भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
महराजगंज बजरिया के पहले ढूंढ़ी एक कुर्सी पर बैठे थे। मैं सड़क पर साइकिल से गुजर रहा था। उन्हें नहीं देखा पर उन्होने मुझे जोर से आवाज दी। मैं रुका, अपनी साइकिल पीछे ली तो ढूंढ़ी लपक कर आये। “हमरो फोटो हींचि क खबर सगरौं दौड़ाई दिहे जीजा!” – उन्होने कहा। फिर बड़ी फुर्ती से अपने गर्म जैकेट का बटन खोल कर कमीज का बांई ओर का वह हिस्सा दिखाया जिसपर किसी सिक्यूरिटी कम्पनी का लोगो बना था।
गार्ड की नौकरी लग गयी है – यह उनकी बात से स्पष्ट हुआ। अधेड़ आदमी को वाचमैनी की नौकरी मिल जाये, इससे बढ़िया और क्या हो सकता है। उनकी प्रसन्नता की गहराई मेरी समझ आ गयी।
मैने उन्हें बधाई दी। जेब से अपना फीचर फोन निकाल कर उनका फोटो खींचा। ढूंढ़ी ने एक कुशल अभिनेता की तरह पोज दिया। वे जानते हैं कि ब्लॉग में कुछ छपेगा और आसपास के दो-चार लोग उनको आ कर बतायेंगे। वे खुद तो फीचर फोन युग से अभी आगे बढ़े नहीं हैं।
ढूंढ़ी मेरे गांव के हैंं। पिछ्ले ग्रामसभा चुनाव में परधानी लड़ने के लिये मैदान में कूदे थे पर तब परधानी ओबीसी की बजाय अनुसूचित खाते में चली गयी। उसके बाद पड़ाव की ओर उन्होने एक चाय की गुमटी लगाई। पर मेरे हिसाब से वह लोकेशन मौके की नहीं थी। ज्यादा चली नहीं। कब बंद हुई, पता नहीं चला।
ढूंढ़ी यादव से मेरा परिचय इस गांव में शिफ्ट होने के समय से है। तब सर्दियों की शुरुआत थी। ढूंढ़ी कडाहे में गुड़ बना रहे थे। बिना परिचय के भी उन्होने मुझे ताजा गुड़ खिलाया था और आधा एक सेर घर पर भी ले कर आ गये थे । मैं नया नया गांव में आया था और लोगों में आत्मीयता की तलाश कर रहा था। वह ढूंढ़ी के माध्यम से भरपूर मिली। आठ साल हो गये उस बात को। तब से वे मेरे मित्र हैं!
ढूंढ़ी खांटी समाजवादी हैं। पर अब जब मध्यप्रदेश में भाजपा ने ने एक यादव को मुख्यमंत्री बना कर सेंधमारी की है; उनका मन कुछ भाजपाई हुआ हो शायद। छोटी से मुलाकात में वह उनसे पूछ नहीं पाया। फिर कभी पूछूंगा!
