प्रेमसागर – यात्रा की प्रकृति बदल गयी है


21 नवम्बर 21, दिन में –

पिछली बार जब मैंने लिखा तो पंद्रह नवम्बर की शाम प्रेमसागर डभोई पंहुचे थे। वहां बद्रीनारायण मंदिर में रुकना हुआ। मंदिर वालों ने उनका काफी सत्कार किया। उनके रेस्ट हाउस में लम्बा रुकना हो गया। लगभग 2000 किमी की विषम यात्रा का फेटीग हावी हुआ है ऐसा लगता है। पहले पच्चीस किमी प्रतिदिन का यात्रा-औसत आता था। माहेश्वर के बाद वह उत्तरोत्तर कम होता गया है। अब वह 15 किमी प्रतिदिन के आसपास है।

उन्होने डभोई से वडोदरा और वडोदरा से बोरसद तक की 60 किमी की यात्रा की है 16-20 नवम्बर के बीच।

मध्य प्रदेश में प्रेमसागर ने विरल आबादी और भरपूर प्रकृति देखी। उस अनुसार देखने और बताने का एक अनुशासन बना लिया था। नदी, घाटी, खेती, बाग, छोटे झोंपड़े, खपरैल आदि बहुत मनोयोग से देखे और बताये। अब परिदृश्य बदल गया है। दरिद्रनारायण की जगह अब मध्य और उच्च वर्ग के लोगों से उनका पाला पड़ा है। यह वर्ग, उनके घर, उनके ड्राइंग रूम, उनके व्यवसाय प्रेमसागर की पूर्व जिंदगी और यात्रा से अलहदा हैं। उनको एक निस्पृह यात्री की नजर से देखना और अनुभूति बताना सरल काम नहीं है। लोग किस तरह का काम करते हैं, कैसे उनके बिजनेस हैं, कैसी उनकी धर्म के इतर सोच है, यह सब देखना और बताना एक अलग प्रवृत्ति मांगता है व्यक्तित्व में। प्रेमसागर सरल व्यक्ति हैं। वे यह सब ऑब्जर्व ही नहीं कर रहे। और यदि कर भी रहे हैं तो अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे।

डभोई के बद्रीनारायण मंदिर का सामने का हिस्सा।

उनकी यात्रा गुजराती लोगों की अभूतपूर्व मेहमान नवाजी से बहुत आरामदेह हो गयी है। इतनी आरामदेह कि उनका चलना कम हो गया है। यात्रा आरामदेह हो गयी है पर ट्रेवलॉग लेखन कठिन हो गया है। लिखा क्या जाये? वडोदरा से बोरसद के बीच मैंने नक्शे में देखा कि माही नदी रास्ते में पड़ती है। प्रेमसागर ने उसका जिक्र नहीं किया। मैंने पूछा – रास्ते में एक नदी मिली होगी? प्रेमसागर का उत्तर था कि हां मिली थी। पर उन्हे कुछ खास नहीं लगी। पानी था। पुल बड़ा था। पर सब नदियां एक सी होती हैं तो उन्होने चित्र नहीं लिया। प्रेमसागर का एक माही का एक चित्र होता तो उसके इर्दगिर्द मेरे माही के अनुभव ही खूब उभरते और उससे ही ट्रेवलॉग का अच्छा खासा कण्टेण्ट बन जाता…। पर वह नहीं हुआ। प्रेमसागर यात्रा के फेटीग और मोनोटोनी से ग्रस्त लगते हैं। लोगों से मिलना और उनका सत्कार उन्हे चमत्कृत कर रहा है। वे कम्फर्ट-जोन में हैं और उस जोन में कांवर यात्रा का स्वरूप वह नहीं रहता जो मेरी कल्पना में है। अब वे यू‌ट्यूब, सोशल मीडिया, फालोवर्स की बात करते हैं। मैं चाहता हूं वे केले के गाछ पर बात करें। एक दो दूर से लिये धुंधले चित्र मोर और बंदरों के भेजे हैं। वे लिखने में सहायता नहीं करते।

बोरसद का सूर्यमंदिर। सूरज के सात घोड़े देखें।

डभोई के बद्रीनारायण मंदिर और बोरसद के सूर्य मंदिर के चित्र अच्छे हैं। गुजरात में मंदिर समृद्ध हैं और उनकी बनावट भी झकाझक है। बाहर की पुताई का कलर कॉम्बिनेशन पुराने मंदिरों से अलग है, पर अच्छा लगता है। इनके अतिथि गृह भी निश्चय ही आरामदायक होंगे। डिण्डौरी की नर्मदा किनारे की धर्मशाला से अलग प्रकार-प्रकृति के।

