धंधुका – कांवर यात्रा में पड़ा दूसरा रेल स्टेशन


24 नवम्बर, रात्रि –

प्रेमसागर धंधुका में पंहुचे हैं। आज कमियाला से चले तो भोर मेंं साढ़े चार बजे के आसपास ही थे, पर साढ़े आठ बजे तक सात-आठ किलोमीटर ही चल पाये थे। एक घण्टे में दो किमी। सवेरे के समय जब सूरज का ताप नहीं होता, यह दूरी बहुत कम कही जायेगी। मुझे अहसास हो गया कि कहीं गड़बड़ ज्यादा ही है उनके स्वास्थ्य में। प्रेमसागर को कहा कि वे आगे इस हिसाब से चलें कि वहां रात गुजारने के लिये रुका जा सके। दिन में बारह बजे के बाद चलना सम्भव नहीं हो पायेगा।

सवेरे आठ बजे अकेले कांवर ले कर चलते रास्ते में लिया प्रेमसागर का चित्र।

प्रेमसागर यह मानने को तैयार नहीं थे कि उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। पर लक्षण उसके उलट थे। मैंने अश्विन पण्ड्या जी से बात की और उन्हे सुझाया कि धंधुका के स्टेशन अधीक्षक महोदय को कहें कि किसी मोटर साइकिल से प्रेमसागर को धंधुका ले आयें। दो तीन दिन में जब उनका स्वास्थ्य सुधरे तो वे अगर चाहें तो पुन: उसी स्थान पर आ कर अपनी कांवर यात्रा जारी कर सकते हैं। वर्ना आपत-धर्म का पालन करें और कांवर उठाये उठाये मोटर साइकिल पर धंधुका पंहुचें।

पण्ड्या जी ने मेरी फोन कॉल पर ही प्रेमसागर को कॉन्फ्रेंस में लिया। वे उस समय फतेहपुर पंहुचे थे और किन्ही बापू भाई के घर पर विश्राम करने को रुके थे। पण्ड्याजी ने और मैंने प्रेमसागर को राजी कराया कि वे मोटर साइकिल से धंधुका चलें। अपनी दशा समझते हुये प्रेमसागर ने ना-नुकुर नहीं की। पण्ड्या जी ने बापू भाई से गुजराती में बातचीत की। बापू भाई ने बताया कि वे स्वयम बारहों ज्योतिर्लिंग दर्शन कर आये हैं। वे तो वाहन से गये थे, पर यात्रा से बहुत थक गये थे; ये सज्जन तो पैदल चल रहे हैं! बापू भाई ने कहा कि वे प्रेमसागर को भोजन करा कर धंधुका पंहुचाने का इंतजाम कर देंगे।

हितेंद्र किशौर सिह;बाबु भाई उमेन्द्रं सिह; खुरोप भाई मुरोप सिह; ग्राम-फतेहपुर जिला- धंधुका। प्रेमसागर इनके यहां रुके थे और इन लोगों ने उन्हे भोजन करा कर धंधुका पंहुचाया।

और इस प्रकार प्रेमसागर दोपहर दो-तीन बजे धंधुका रेलवे स्टेशन पर आ गये थे। वहां खाली पड़े रेलवे स्टेशन के डॉर्मेट्री वाले रेस्ट हाउस में जिसमे चार बिस्तर हैं; प्रेमसागर को जगह मिली। स्टेशन पर बिजली पानी की सुविधा है। काम लायक फर्नीचर भी है। पिछले दो तीन साल से स्टेशन गेज कंवर्शन के लिये बंद है तो कोई चहल पहल नहीं है। तीन लाइन के स्टेशन में स्टेशन अधीक्षक साहब और दो तीन और कर्मी भर होंगे। प्रेमसागर इत्मीनान से एकांत-स्वास्थ्य लाभ कर सकते हैं।

धंधुका रेलवे स्टेशन। चित्र लेने से किसी आर.पी.एफ. कर्मी ने प्रेमसागर को मना किया। इसलिये चित्र इण्डिया रेल इंफो की साइट से साभार।

कल प्रेमसागर को स्टेशन का प्वाइण्ट्समैन या खुद स्टेशन अधीक्षक साहब डाक्टर साहब को दिखा लायेंगे। वहां उनका कोरोना टीकाकरण भी हो जायेगा और डाक्टर साहब से परामर्श भी।