उनकी गार्ड की नौकरी लगने से मुझे बहुत खुशी है। उन्होने “खबर सगरौं दौड़ाने (सब तरफ फैलाने)” को कहा था। कहते हुये ऊपर की ओर सुदर्शन चक्र घुमाने की मुद्रा में अपनी तर्जनी भी घुमाई थी। उसी के लिये यह पोस्ट लिख रहा हूं। ढूंढी मेरे ब्लॉग के चरित्र पहले ही हैं। एक पोस्ट और सही! :lol:
अशोक सवेरे काम पर आया पर कष्ट में था। टेढ़े हो कर चल रहा था। मेरी पत्नीजी ने कारण पूछा तो बोला – पलई पिरात बा।
पसलियों में दर्द है। कारण कुछ भी हो सकता है। सर्दी लग जाना या अण्ट-शंट खाना। रात में सर्दी में सोने का पोश्चर भी गलत हो सकता है। मेरी पत्नीजी ने उसे तुरंत सलाहें देना शुरू किया। अजवाइन फांके। काढ़ा लिया या नहीं? “रात में ठण्ड में छुछुआत रहा होबे (रात में सर्दी में इधर उधर घूम रहे होगे)”। ज्यादा दर्द हो रहा है तो जरूरी काम निपटा कर घर जाओ और आराम करो।
सहानुभूति मिलने से अशोक कुछ और झूल गया। वह हमारा वाहन चालक है, पर घर के फुटकर काम भी निपटाता है। चारपाई खींच कर धूप में रखना और अनाज सुखाना; ओवरहेड टंकी में पानी देख कर पानी भरना; आटा पिसवाना; दीवार घड़ी का सेल या फ्यूज बल्ब बदलना आदि। ये छोटे छोटे काम गिनती में नहीं आते पर जैसे बनिया की दुकान से सामान की बजाय घेलुआ ज्यादा महत्वपूर्ण है, अशोक के ये काम उसके वाहन चलाने से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। अन्यथा हमारी कार चलती ही कितना है? साल भर में मुश्किल से पांच सात हजार किलोमीटर।
पिछले आठ साल में अशोक तीन बार हमारा साथ छोड़ कर जा चुका है और तीनों बार जब वापस आया तो हमने बिना किसी हील-हुज्जत के, उसे रख लिया है। उसका बच्चा बीमार हुआ तो दो बार उसका इलाज भी हमने कराया। एक बार तो बच्चा चार दिन अस्पताल में भरती रहा और हमें काफी खर्च करना पड़ा।
अशोक गांवदेहात की नब्ज पहचानने में वह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गांव की जिंदगी में हमारे लिये अशोक महत्वपूर्ण है और अशोक के लिये हम। उसकी प्रतीक्षा रहती है इसलिये नहीं कि मुझे कहीं जाना होता है; वरन इसलिये आसपास की खबर वह बखूबी देता है। और गांव के ‘अखबार’ का एडिटोरियल कण्टेण्ट भी स्तरीय बनाता है। उसके विश्लेषण भले ही देसी हों, वे आपको एक अलग कोण से जगहों, घटनाओं और लोगों को दिखाते हैं। और वह पूछने पर बोलता है। हर किसी बात में टांग नहीं घुसाता।
खैर, पसलियों के दर्द पर लौटा जाये। अशोक ने डाक्टर को भी दिखाया था। अपनी बात के सत्यापन के लिये उसने जेब से एक दवाई भी दिखाई जो डाक्टर ने दी थी। डाक्टर ने सूई लगाने की सलाह भी दी थी। उसपर वह विचार कर रहा है कि लगवाई जाये या नहीं। लगवाने का मतलब ज्यादा खर्च।
उसके बताया कि चार पांच दिन पहले भी दर्द हुआ था। तब “लात छुआये रहा” वह। लात छुआना क्या है? मुझे बताया गया कि यह देसी टोटका है। पसलियों में दर्द आम है। और दर्द भी तीखा होता है। गांवदेहात में लोग उस व्यक्ति से पैर का पसलियों पर स्पर्श करवाते हैं, जो उल्टा पैदा हुआ हो। अर्थात प्रसव में जिसका पैर पहले बाहर आया हो। ऐसे व्यक्ति निश्चय ही विरले हैं। और उनकी मांग होती है पसलियों के दर्द में।
