मुकेश पाठक का शहद का कॉम्बो पैक

मुकेश जी मधुमक्खी पालन में दो प्रकार से समस्याओं से जूझ रहे हैं। मधुमक्खी पालन अपने आप में चुनौती है। यह एक घुमंतू व्यवसाय है जिसमें स्थान परिवर्तन के कारण रखरखाव, लॉजिस्टिक्स और प्रबंधन की विकट समस्यायें हैं। इसके अलावा ब्राण्डेड शहद में मक्का-चावल शर्करा घोल का मिलाना दूसरी बड़ी समस्या है, जो मधुमक्खी पालन की प्रतिद्वंद्विता में सेंध लगाती है।


रामपुर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश निवासी मुकेश पाठक जी से लगभग दस साल से ट्विटर के माध्यम से परिचित हूं। उनसे बहुत समानतायें हैं। कल उनसे पहली बार बातचीत हुई तो उन्होने बताया कि उनसेे मेरी बिटिया ने उन्हें कहा था – अंकल, आपकी आवाज मेरे पिताजी सेे मिलती जुलती है।

पाठक जी मधुमक्खी पालन का व्यवसाय करते हैं। वे भाजपा की आई.टी. शाखा से सक्रिय रूप से जुड़े हैं। वे अपने को ट्विटर पर “मोदी युग का भाजपा सिपाही” कहते हैं और लिखते हैं कि उन्हे फख्र है कि प्रधानमंत्री जी ट्विटर पर उन्हे फॉलो करते हैं

मुकेश पाठक

मेरा फोन नम्बर और मेरा पता भी मेरी बिटिया के माध्यम से उन्हें मिला। बिटिया वाणी पाण्डेय ने अपनी संस्था साथ-फाउण्डेशन के लिये उन्हें सहायता और मार्गनिर्देशन हेतु सम्पर्क किया था। उसके बाद पाठक जी ने शहद का एक कॉम्बो पैक; जिसमें मल्टीफ्लोरा, अजवायन, जामुन और लीची के परागकणों द्वारा बनाये गये शहद के जार थे, कोरियर के माध्यम से मुझे भेजा। कोरियर वाला नालायक था। पाठक जी की इतने प्रेम से भेजी वस्तु अपने यहां तीन चार दिन लिये बैठा रहा और मुझे एसएमएस भेजा कि मैं उसके ऑफिस से आ कर ले जाऊं। कोई और पैकेट होता तो मैं हल्ला मचाता और उसे जा कर लेने से मना कर देता। पर पाठक जी का पैकेट था, तो उसके यहां जा कर छुड़ाया।

गांवदेहात में कोरियर सेवा वाले अभी कुशल सेवा के लिये प्रतिबद्ध नहीं हैं। अकुशल होने के साथ साथ कई तो भ्रष्ट भी हैं। पहले एक बंदा मुझसे घर ला कर सप्लाई देने के पैसे/रिश्वत मांग बैठा था। मैंने उसकी शिकायत अमेजन से की थी और तब अमेजन ने कोरियर ही बदल दिया था। ये सज्जन भी शिकायत करने लायक काम किये थे। पर पाठक जी का पैकेट मुझे मिला और शहद की चार बोतलें पा कर मैं शिकायत की बात भूल गया। 🙂

मधुमक्खी पालन कष्टसाध्य कार्य है। इनके छत्तों के बक्से ले कर स्थान स्थान पर घूमना पड़ता है। घूमने की प्रक्रिया के लिये रात भर का समय ही मिलता है।

उसके बाद मुकेश जी से मैसेज आदानप्रदान हुआ। फोन नम्बर लिया। ह्वाट्ससएप्प पर संदेश दिये लिये गये। फिर बातचीत हुई। दस साल से वर्चुअल जगत के परिचय के बावजूद भी बातचीत के असमंजस की बर्फ तोड़ने में कुछ समय लगा! इसमें शायद मेरा अंतर्मुखी होना ही जिम्मेदार है।

मधुमक्खी पालकों से मेरा पूर्व परिचय है। ब्लॉग पर ऐसे दो व्यक्तियोंं से बातचीत के आधार पर मैंने लिखा भी है:

  1. विकास चंद्र पाण्डेय, मधुमक्खी पालक
  2. मधुमक्खी का गड़रिया – शम्भू कुमार
मुकेश पाठक

पर उक्त दोनों की बजाय मुकेश पाठक जी का मधुमक्खी पालन एक अलग ही स्तर पर निकला। वे न केवल मधुमक्खी पालन और उसके व्यवसाय से गहरे से जुड़े हैं, वरन मधु की शुद्धता के बारे में जन जागरण में भी बड़ा योगदान कर रहे हैं। उनकी नेटवर्किंग की क्षमता और सोशल मीडिया पर सार्थक सक्रियता इसमें बहुत सहायक है। अपने व्यवसाय को चलाने में वे अत्यंत कुशल हैं – यह उनसे छोटी सी बातचीत से स्पष्ट हो गया।

“मधुमक्खी पालन कष्टसाध्य कार्य है। इनके छत्तों के बक्से ले कर स्थान स्थान पर घूमना पड़ता है। घूमने की प्रक्रिया के लिये रात भर का समय ही मिलता है। अगर स्थान परिवर्तन करना हो तो रात 8-9 बजे; जब बक्से सभी मधुमक्खियों के छत्ते में आने के बाद बंद किये जाते हैं; से सवेरे तक के समय में ही स्थान परिवर्तन सम्भव है। सवेरे इनको ऐसी जगह पर रख कर बक्से खोलने होते हैं, जहां तीन से पांच किमी परिधि में पर्याप्त फूल हों। इस प्रकार स्थान परिवर्तन बड़ी सूझबूझ से चुनने होते हैं। एक दो बार तो परेशानी हो गयी थी, जब बक्सों का वाहन ट्रेफिक जाम में फंस गया और अगले दिन समय से उन्हें पोजीशन कर खोलने में दिक्कत हुई। अगर मक्खियों को पराग न मिले तो उनके मरने की सम्भावना बन जाती है। ऐसी दशा में कई मधुमक्खी पालक चीनी पानी का घोल उन्हें फीड के रूप में देते हैं। हम वैसी प्रेक्टिस नहीं बनाना चाहते। जैसा शहद फूलों के पराग से मधुमक्खियां बनाती हैं, वैसा शहद हम लोगों को देते हैं और वह मशहूर ब्रांडों के शहद की अपेक्षा कैसा है, उसका निर्णय उपभोक्ता पर छोड़ते हैं।”

“मैं स्वयम भी इन टीमों में घूमा हूं। तरह तरह की अप्रत्याशित समस्याओं से जूझना पड़ा है। मधुमक्खियों ने काट भी खाया है।” – मुकेश पाठक

“मैने लगभग 150 बी-हाइव बक्सों वाली टीमें बना दी हैं। एक टीम में दो व्यक्ति होते हैं। उन्हे वैसे ही स्मार्टफोन ले दिये हैं, जैसे मेरे अपने पास हैं। उनमें ह्वाट्सएप्प के माध्यम से सम्पर्क बना रहता है। इन टीमों को मूवमेण्ट प्लान के रूप में फ्लोरल केलेण्डर बना दिये हैं। उसी आधार पर इनका स्थान परिवर्तन होता है।”

“ये टीमें उत्तराखण्ड, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार और झारखण्ड में जाती हैं। कभी कभी तो बेचैनी सी होती है जब यह अहसास होता है कि करीब ढाई हजार बी-हाईव बक्सों के रूप में दो-ढाई करोड़ की पूंजी खेतों-जंगलों में बिखरी हुई है! तब अपने नेटवर्क और डिस्टेण्ट मैनेजमेंट पर ही भरोसा करना होता है। मैं स्वयम भी इन टीमों में घूमा हूं। तरह तरह की अप्रत्याशित समस्याओं से जूझना पड़ा है। मधुमक्खियों ने काट भी खाया है।”

पाठक जी ने अपने ट्विटर प्रोफाइल पर एक ट्वीट पिन कर रखी है जो मधुमक्खी पालकों की एक बड़ी समस्या पर दृष्टि डालती है –

