सुनील ओझा जी और गाय पर निर्भर गांव का जीवन


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Gadauli Dham गड़ौली धाम

इस इलाके में जहां मैं रह रहा हूं; किसानों की जोत कम से कमतर होती गयी है। लोगों के पास खेती की जमीन बीघे में नहीं बिस्वे (बीघे का बीसवां अंश) में है। और बहुत से खेती पर आश्रित लोगों के पास तो अपनी जमीन है ही नहीं। खेती की नहीं, मकान या शौचालय बनाने की भी जमीन ठीक से नहीं है। उनके विकल्प सीमित हैं – अधियरा या बटाईदारी आधार पर किसानी; एक दो बकरी-मुर्गी-भेड़ पालन और उसके साथ एक गाय या भैस रखना जिन्हे आसपास की घास चरा कर जीवित रखना और गाढ़े में उन्हे बेच कर कुछ रकम पा लेना; कालीन बुनाई करना या उससे सम्बद्ध कोई कार्य करना; मजदूरी या मकान की बेलदारी-मिस्त्री का काम करना आदि। यह सब उन्हें प्रगति की ओर नहीं ले जाते। केवल जिंदा रहने भर के साधन हैं।

इसलिये, लोग यहां से निकल कर महानगरों की ओर जाते हैं। पर वह भी (अधिकांश मामलों में) केवल सबसिस्टेंस का ही जरीया है; समृद्धि का नहीं। समृद्धि तो तभी आ सकती है, जब यहां रहते हुये उन्हें ऐसा रोजगार मिले जो उनकी आर्थिक दशा सुधारे और उसमें उत्तरोत्तर सुधारने की क्षमता हो।

उस दिन गौ-गंगा-गौरीशंकर प्रॉजेक्ट के स्थान पर सुनील ओझा जी से अप्रत्याशित भेंट हो गयी। गाय पर अपनी सोच स्पष्ट करते हुये उन्होने कहा कि ऐसा हो सकता है; गांव के मार्जिनल और खेतिहर की समृद्धि आ सकती है और वह देसी गाय आर्धारित जीवन पर निर्भर है।

बड़े धैर्य के साथ ओझा जी ने हम से सवा घण्टे बातचीत की। उस दौरान मैं ओझा जी की सरलता का कायल हो गया।

पर जब ओझा जी ने कहा कि उनकी सोच इन खेतिहर किसानों को गाय पालन के आधार पर उस स्तर पर लाने की है जो ग्रामीण जीवन के लिये एक मॉडल बनेगी; तो वह बात सीधे सीधे मुझे नहीं पची। वह कहना मुझे गांधी जी के ग्राम-स्वराज्य जैसा आदर्शवाद लगा; जिसपर आज भी हम लिप-सर्विस देते हैं पर जीवन में उसे सिरे से नकार चुके हैं। मुझे गांधीजी के ग्राम की परिकल्पना के अनेकानेक प्रयोग याद आये जो आज केवल नोश्टॉल्जिया का अंग हैं; यथार्थ में गांधीजी हाशिये पर हैं। भवानी भट्टाचर्य के उपन्यास Shadow From Ladakh (1966) के समय ही बापू का ग्रामोदय प्रसंग खो रहा था और अस्सी के दशक के बाद जब बैल आर्धारित खेती खत्म हुई, ट्रेक्टर-ट्यूब वेल आये, तब गाय-बैल की अर्थव्यवस्था भी दम तोड़ने लगी थी। यह सब मेरे जमाने में हुआ है।

मैं अपनी पत्नीजी को गौ-गंगा-गौरीशंकर का वह स्थल दिखाने ले गया था, जहां इस थीम पर एक वृहत परियोजना फलीभूत होने जा रही है।

मैं अपनी पत्नीजी को गौ-गंगा-गौरीशंकर का वह स्थल दिखाने ले गया था, जहां इस थीम पर एक वृहत परियोजना फलीभूत होने जा रही है। हम लोग शाम चार बजे गये थे और मैं सोचता था कि पत्नीजी को दस मिनट में वह स्थान दिखा कर लौट सकूंगा। पर वहां तो दो दर्जन कारें और एसयूवी वाहन खड़े थे। लोग गंगा तट पर देखते चर्चा करते लौट रहे थे। एक बारगी तो मन हुआ कि आज लौट चला जाये; पर फिर विचार बदल कर पत्नीजी को मैंने गंगा किनारे वह स्थान दिखाया जहां महादेव का मंदिर बनेगा। उसके पश्चिम में ढलान है और उसके बाद फिर ऊंचाई। पश्चिम की ऊंचाई पर गौरीशंकर की 108 फुट की प्रतिमा, गंगा किनारे, गंगा जी को मुंह किये स्थापित होगी। पूरी थीम भारतीय जनता पार्टी की पोलिटिको-कल्चरल सोच को संवर्धित करती है।