स्टेशन अधीक्षक श्री उपेंद्र दोषी जी 59 वर्ष के हैं। इग्यारह महीने बाद उनका रिटायरमेण्ट है। उनका परिवार वडोदरा में रहता है। यहां धंधुका में वे लम्बे अर्से से हैं। यह नीचाई का इलाका है। रेलवे के मकानों में बारिश के मौसम में पानी घुस जाता है। दो तीन साल नहीं आता, पर किसी साल अचानक बारिश से घर जलमग्न हो जाते हैं। उनके घर का काफी सामान जलमग्न होने से खराब हो गया। गेज कनवर्शन में उनकी पोस्टिंग कहीं और थी तो परिवार को काफी परेशानी झेलनी पड़ी। यह देखते हुये उन्होने अपना परिवार वडोदरा शिफ्ट कर दिया। अब वे अकेले यहां रहते हैं। थोड़ी बची रेल नौकरी काटनी है अकेले उनको।

“मोदी जी की सरकार आयी तो नर्मदा का पानी मिलने लगा। नहीं तो बड़ी दिक्कत थी यहां पीने के पानी की। अब शहर में भले पानी दो दिन में एक बार मिलता हो, स्टेशन में रोज मिलता है। बड़ा अच्छा पानी मिलता है।” – पानी के बारे में दोषी जी ने कई बार मुझे बोला। नर्मदा के पानी और मोदी जी को दो तीन बार जोड़ा। रेलवे के क्वार्टर की कमी (भूकम्प में टूटने के बाद क्वार्टर बने ही नहीं) और पानी की अब प्रचुर उपलब्धता – ये दो बातें उन्होने जोर दे कर कहीं।

पश्चिम रेलवे के पास संसाधनो की कमी हो, यह मैं नहीं मान सकता। पर स्टाफ क्वार्टर्स का पुन: निर्माण शायद इसी कारण से नहीं हुआ कि धंधुका या बोटाड की रेल लाइन माल यातायात के दृष्टिकोण से कोई महत्व की नहीं होगी। ब्रांच लाइन की उपेक्षा ही कारण हो सकता है। तभी आज 2021 तक यह स्टेशन बड़ी लाइन के नक्शे पर नहीं आ सका है। खैर, प्रेमसागर के कारण ही मैंने धंधुका रेल स्टेशन का नाम सुना। मैंने प्रेमसागर को कहा कि वे स्टेशन का चित्र तो भेजें। अब वहां पैनल इण्टरलॉकिंग हो गयी है। पैनल की टेस्टिंग भी हो चुकी है। स्टेशन सिगनलिंग के हिसाब से पूरी तरह तैयार है। बस इसका बड़ी लाइन के लिये खुलना बाकी है। शायद इस साल के अंत पर ट्रेन चले यहाँ।

आशा करता हूं कि प्रेमसागर यहां स्वास्थ्य लाभ कर सकेंगे। उन्हें आगे की यात्रा और अपने शारीरिक अनुशासन पर पुन: विचार करना चाहिये। कांवर यात्रा के स्वरूप पर भी अगर पुन: विचार कर सकें तो बेहतर हो। मेरे हिसाब से वे पहले कांवर यात्री हैं और उन्हें इसका अनुशासन सेट करना है। आगे अगर कोई और यात्रा करेगा, तो उनका दृष्टांत ध्यान में रख कर करेगा।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

माँ की याद आती ही है, आंसू टपकते हैं – प्रेमसागर


23 नवम्बर, रात्रि –

सोलह साल का प्रेमसागर, जिसे यह कोई अंदाज नहीं था कि द्वादश ज्योतिर्लिंग की कांवर यात्रा कितनी दुरूह होती है; अपनी मरणासन्न माँ की जिंदगी के लिये किसी महिला के कहने पर संकल्प कर बैठता है कि अगर माँ बच गयी हो वह यह कांवर यात्रा करेगा। और चमत्कार होता है, माँ बच जाती हैं। अठाईस साल और जीती हैं।

वह संकल्प बचा रहता है। प्रेम सागर की उम्र सैंतालीस साल की होती है पर संकल्प धुंधला नहीं पड़ता। प्रेमसागर को लगता है कि आगे शरीर क्षीण पड़ेगा और यह संकल्प पूरा करना दुरूहतर होता जायेगा। वह व्यक्ति संगम से कांवर ले कर निकल देता है बाबा विश्वनाथ के लिये। फिर विश्वनाथ महादेव से अमरकण्टक; आगे उज्जैन, ॐकारेश्वर और अब सोमनाथ की ओर अग्रसर।

