अमरकण्टक – नर्मदा और सोन की कथाओं का जाल


22 सितम्बर 2021:

अमृतलाल वेगड़ उन्हें सौंदर्य की नदी, अमृतदायिनी नदी कहते हैं। सर्पिल, बल खाती, उछलती कूदती क्षिप्र गति से आगे बढ़ती नर्मदा मंत्रमुग्ध करती हैं। मेरे जैसे अ-कवि हृदय को भी इतना आकर्षित करती हैं कि मैं यहां अपने लैपटॉप के की-बोर्ड से जूझते हुये भी नर्मदा तट पर जाने की प्रबल इच्छा रखता हूं।

इधर प्रेम सागर अमरकण्टक की ओर बढ़ रहे थे, उधर मुझे अमरकण्टक से बहने वाली नदियों की भांति भांति की कथायें सुनने को मिल रही थीं। आज और अगले दो दिनों में प्रेमसागर नर्मदा और सोन आदि के उद्गम स्थलों को देख चित्र आदि भेजेंगे। नर्मदा की उत्पति और सोन से उनके सम्बंधों की बात उठेगी। उन कथाओं की बात होगी जो मैंने सुनी हैं, पर जिनपर कोई मत नहीं बनाया है।

सोन नदी नहीं नद है। नर्मदा चिरकुमारी हैं। उनकी शादी होने वाली थी सोन से, जो हुई नहीं। सोन जोहिला (नर्मदा की सखी/दासी/नाउन) के साथ वैवाहेत्तर सम्बंध बनाना चाह रहा था या बना चुका था। ये सब कथानक तत्कालीन समाज, उसके उन्मुक्त भाव या पितृसत्तात्मक स्वरूप आदि पर दृष्टि डालते है। नदियाँ, पर्वत, ताल, झील, समुद्र, सूर्य, चंद्रमा, नक्षत्र आदि प्राकृतिक संरचनायें हैं। भिन्न भिन्न समाज उन्हें समझने के लिये उन्हें मानवीय या अतिमानवीय गुण प्रदान करते हैं और उनकी प्रकृति अपनी कथाओं के आधार पर समझने समझाने का प्रयत्न करते हैं। वही गंगा-यमुना-सरस्वती-सिंधु के साथ हुआ है और वही नर्मदा, सोन और जोहिला के साथ भी।

जो कथा (कथायें) मुझे बताई गयीं नर्मदा के बारे में, वे निश्चय ही वैदिक या पौराणिक आधार रखती हैं। पर शहडोल-अमरकण्टक और छतीसगढ़ के जुड़े इलाके में गोंड जनजाति रहती आयी है। शैलेश पण्डित से मैं पूछता हूं कि पुष्पराजघाट (राजेंद्रग्राम) से अमरकण्टक के बीच कौन रहते हैं तो उनका कहना है कि सकरा घाटी और उसके बाद के विंध्य के (?) पठारी भू भाग में दूर दूर बसे गोंड गिरिजनों के गांव (उनकी भाषा में ‘टोला’) हैं। आज से नहीं; आदि काल से यही गिरिजन वहां हैं। मनु, मार्कण्डेय, अत्रि या अगस्त्य और आज के तिवारी, पांड़े, ठाकुर, वैश्य आदि तो बाद में आये होंगे (मेरा कयास)। गोंड क्या लोककथा रखते हैं नर्मदा के बारे में? उनकी कथायें वही या उसी जैसी हैं जो मनु, मार्कण्डेय की पौराणिक कथायें हैं या उनसे कुछ अलग? नर्मदा के क्षेत्र में वे तो पहले (आदि) मानव रहे होंगे।

मुझे इण्टरनेट पर मोऊमिता डे (Moumita Dey) जी का एक रिसर्च पेपर मिला। इस सात पेज के वर्ड डॉक्यूमेण्ट में भिन्न भिन्न समाजों में नर्मदा के विषय में प्रचलित कथाओं का विश्लेषण है। यह रिसर्च पेपर आपको किसी निष्कर्ष पर नहीं पंहुचाता। वह शायद उसका ध्येय भी नहीं है।

वह रिसर्च पेपर केवल यह बताता है कि प्रत्येक समाज ने प्रकृति की देन – नदियों – को अपनी अपनी मान्यताओं के अनुसार गुण प्रदान किये हैं। पितृसत्तात्मक समाज में नारी (नर्मदा) किस प्रकार अपने को अभूतपूर्व बनाने के लिये संघर्ष करती है और किस प्रकार वह सफल या असफल होती है, उसकी झांकी लोक मान्यताओं/कथाओं में है। सुश्री डे के रिसर्च पेपर में अगर कोई पक्षपात है तो वह फेमिनिस्ट पक्षपात ही होगा।