एफ.एस.एस.ए.आई. ने पिछले साल शुद्ध शहद में चावल और मक्के के सिरप को मिलाने को वैधानिक कर दिया है। आजकल यह खबरों में है कि यह सिरप चीन से आयात कर ब्राण्डेड कम्पनियाँ अपने शहद में मिलाती हैं। यह शहद एफएसएसएआई के मानक पर सही भले हो, अंतर्राष्ट्रीय मानक परीक्षणों में खरे नहीं उतर पाये। पर एफएसएसएआई की इस “छूट” के कारण मधुमक्खी पालकों के समक्ष संकट आया है। दूसरे; लोगों को ईम्यूनिटी बूस्टर शहद की बजाय चीनी का घोल मिल रहा है।

यह घोल चीन भर से नहीं आ रहा। उत्तराखण्ड में भी यह औद्योगिक स्तर पर बनाया जा रहा है। इस चावल-मक्का शर्करा घोल को 25 से 50 प्रतिशत तक शहद में मिलाने पर वह परीक्षणों में “पकड़ा” नहीं जा सकता –

मुकेश जी मधुमक्खी पालन में दो प्रकार से समस्याओं से जूझ रहे हैं। मधुमक्खी पालन अपने आप में चुनौती है। यह एक घुमंतू व्यवसाय है जिसमें स्थान परिवर्तन के कारण रखरखाव, लॉजिस्टिक्स और प्रबंधन की विकट समस्यायें हैं। इसके अलावा ब्राण्डेड शहद में मक्का-चावल शर्करा घोल का मिलाना दूसरी बड़ी समस्या है, जो मधुमक्खी पालन की प्रतिद्वंद्विता में सेंध लगाती है।

जैसा मुकेश जी की बातचीत से लगा, वे इन दोनो समस्याओं से बखूबी लोहा ले रहे हैं और बहुत सीमा तक अपनी उपलब्धि से संतुष्ट भी नजर आते हैं।

“बनारस आना होता है मेरा। शहद के फ्लोरल केलेण्डर में भी इस स्थान पर आना जाना होता है। अगली बार चक्कर लगा तो आपके यहां तक आऊंगा। आपने जिस तरह का वर्णन अपने गांवदेहात का किया है, उसके कारण जिज्ञासा भी है। लम्बे अर्से से आप से मिलने की इच्छा भी है।” – मुकेश जी ने कहा।

मुकेश पाठक जी का एक और चित्र। सभी चित्र उनके ट्विटर अकाउण्ट से लिये गये हैं।

मुकेश जी ने इस बार जो शहद मुझे भेजा, उसके पैसे नहीं लिये। “इस बार का शहद आप मेरी ओर से भेंट ही मानें। प्रयोग कर देखें कि आपको ब्राण्डेड शहद की अपेक्षा कैसा लगता है। कॉम्बो पैक में भेजने और उसकी मार्केटिंग का ध्येय भी यही है कि लोगों को यह पता चले कि मधुमक्खियां जो शहद बनाती हैं वह अलग अलग पराग कणों से अलग अलग प्रकार का बनता है। उसकी गंध भी अलग अलग होती है और स्वाद भी। वह अलग अलग सांद्रता का होता है। ब्राण्डेड शहद की तरह हमेशा एक सा नहीं होता।”

आगे मुकेश जी से ट्विटर के साथसाथ शहद भी एक और निमित्त बना जुड़ने का। मुकेश जी ने मुझे अपने बड़े भाई की तरह माना – “वे भी सन 1955 के आसपास के जन्मे हैं आप की तरह!”

मुकेश जी से आमने सामने की मुलाकात की साध बढ़ गयी है! 🙂


विकास चंद्र पाण्डेय, मधुमक्खी पालक

छत्तीस क्विण्टल शहद का उत्पाद। एक कच्ची गणना से मैं अनुमान लगा लेता हूं कि गांव के रहन सहन के हिसाब से यह सम्मानजनक मध्यवर्गीय व्यवसाय है। एक रुटीन नौकरी से कहीं अच्छा विकल्प। और भविष्य में वृद्धि की सम्भावनायें भी!


