्र से पूछता हूं – उनका मोबाइल नम्बर क्या है? और उत्तर मुझे ट्रिप कर देता है। “कोई मोबाइल नहीं है। जब भजन करो, ध्यान करो तो किसी न किसी का फोन आ जायेगा। फोन तो ध्यान खा जायेगा। मैंने फोन ही नहीं रखा। जितना कम सामान, उतना सुखी जीवन।”

आज के चित्र – मेदिनीपुर, पठखौली और इटवा


घास छीलने वाली सवेरे सवेरे निकल पड़ी थीं। आपस में बोल बतिया भी रहे थीं। गर्मी बढ़ रही है। गाय-गोरू के लिये घास मिलनी कम हो गयी है। उसके लिये इन महिलाओं को अब ज्यादा मशक्कत करनी पड़ने लगी है।

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