पितृसत्तात्मक समाज – चाहे वह मनु मार्कण्डेय के गोल वाला हो या गिरिजनों के गोल वाला, वह नारी (अर्थात नर्मदा) की महत्ता यूंही स्वीकार नहीं करता। पहले वह उसे लांछित या उपेक्षित करता है, पर अगर फिर भी नारी अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित कर देती है, जो नर्मदा के मामले में है; तो वह उसे देवी का दर्जा देकर पूजनीय बना देता है।

नर्मदा मंदिर, अमरकण्टक

पेपर के अनुसार गोंड समाज में मान्यता है कि –

  • नर्मदा माँ देवी थीं और उनके सोन के साथ (संसर्ग से) एक बच्चा हुआ था।
  • नर्मदा के रूप रंग आकार प्रकार के बारे में गोंण लोक गाथा कुछ नहीं कहती।
  • जब नर्मदा ‘सिंगल मदर’ थीं (बिना बच्चे के पिता का नाम बताये) अपने बच्चे के लिये और वे जीवनदायिनी हैं। यह उनकी प्रकृति बताई गयी है। अर्थात अपने बच्चे का खुद पालन देखभाल करने वाली।
  • जिस कथा में वे यह बताती हैं कि उनका शिशु सोन के संसर्ग से है, वहां उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती है।
  • गोंड गिरिजनों के मातृकुलीय समाज में स्त्री अपने बच्चे का लालन पालन कर सकती है, बिना अपने बच्चे के पिता या अपने पति का नाम बताये। पर अगर पिता कुल के बाहर का होता है तो नारी उपेक्षित और निंदनीय हो जाती है।
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गोंड सोन को अपने कुल का मानते हैं। नर्मदा का अपने कुल के व्यक्ति से सम्बंध हो तो वह ‘स्वीकार्य है’ भले ही मातृकुलीय परम्परा पिता के जनक का नाम न घोषित करे। पर एक अन्य लोक कथा – सोन-मुदा की लोक कथा – में सोन गोंड समाज से इतर है और तब नर्मदा को अपनी दिव्यता के बावजूद आत्महत्या करनी पड़ती है।… कुल मिला कर नर्मदा के चरित्र की परिकल्पना बहुत कुछ इसपर निर्भर करती है कि कौन समाज वह परिकल्पना कर रहा है।

नर्मदा गिरिजनों की भी नदी हैं और आर्यजनों की भी। इसलिये उनकी कथाओं और उनको दिये गये attributes में अंतर है। आर्यजनों की नर्मदा चिरकुमारी हैं। गंगा जितनी पवित्र हैं। पितृसत्तात्मक समाज में भी अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के कारण; एक बड़े विंध्येत्तर भू भाग की जीवनदायिनी पुण्यसलिला नदी होने के कारण; वे उतनी ही पूज्य हैं; वैसी ही पापनाशिनी हैं, जैसी माँ गंगा।

अमृतलाल वेगड़ उन्हें सौंदर्य की नदी, अमृतदायिनी नदी कहते हैं। सर्पिल, बल खाती, उछलती कूदती क्षिप्र गति से आगे बढ़ती नर्मदा मंत्रमुग्ध करती हैं। मेरे जैसे अ-कवि हृदय को भी इतना आकर्षित करती हैं कि मैं यहां अपने लैपटॉप के की-बोर्ड से जूझते हुये भी नर्मदा तट पर जाने की प्रबल इच्छा रखता हूं।… और इसके अलावा सोन (शोणभद्र नद) को भी आदर मिलना चाहिये। यह कहना कि वह एक नाउन या दासी के साथ सम्बंध बना रहा था; धिक्कृत लोक मानसिकता है। जोहिला भी एक अच्छी बलखाती ट्रिब्यूटरी नदी है। उसका भी मान होता चाहिये। … नदी, कोई भी हो, प्रकृति का वरदान है। मानव उसकी इज्जत करेगा तो प्रकृति मानव की इज्जत करेगी। अन्यथा भारत की अनेक नदियाँ माता का दर्जा पाने पर भी आई.सी.यू. में हैं। मरणासन्न! :sad:

यह सब पढने-जानने के बाद में मनु-मार्कण्डेय-पुराण-नर्मदा उद्गम- सोन मुदा और गिरिजनों की लोक कथाओं के जाल को विराम देते हुये; मैं केवल नर्मदा के सुंदर, चंचल और जीवनदायी स्वरूप के प्रति ही सोचूंगा। सोन/शोणभद्र, जोहिला और नर्मदा के सम्बंधों की बात को विराम देता हूं।

और इससे जुडी बात – ईश्वर की, देवों की रचना मनुष्य ने की है; या प्रकृति को, मनुष्य को ईश्वर ने रचा है; उसके पचड़े में पड़ने का भी कोई लाभ नहीं है। जो सामने है, वह सत्य है, सुंदर है, शिव है। वही सोचो और वही लिखो जीडी!

हर हर महादेव!

(इस पोस्ट का ऊपर का चित्र शैलेश पंडित का हैं। हेडर में प्रेमसागर नर्मदा मंदिर में हैं।)

23 सितम्बर 2021 सवेरे:

कल प्रेमसागर नर्मदा मंदिर गये थे। उसके अनेक चित्र उन्होने भेजे हैं। मैंने उन्हें कहा है कि मुझे चित्रों की आवश्यकता जितनी है उससे दस गुना चित्र भेजे हैं। उनमें से कुछ का प्रयोग मैं आगे एक दो दिन में करूंगा।

एक अच्छी बात उन्होने बताई कि वन विभाग एक आसवन शाला चलाता है संजीवनी नामके स्थल पर। वहां अश्वगंधा, नीम का तेल आदि अनेक दवायें वे निर्मित करते हैं। उनकी बिक्री भी होती है। वहां आई ड्रॉप का आसवन चल रहा था। एक कर्मी, साधना मार्को जी वहां लैब में काम कर रही थीं। प्रेमसागर ने भी वहां आई-ड्रॉप लिया।

एक कर्मी, साधना मार्को जी वहां लैब में काम कर रही थीं।

आज प्रेम सागर जी ने बताया कि प्रयाग-बनारस के बीच चलने वाले दो कांवरिया बंधु कल अमरकण्टक पंहुच रहे हैं। वे भी प्रेम जी के साथ अमरकण्टक से कांवर उठा कर साथ चलेंगे और उनके साथ ॐकारेश्वर-महाकाल तक साथ रहेंगे। … कारवाँ बढ़ेगा, जैसी टिप्पणी में कयास व्यक्त किया था कृष्ण देव जी ने! :-)

प्रेम सागार जी की गतिविधि के बारे में कल लिखा जायेगा। आज तो आप मेरी उक्त ‘मानसिक हलचल’ से ही अवगत हों! :-)


विघ्नों बाधाओं को लांघते अमरकण्टक पंहुच ही गये प्रेमसागर


21 सितम्बर 2021, शाम:

आज की यात्रा के उत्तरार्ध की चर्चा करते हुये प्रेमसागर जी ने बताया कि रास्ता बदल कर कच्चा मार्ग पकड़ा था जो सीधे अमरकण्टक ले जाता था। उसमें कहीं कहीं तो सड़क पर पानी था। कहीं बांयी ओर पानी के तेज गिरने की, झरने की आवाज आती थी, पर दिखाई कुछ भी नहीं पड़ता था। एक जगह झरने की आवाज दांयी ओर से सुनाई पड़ी और झरना दिखा भी। रास्ते में जगह जगह बड़े पेड़ टूट कर रास्ता पूरी तरह बंद कर पड़े थे।

प्रथम चरण – प्रयागराज से वाराणसी होते, रीवा, शहडोल, अनूपपुर, बंद मार्ग पर मैकल पर्वत की चढ़ाई और कच्चे रास्ते पर गिरे हुये वृक्षों को पार करते हुये अंतत: द्वादश ज्योतिर्लिंग के कांवर पदयात्री प्रेम सागर अमरकण्टक पंहुच ही गये आज शाम चार बजे! उन्होने वन विश्रामगृह अमरकण्टक का चित्र भेजा जो आज से सत्तर साल पहले समुद्र तल से 1061 मीटर की ऊंचाई पर बना था। आज की यात्रा के बारे में प्रेमसागर पांड़े कहते हैं कि वह रोमांच और आनंद से संतृप्त यादगार यात्रा थी। अमरकण्टक पंहुचने पर एक उपलब्धि का जो भाव होता है, वह उनकी आवाज से टपक रहा था। बोले – “आज का यात्रा तो यादगार रहेगा! सबसे रोचक बोला जाये तो आज का रहेगा। घाटी पार करने पर जलेस्वर धाम का मंदिर था जहां सोन और नर्मदा माई के विवाह का स्थल है। वहां दर्शन किया तो बगल में माँ अन्नपूर्णा का मंदिर था। उसके पास ही छत्तीसगढ़ की सीमा भी पड़ती है। अमरेश्वर महादेव के मंदिर में द्वादश ज्योतिर्लिंग की प्रतिकृतियाँ बिठाई गयी हैं।”