“लात छुआया था तो आराम था। तीन दिन ठीक चला। अब एक बार फिर जाना होगा लात छुआने। लगता है पिछली बार पूरे तौर पर लात नहीं छुआई थी उसने।”
शायद पसलियों का दर्द कुछ समय बाद शरीर को आराम मिलने से स्वत: ठीक हो जाता हो। आखिर शरीर का सेल्फ करेक्टिंग मेकेनिज्म भी जबरदस्त चीज है। उसे गांव देहात में लात छुआने के टोटके से जोड़ दिया गया है।
सुग्गी ने बताया है कि हमारे माली जी (रामसेवक) भी उल्टा पैदा हुये थे। मेरी पत्नीजी ने कहा कि अशोक कहीं और जाने की बजाय रामसेवक जी की लात ही खा ले! यूं रामसेवक इस तरह की टोटका वाली दवाई पर शायद यकीन नहीं करते। वे बहुत नो-नॉनसेंस आदमी हैं। अपने काम से काम रखने वाले।
वैसे भी, लगता है अशोक की श्रद्धा उसके पुराने लात-मारक में ही है; भले ही वह व्यक्ति दलित बस्ती का है! :lol:
इसके पहले अशोक दांतों के दर्द से निजात के लिये कीड़ा झड़वाने की बात कर चुका है। जब सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था नदारद हो तो ऐसे टोटकों का ही वर्चस्व होता है। बगल में फलाने की माई के पास बच्चे ले कर आने वालों की सबेरे भीड़ लगने लगती है। बच्चा बीमार रहता है तो नजर झड़वाई जाती है। दूध नहीं पीता या उल्टी कर देता है, खाना नहीं पचता – इस सब का इलाज झड़वाना है। बच्चे ही नहीं वयस्क भी भोजन न पचने पर झड़ाई की शरण लेते पाये जाते हैं।
कोई भी मसल्स स्पैज्म हो – चिलक हो या नस खिंचने से तीखा दर्द – उसके लिये लात खाना या छुआना इलाज है। गले या पीठ के दर्द में भी लात छुआई जाती है। नाभि के पास के दर्द के लिये खटिया के पाये पर नाभि दबा कर रखी जाती है। उसके बाद मुंह में कुछ डाल कर उठा जाता है। कंधे और गले के दर्द में मूसल के बीच के भाग पर गर्दन रख कर लेटा जाता है। इन कृत्यों का तो हो सकता है कोई वैज्ञानिक कारण हो; पर उल्टा पैदा हुये व्यक्ति की लात खाना या छुआना तो विशुद्ध टोटका है!
अशोक
उस लात-मारक ने अशोक को दोपहर में खाली पेट आने का अप्वाइण्टमेण्ट दिया है। यह बता कर अशोक चला गया और शाम को नहीं आया। अब जब आयेगा तब पूछा जायेगा कि लात खाने का कोई सार्थक परिणाम हुआ या झोलाछाप डाक्टर साहब की सूई लगवाने से आराम मिला!
अगले दिन, आज, अशोक आया। एक हड्डी का आदमी है और कमर झुका कर चल रहा था। दयनीय भी लग रहा था और कार्टून भी। उसने बताया कि आराम मिला है पर ज्यादा नहीं। पेट में सूजन है। डाक्टर ने सूई लगाने को कहा है। उसके लिये आज जायेगा।
आज रविवार है। रामसेवक जी के आने का दिन भी है। वे क्यारी में काम कर रहे थे जब अशोक आया। पत्नीजी ने अशोक को और उन्हें चाय दी। अशोक को नारियल छीलने को काम बताया। नारियल छिलने की विशेषज्ञता अशोक की ही है।
रामसेवक और अशोक एक कोने पर धूप में बैठ चाय पी रहे थे। मैने सुना; रामसेवक अशोक से कह रहे थे – एक हफ्ते कायदे से दवाई करो। सब ठीक हो जायेगा।