पांच सात मिनट में हम दोनो वापस लौट रहे थे तभी एक सज्जन – धर्मेंद्र सिंह जी ने हमारी ओर आ कर हमारा परिचय पूछा और वहां आने का प्रयोजन भी। मेरे नाम से शायद वे कुछ दिन पहले मेरी ब्लॉग पोस्ट के साथ मुझे पहचान पाये और उन्होने हमें सुनील ओझा जी से मिलाया।

चित्र में बांयी ओर ओझा जी और धर्मेंद्र जी|

ओझा जी एक आर्किटेक्ट जैसे लगते सज्जन से बातचीत कर रहे थे। उनको वे समझा रहे थे कि साइट देखने के आधार पर उन्हें थीम को ध्यान में रखते हुये प्लान परिवर्धित करना है। मैंने देखा कि पचीस-तीस लोग, जो वहां थे; ओझा जी को ध्यान से सुन रहे थे। जल्दी ही उन सज्जन को विदा कर वे हमें मुखातिब हुये। उनकी बात से लगा कि वे मेरी ब्लॉग-पोस्ट पढ़ चुके थे। ब्लॉग पोस्ट तथा शैलेश जी ने जो कुछ मेरे बारे में उन्हे बताया था; उसके आधार पर वे मुझे इस योग्य पाते थे कि वे एक सवा घण्टे तक मेरे साथ बातचीत कर सकें। अन्यथा यह तो मैं जान ही गया था कि उनका समय कीमती है और आसपास आये कई लोग तो मात्र उनके द्वारा नोटिस किया जाने से ही अपने को धन्य मानते होंगे।

बारम्बार ओझा जी ने कहा कि वे यह नहीं सोचते कि हम गाय पर दया करें, वरन ऐसा हो कि हमें लगे कि गाय वास्तव में हमारी माता की तरह हमारा पालन कर रही है। यह सुन कर मैंने उनसे दो तीन बार पूछा – आप यह आर्थिक आधार पर कह रहे हैं या मात्र “गौमाता वाले इमोशन” को अभिव्यक्त कर रहे हैं? पर हर बार उनका उत्तर था कि वे शुद्ध आर्थिक आधार की बात कर रहे हैं। “गाय की जब सेवा होगी, पर्याप्त और सदा उपलब्ध भोजन उसकी चरनी में रहेगा, जब गाय की साफ सफाई का ध्यान रखा जायेगा तो वह इतना देगी कि खेतिहर के जीवन में समृद्धि आयेगी।”

उन्होने जोर दे कर स्पष्ट किया कि वे ज्यादा दूध देने के लिये जर्सी या अन्य विदेशी गायों की बात नहीं कर रहे। वे अमूल के दूध कलेक्शन या विपणन मॉडल की भी बात नहीं कर रहे – जिसमें दूध को उसमें वसा की मात्रा जांच कर उसकी खरीद करने का चलन है। वे देसी गाय के उस दूध की बात कर रहे हैं, जिसे भारतीय आयुर्वेद और संस्कृति ‘अमृत’ मानती है। और उसकी कीमत देसी गाय के शुद्ध दूध के आधार पर आंकी जानी चाहिये।

देसी गाय। महिला ने बताया कि गाभिन है।

ओझा जी की बात उस समय मुझे उस यूटोपिया का अंग लगी जिसे हिंदू धर्म के समर्थक-प्रचारक बांटते हैं। उस सद्प्रचार के बावजूद सारी अर्थव्यवस्था ऐसी हो गयी है कि गाय – बैल अप्रासंगिक होते गये हैं; उत्तरोत्तर। और गाय बेचारी बहेतू जानवर की तरह (माता कहाये जाने के बावजूद) प्लास्टिक का कचरा खाने को अभिशप्त है। और बहेतू गाय बछड़ों को किसान धर्म के भय से मारता नहीं पर अपनी खेती की दुर्दशा के लिये खूब कोसता है। किसान के इस भाव को विपक्षी दल भुनाने से बाज नहीं आयेंगे; जबकि उनके पास कोई वैकल्पिक समाधान नहीं है। … इतना जरूर है कि कोई समाधान होना चाहिये। इसलिये ओझा जी की बात भले यूटोपियन लगती हो, पर उस पर ध्यान देने की जरूरत मैंने महसूस की।

