गांव का पता और ऑनलाइन जरूरतें


amazon-7591ऑनलाइन युग गांव के मेरे पते को उपयुक्त नहीं पाता। शायद इण्डिया, भारत को न पहचानने की जिद सी करता है।

शुरुआत “आधार” से हुई। गांव में शिफ़्ट होने पर मैने अपना पता आधार की साइट पर जा कर बदलने का यत्न किया। अपना पिन कोड भरने पर उसने पते में गांव, पोस्ट, और तहसील लेने के साथ साथ अपनी तरफ़ से कुछ और स्थान चिपका दिये, जिन्हे मैं उस समय जानता ही नहीं था। उनको हटाने पर वह मेरा पता स्वीकार ही नहीं कर रहा था। अत: मेरे अनुसार मेरे आधार(भूत) पते में कुछ अतिरिक्त स्थानों का जिक्र भी है। मसलन, डैइनिया (भूतों के बगीचे) का जिक्र है। जो न भी होता तो काम बखूबी चलता। गूगल मैप ने आधार को शायद बता दिया है कि मेरे पते की पहचान डैइनिया के बगीचे से होती है।

खैर, डाकिया आधार का नया कार्ड उसमें लिखे मेरे पते पर ले आया – अत: वह पता स्वीकार्य मान लिया मैने।

ऑन लाइन खरीद करने पर अलग प्रकार से झंझट आया। कुछ कोरियर कम्पनियां पैकेट बनारस भेज देती थीं, कुछ मिर्जापुर और कुछ इलाहाबाद। अलग अलग स्थानों से कुरियर मुझे फोन कर पूछते थे कि मैं कहां रहता हूं। एक दो को तो मैने कहा कि पैकेट कटका रेलवे स्टेशन पर दे जायें और मैं स्टेशन मास्टर साहब से बाद में उनके पास जा कर ले आऊंगा। इसपर वे राजी नहीं थे। फलत: औसत 4-5 फोन कॉण्टेक्ट के बाद ही वे मेरे घर तक आ पाये। दो-तीन पैकेट तो आ ही न सके। थक कर अमेजन या स्नैपडील ने ऑर्डर केंसिल कर दिया और पैसा रिफ़ण्ड किया। इस में हफ़्तों-महीनों का समय लगा। उस दौरान मुझे धुकधुकी लगती रही कि कहीं पैसे डूब तो नहीं गये (गांव के पते पर कैश-ऑन-डिलिवरी का विकल्प नहीं है)। पैसे फंसे रहे, सो अलग।

हां, स्पीडपोस्ट से भेजा सभी सामान समय से और बिना विश्व-भ्रमण किये मुझे मिलता रहा है। सबसे ज्यादा दुर्गति तो “गति” नामक कोरियर कम्पनी से हुई।

अभी एक ऑनलाइन पुस्तक बेचक ने पैकेट न मिलने के तकाजे पर ई-मेल भेजा है –

Dear Sir, We regret the inconvenience caused. Your copy was sent by DTDC courier and they returned it due to no service. We will be sending it back by speed post.

DTDC जरूर कोई शहराती कुरियर कम्पनी होगी। उन्हे गांव की पगडण्डियों का अन्दाज नहीं है शायद।


आप कह सकते हैं कि अपने पते को लेकर, या ऑनलाइन खरीद को ले कर मैं इतना फसी क्यूं हूं। पास के रमेश तेली या बलवन्त सेठ की दुकान से सामान खरीद कर संतुष्ट क्यों नहीं हो जाता। क्यों इण्टरनेट कनेक्शन और उनकी वेब साइटों के चक्कर में रहता हूं। क्यों अंगरेजी के आधा दर्जन अखबार पढ़ना चाहता हूं। क्यों गांव में आने वाले अमर उजाला या जागरण के प्रिण्ट एडीशन से काम चला लेता।

