नगरा से सैदपुर – प्रेमसागर


<<< नगरा से सैदपुर – प्रेमसागर >>>

कल सवेरे साढ़े छ बजे नगरा, उत्तर प्रदेश से आगे निकले प्रेमसागर। चंदौली जाना था संतोष मिश्र जी के यहां। चंदौली, बकौल उनके 131 किमी दूर था। बताया कि घंटे भर में 10-12 किमी की रफ्तार से साइकिल चलती है। इस हिसाब से बारह घंटे नॉन स्टॉप चलानी होती उन्हें साइकिल। प्रेमसागर पूरी तरह गणना कर नहीं चलते। पुरानी आदत छोड़ नहीं पाये।

वे चंदौली नहीं पंहुचे। उसके लिये गंगा पार करते। वे पंहुचे सैदपुर। करीब 100 किमी साइकिल चलाई। रास्ते के आधा दर्जन फोटो मेरे पास ठेले उन्होने। नदी, रास्ते और पुलों के फोटो। उनसे कोई स्टोरी नहीं बनती। ट्रेवलॉग में कोई रंग नहीं आता सिवाय बदरंग के। साइकिल यात्रा इतनी नीरस होती है? शायद मैं उनसे दिन में चार पांच बार बात कर उनसे अनुभव उगलवाता तो कुछ कथा कहानी निकलती। यूं असम्पृक्त सा नहीं चलेगा लिखना।

बीच में तमसा नदी मिली। नदी क्या एक मझोली आकार की नहर सी लगती है जिसके किनारे कच्चे हों। तमसा में पानी है पर एक नदी की तरह वह प्रसन्न नहीं करती। नदी माने गंगा या सरयू। यूं गोमती या सई भी बजबजाती मरी सी दीखती हैं। तमसा भी बीमार सी लगी मुझे। उसका पुल सिधारगढ़ घाट या पुल है नक्शे में पर प्रेमसागर ने लिख भेजा है – सिधाकर घाट गाजीपुर बलिया। प्रेमसागर स्थानों के नामों को वह इज्जत नहीं देते जो उनका ड्यू है।

रात में वे सुरेश कुमार बरनवाल जी के घर डेरा किये। बरनवाल जी उनके देवरिया के संजय बरनवाल सम्पर्क से मिले – “भईया, सैदपुर पंहुच कर हम कोई मंदिल तलाश रहे थे रात गुजारने के लिये। इतने में संजय जी का फोन आया। उन्होने अपने जीजा सुरेश जी को मेरे पास भेजा। सुरेश जी को आने में दो मिनट भर लगा होगा।”

प्रेमसागर सुरेश जी से पहले मिल चुके हैं देवरिया में। साइकिल यात्रा अभी तक प्रेमसागर के पुराने सम्पर्कों के माध्यम से चल रही है। कल वे वाया बनारस मेरे घर तक पंहुचेंगे। प्रयाग में संगम पर माघ मेला तो 13 जनवरी से है। अभी समय है वहां पंहुचने के लिये।

दो दिन की साइकिल यात्रा से प्रेमसागर का मन लहकने लगा है। अब योजना बना रहे हैं साइकिल से बारहों ज्योतिर्लिंगों की यात्रा करने की। “इसमें तो समय भी कम लगेगा और रुकने की जगहें भी कम तलाशनी होंगी।” – प्रेमसागर ने कहा।

मैं सोच नहीं पा रहा कि प्रेमसागर और उनकी साइकिल को कितनी तवज्जो दी जाये। पर उनके साथ यह वर्चुअल ट्रेवलॉग इतना प्लेन-वनीला-आइसक्रीम जैसा तो नहीं चल सकता। मुझे अपनी कल्पनाशीलता इसमें डालनी होगी…