कुल मिला कर अमरेश्वर मंदिर में प्रेमसागर जी ने बारहों ज्योतिर्लिंग की झांकी देख ली – जहां की पदयात्रा का उनका संकल्प है!

उपलब्धि प्राप्त होने पर विनयशील व्यक्ति उन सब के प्रति धन्यवाद कृतज्ञता जताने के मोड में आ जाता है जो उस बड़े कार्य में सहायक होते हैं। वे वन विभाग के सभी लोगों के प्रति बारम्बार आभार और कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे जो रास्ते भर उनकी सुविधाओं और कुशलक्षेम के लिये लगे रहे! वे प्रवीण दुबे जी, सुधीर पाण्डेय जी और मेरे लिये बोले – “मेरे मन में आता है कि आप तीनों मेरे लिये ब्रह्मा-विष्णु-महेश हैं! तीनो देव मेरी सफलता के लिये सदा कृपा बनाये रखे।”

वन विश्रामगृह, अमरकण्टक पंहुचे प्रेमसागर

मैंने हंसते हुये उनसे पूछा – “अच्छा?! कौन ब्रह्मा है, कौन विष्णु और कौन महेश?!”

प्रेमसागर जी की वाणी में हल्की स्टैमरिंग है। उसके साथ उन्होने उत्तर दिया – “हम तो, हम तो यही मानते हैं कि आप ब्रह्मा हैं; काहे कि आप सबसे पहले मिले। फिन प्रवीण भईया (प्रवीण दुबे जी) विष्णु हैं और, और सुधीर भईया (सुधीर पाण्डेय) महेश हैं!”

धूप तेज थी, पर चुभ नहीं रही थी। वैसी सुखद थी जैसी शरद ऋतु में होती है।

राजेंद्रग्राम से अमरकण्टक के रास्ते के बारे में प्रेम सागर कहते हैं कि दृश्य बहुत मनोरम था। रास्ते के दोनो ओर वन और पहाड़ियाँ थीं। बीच बीच में मंदिर भी मिल रहे थे। धूप तेज थी, पर चुभ नहीं रही थी। वैसी सुखद थी जैसी शरद ऋतु में होती है। शिव मंदिर ही मुख्यत: मिले। एक स्थान पर तो बहुत ही बड़ा शिवलिंग देखा उन्होने। नंदी की भी विशाल प्रतिमा थी।

*** द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची ***
पोस्टों की क्रम बद्ध सूची इस पेज पर दी गयी है।
द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा पोस्टों की सूची

आज शैलेश पण्डित जी ने दस साल पहले की गयी अपनी राजेंद्रग्राम से अमरकण्टक की यात्रा के कुछ चित्र भेजे। उनमें से एक चित्र में सड़क के दोनो ओर लम्बे लम्बे वृक्ष दिखते हैं। पर प्रेमसागर जी के चित्रों में सड़क किनारे का वैसा दृश्य नजर नहीं आया। एक दशक में बहुत कुछ बदला भी होगा। शायद मंदिर और स्थान वही हों। पर पर्यावरण में परिवर्तन तो होंगे ही!