मैं शायद स्प्लिट पर्सनालिटी हूं। बिना एयर कण्डीशनर के रहने के प्रयोग तो करना चाहता हूं। पर किण्डल पर दन्न से खरीद कर डाउनलोड हुई ताजा पुस्तक मुझे बहुत लुभाती है। वह मेरे लिये लग्जरी नहीं, आवश्यकता बन गयी है।


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मेरा खाता आई.सी.आई.सी.आई. बैंक में है। साहब लोगों का बैंक। उसके रिलेशनशिप मैनेजर तो बड़े अच्छे हैं। सहायता करने के लिये मेरे घर तक आये कई बार। जी हां; बनारस से 45 किमी दूर गांव में। पर उनके बैंक की साइट पर अपना पता सही करने में जो मशक्कत अभी तक कर रहा हूं, वह मैं ही जानता हूं। पता भरने के लिये उसकी साइट मकान/फ्लैट नम्बर, माला और बिल्डिण्ग नम्बर/नाम और गली नम्बर, मुहल्ला, शहर आदि मांगती है। वह सब गांव में होता ही नहीं। उत्तर प्रदेश के भदोही जैसे भुच्च जिले को तो अपने ऑप्शन में दिखाती ही नहीं वह साइट। “लालता पण्डित की बखरी के पूरब का मकान” जैसा इनपुट वह लेती ही नहीं।

ले दे कर जो पता बैंक की साइट पर आ सका है, उसे मैने अपने डाकिये – रमापति – को ध्यान से नोट करा दिया है कि इस तरह के ऊट-पटांग लिखे पते वाली कोई भी चिठ्ठी हो, मुझे दे जाये। इस सब के लिये रमापति से बड़े आत्मीय संबन्ध बनाने पड़े मुझे। उनके बारे मे जितनी जानकारी ली मैने कि उसके आधार पर एक-दो बड़े आकार की ब्लॉग पोस्टें लिखी जा सकती हैं। यह भी सुनिश्चित हो गया कि इस इलाके के डाकिया, रिटायर होने तक, रमापति ही रहेंगे।

मिलने आने वाले शहरी लोगों के लिये मैने अपना फोन नम्बर देने के साथ साथ ह्वाट्स-एप्प पर एक नक्शे सहित रास्ते का विस्तृत विवरण भेजना प्रारम्भ किया। पर कई बार लोग फिर भी फड़फड़ी खाते जब मेरे घर पंहुचे तो पता चला कि ह्वाट्सएप्प खोल कर उन्होने मेरा संदेश पढ़ा ही न था।

खैर; साल भर से ऊपर हो गया। यहां रहते बहुत से लोग जानने लगे हैं। एक दो कुरियर वाले भी पहचान गये हैं। डाकिया जी तो घरेलू से हो गये हैं। गांव के पते को ऑनलाइन जगत हिकारत से भले देखता हो, मेरा काम चल जा रहा है।

आशा है, भविष्य में बेहतर ही होगा, उत्तरोत्तर। गंवई बनने की जिद जो है मेरी। अपनी शर्तों पर रहता रिटायर्ड आदमी। … काश कभी यह हो कि मेरे नाम और जिले के नाम/पिनकोड भर से चिठ्ठी/पैकेट मुझे मिलने लगें। इलाके में उतना फ़ेमस बनने का ख्वाब पालना कोई बुरा ख्वाब नहीं है!

यद्यपि, यह पक्का है कि शहर और गांव की कशमकश में गांव आगे और तेजी से हारने वाले हैं। यह हारना केवल डाक पते की पहचान से कहीं ज्यादा गहरा होगा। बिना किसी संशय के। अगर गांव को जीतना है (या प्रासंगिक रहना है) तो खुद को री-इन्वेण्ट करना होगा। शहर की अनेक्सी की तरह नहीं चल पायेंगे गांव।

खुले में शौच


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गांव की सड़क। इसके किनारे खुले शौचलाय का काम देते हैं बरसात के मौसम में। 