पर मुझे शैलेश पाण्डेय ने बताया था कि ओझा जी आम लफ्फाज नेता की तरह नहीं हैं। वे ठोस काम करने वाले और धरातल से जुड़े, धरातल पर खड़े व्यक्ति हैं। इसलिये मैंने उनके कहे को, अपनी शंकाओं के होते हुये भी, ध्यान से सुना। और बड़े धैर्य के साथ ओझा जी ने हम से सवा घण्टे बातचीत की। उस दौरान मैं ओझा जी की सरलता का कायल हो गया। उन्होने न केवल अपनी बात कही, अपने परिचय में भी बताया और हमारा भी उतना परिचय प्राप्त किया जिससे हमारे चरित्र और प्रवृत्ति को वे समझ सकें।

ओझाजी गुजराती हैं; पर काशी को और यहां के अंचल को अपना घर मान रहे हैं। शायद यहीं बस जायें। वैसे ब्राह्मणों का इतना इधर से उधर जाना हुआ है कि अगर वे बहुत पीछे जायें तो वे शायद सरयूपारी-कान्यकुब्ज-शाण्डिल्य ही निकलेंगे। काशी के आसपास से गुजरात गये हुये। यह पूरा भारत एक है! :lol:

ओझा जी की उम्र लगभग मेरे बराबर है। वे राजनीति में हैं। सक्रिय। उनकी एक ट्वीट के अनुसार वे सन 2001 के गुजरात विधान सभा के नरेंद्र मोदी जी के चुनाव में वे मोदी जी के प्रभारी थे –

सुनील ओझा जी की ट्वीट। चित्र में सबसे दांये अमित शाह जी हैं और उनके बांये ओझा जी।

ओझा जी ने बताया कि सन 2014 में वे वाराणसी आये और 2019 के चुनाव में मोदी जी के प्रभारी थे। वे काशी और गंगा मां से इतने अभिभूत हैं कि इसी इलाके में अपने जीवन का उत्तरार्ध व्यतीत करने की सोचते हैं। वे इस गौगंगागौरीशंकर प्रॉजेक्ट को अपना ध्येय मानते हैं और इसके साथ आसपास के छोटी जोत के और खेतिहर लोगों को जोड़ कर एक आर्थिक मॉडल बनाने की भी सोच रखते हैं।

इस इलाके की देसी गौ आर्धारित अर्थव्यवस्था पर ओझा जी की दृढ़ सोच पर अपनी आशंकाओं के बावजूद मुझे लगा कि उनकी बात में एक कंविक्शन है, जो कोरा आदर्शवाद नहीं हो सकता। उनकी क्षमता भी ऐसी लगती है कि वे गायपालन के मॉडल पर प्रयोग कर सकें और उसके सफल होने के बाद उसे भारत के अन्य भागों में रिप्लीकेट करा सकें।

सांझ ढलने पर हमें ओझा जी ने महुआरी के उस झुरमुट में हो रही बैठक से हमें विदा किया। वहां से चलते समय बहुत से विचार मेरे मन में थे। जीवन के इस उत्तरार्ध में मेरी राजसिक वृत्तियां लगभग समाप्त हो गयी हैं। अब तो विशुद्ध जिज्ञासा ही शेष है – यह जानने की जिज्ञासा कि क्या इस ग्रामीण अंचल का और यहां के गरीब मार्जिनल या खेतिहर किसान का भला हो सकता है?