बोरसद से आगे उन्हें इंद्रराज तक जाना था, पर वे आज निकले हैं कि रास्ते में कहीं तारापुर रुकेंगे। वह स्थान 27 किमी दूर नजर आता है नक्शे में। पच्चीस से पैतीस किमी के बीच चलना सही है। ज्यादा चलने पर थकान और अस्वस्थता बहुत होती है। अब तक तो प्रेमसागर का जोश और उनकी रिजर्व ऊर्जा काम आती रही है। उसके बल पर उन्होने वर्षा के विषम महीनों में भी लम्बी लम्बी यात्रायें की। अब उन्हें शरीर की मांग के आधार पर चलना चाहिये। अगर देखा जाये तो पूरी यात्रा का अभी पच्चीस फीसदी ही सम्पन्न हुआ है। आगे के लिये ऊर्जा संचित करना सही स्ट्रेटेजी है – अगर प्रेमसागर कोई स्ट्रेटेजी बना कर चलते हों। :-)

बहुत से लोगों ने प्रेमसागर की सहायता की है। असल में उन्ही के जरीये वे चल रहे हैं। पर इस पोस्ट में मैं उन सभी का जिक्र जान बूझ कर नहीं कर रहा हूं। उनकी कृपा से यात्रा कम्फर्ट जोन में हो रही है पर वह ट्रेवलॉग के हिसाब से बहुत बढ़िया नहीं है। वह यात्रा तो वैसी ही होती है जिसमें लोग आराम से यूरोप की यात्रा पर जाते हैं और सब मशहूर जगहों पर अपने टनों चित्र खींच कर लौटते हैं – यह बताने के लिये कि एफिल टॉवर के सामने मैंने यह बहुत प्यारी ड्रेस पहनी थी! कांवर यात्रा वृत्तांत वैसा तो कत्तई नहीं हो सकता। और वह बताने के लिये मेरे जैसे “हर चीज चिमटी से पकड़ छीलने वाले (यह फ्रेजॉलॉजी मेरी पत्नीजी की है)” की जरूरत नहीं होती।

मेरी पत्नीजी कहती हैं – “गलती तुममे है। वह प्रेमसागर की यात्रा है; किसी शंकराचार्य या विवेकानंद की नहीं। उस आदमी की सरलता और संकल्प को देखो, तुम काहे दुबले होते हो कि लोगों के ड्राइंग रूम कैसे हैं या कितने लोग प्रेमसागर के पैर छू रहे हैं। वे जो अनुभव कर रहे हैं उसे देखो और चुपचाप वह लिखो जो समझ में आता है। यात्रा को प्रेमसागर की नजर से देखो, अपने चश्मे से नहीं।” … पर मैं कनफ्यूज्ड हूं। शायद प्रेमसागर को यात्रा फेटीग हो न हो, मुझे ट्रेवलॉग फेटीग है।

अपेक्षा करता हूं कि यह फेटीग सोमनाथ नियराते नियराते खत्म हो जायेगा। प्रेमसागर और मैं – हम दोनो नई ऊर्जा से यात्रा करने और यात्रा लिखने में लग जायेंगे।

22 नवम्बर सवेरे –

कल प्रेमसागर ने यात्रा की – बोरसद से तारापुर। रात में जलाराम बापा के मंदिर में ठहरना हुआ। तारापुर बोरसद से तारापुर अठाईस किलोमीटर दूर है। पर वे शाम सात बजे बाद पंहुचे। बोरसद में लोग नाश्ता करा रहे थे, सो निकलने में देर हुई थी।

