विस्थापित – न घर के न घाट के


अपने गांव के चमरऊट को मैं गरीब समझता था। पर इनकी दशा तो उनसे कहीं नीचे की है। उनके पास तो घर की जमीन है। सरकार से मिली बिजली, चांपाकल, सड़क और वोट बैंक की ठसक है। इन विस्थापितों के पास वह सब है? शायद नहीं।

पैदल जाते भरत पटेल


अस्सी पार का व्यक्ति, बारह किलोमीटर सामान्य चाल चलने का स्टेमिना और उम्रदराज होने पर भी अपने नाते रिश्तों से मेल मिलाप हेतु यात्रा करने का ज़ज्बा – अपने ननिहाल तक से रिश्ता जीवंत रखना – यह सामान्य बात नहीं है।

कस्टर्ड, कजिया और कोरोना


मैं सोचता था कहीं लोगों का जमावड़ा नहीं होगा। पर मैँ गलत निकला। एक जगह चालीस पचास की भीड़ थी। … सवेरे सवेरे कजिया (स्त्रियों/ग्रामीणों की रार) हो रही थी।

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