उसकी शरीर की रिजर्व ऊर्जा छीज रही है। एक एक कदम रखना भारी पड़ रहा है। पर वह चलता जा रहा है। आज वह 28-30 किमी चला है। नक्शे से लगता है कि वह सौराष्ट्र में घुस गया है। दूर दूर तक बबूल के झाड़ नजर आते हैं। ऊसर, बंजर जमीन। खेती कम। रास्ते में मुश्किल से आठ दस छायादार वृक्ष दिखे होंगे। पानी साथ लिये है। सो वैसी कोई दिक्कत नहीं। सवेरे साढ़े चार बजे अंधेरे में गलियाना से निकले प्रेमसागर बारह बजे तक बीस किलोमीटर की दूरी नाप लेते हैं। उसके बाद सूरज का ताप बढ़ने पर एक जगह आराम के लिये रुकते हैं तो तीन बजे तक आराम करते हैं। उसके बाद चलना शुरू करते हैं, पर गर्मी, थकान और ऊर्जा की कमी से चलना दूभर होता है। “करीब आठ किलोमीटर चलने में भईया तीन घण्टे से ज्यादा लगा; जबकि इतनी दूरी मैं सवा-डेढ़ घण्टे में नाप लिया करता था।”

दूर दूर तक बबूल के झाड़ नजर आते हैं। ऊसर, बंजर जमीन। खेती कम।

कुछ न कुछ गलत है – ज्यादा ही दिक्कत है। प्रेमसागर उसे स्वीकार नहीं कर रहे थे अब तक। जिद्दी और जड़ मति संकल्प पूरा करने के लिये धुन में रमा व्यक्ति। अब उन्हें समझ मेंं आ रहा है। … सुधीर पाण्डेय मुझे कहते हैं – यह व्यक्ति आत्मघाती जुनून के वश में है। इसका हीमोग्लोबीन जरूर घट गया होगा। बाकी जरूरी तत्व भी चुक गये होंगे। इसे डाक्टर की सलाह और सप्लीमेण्टस की जरूरत है। कुछ दिन का आराम भी होना चाहिये। जीवन रहेगा, तभी तो यात्रा कर पायेगा।”

मैं भी प्रेमसागर को यह कहता रहा हूं, पर वे सुनते नहीं थे – “भईया मैं पूरा इंतजाम से चल रहा हूं। बबूल का गोंद रात में भिगो कर सवेरे उसका सेवन करता हूं।” … इसी तरह के सेल्फ मेडीकेशन वाले नुस्खे वे मुझे बताते रहे और मुझे भी मेरी ऑस्टियोअर्थराइटिस के लिये सलाह देते रहे। पर पिछले दो दिनों से डाक्टर को दिखाने की सलाह पर रिसेप्टिव हुये हैं। उन्हें भी समझ आ गया है कि कहीं उनके साथ कुछ गड़बड़ है जरूर।

भोगावो नदी

यहां, जहां आज शाम पंहुचे, वह स्थान नक्शे में कमियाला दिखती है। भोगावो नदी पार करने के बाद। यहांंसे धंधुका 28 किलोमीटर दूर है। अश्विन पण्ड्या जी ने कहा है कि वहां रेलवे स्टेशन पर स्टेशन अधीक्षक (स्तेधी) महोदय तैयार हो गये हैं अपने यहां उन्हें “जितना जरूरी हो उतने दिन” रखने के लिये। स्टेधी साहब अश्विन जी के पुराने सब-ऑर्डीनेट रह चुके हैं और उनके प्रति बहुत आदर करते हैं। धंधुका रेल स्टेशन अभी गेज कंवर्शन में बंद है तो स्तेधी महोदय के पास काम भी ज्यादा नहीं है। दिन में एक दो इंजन भर आते होंगे ट्रेक रोलिंग के लिये। वे भी प्रेमसागर को पूरी तवज्जो दे सकेंगे। वे तो प्रेमसागर को चार दिन रुकने की बात कहते हैं, पर मेरे विचार से वहां प्रेमसागर को जरूरत हो तो ज्यादा भी रुक कर स्वास्थ्य लाभ करना चाहिये। धंधुका में प्रेमसागर स्वास्थ लाभ करें और स्टेशन अधीक्षक महोदय पुण्य लाभ। दोनो नफे में रहेंगे। अश्विन जी बताते हैं कि स्टेशन अधीक्षक महोदय स्वयम काफी धार्मिक वृत्ति के व्यक्ति हैं।