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प्रेमसागर की संगम यात्रा


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8 जनवरी 25

प्रेमसागर ने फोन किया सवेरे। वे साइकिल से अपने गांव से चल दिये हैं। गांव जीरादेई, सिवान के पास है। वहां से बलिया, गाज़ीपुर, बनारस होते संगम जायेंगे कल्पवास के लिये। द्वादश ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ पदयात्रा पैदल चलते रोज पच्चीस तीस किलोमीटर नापते थे प्रेमसागर। साइकिल से तो पचास तक नापेंगे।

उन्होने बताया कि उनके गांव से मेरा घर 207किमी बताता है गूगल मैप। मेरे घर से प्रयाग करीब 90 किमी। सो तीन सौ किमी की साइकिल यात्रा कर पंहुचेंगे प्रेमसागर प्रयागराज।

अपना फोटो भेजा है साइकिल पर सवार हो कर। आगे हैंडल से दो थैले लटके हैं। कपड़ा-लत्ता होगा सर्दी के मौसम का। उसके अलावा शायद घर से लाई चिऊरा, लेड़ुआ आदि भी हो। बाकी, जाकिट आदि साटे स्मार्ट लग रहे हैं प्रेमसागर। देखें, आगे अपनी यात्रा का क्या क्या बताते हैं।

9 जनवरी 25

कल प्रेमसागर ने साइकिल से संगम यात्रा प्रारम्भ की अपने गांव से। उनका गांव है सिंकिया, जीरादेई से 3किमी दक्खिन। साइकिल से सवेरे नौ बजे चले। आगे हैंडल पर झोले बांधे और पीछे कैरीयर पर कम्बल रखे।

बीस किमी दूर दरौली घाट में इस साल पॉण्टून पुल अभी पूरी तरह बना नहीं है। सरयू (घाघरा) पार करने के लिये फेरी का इंतजार दो घंटे किया। फेरी बड़ी थी। सरयू भी बड़ी थीं। खूब पानी दीखता है। पाट भी बहुत चौड़ा है घाघरा/सरयू का। “दो किमी का होगा”।

दिन भर में कुल सत्तर किमी साइकिल चलाई। कोई पांड़े जी हैं, उनका मैरिज हॉल है नागरा में। वहीं पांड़े जी ने प्रेमसागर के रात गुजारने का इंतजाम किया।

आज चंदौली तक साइकिल चलानी है प्रेमसागर को। नागरा से चंदौली 113 किमी है – ऐसा प्रेमसागर ने बताया।

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पुराने कपड़ों से रजाई बनाने वाले


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घर के बगल की महुआरी में आये हैं पुराने कपड़े से रजाई-गद्दे बनाने वाले। तीन दिन से डेरा किया है। मेरी पत्नीजी की सहायिका अरुणा अपने इक्कीस किलो पुराने कपड़ों से तीन रजाइयां बनवा लाई है। उसने हमें बताया तो हम (पत्नीजी और मैं) देखने गये।

महुआरी में एक पुराने महुआ के पेड़ के नीचे दरी बिछा कर अपना उपकरण जमा रखा है मोहम्मद ताहिर ने। उन्होने बताया कि वे हैं तो दरभंगा, बिहार के; पर पुराने कपड़ों से ‘ऊन’ बनाने और उससे रजाई गद्दा बनाने का काम श्रीनगर, कश्मीर में करते थे। ताहिर की भाषा में कश्मीरी पुट है यद्यपि वे स्प्रिंग को सपरिंग नहीं उच्चारित करते।

वे दो लोग हैं। ताहिर यहां महुआरी में बैठे हैं और दूसरा आदमी महराजगंज गया है। वह सेट-अप जमाने की वैकल्पिक जगह तलाशने गया है। अगर इस महुआरी में काम ज्यादा न मिला तो वे कहीं और जमायेंगे अपना तामझाम।

ताहिर के सेट-अप में एक डीजल इंजन से चलती मशीन है। उसमें पुराने कपड़े काट छांट कर फीड किये जाते हैं और दूसरी ओर एक कपड़े के चेम्बर में मशीन द्वारा बना ‘ऊन’ इकट्ठा होता है। उस ऊन को निकाल कर उससे रजाई गद्दे की तगाई ताहिर हाथ से करते हैं। सिस्टम साधारण है, पर भारत की गरीब जनता के लिये यह वरदान हो सकता है। पुराने कमीज, पैंट, लूगड़े, धोती, लुंगी आदि से रजाई बन जाती है। कपड़े से ऊन बन जाता है तो ऊन को स्टफ कर कई चीजें बनाई जा सकती हैं।