टोटका स्कूल ऑफ थॉट के मुरीद पूरे गांव वाले हों, वैसा नहीं है।
नीलेश शाह के एक दो वीडियोंं में जिक्र है कि भारत में आजादी के बाद विकास असंतोषजनक रहा। जापान, चीन और कोरिया हमारे बराबर थे सन सैंतालीस में। पर ये सब आगे निकल गये। हमने विकास किया पर सबका नहीं। मसलन, भारत में इस समय सात प्रतिशत आबादी आस्ट्रेलिया के समतुल्य है। बीस प्रतिशत ने जो समृद्धि हासिल की वह फिलिपींस जैसी है। बाकी तिहत्तर प्रतिशत जनता सब-सहारा जैसी है।
भारत बहुत बड़ा है। मैं तो भारत की दशा उसकी समग्रता में नहीं सोच पाता। मेरे सामने तो यह गांव भर है। यह गांव और इसके आसपास के गांव। नेशनल हाईवे के समीप होने के कारण यह भारत के बेहतर गांवों में से होना चाहिये। लेकिन यहां भी, लगभग उसी अनुपात में, मुझे आस्ट्रेलिया, फिलिपींस और सब-सहारा वाले अफ्रीका के दर्शन हो जाते हैं।
यहां मेरे साले लोग हैं और उनके अलावा दे-तीन और परिवार हैं जो बम्बई-कलकत्ता आदि जगहों पर व्यवसाय कर ‘आस्ट्रेलिया’ बन गये हैं। कुछ लोग मध्यवर्गीय नौकरियों में हैं। बनारस अप-डाउन करते हैं। मोदी राज में हाईवे बहुत सुधर गया है। अब वाराणसी की कम्यूट घण्टे भर से कम समय लेती है। वे गांव की कम खर्चे में बेहतर जिंदगी और शहर की आमदनी – दोनो का लाभ ले पाते हैं। वे और कुछ अन्य, जिनमें मुझ जैसे पेंशनयाफ्ता रिटायर्ड लोग हैं, ‘फिलीपींस’ वाले हैं। वैसे गांव में ‘फिलिपींस’ बीस फीसदी नहीं, कुछ कम होगा। पर पिछले दशक में हुये विकास का लाभ ले कर यह तबका जल्दी ही बीस प्रतिशत पार कर जायेगा। मसलन, मेरे पास के करीब बीस परिवार बनारस के शैव मंदिरों के लिये रोज बिल्वपत्र और दूर्वा ले कर जाते हैं। इस तुच्छ सी सामग्री के बल पर बाबा विश्वनाथ उन्हें समृद्ध कर रहे हैं। पिछले आठ साल में मैने उनकी माली हालत में गजब का बदलाव देखा है। अब उनमें से बहुतों के पास मोटर साइकिल और मॉपेड हैं और यह पिछले पाच सात साल में खरीदे हैं उन्होने। ये और कई अन्य ‘फिलिपींस’ वर्ग में घुसने की दस्तक दे रहे हैं।
इस गठरी में बेल पत्ता और दूब घास है। गांव से यह सामग्री ले कर कई लोग बनारस जाते हैं। तुच्छ सी इस चीज से उन परिवारों में समृद्धि आई है। दो दर्जन परिवारों को रोजगार मिला है इस प्रकार बाबा विश्वनाथ के द्वारा!
इन सब के अलावा बड़ी आबादी खेतिहर किसानी मजदूरी, कालीन बुनाई सेण्टरों में काम करती और फुटकर काम तलाशती जनता की है। ये सब बुरुण्डी और नाइजर जैसी आर्थिक दशा वाले हैं और इनकी संख्या गांव का तीन चौथाई होगी। इनके पास, एक कमरे के ही सही, अब पक्के मकान हो गये हैं। घर में बिजली है। चांपाकल है। भाजपाई सरकार की अनुकम्पा से उन्हें कई सालों से राशन मिल जा रहा है। पर यह समृद्धि उनके पास सरकारी अनुकम्पा-अनुदान की बदौलत ही है। कोई उद्योग यहां लगा नहीं। माफिया-रंगदारी की पकड़ यहां ढीली पड़ी है, पर ब्लड-सकर्स के रूप में स्थानीय नेता, नौकरशाही, गांव का प्रधान और राशन का कोटेदार है ही। वे सब मिल कर अनुदान-अनुकम्पा में से पंद्रह बीस प्रतिशत गायब कर लेते हैं।