शैलेश पाण्डेय, प्रॉजेक्ट स्थल पर

मैंने उस मुलाकात के बाद कई ग्रामीण लोगों से और एक कृषि वैज्ञानिक से बातचीत की है। उनकी बात से यह स्पष्ट हो गया है कि ओझा जी की कही बातों पर आर्धारित आर्थिक मॉडल की सफलता की सम्भावना तो बनती है। उन लोगों ने जो कहा, वह आगे एक पोस्ट में लिखूंगा।

… पर सफलता निर्भर करती है कि उस पाइलट प्रोजेक्ट पर काम करने वाले कुछ प्रतिबद्ध लोगों की टीम काम पर लगे जो किसानों को आर्थिक और कृषि-वैज्ञानिक ज्ञान सरल भाषा में समझा सक। इसके अलावा उनके लिये दूध के मार्केट को, जो ऑनलाइन भी अब काम करने लगा है – देस और विदेश के स्तर पर भी; सुलभ कराने की दिशा में फेसीलिटेट करे। इसके अलावा हरा चारा उगाने और अन्य पशुआहार की उपलब्धता सीम-लेस बनाने की दिशा में काम करे। एक बार ये सब घटक स्ट्रीमलाइन हो जायेंगे तो गौ आर्धारित श्री-समृद्धि किसान के पास सहज आयेगी।

मैं किसान नहीं हूं। मैंने गाय भी नहीं पाली है। पर छ साल गांव में परिवेश को समझने के लिये अपनी सभी ज्ञानेंद्रियों को खोल कर रखने और अब पिछले दस दिनों में सब प्रकार के लोगों से बातचीत के बाद गाय आर्धारित मॉडल पर अगली पोस्ट लिखने में अपने को सक्षम पाता हूं।

अगली पोस्ट की प्रतीक्षा की जाये। इस बीच मैं सुनील ओझा जी को धन्यवाद देता हूं कि उन्होने उस शाम जो मुझे समय दिया, उससे मेरी मानसिक हलचल गाय की दिशा में मुड़ी। … और मैं अपनी पत्नीजी से चर्चा करने लगा हूं – एक दो देसी गायें पाल ही ली जायें! :lol:


ठण्ड बढ़ी है। आज कोहरे की दस्तक हुई है।


आज सवा छ बजे घर का गेट खोलने बाहर निकला तो पाया कोहरे की शुरुआत हो गयी है। अब दिनचर्या बदलेगी। सवेरे सात बजे साइकिल ले कर निकलने की बजाय अब नौ या दस बजे निकलना होगा। लेकिन साइकिल चलाते रहो ज्ञानदत्त जी। शारीरिक और मानसिक दोनो फिटनेस का मूल साइकिल में ही है। जिस किसी ने साइकिल ईजाद की है, उसे नोबेल मिलना ही चाहिये था। या उससे भी बड़ा कोई पुरस्कार!

आज कोहरे की दस्तक हुई है।

कायदे से यह सूचना ट्विटर या फेसबुक पर देने वाली है। पर मैं अपनी सामग्री उस मीडिया पर देने में अब संकोच करने लगा हूं, जिसकी हाफ-लाइफ घण्टो या दिनों भर में हो। पिछले दशक में जितना ट्विटर, इंस्टाग्राम या फेसबुक पर ठेला होगा, वह कुल 10-20 हजार शब्द तो होंगे ही। या ज्यादा भी। और उनके साथ कई चित्र जिनपर मैंने कॉपीराइट का वाटरमार्क भले ही लगाया हो पर वे मैं स्वयम नहीं तलाश सकता। इसलिये बेहतर है कि ब्लॉग पर उसे सहेजा जाये। सो यहां लिख रहा हूं कि आज कोहरे की शुरुआत हो गयी है!

सर्दी कल से ही बढ़ गयी है। आज ऊनी टोपी और गरम कमीज भी निकल गयी है। सुबेदार और बसंत को गरम कपड़े ड्राइक्लीन को भी दिये जा चुके हैं। ये दोनो गांव के धोबी हैं। बसंत तो मेरे ब्लॉग के एक चरित्र भी हैं। सुबेदार पर ट्विटर पर कुछ लिखा था, पर उसे निकालना टेढ़ा काम है।

सर्दी में उंगलियां की-बोर्ड पर कम चलती हैं, पर मानसिक हलचल खूब होती है। कोहरे के आने के साथ सर्दियों के मौसम को ले कर मन में खूब सनसनी है। आने वाले महीने आनंद दायक रहेंगे। यह आशा की जानी चाहिये।

स्वागत है कोहरा जी (और यह कोहरा जी ही हैं, महानगरों के स्मॉग रूपी दैत्य नहीं)। रेल की नौकरी में होता तो आपको देख तनाव बढ़ जाता; अब हर्ष हो रहा है। यह समय का परिवर्तन है! जय हो!