जलाराम बापा मंदिर में जमीन पग गद्दा बिछा कर सोने का इंतजाम था, कोई घर या रेस्ट हाउस जैसा नहीं। धर्मशाला जैसा। पास के होटल में उन्होने सादा भोजन किया। आज सवेरे वहां से चले तो मैंने उन्हे इस पोस्ट में लिखे मेरे विचारों के बारे में बताया। रास्ते में महादेव की अनुभूति करने और उसे बताने के बारे में पुराने अनुशासन को जीवित करने के बारे में कहा। प्रेम सागर ने तब बताया कि दो दिन पहले पांच लोगोंंका जत्था मिला था जो वैष्णो देवी की पदयात्रा पर निकले थे। उन्हे प्रेमसागर ने पचास रुपये की सहायता भी दी थी। पर उनके बारे में उन्होने न बताया था मुझे न कोई चित्र लिया। इस युग में गुजरात से वैष्णो देवी की डेढ़ हजार किमी की पदयात्रा पर निकलते हैं लोग – यह बड़ी बात है। इसका उल्लेख ही नहीं किया था प्रेमसागर ने! ट्रेवलॉग का एक जरूरी विवरण होना चाहिये था यह। पर प्रेमसागर उस बात को नजर-अंदाज कर दिये थे। वैसे ही जैसे उन्होने माही जैसी महत्वपूर्ण नदी को ओवरलुक किया। खैर, आगे से वे यह यात्रानुशासन पुन: जीवित करेंगे, ऐसा लगता है।

आज सवेरे उन्होने दो चित्र भेजे जो मैं यहां प्रस्तुत करना चाहता हूं –

एक – प्रेमसागर सवेरे साढ़े छ बजे यात्रा प्रारम्भ कर बंदर को कुछ खाने को देते हुये –

प्रेमसागर सवेरे साढ़े छ बजे यात्रा प्रारम्भ कर बंदर को कुछ खाने को देते हुये

दो – यात्रा प्रारम्भ कर रास्ते में सवेरे सात बजे सीताराम जी ने उनकी कांवर देख कर उन्हें रोका और चाय पिलाई।

रास्ते में सवेरे सात बजे सीताराम जी ने उनकी कांवर देख कर उन्हें रोका और चाय पिलाई

मेरे हिसाब से यह महादेव की कृपा से ही हुआ। जब लोगों पर निर्भर रह चाय नाश्ता लेते हैं तो आठ बजे बाद निकल पाते हैं। जब धुंधलके में ही निकल लिये तो सीताराम जैसे मिलते हैं चाय पिलाने के लिये। अब उनमें एक अलग ऊर्जा दिखती है और वह मुझे भी उनकी यात्रा की ओर उन्मुख करेगी। मैंने उनकी यात्रा के बारे में अश्विन पण्ड्या जी से बात भी की। वे गुजरात की आगे की उनकी यात्रा के बारे में गुजरात के बारे में मुझे आवश्यक जानकारी भी देंगे और प्रेमसागर की सहायता भी वे कर ही रहे हैं।

अब लगता है कि प्रेमसागर ट्रेवलॉग के लिये बेहतर इनपुट्स देंगे। आज वे गलियाना तक की यात्रा करने वाले हैं। वह 23-24 किमी आगे है तारापुर से। समय पर वहां पंहुच भी जायेंगे।

हर हर महादेव!


*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची
प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

गंगा आरती @ गौगंगागौरीशंकर


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

वह गंगा का ऊसर किनारा, जिसमें करारी कंकर हैं, गंगा के बाढ़ के पानी से बना एक तालाब है, इक्का दुक्का घूमते नीलगाय हैं और नीरव शांति है; वह मेरे नित्य सवेरे घूमने का नया जुनून है। मेरे घर से टेढ़े मेढ़े रास्ते से वह करीब छ किलोमीटर दूर पड़ता है। रास्ते में जो भी दिखता है और जो भी अनुभूतियां होती हैं वो मन में बहती चली जाती हैं। उन्हें बाद में बैठ कर कागजबद्ध किया जाये तो अनूठी चीज बने। पर वे सब बहुत तरल होती हैं। लेकिन, मैं कभी कभी सोचता हूं कि कागज (या कीबोर्ड) बद्ध करना महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है अनुभूतियों को जीना। वह मैं कर रहा हूं। और उसमें आनंद है!

शमी के कोटर में रखा दिया देवदीपावली की अगली सुबह भी वहीं था।

देव दीपावली के अगले दिन सवेरे उस स्थल पर पंहुचता हूं तो सतीश सिंह पिछले दिन की देव दीपावली के पीतल के दीपक और अन्य उपकरण मांज-धो कर सहेजते नजर आते हैं। सतीश की सरलता को देख कर लगता है कि सुनील ओझा जी को आदमी के चरित्र को परखने की गजब की काबलियत है। इस एकांत में इस काम के लिये सतीश से बेहतर कौन आदमी होता। इस गांव-गंगा-जंगल-झाड़ी में सतीश अकेले टेण्ट में रहते हैं। झाड़ू भी लगाते हैं; आरती भी करते हैं; मजदूरों की गतिविधि पर निगाह भी रखते हैं। सतीश की दिनचर्या भी रोचक है। उसपर फिर कभी लिखूंगा। शहर-महानगर की जटिल जिंदगी से उलट एक सरल दिनचर्या भी हो सकती है, जिसमें दिन भर सतीश कुछ न कुछ करते नजर आते हैं – वर्ना वे पतले दुबले इकहरे बदन के नहीं होते। मेरी तरह स्थूल होते।