कमियाला में जहां प्रेमसागर रुके हैं, वहां कोई हनुमान मंदिर है। मंदिर तो अच्छा दिखता है चित्र में। उसमें कोई धर्मशाला नहीं है। नये जमाने की टीन की छत है और उसके नीचे पंखा है। मच्छर नहीं लगेंगे। भोजन का अच्छा प्रबंध कर दिया है मंदिर समिति वालों ने। एक तख्त है जिसपर प्रेमसागर ने अपनी चादर बिछा ली है। अपनी कांवर सिरहाने रखी है और अपने बैग का सिरहाना बना लिया है। “रात गुजारनी है भईया। सवेरे जल्दी निकल लूंगा – चार साढ़े चार बजे। बारह बजे तक जितना चल सका चलूंगा। उसके बाद नहीं चला जायेगा।”

मैं भी उन्हें सलाह देता हूं कि धंधुका की 28 किमी की यात्रा वे एक दिन में करने की बजाय दो दिन में करें। दूसरे दिन दोपहर से पहले वे धंधुका पंहुच जायें। कल बारह बजे तक जो उपयुक्त जगह मिले वहां दोपहर के बाद रात गुजारने की चेष्ठा करें।… देखें वे क्या करते हैं।

मैं उनसे पूछता हूं – घर वालों से बात होती है?

“हां हां। दिन में दो तीन बार उनका फोन आ जाता है। ज्यादातर यही पूछ्ते हैं कि अभी और कितना दिन लगेगा यात्रा में। पिताजी से भी बात होती है। वे तो रोने लगते हैं।”

जिनके लिये इतना कठिन संकल्प लिया, उनकी याद आती है? – मेरा यह प्रश्न सुन कर प्रेमसागर की आवाज बदल जाती है। लगता है कि कुछ गले में फंस रहा हो – “भईया अकेला चलता हूं तो उनका याद, माँ का याद, बना ही रहता है। हर समय आंखों के सामने उनकी तस्वीर आती है। आंसू टपकने लगते हैं। बस मैं मोबाइल पर भजन लगा देता हूं और सुनता चलता हूं…।”

इस बारे में मैं आगे और बात नहीं करता। संकल्प का संवेदनशील विषय लम्बा बतियाने की मेरी क्षमता नहीं है। मुझे अपनी माता और पिता के साथ उनके अंतिम दोनों में बिताये दिन याद आने लगते हैं। कैसे मैं इस जद्दोजहद से गुजरा हूं कि उनकी जिंदगी कुछ और चल जाती… माता पिता की बात बहुत इमोशनल नब्ज है।

“भईया मुझसे जो भी लोग मिलते हैं; मैं उन्हे यही कहता हूं कि अपने माता पिता की सेवा करो। जितना भी दम खम हो। उससे बड़ी भगवान की सेवा कोई दूसरी नहीं।” – प्रेमसागर जोड़ते हैं।

मैं आगे बात नहीं चलाता। रात के आठ बजे हैं। प्रेमसागर को जल्दी सो जाना चाहिये और कल सुबह भोर में ही यात्रा शुरू कर जितना हो सके उतनी दूरी तय कर लेनी चाहिये। अभी धंधुका पंहुच स्वास्थ्य लाभ उनका ध्येय होना चाहिये; सोमनाथ और बाकी ज्योतिर्लिंग तो बाद में होंगे। शरीर की सेवा होगी तो शरीर ही वाहन होगा संकल्प सिद्धि के लिये।

जय बजरंग बली! हर हर महादेव!

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प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
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2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
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प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

प्रेमसागर – तारापुर से गलियाना, गुजरात में


22 नवम्बर 21, रात्रि –

तारापुर और गलियाना दोनो छोटी जगहें हैं। गांव ही कहे जा सकते हैं। गलियाना गूगल मैप में जहां दिखाता है वहां से दो किमी आगे साबरमती नदी पार कर नदी के पास ही कोई श्रीकृष्ण मंदिर है। उसकी धर्मशाला में रुके हैं प्रेमसागर। नक्शे के हिसाब से कुल पच्चीस किमी चलना हुआ। पुराने उनकी यात्रा मानकों से यह छोटी यात्रा कही जायेगी पर वे सवेरे छ-सवा छ बजे निकले थे और शाम सात बजे मुकाम पर पंहुचे।

रास्ते में लोग उनकी कांवर पदयात्रा देख कर सहायता करने में पीछे नहीं रहे। सवेरे चाय की दुकान पर चाय वाले सज्जन – सीताराम बाबा जी ने बुला कर चाय पिलाई और पैसे नहीं लिये। एक जगह कालू भाई और गिरीश भाई ने उन्हें रोक कर उन्हें चीकू और केले खिलाये। दोपहर में एक होटल में भोजन के लिये रुके और भोजन के बाद होटल वाले सज्जन ने भी इनसे पैसे नहीं लिये।