प्रेमसागर – बोडेली से डभोई


बोडेली में प्रेमसागर धनराज कोठारी जी के यहां ठहरे। धनराज कोठारी, उनकी पत्नी और उनके लड़के कैलाश जी के चित्र उन्होने भेजे हैं। अगर बोडेली को एक बड़ा गांव माना जाये और कोठारी परिवार को किसान नहीं, व्यवसायी माना जाये, तो उत्तरप्रदेश और गुजरात के समकक्ष कस्बाई व्यवसायी परिवार की समृद्धि का अंतर उन चित्रों से साफ नजर आता है। सुरुचिपूर्ण ड्रॉइंग कक्ष और उसमें सुविधायें यहां के बेतरतीब कमरों जिनमें रिहायश के सभी अंगों – अतिथि, बिस्तर, भोजन कक्ष और ओसार – सब गड्ड-मड्ड होता है – की बजाय बहुत ही अलग दिखती है। यहां के समृद्ध से समृद्ध परिवारों के घर भी बड़े लदर फदर होते हैं। सोफा या खिड़कियों पर पर्दों का प्रयोग नहीं दिखता। उसकी बजाय प्लास्टिक की कुर्सियाँ दिखती हैं। कमरों में रोज साफ सफाई, डस्टिंग और पोछा लगाना भी नहीं होता।

धनराज कोठारी और उनकी उनकी पत्नी

धनराज जी के परिवार के अलावा प्रेमसागर से मिलने के लिये घर में कई लोग आये। लोगों की धर्मपरायणता, प्रेमसागर की कांवर यात्रा की दुरुहता और और एक सहज कौतूहल ने उन्हें प्रेमसागर से मिलने को आकर्षित किया होगा। धनराज जी के ड्रॉइंग रूम में बैठे कई लोगों के कई चित्र प्रेमसागर ने मेरे पास भेजे हैं। इसके अलावा उन्होने बताया कि अगले दिन जब वे बोडेली से डभोई के लिये निकले तो सड़क पर करीब पचास लोग उन्हें विदा करने के लिये जमा थे। कोई उन्हें फूल माला पहना कर विदा कर रहे थे और किसी ने तो उनकी आरती भी की। प्रेमसागर से यह सुन कर मैंने तुरंत उन्हे कहा कि सत्कार-फूलमाला-आरती को वे अपने बाबाजी बन जाने का मुगालता न पालें। यही मान कर चलें कि वे एक संकल्पबद्ध साधारण कांवर यात्री हैं। ये सत्कार या उपेक्षा (या लूट की घटना भी) तो यात्रा के सहज अंग हैं। उन्हें अपनी ईगो बूस्टर के रूप में कत्तई नहीं लेना चाहिये। पर यह अच्छा लगा कि लोग प्रेमसागर को जान रहे हैं और यात्रा में सहायता कर रहे हैं। इससे यात्रा में एक साधन हीन को साधन मिल रहे होंगे।

धनराज जी के परिवार के अलावा प्रेमसागर से मिलने के लिये घर में कई लोग आये।

एक से एक कर लोग जुड़ रहे हैं। रतलाम-उज्जैन के शेखर व्यास जी के माध्यम से अलीराजपुर के कमलेश जोशी, आशुतोष पंचोली और उनके माध्यम से गुजरात में ये सज्जन लोग… इनके माध्यम से आगे भी लोग मिलते रहेंगे। प्रेमसागर के लिये एक बिस्तर और सादे भोजन का जुगाड़ होता चलेगा। महादेव के इस भक्त की जरूरतें बहुत नहीं हैं। वे पूरी होती रहेंगी; आशा की जानी चाहिये। पर, और यह एक अनिवार्य ‘परंतु’ लगाना है – कि प्रेमसागर को गाहे बगाहे पीपल के पेड़ के नीचे रात गुजारने को भी तैयार रहना चाहिये।

बोडेली से डभोई के रास्ते के चित्रों में एक बड़ी नहर, केले की खेती और लम्बी सींग वाले गाय-बैलों के चित्र हैं। गाय की नस्ल उत्तर प्रदेश की छोटे साइज वाली गाय से अलग लगती है। प्रेमसागर ने अलीराजपुर से भेजी भास्कर में छपी उनपर पांच कॉलम की रिपोर्ट की कटिंग भी मुझे फारवर्ड की है।