दस किलो पुराने कपड़ों से करीब सात आठ किलो फीड बनती है। कुछ कपड़ा – जैसे बटन और मोटी सिलाई का भाग ताहिर काट कर अलग करते हैं। उस हिस्से से ऊन नहीं बनता। सात किलो सही कपड़े से एक बड़ी रजाई बन सकती है। अरुणा इक्कीस किलो कपड़े ले कर गई थी और तीन रजाइयां बनीं – चार पांच किलो ऊन से एक रजाई बनी होगी।

एक किलो कपड़े पर पचास रुपये का मेहनताना चार्ज करते हैं ताहिर। इसमें ऊन बनाना और रजाई-गद्दे के तगाई शामिल है। अरुणा ने इग्यारह सौ दिये थे तीन रजाइयां बनवाने में। इक्कीस किलो पुराने कपड़े और इग्यारह सौ रुपये में तीन रजाइयां – सौदा अच्छा ही मानती है वह।

रजाई की गरमाहट तो निर्भर करती है कि रुई या ऊन में कितनी हवा है। जो ऊन ताहिर ने हमें दिखाई, उससे तो लगता है कि अच्छी क्वालिटी की रजाई या गद्दा बनेगा उससे।

#गांवदेहात के मिनिमलिज्म के साथ यह रजाई बनाने की मशीन बहुत फिट लगती है। गांवदेहात में कोई चीज बरबाद नहीं की जाती। उसका जितना कस निकाला जा सके निकाला जाता है। आसपास के लोगों को पता चले तो बहुत से लोग पंहुचेंगे ताहिर के पास। वैसे भी, इस समय कड़ाके की सर्दी पड़ रही है। धूप नजर ही नहीं आती। दोपहरी में भी ठंडी सुर्रा हवा चल रही है। सबको रजाई की ही याद आती है। मौके पर आये हैं रजाई बनाने वाले ताहिर जी।

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अगले दिन फिर गया महुआरी में। मुहम्मद ताहिर के जोड़ीदार मिले मुहम्मद शमशाद। शमशाद ने और जानकारी दी। उनके जैसी मशीन ले कर अंचल में दो दर्जन समूह घूम रहे हैं। दो नेपाल में हैं, पांच आजमगढ़ में, यहां आसपास भी हैं – महराजगंज, ममहर, जलालपुर, गिर्दबड़गांव…

शमशाद ने कहा कि वे सब एक ह्वाट्सएप्प ग्रुप में जुड़े हैं। आपस में बातचीत भी होती है। इस इलाके से कहीं और जाना होगा तो सब मिल कर तय करते हैं। सभी की मशीनें एक साथ लदती हैं ट्रक में और एक नये इलाके, एक नये प्रांत को निकल देते हैं।

एक मशीन लाख सवा लाख की पड़ती है। मेरे ख्याल से खर्चा मशीन का ज्यादा नहींं; पुराने कपड़े का सदुपयोग और उसे #गांवदेहात तक ले जाने का विचार बहुत काम का है। बहुमूल्य।

तीन औरतें बातचीत करने आई थीं वहां। मोलतोल कर बोल कर गईं कि कल सवेरे तीन चार रजाइयां बनवाने आयेंगी। वे यह आश्वस्त होना चाहती थीं कि शमशाद और ताहिर अभी कुछ दिन यहां ठहरेंगे।

मैं सोचता हूं कि कल फिर जा कर शमशाद-ताहिर का मोबाइल नम्बर ले लूं और अगले पांच छ महीने उनकी घुमंतू जिंदगी को ट्रैक कर लिखने का प्रयास करूं! मजेदर होगा वह!

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