सन 1987 में मैने अपने बाबा का दाह संस्कार किया था। गांव में लगभग दो सप्ताह रहा उनके क्रिया-कर्म सम्पादित करने के लिये। दस दिन तक अछूत था मैं। अपना भोजन नहीं बनाता था। घर में एक बुआ जी बना देती थीं और भोजन की पत्तल मेरी तरफ़ सरका देती थीं। अगर रोटी अतिरिक्त देनी होती थी तो पत्तल में रखने की बजाय ऊपर से टपका देती थी। मुझे खराब नहीं लगा था वह सब। कर्मकाण्ड निभाने का कौतूहल था। सर्दियों का मौसम था। सभी प्रयोग अच्छे लग रहे थे।

एक तख्ते पर पुआल बिछा कर मेरा बिस्तर बनाया गया था। आनन्द आता था उसपर सोना। आसपास और भी लोग रहते थे। पर काफी समय अकेले सोचने में व्यतीत होता था। विशेषकर रात में। भोर में ही मैं शौच के लिये तालाब के समीप जाता था। घर से लगभग एक किलोमीटर दूर। खुले में शौच का वह मेरा अन्तिम अनुभव था। मेरे पास लोटा नहीं होता था। एक दो बार मिट्टी की घरिया में पानी ले कर गया। पर वह असुविधाजनक था। फिर गड़ही/तालाब के पानी का प्रयोग करने लगा। मिट्टी से ही हाथ रगड़ कर धोता। यह सब कर्म सुबह की पहली किरण दिखने के पहले ही पूरा कर लेता था। मुझे यह याद नहीं आता कि मेरे पास कोई टार्च थी। अंजोरिया पाख था। चांद की रोशनी में काम चल जा रहा था।

खुले में शौच का वह अनुभव कुल मिला कर खराब नहीं था मेरे लिये। इसके पहले बचपन की स्मृतियों में केवल वह अच्छी तरह याद है, जब मटर के खेत में नेकर की डोरी बहुत यत्न करने पर भी नहीं खुली थी और किसी तरह सरका कर नेकर उतारा था। निपटान के बाद टिश्यू पेपर का काम किसी ढेले या खेत में सुविधाजनक रूप से मिलने वाली पत्तियों से लिया जाना तो रुटीन था। उसके बाद नेकर आधा पहने गड़ही तक जा कर धोना भी सामान्य प्रक्रिया थी। जब तक लोटा ले कर खेत में जाने की उम्र आती, मैं शहरी बन चुका था।

अब, रिटायरमेंट के बाद गांव की लगभग 95% आबादी को खुले में शौच करते पाता हूं। तीन दशक बाद भी गांव शौच के मामले में बदले नहीं। उल्टे, आबादी बढ़ने के कारण बदतर हो गये हैं।

बरसात के मौसम में लोग खेत में नहीं जा पाते तो सड़क के किनारे और रेल लाइन के आसपास की जगह विष्ठा से भर देते हैं। सड़क पर चलना या साइकल चलाना बहुत अप्रिय अनुभव हो जाता है।

गंगा किनारे गांव है कोलाहलपुर। पूरा गांव चमार जाति के लोगों का है। अम्बेडकर ग्राम घोषित कर उसमें सरकार ने हर घर में एक शौचालय बना दिया है। पर शायद ही कोई व्यक्ति उन शौचालयों का बतौर शैचालय प्रयोग करता हो। महिलायें भी शौच के लिये गंगा किनारे जाती हैं।

यहां पास के गांव – भगवानपुर में एक बाभन जवान ने मुझे बताया कि सूरत में फैक्टरी में काम करता था वह। गांव वापस चला आया – “उहां, हगई बरे भी संडास के बहरे लाइन लगाये पड़त रहा। इहां जब मन आवइ, चलि द लोटा लई क खेते (वहां शौच के लिये भी शौचालय के बाहर लाइन लगानी पड़ती थी। यहां जब मन आये चल दो लोटा ले कर खेत में।” मुझे अजीब लगा कि हगने की फ्रीडम के लिये भी रिवर्स-माइग्रेशन होता है; शहर से गांव में।