वहां उस प्लेटफार्म पर अभी भी सजावट के फूल पड़े हैं, जहां कल देवदीपावली की सांझ में गंगा आरती हुई थी।

मैं अपनी साइकिल ले कर गंगा के बिल्कुल किनारे चला जाता हूं – उस ऊंची नीची जमीन पर साइकिल लहराते चलती है – जैसे बच्चे रोलर-कोस्टर पर ऊपर नीचे आते हैं। वहां उस प्लेटफार्म पर अभी भी सजावट के फूल पड़े हैं, जहां कल देवदीपावली की सांझ में गंगा आरती हुई थी। वहां पूरी नीरवता है। दूर विश्वेश्वरानंद घाट के पास इक्का दुक्का लोग नहाते दीखते हैं। चार सौ कदम दूर इसी गौंगंगौरीशंकर स्थल पर ही एक कद्दावर नीलगाय खरामा खरामा चलता नजर आता है। उसे भी शायद आश्चर्य हो रहा हो कि इस जगह की कुशा की घास कहां चली गयी। वह मेरी ओर भी देखता है, पर मैं शायद उसे एक इनसिग्नीफिकेण्ट चीज नजर आता हूं। धीरे धीरे आगे वह कुशा के झांखाड़ की ओर चला जाता है।

चार सौ कदम दूर इसी गौंगंगौरीशंकर स्थल पर ही एक कद्दावर नीलगाय खरामा खरामा चलता नजर आता है। उसे भी शायद आश्चर्य हो रहा हो कि इस जगह की कुशा की घास कहां चली गयी।

पास में ही शमी का वह वृक्ष है, जिसे कल मेरी पत्नीजी और मैंने अपने घर से लाये दियों को सजाने के लिये चुना था। उसके आसपास करीब चालीस पचास दिये सजाये थे। उनसे एक स्वास्तिक चिन्ह बनाया था। शमी में एक कोटर है। उसमें आरपार दिखता है। उस कोटर में भी एक दिया रखा था। आज सवेरे देखा तो सभी दिये वहां जस के तस थे। वह कोटर वाला दिया भी। दिन में कौव्वे उनसे छेड़छाड करेंगे।

आशा करता हूं कि जब यहां महादेव मंदिर बनेगा तो गंगा किनारे के इस शमी को छुआ नहीं जायेगा। बाकी, निर्माण करने वालों की विध्वंसक ताकत की आशंका तो होती ही है।

मेरी पत्नीजी ने यह शमी का वृक्ष चुना था दिये की सजावट के लिये

मुझे गंगा किनारे आया देख एक मजदूर भी पीछे पीछे चला आया। नाम है हीरालाल। यहीं पास के गांव अगियाबीर का है। उस मिस्त्री का सहायक है वह जिसने कल यह गंगा आरती का प्लेटफार्म बनाया है। बताता है – “फलाने जी प्लाई कम लाये इसलिये दोनो ओर शेल्फ के पल्ले नहीं लग सके। आज शायद काम हो। मिस्त्री आयेंगे तो बतायेंगे क्या करना है।”

हीरालाल

हीरालाल की साइकिल का कैरियर आम साइकिल वाला नहीं है। वह लोहे के एक मोटे पतरे से बना है। उसपर सामान भी ढोया जा सकता है। इस प्लेटफार्म को बनाने के लिये पटिया इसी कैरियर पर लाद कर गंगा किनारे लाया था हीरालाल। उसपर बिठा कर अपनी पत्नी-बच्चे को मेला-ठेला भी घुमा लाता है। कल कार्तिक पुन्निमा के मेला में भी इसी साइकिल से गया होगा उसका का परिवार। उस कैरियर से साइकिल गरीब की मोटरसाइकिल बन गयी है।

कल देवदीपावली को अच्छी चहल पहल हो गयी थी यहां। सौ के आसपास लोग थे।

कल देवदीपावली को अच्छी चहल पहल हो गयी थी यहां। सौ के आसपास लोग थे। गणेश वंदना और गंगाआरती गाने वालों का दो चार लोगों का संगीत उपकरणों से लैस ग्रुप भी था और आरती करने के लिये पण्डिज्जी भी थे। वैसे नित्य आरती तो सतीश सिंह ही किया करेंगे।

देवदीपावली को शमी की कोटर में जलते दिये का चित्र मुझे इतना भाया था कि उसका ब्लॉग-हेडर ही बना लिया!