कुछ दिनों से मैं जुगेश के जरीये गांव की गरीबी की सोचता रहा हूं। उस बच्चे के लिये हमने चप्पल खरीदी। कल हम उसके लिये स्वेटर खरीदने गये। मेरी पत्नीजी ने तीन स्वेटर-जैकेट खरीदे। एक कम्बल भी। वे कुछ दिन पहले भी दस कम्बल खरीद कर बांट चुकी हैं। इसके लिये ज्यादातर मेरी बिटिया-दामाद अर्थदान करते हैं। उसके साथ हम भी अपना कण्ट्रीब्यूशन जोड़ते हैं। पर इस साल कुछ ज्यादा ही खर्च हो गया है धर्मादे खाते। हमारी सामर्थ्य से ज्यादा।
और यह धर्मादा मात्र हमें ही सुकून देता है। “कुछ न कुछ करने की हमारी ईगो” की तुष्टि हो जाती है। उन गरीब लोगों की आर्थिक दशा में कोई सार्थक प्रभाव नहीं पड़ता। सार्थक प्रभाव के चार-पांच घटक हैं। सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर और कानून व्यवस्था की ओर काम करती नजर आती है। कम्यूनिकेशन, इण्टरनेट, संचार बहुत बेहतर हुआ है। पर शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था लचर बनी हुई है। स्वास्थ्य व्यवस्था तो आसपास कहीं नजर आती ही नहीं (वह कभी दिखती भी है तो पोलियो की ड्रॉप पिलाने में)। पूरा देहात झोलाछाप डाक्टरों और सोखा-ओझाओं के हवाले है। स्कूलों के रंगरोगन के बावजूद पढ़ाई का सॉफ्टवेयर बेहतर नहीं हो पाया। सरकारी स्कूलों में मास्टर-मास्टरानियां अच्छी तनख्वाह के बावजूद पढ़ाने में यकीन ही नहीं करते। शायद एआई और इण्टरनेट का सार्थक प्रयोग इस दिशा में कर प्राइमरी शिक्षा सुधारी जा सकती है। मुझे अगर दाव लगाना हो तो मैं ‘चैटजीपीटी’ पर लगाऊंगा, इन स्कूल टीचर्स पर नहींं।
प्रशांत किशोर की बिहार के गांवों में पद यात्राओं के वीडियो मैं सुनता-देखता रहा हूं। उन यात्राओं में प्रशांत जी के संवादों से मुझे यह स्पष्ट हुआ है कि इस अंचल में सार्थक रोजगार टाटा बिड़ला अडानी अम्बानी की कम्पनियों से नहीं आयेगा। वह दशकों से बंद पड़ी चीनी और सीमेण्ट मिलों को चालू करने से भी नहीं आयेगा। वह आयेगा उद्यमों के लिये छोटी पूंजी की उपलब्धता से। मैं नेट पर आंकड़े छानता हूं और मुझे समझ आता है कि बैंक पूर्वांचल-बिहार में छोटी पूंजी के लिये लोन देने में उत्सुक नहीं हैं। और जो लोन बैंक देते भी हैं, उसका बड़ा हिस्सा यहां के ‘आस्ट्रेलिया’ के हिस्से चला जाता है।
मैं चैट जीपीटी को बुरुण्डी की प्रति व्यक्ति आय बताने को कहता हूं। उसका दन्न से उत्तर आता है। वह (परचेजिंग पावर पेरिटी के आधार पर) लगभग 50 हजार रुपया बनती है। बिहार की प्रतिव्यक्ति आय भी वैसी ही है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के आंकड़े आसानी से नहीं मिलते पर समग्र उत्तर प्रदेश के आंकड़ों में सम्पन्न पश्चिमी भाग को डिसकाउण्ट कर दिया जाये तो पूर्वांचल का भदोही, गाजीपुर, बलिया, आजमगढ़ आदि वैसा ही होगा जैसा बिहार। ये इलाके और बुरुण्डी-नाइजर एक समान हैं – अगर मात्र प्रति-व्यक्ति आय के आधार पर देखा जाये! इथियोपिया और सोमालिया कहीं बेहतर होंगे। और इथियोपिया/सोमालिया वे देश हैं, जिनको हम दुनियां की गरीबी के प्रतीक के रूप में देखते हैं! :-(