राजेंद्रग्राम से अमरकण्टक की यात्रा – शैलेश पण्डित, एक दशक पहले।

आज की यात्रा के उत्तरार्ध की चर्चा करते हुये प्रेमसागर जी ने बताया कि रास्ता बदल कर कच्चा मार्ग पकड़ा था जो सीधे अमरकण्टक ले जाता था। उसमें कहीं कहीं तो सड़क पर पानी था। कहीं बांयी ओर पानी के तेज गिरने की, झरने की आवाज आती थी, पर दिखाई कुछ भी नहीं पड़ता था। एक जगह झरने की आवाज दांयी ओर से सुनाई पड़ी और झरना दिखा भी। रास्ते में जगह जगह बड़े पेड़ टूट कर रास्ता पूरी तरह बंद कर पड़े थे। प्रेमसागर जी ने उन्हें चढ़ कर और लांघ कर पार करने का यत्न किया। आगे बढ़े पर एक जगह काले मुंह वाले बहुत से बंदर सामने आ गये। वे खतरनाक लग रहे थे। प्रेमसागर ने अपने कदम मोड़ लिये और उसी रास्ते पर वापस करीब पांच किलोमीटर लौटे। वहां उन्हें वन विभाग के वर्मा जी मिले जो उन्हे दूसरे रास्ते से ले कर विश्रामगृह पंहुचे। “सब कुछ बहुत ही रोचक और रोमांचक था।” – यह प्रेम सागर जी ने बार बार कहा।

रीता पाण्डेय

रोचकता, रोमांच और आनंद – इनको शब्दों में व्यक्त करने की मेरी विपन्नता है। प्रेम सागर मुझे वे शब्द दे नहीं सकते, वे भाव दे सकते हैं। मैं शब्द जुगाड़ सकता हूं पर मेरे पास अनुभव और भाव नहीं हैं। अपनी पत्नीजी को मैं अपनी यह व्यथा कहता हूं तो वे झिड़क देती हैं – “तुमने खुद ने गुड़ खाया नहीं है और खाने वाला अगर मूक है तो उस स्वाद की बात करना बेमानी है। जो तुम्हें समझ आ रहा है, वही लिखो। बहुत ज्यादा व्यथा व्यथा चिल्ला कर भाव मत खाओ।” मेरी पत्नीजी मेरी सबसे पहली पाठिका हैं और सबसे बड़ी आलोचक भी। :lol:

अगले दो तीन दिन प्रेमसागर जी को अमरकण्टक में गुजारने हैं। बहुत कुछ वहां उनको देखने को है। वहां उन्हें कांवर-जल भी उठाना है। उनकी कांवर पदयात्रा का यह महत्वपूर्ण पड़ाव है। मोटे तौर पर उन्होने 700 से अधिक किलोमीटर की पदयात्रा पूरी कर ली है।

उनके संकल्प की दृढ़ता की परीक्षा हो गयी है और वे अपना जीवट प्रमाणित करने में सफल रहे हैं। महादेव अवश्य प्रसन्न होंगे उनसे। पर महादेव की प्रसन्नता का उन्हें मेरा प्रमाणपत्र तो चाहिये नहीं। महादेव जी के साथ तो उनकी हॉटलाइन बन गयी है उनके इस जीवट भरी भक्ति से।

‘अभी तो जुनून की नाईं रोज मैं उनपर ब्लॉग लिखने की कोशिश में लगा रहता हूं; पर वह जल्दी ही होगा जब प्रेमसागर पांड़े से ईर्ष्या होने लगे! :lol:

प्रयागराज से अमरकण्टक की पदयात्रा

हर हर महादेव!


मनोज सिंह की नाव का वार्षिक अनुरक्षण


मनोज सिंह की नाव अपेक्षाकृत छोटी है – मारुति कार जैसी। उसपर एक लाख का ओवरहाल खर्च करने पर उसकी लाइफ 7-10 साल बढ़ जायेगी। जब वह बनी थी तो यूकलिप्टस – सफेदा – की लकड़ी का प्रयोग हुआ था। वह जल्दी खराब हो गयी। अब वे साखू की लकड़ी ही लगवायेंगे।

दो ‘नावकंकाल’ हैं द्वारिकापुर गंगाघाट पर। एक नाव मनोज सिंह की है और दूसरी मयंक सिंह की। दोनो का ए.ओ.एच. – Annual Overhaul चल रहा है। उनके साइड की लकड़ी उखाड़ी जा रही है। साथ में लगा लोहे का पतरा भी निकाला जा रहा है।

आज शाम पत्नीजी के साथ गंगा घाट पर गया। अपनी नाव पर मनोज सिंह भी एक रम्मा (लोहे की नुकीली रॉड) ले कर लकड़ी निकालने में लगे थे। साथ में एक अन्य व्यक्ति भी काम कर रहा था। मनोज जी ने बताया कि तल्ले की लकड़ी सड़ती नहीं है – वह सदा पानी में रहती है। साइड की लकड़ी जो कभी पानी और कभी हवा के सम्पर्क में आती है, वह खराब हो जाती है। उसे ही बदलना होता है। उसके साथ लगा लोहे का पतरा भी जंग लग जाता है। पतरा भी नया लगता है।