जिन लोगों का कल शाम जमावड़ा था, उनमें एसयूवी वाहनों पर आये दो दर्जन से ज्यादा वे लोग भी थे जिनका ध्येय आसन्न विधायिका चुनाव में टिकट साधना है। यह टिकट-साधना बेचारे कलफ-क्रीज वाले झकाझक कपड़े पहने उन बड़े लोगों को कहां कहां के चक्कर नहीं लगवाती!… बेचारे गंगा आरती में जुटे थे। गंगा माई के बंधक-भक्त। :lol:

मैं गंगा तट से लौटता हूं। सतीश दीपक मांज चुके थे। आरती भी कर चुके थे। उन्होने मुझे प्रसाद दिया – लाचीदाना और किशमिश। उसके बाद मुझे नमस्ते की – “बाबूजी, घर को निकलूंगा। मेरा मोबाइल खो गया है। वही तलाशना है। सवेरे गईया को सानी करते समय शायद झुकने में वहीं गिर गया होगा। वह इधर उधर हो जाये इससे पहले मुझे तलाश लेना है।”

करीब पौना घण्टा वहां गंगा-नीलगाय-हीरालाल-सतीश के साथ बिता कर मैं भी घर के लिये लौटता हूं। मुंह में जीभ पर सतीश के दिये गये प्रसाद की किशमिश अभी भी चुभुलाने को बची है। आज अच्छी सैर रही। ऐसी ही रोज रहती है। जीवन का यह स्वर्णिम काल है?! :-)

गौ-गंगा-गौरीशंकर पर पोस्टें –
1. गौ-गंगा-गौरीशंकर के सतीश सिंह भारत देख चुके साइकिल से!
2. सुनील ओझा जी और गाय पर निर्भर गांव का जीवन
3. देव दीपावली पर गंगा आरती शुरू होगी गौगंगागौरीशंकर पर
4. गंगा आरती @ गौगंगागौरीशंकर
5. बिस्राम का बुढ़ापा
गौगंगागौरीशंकर

देव दीपावली पर गंगा आरती शुरू होगी गौगंगागौरीशंकर पर


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

आज सवेरे गौ-गंगा-गौरीशंकर (गौगंगौरी) वाली जगह गया तो सतीश सिंंह ने बताया कि गंगा किनारे प्लेटफार्म बन गया है जहां रोज शाम सूर्यास्त के समय गंगा आरती हुआ करेगी। आज शुभ दिन है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन देव दीपावली मनाई जाती है। आज से यहां गंगा आरती नित्य करना प्रारम्भ होगा।

देवदीपावली होने के कारण सतीश वहां 500 दिये जलाने का इंतजाम भी कर रहे हैं। उन्होने मुझे भी आने के लिये आग्रह किया है। मेरी पत्नीजी 25-50 दीये और तेल ले कर चलेंगी वहां। वाहन चालक को सजेह दिया है कि चार बजे शाम हम जायेंगे गौगंगौरी स्थल पर।

देवदीपावली होने के कारण सतीश वहां 500 दिये जलाने का इंतजाम कर रहे हैं।

परियोजना में गंगा तट पर, जहां महादेव मंदिर बनना है, वहीं यह प्लेटफार्म बन रहा है। उसपर पटिया साँझ से पहले लग जायेगा। प्लेटफार्म के नीचे दो चेंबर हैं जिनमें वहां नित्य की गंगा आरती का सामान रखा जा सकेगा। उनपर दरवाजा भी लगेगा। सतीश ने मुझे वह सब दिखाया। हम दोनो वहां अपनी अपनी साइकिल से पंहुचे।

गंगा तट पर, जहां महादेव मंदिर आना है, वहीं यह प्लेटफार्म बन रहा है। उसपर पटिया संझा से पहले लग जायेगा।