इस तरह बात करना खराब लग सकता है। मुझे भी लगता है; पर यही वस्तुस्थिति है। जुगेश का पिता अण्डे का ठेला लगाता है। उसका परिवार एक बीघा जमीन पर आधे की बंटाई के आधार पर खेती करता है। घर में शायद कुछ बकरियां और दो भैसें हैं। बकरियां रिकरिंग डिपॉजिट की तरह हैं। भैसों के दूध को वे बेंचते हैं और गोबर से उपले बना कर ईंधन का काम लेते हैं। भोजन के लिये कोटेदार पांच के अंगूठे पर चार किलो अनाज देता है। एक कमरे का घर आवास योजना से मिला है। बस यही उनका आर्थिक आधार है।
मेरी पत्नीजी ने जुगेश को बुलाया। पता चला कि आज वह स्कूल गया है। उसका भाई आ कर उसके लिये स्वेटर और एक कम्बल ले कर गया। वह देना हमारे लिये भावनात्मक सुकून है। पर यह हम अच्छी तरह जानते हैं कि हम कोई समाधान नहीं दे रहे।
सोशल मीडिया पर मैने पाया कि मेरी तरह कई अन्य लोग भी इस भावनात्मक सुकून की तलाश कर रहे हैं। सुरभि तिवारी जुगेश को चप्पल देना चाहती थीं। किरीट सोलंकी जी ने मुझे सीधे सन्देश में अपना सहयोग भेजने की पेशकश की। केप्टन अमरनाथ सिंह और अर्चना वर्मा जी ने मेरे जुगेश को चप्पल देने पर साधुवाद दिया। कई अन्य बंधु भी वैसा ही व्यक्त कर रहे हैं। मेरे ख्याल से वे सब समझते हैं कि यह सुकून की तलाश कोई पुख्ता समाधान नहीं है अति-गरीबी का। पर और किया भी क्या जा सकता है?
दोपहर स्कूल टाइम के बाद जुगेश आया। वह स्वेटर पहने था। आज उसका चेहरा निर्विकार नहीं था। उसके सफेद दांत दिख रहे थे। उसने मेरे पास आ कर ‘थैंक्यू’ बोला। मैने उसकी पीठ पर हाथ फेरा तो उसका चेहरा और प्रसन्न हो गया। उसने बताया कि स्वेटर उसके नाप का है। देखने से भी लगता था कि थोड़ा ढीला है तो एक दो साल बढ़ती उम्र में भी छोटा नहीं पड़ेगा। गर्म कपड़ा और चप्पल अगर उसे और उसके परिवार को इस बीच लग्जरी की बजाय जरूरत लगने लगें तो शायद परिवार इन चीजों की उपलब्धता को तरजीह देने लगे – मसलन पान मसाला जैसी फालतू चीजों की बजाय इनके लिये पैसे बचाये। या फिर भारत की सात फीसदी सालाना ग्रोथ का कुछ बढ़ा हिस्सा उन तक पंहुचने लगे। … मैं जानता हूं, और हम सब जानते हैं कि चप्पल और स्वेटर देना हमारे लिये भावनात्मक सुकून हो सकता है; समस्या का कोई समाधान नहीं।
वह जाते समय गेट के पास पंहुचा तो मैने देखा कि नये स्वेटर का टैग लटक रहा था। उसने काट कर अलग नहींं किया था। वह पहनते ही दौड़ कर मुझे दिखाने चला आया था। मेरे कहने पर उसने रुक कर वह टैग अलग किया। टैग के हटने से मेरे प्रति कृतज्ञता का उसपर बोझ शायद कुछ कम हो सके। एक बच्चे और एक बूढ़े के बीच शायद सहज मैत्री विकसित हो सके।
तुम ज्यादा ही सोचने और अपेक्षा करने लगते हो जीडी! इस प्रकरण को सुखद भाव से भूलो और आगे बढ़ो!