पैदल जाते भरत पटेल

अस्सी पार का व्यक्ति, बारह किलोमीटर सामान्य चाल चलने का स्टेमिना और उम्रदराज होने पर भी अपने नाते रिश्तों से मेल मिलाप हेतु यात्रा करने का ज़ज्बा – अपने ननिहाल तक से रिश्ता जीवंत रखना – यह सामान्य बात नहीं है।


नेशनल हाईवे 19। अब सर्विस लेन करीब अस्सी प्रतिशत बन गई है। सवेरे खाली भी मिलती है। साइकिल चलाने या रुक कर किसी से बात करने में वह हाईवे वाला जोखिम नहीं है।

मैं सवेरे अपने साइकिल व्यायाम अनुष्ठान का पालन कर रहा था। तभी वह व्यक्ति जाता दिखा। कमर थोड़ी झुकी हुई। पर चाल तेज। पैर में जूते और कपड़े भी साफ। एक थैला लपेट कर बांये हाथ में पकड़े था और दाएं में लाठी।

सवेरे सूरज की रोशनी में अच्छा चित्र लगा खींचने के लिए।

पैदल जाता व्यक्ति, लाठी लिए, झुकी कमर पर चाल तेज
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लालती और पिताजी

यही कुछ क्षण हैं जो याद रहेंगे. अन्यथा वे कितना रिकवर करेंगे, कहा नहीं जा सकता.


पिताजी को तेइस दिन हो गए अस्पताल में. संक्रमण और वृद्धावस्था में डिमेंशिया के कारण अशक्तता उन्हें भ्रमित और लगभग कोमा जैसी दशा में होने को बाध्य करती है. कभी कभी वे “होश” में आते हैं. अन्यथा, बकौल डाक्टर साहब, उनका Glasgow Coma Score 9 के आसपास है. सामन्य व्यक्ति का 15 होता है.

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