धान के पुआल का संग्रह
धान की कटाई में लगे किसान

प्रेमसागर के अनुसार उनकी यात्रा का इलाके में वहां केले की बागवानी थी पर खेती में धान मुख्य दिखा। वह अब कट रहा है और खेत खाली होते दिख रहे हैं। उन्हें कालू भाई-गिरीश भाई ने चीकू खिलाये तो शायद किसान चीकू का हॉर्टीकल्चर भी करते हों।

कालू भाई-गिरीश भाई ने चीकू खिलाये

प्रेमसागर ने बताया कि दोपहर में धूप बहुत थी और असहनीय गर्मी थी। उस जगह से उनका मुकाम मात्र आठ साढ़े आठ किलोमीटर था, पर वे शाम पांच बजे तक उस होटल में ही आराम करते रहे। शाम पांच बजे ही निकल सके। सात बजे उनसे बात की तो वे साबरमती नदी पार कर मुकाम पर पंहुच ही रहे थे।

अश्विन पण्ड्या

मुझे थोड़ा अजीब लगा कि पचीस किमी की यात्रा में तेरह घण्टे लगे। सामान्यत: वे इतनी दूरी पर 8-9 घण्टे में पंहुच जाते थे। मैंने अश्विन पण्ड्या जी से भावनगर बात की। उन्होने बताया कि आगे धंधुका में उनकी व्यवस्था कर दी है उन्होने। वह भावनगर रेल मण्डल का रेलवे स्टेशन है जो आजकल आमान परिवर्तन (gauge conversion) के लिये बंद है। वहां स्टेशन के आवास खाली पड़े हैं। उन्ही में प्रेमसागर तीन-चार दिन रह सकते हैं। वहां स्टेशन मास्टर साहब उनके भोजन की भी व्यवस्था कर देंगे। जगह भावनगर से सौ किमी दूर है तो पण्ड्याजी खुद जा कर उनका हालचाल पता कर लेंगे। उनका कोरोना टीकाकरण भी हो जायेगा और जरूरत पड़ने पर जनरल चेक अप भी। पर धंधुका प्रेमसागर के इस साबरमती नदी तट के मुकाम से 56 किमी दूर है। वहां वे दो दिन में पंहुचेंगे।

रास्ते में यह एक ग्रमीण दम्पति का चित्र प्रेमसागर ने भेजा

“साबरमती नदी में जल बहुत था भईया, पर अंधेरा होने लगा था, इसलिये चित्र नहीं ले पाया; कल सवेरे ले कर भेज दूंगा।” – प्रेमसागर ने कहा। रात आठ बजे उन्होने मुझे फोन कर बताया कि श्रीकृष्ण मंदिर की धर्मशाला में ही भोजन व्यवस्था थी। भोजन में रोटी सब्जी और दूध था। सादा भोजन जो प्रेमसागर को रुचता भी है। भोजन कर वे सोने जा रहे हैं। अपना फोन भी साइलेण्ट मोड में रखेंगे। दिन में गर्मी ज्यादा लगी। थकान हो गयी है। नवम्बर के उत्तरार्ध में गर्मी थोड़ा अजीब लगा मुझे सुन कर पर पण्ड्या जी ने बताया कि यह इलाका सौराष्ट्र की सीमा पर है और अरब सागर की गतिविधियों के कारण गर्मी जरूर है। शायद उमस भी हो। यहां प्रयाग-भदोही-वाराणसी के मौसम से उसका अंदाज लगाना मेरे लिये कठिन है।

कल सवेरे प्रेमसागर को आगे निकलना है। दो दिन में धंधुका पंहुचना है तो उन्हे 25-30 किमी पर कोई रुकने का स्थान तलाशना होगा। पण्ड्या जी के अनुसार इलाका बहुत अच्छा है। लोग अच्छे हैं और रास्ते में बहुत मंदिर हैं जिनमें धर्मशालायें भी हैं। व्यवस्था ऐसी हैं रास्ते में कि लोग उनका प्रयोग शादियों-समारोहों के लिये किराये पर लेने का काम भी करते हैं। प्रेमसागर को उचित-उपयुक्त जगह मिलने में कोई दिक्कत नहीं होगी। आगे की यात्रा शुभ हो।

उमापति महादेव की जय। हर हर महादेव!

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
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द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
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प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
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प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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