दो दिन पहले एक एन.जी.ओ. पास के प्राइमरी स्कूल में लोगों को बुला कर भाषण दे रहा था खुले में शौच के खिलाफ़। उसने खुले में शौच को स्त्रियों की इज्जत-आबरू से जोड़ा। उस पर औरतों में कसमसाहट शुरू हुई। फिर विरोध। और लोग उठ कर जाने लगे। जाने वाले आदमी नहीं, औरतें ही थीं। बड़ा ही जटिल है ग्रामीणों को किसी बात को, किसी विचार को समझाना। और थोड़ा बहुत समझ भी आये तो अपेक्षा यही रहती है कि सरकार शौचालय बना कर दे। जहां बना कर दिये भी हैं – कोलाहलपुर में – वहां उसकी साफ़सफ़ाई खुद नहीं करना चाहते लोग। फलत: गंगा (जिसे मां कहते हैं लोग) का किनारा शौच से पाटने को बुरा नहीं समझते वे।

खुले में शौच और स्वच्छता पर लोगों की आदतें बदलना आसान काम नहीं।

अरहर के पौधे


अरहर के पौधे। आठ-दस फुट के। फूलों से लदे।
अरहर के पौधे। आठ-दस फुट के। फूलों से लदे।

उन्हे पौधे कहना एक अण्डर स्टेटमेण्ट होगा। आठ दस फुट के हो गये हैं, पेड़ जैसे हैं। फूल लगे हैं। यूं कहें कि फूलों से लदे हैं। करीब दो दर्जन होंगे। गांव के मेरे घर में अनाधिकार आये और साधिकार रह रहे हैं।

पिछले सीजन में जो थोड़ी बहुत अरहर हुई थी खेत में; फसल कटने के बाद मेरे घर के एक कोने में रखी गयी थी। उसके कुछ बीज गिरे और आने वाली बारिश में अनुकूल अवसर पा कर पनप गये। जब थोड़े बड़े हुये तो खरपतवार निराने वाली महिलाओं को पत्नीजी ने साफ़ करने को कहा था। पर निराई करने वालों की लीडर ने कहा – “नाहीं फुआ, ई रहरि हओ। रहई दअ। (नहीं बुआ, यह अरहर है, रहने दें इसे)”

उन निराई करने वाली महिलाओं का अपना एथिक्स है। घास या खरपतवार के अलावा कोई भी पौधा जो काम का हो या पेड़ बनने वाला हो; उसे काटती नहीं हैं। उन्हे निर्देश भी दिये जायें तो कोई न कोई तर्क दे कर छोड़ देती हैं। सो, निराई करने वाली महिलाओं की दया माया से ये पौधे बच गये और आज खूब छंछड़ गये हैं।

मेरे पिताजी अनुमान लगाते हैं कि पांच सेर अरहर तो निकल ही आयेगी उनसे। इन्हे देख कर ही मैं आकलन करता हूं कि इस साल अरहर की फसल अच्छी होगी और दाम काबू में रहेंगे। उस विपक्ष के घोस्ट राइटर के लिखे भाषण को पढ़ने वाले नेता को “अरहर मोदी” का नारा देने का अवसर नहीं मिलेगा।

घर में – करीब आठ बिस्वा जमीन में अनेक वनस्पतियां, अनेक जन्तु साधिकार आ गये हैं। शहर में रहते तो एक फ्लैट में गमले में कुछ देसी/विलायती पौधे पनपाते। यहां वे ऐसे हैं मानो घर उन्ही का हो और हमें रहने दे कर कृतार्थ कर रहे हों हमें।

पर शायद “मानो” सही शब्द नहीं है। वे वास्तव में कृतार्थ कर रहे हैं हमें और सही मायने में यह गांव में रहने का आनन्द है।

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