मनोज (बांये से तीसरे) की नाव का ओवरहॉल हो रहा है। सबसे बायें है मेरा वाहन चालक गुलाब।

नाव की लकड़ी अच्छी क्वालिटी की होती है; साखू की। उसपर लोहे की चादर लगा कर जंग से बचाने के लिये अलकतरा का पेण्ट भी किया जाता है। इस ओवर हॉल में करीब एक लाख का खर्चा है। एक नई नाव, जो बालू ढोने के काम आती है; तीन से सात लाख की पड़ती है। मतलब एक बोलेरो या एक मारुति जितना खर्च!

मनोज सिंह की नाव अपेक्षाकृत छोटी है – मारुति कार जैसी। उसपर एक लाख का ओवरहाल खर्च करने पर उसकी लाइफ 7-10 साल बढ़ जायेगी। जब वह बनी थी तो यूकलिप्टस – सफेदा – की लकड़ी का प्रयोग हुआ था। वह जल्दी खराब हो गयी। अब वे साखू की लकड़ी ही लगवायेंगे।

नावकंकाल। अंजर पंजर खुल गये हैं।

मनोज ने बताया कि काम में करीब तीन हफ्ता और लगेगा। मैंने मनोज जी का फोन नम्बर ले लिया है – बाद में पता करने के लिये कि नाव की मरम्मत का काम कैसे चल रहा है। काम सवेरे साढ़े छ बजे शुरू हो जाता है। इसलिये सवेरे साइकिल भ्रमण के दौरान मनोज जी से मुलाकात भी हो सकती है।

एक नाव पर उसका नाविक बैठा सुस्ता रहा था।

गंगा किनारे का दृश्य हमेशा की तरह सुंदर था। सुबह और शाम के चित्र सुंदर आते भी हैं। अब शाम ढलने में आधा घण्टा ही था। बालू का काम खतम कर नावें किनारे खड़ी हो गयी थीं। पिछले कुछ दिनों में गंगाजी बढ़ी हैं। वह साफ दिख रहा था। एक नाव पर उसका नाविक बैठा सुस्ता रहा था। एक पटरा नाव पर रखा था जो किनारे जमीन पर उतरने के लिये रैम्प की तरह काम आता है। एक अन्य नाव पर बच्चे किनारे पर बैठे सूर्यास्त भी निहार रहे थे और मछली पकड़ने का मनोविनोद भी कर रहे थे। उन्होने बताया कि अभी कोई मछली पकड़ी नहीं है। जो मछली पकड़ने का कंटिया लिये था, उसने बात बात में यह दर्शा दिया कि वह “दक्ष मछली पकड़क” है! पर बाकी दोनो उसकी इस बात का समर्थन करते नहीं दिखे।

उन्होने बताया कि अभी कोई मछली पकड़ी नहीं है।

सूर्यास्त होने को था। ‘दिवस का अवसान समीप था; गगन था कुछ लोहित हो चला।’ सूरज और उनकी गंगाजल में परछाई मंत्रमुग्ध कर रही थी!

उमस भी ज्यादा ही थी। हवा रुकी हुई थी। पर उमस से और हवा न चलने से तट पर लोगों को कुछ खास अंतर नहीं पड़ रहा था। अंतर मुझ जैसे को था जो कार के वातानुकूलित वातावरण से निकल कर घाट पर घूम रहे थे।

सूरज और उनकी गंगाजल में परछाई मंत्रमुग्ध कर रही थी!

घर लौटने का समय हो गया था। सांझ के बाद गांवदेहात अपने अपने खोल में दुबकने लगता है। पंच्छी भी नीड़ पर लौटते हैं और हम भी घर को निकल लिये। बहुत दिनों से बारिश और मौसम के कारण साइकिल नहीं निकली। आज द्वारिकापुर घाट देख कर यह तय किया कि कल से निकला जाये।

आजकल काफी समय प्रेमसागार जी की द्वादश ज्योतिर्लिंग कांवर पदयात्रा को ट्रैक करने और उसपर ब्लॉग लिखने में व्यतीत हो रहा है। पर आसपास भी जो कुछ है, वह भी सुंदर है और शिव है! हर हर महादेव!

आसपास भी जो कुछ है, वह भी सुंदर है और शिव है!

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