परिसर में कुशा की घास साफ कर दी गयी है तो उसमें रहने वाले चींटों के बिल और उनके खोद कर बाहर लाये मिट्टी के ढूह नजर आते हैं। सतीश ने बताया कि ओझा जी ने मंदिर के स्थापत्य वालों को कहा है कि मंदिर की योजना इस तरह से बनायें जिससे चींटे भी रहें और महादेव भी। प्रकृति को सैकड़ों साल लगते हैं जमीन को एक आकार देने में – कहीं ऊंचाई और कहीं नीचाई। उसका सम्मान किया जाना चाहिये। आकार के साथ कम से कम छेड़छाड़ की जानी चाहिये। इससे स्थापत्य-निर्माण वालों को कष्ट हो सकता है पर महादेव खूब प्रसन्न होंगे!

परिसर में कुशा की घास साफ कर दी गयी है तो उसमें रहने वाले चींटों के बिल और उनकी बाहर लाये मिट्टी के ढूह नजर आते हैं। सतीश ने बताया कि ओझा जी ने मंदिर के स्थापत्य वालों को कहा है कि मंदिर की योजना इस तरह से बनायें जिससे चींटे भी रहें और महादेव भी।

सवेरे सतीश के साथ 15-20 मिनट मिलना होता है और इस प्रकार की कई बातें सतीश मुझे बताते हैं। अगर नित्य का वह सब ब्लॉग पर संजोया जाये तो गौगंगौरी किस प्रकार बनेगा उसका एक दस्तावेज बन जायेगा। प्रेमसागर की कांवर पदयात्रा लेखन के समांतर यह भी करो ज्ञानदत्त! रिटायर हो, बैठे-ठाले और क्या करोगे! :-)

एक जगह से ढलान दे कर गंगा तीर पर जाने का रैम्प जैसा रास्ता बन जायेगा जिससे लोग जा कर नदी किनारे दीये रख सकें।

पास में ही एक जगह से ढलान दे कर गंगा तीर पर जाने का रैम्प जैसा रास्ता बन जायेगा जिससे लोग जा कर नदी किनारे दीये रख सकें। सतीश सिंह ने कहा कि पचीस पचास लोग इकठ्ठा होंगे। कटका के भाजपा बूथ प्रभारी विशाल जी अपने साथ दस बीस गण ले कर आयेंगे – ऐसा बताया है। शायद प्रयाग से सुनील ओझा जी भी आयेंं। वे आये तो उनकी कृपा के इच्छुक पचीस तीस लोग तो आ ही जायेंगे। दो आदमी – मेरी पत्नीजी और मैं भी जुड़ जायेंगे उस समूह में।

सतीश बताये कि कल थाने वाले भी आये थे। पूछ रहे थे कि कोई समस्या तो नहीं आती। कप्तान साहेब उनसे रिपोर्ट मांगते हैं तो बेचारों को इस झाड़ झंखाड़ में आने की जहमत उठानी पड़ रही है।

गंगा का किनारा और गौंगंगौरी का पूरा विस्तार देख कर मेरे मन में शिवकुटी के गंगा किनारे घूमने के दिन याद आते हैं। वहां घर से 300 कदम दूर पैदल चल कर रोज पंहुच जाता था, यहां मुझे आधा घण्टा साइकिल चला कर पंहुचना होता है। इसमें द्वारिकापुर-अगियाबीर के नाले में साइकिल धकेलना भी शामिल है।

ओझा जी एक पास आजकल ढेरों लोग अपने अपने स्वार्थ को ले कर चक्कर मारते हैं। मैं सोचता हूं कि इसी बहाने अगर इस नाले पर एक पुल बन जाये तो आनंद आ जाये। बरसात के मौसम में भी इस उत्तरापथ पर आना सुगम हो जाये। यह उत्तरापथ – गंगा किनारे से पटना तक – जाने वाला मार्ग पौराणिक है। इसी पर अगियाबीर का वह टीला है जिसमें आज से तीन हजार वर्ष पूर्व का औद्योगिक नगर दफन है।

खैर, असल बात यह है कि आज से गंगा आरती प्रारम्भ होगी गौंगंगौरी स्थल पर और आज 500+ दीपक भी जलेंगे वहां गंगा तीरे।

त्रिपुरारि शिव ने आज ही के दिन त्रिपुरासुर का संहार कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त किया था और देवों ने दीप जला कर दिवाली मनाई थी। आप सब को देवदीपावली पर मंगलकामनायें। हर हर गंगे; हर हर महादेव!


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