प्रेमसागर ने अलीराजपुर से भेजी भास्कर में छपी उनपर पांच कॉलम की रिपोर्ट की कटिंग भी मुझे फारवर्ड की है।

अलीराजपुर के आशुतोष पंचोली जी ने अपने ‘अलीराजपुर न्यूज’ यू-ट्यूब चैनल के लिये एक वीडियो भी बनाया है। उसका लिंक भी भेजा। कुल मिला कर प्रेमसागर के सेलिब्रटीत्व का खासा मसाला बन रहा है। प्रेम सागर ने बताया कि फोन पर उन्हें सूचना मिली है कि असम में कोई लोग उनकी यात्रा की सफलता की कामना के लिये शिवपुराण श्रवण का अनुष्ठान भी कर रहे हैं।

अलीराजपुर के आशुतोष पंचोली जी ने अपने ‘अलीराजपुर न्यूज’ यू-ट्यूब चैनल के लिये एक वीडियो भी बनाया है।

डभोई पंहुच कर प्रेमसागर ने पांच-साढ़े पांच बजे फोन किया – “भईया आज तो गजबै हो गया। लोगों ने आगे व्यवस्था के लिये कहा होगा और यहां दो जगहों से रात्रि में रुकने के लिये आग्रह के फोन आने लगे। यहां के बद्रीनारायन मंदिर के कई लोग तो रास्ते में आ कर कई किलोमीटर पहले मुझे मिले और मेरा सामान मंदिर में ले आये। मेरे साथ कुछ लोग पैदल भी आये मंदिर तक। मुझे दूसरे वाले लोगों को फोन कर बताना पड़ा कि उनके यहां रुकना नहीं हो पायेगा।”

बद्रीनारयण मंदिर से मुझे याद आया उत्तरप्रदेश मेंं मिर्जापुर जिले में एक मंदिर का हाल। वहां भी विष्णु भगवान का मंदिर था। प्रेमसागर रुकना चाहते थे पर मंदिर के लोगों ने कहा कि वहां बिजली कम ही आती है, मच्छर बहुत हैं। इसलिये बाबा जी आप कहीं आगे जा कर रुकने का स्थान तलाशो! उत्तर प्रदेश से गुजरात तक में यह फर्क पड़ा है कि महादेव ने बद्रीनारायण को अपने भगत के लिये साध लिया है! वैष्णव इस शैव भक्त को मनुहार कर अपने यहां ठहरा रहे हैं। :lol:

रात आठ बजे मैंने प्रेमसागर से बात की तो वे देवोत्थानी एकादशी की शाम के विष्णु भगवान के तुलसी विवाह के कार्यक्रम में बैठे थे। पूछा पछोरा नहीं उनसे, पर तुलसी विवाह के उपरांत प्रसाद बढ़िया ही लहा होगा!

डभोई में तो प्रेमसागर का ठौर-ठांव बढ़िया जम गया। कल उन्हें वडोदरा के लिये निकलना है। नक्शे के हिसाब से वडोदरा तैंतीस किलोमीटर दूर है। आशा की जानी चाहिये कि वहां भी प्रेमसागर के रुकने का इंतजाम हो ही जायेगा।

प्रेमसागर पाण्डेय द्वारा द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर यात्रा में तय की गयी दूरी
(गूगल मैप से निकली दूरी में अनुमानत: 7% जोडा गया है, जो उन्होने यात्रा मार्ग से इतर चला होगा) –
प्रयाग-वाराणसी-औराई-रीवा-शहडोल-अमरकण्टक-जबलपुर-गाडरवारा-उदयपुरा-बरेली-भोजपुर-भोपाल-आष्टा-देवास-उज्जैन-इंदौर-चोरल-ॐकारेश्वर-बड़वाह-माहेश्वर-अलीराजपुर-छोटा उदयपुर-वडोदरा-बोरसद-धंधुका-वागड़-राणपुर-जसदाण-गोण्डल-जूनागढ़-सोमनाथ-लोयेज-माधवपुर-पोरबंदर-नागेश्वर
2654 किलोमीटर
और यहीं यह ब्लॉग-काउण्टर विराम लेता है।
प्रेमसागर की कांवरयात्रा का यह भाग – प्रारम्भ से नागेश्वर तक इस ब्लॉग पर है। आगे की यात्रा वे अपने तरीके से कर रहे होंगे।
प्रेमसागर यात्रा किलोमीटर काउण्टर

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