हफ्ता भर पहले नीरज पाण्डेय जी ने फेसबुक की निम्न माइक्रो-पोस्ट पर टिप्पणी की थी; कि यहां पास के गांव उमरहाँ में उनके मामा विकास चंद्र पाण्डेय जी मधुमक्खी पालन करते हैं और उनके पास से मुझे शुद्ध शहद प्राप्त हो सकता है।

उमरहाँ गांव मेरे गांव से तीन किलोमीटर दूर है।

आज मैं अपने बेटे ज्ञानेंद्र के साथ विकास जी गांव की ओर निकला। पूछने पर लगभग हर एक व्यक्ति ने उनके घर का पता बता दिया। पर वे घर पर नहीं मिले| उनके भतीजे आशीष ने बताया कि लसमड़ा गांव में स्कूल में उन्होने अपने बी-हाईव बॉक्स रखे हैं। वहीं गये हैं। हम लोग बताये स्थान पर पंहुचे। वहीं विकास जी से मुलाकात हुई।

विकास चंद्र पाण्डेय जी का मधुमक्खी के छत्तों के बक्से रखने का स्थल। चित्र पेनोरामा मोड में लिया गया है।

विकास जी लगभग पचास की उम्र के हैं। हाई स्कूल में पढ़ते थे, तब मधुमक्खी पालन के बारे में पढ़ा था। बीए पढ़ते समय एक सहपाठी के कहने पर कृषि विभाग के उनके पिता के सम्पर्क में आये और फिर मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण भी लिया। पर बीस साल तक उस ट्रेनिंग के आधार पर काम प्रारम्भ नहीं किया। पहले पौधों की नर्सरी का व्यवसाय करते थे। वह काम तो ठीक ठाक चलता था पर उसमें कुटुम्ब के अन्य सदस्यों की तुलना में उनकी प्रगति के कारण जमीन के प्रयोग को ले कर विग्रह हो गये। तब उन्होने यह तय किया कि व्यवसाय वैसा करेंगे जिसमें पुश्तैनी जमीन का प्रयोग ही न हो। उस समय उन्हें मधुमक्खी पालन का ध्यान आया। पिछले तीन साल से यह उद्द्यम कर रहे हैं।

विकास चंद्र पाण्डेय

बी-हाइव बक्सों की संख्या अभी 110-125 के आसपास है। यह बढ़ा कर 500 तक करने की सोच है विकास जी की। मधुमक्खी पालन में स्थान बदलते रहने की अनिवार्यता होती है। अभी तो वे घर से 20-25 किलोमीटर की परिधि में ही स्थान चुनते हैं। उसका ध्येय यह है कि दिन भर कार्यस्थल पर लगाने के बाद शाम को घर वापस लौट सकें।

“अच्छा? तब रात में उनकी रखवाली कौन करता होगा?”

“मधुमक्खियां स्वयम सक्षम हैं अपनी सुरक्षा करने को। मेरी तो गंध पहचानती हैं, चूंकि मैं हमेशा उनके साथ कार्यरत रहता हूं। किसी अपरिचित व्यक्ति को वे सहन नहीं करेंगी।”

विकास जी ने बी-हाइव बक्से को खोल कर दिखाया।

मुझे विकास चंद्र जी ने मधुमक्खी के बक्सों को खोल कर दिखाया। हर बक्से में 9 लकड़ी के फ्रेम लगी जालियों की प्लेटें हैं, जिनपर मधुमक्खियां छत्ते बनाती हैं। उनको एक जूट के बोरे और उसके ऊपर बक्से के ढक्कन से ढंका गया है। मधुमक्खियों के भय से मैं बहुत पास नहीं गया – विकास जी की गंध तो वे पहचानती हैं। मेरा लिहाज तो वे करेंगी नहीं! 😀


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धन्यवाद।


उन्होने बताया कि मधुमक्खियों का पालन करने वाले को स्थान बदलना होता है। मधुमक्खियां तीन से पांच किलोमीटर के दायरे में फूलों से पराग इकठ्ठा करती हैं। अभी सरसों फूलने लगेगी, तब उसका शहद बनेगा। मार्च-अप्रेल में बबूल का शहद मिलेगा। उसके स्थान भी उनके द्वारा चिन्हित हैं। उसके बाद जामुन का शहद बनायेंगी मधुमक्खियां। करंज के वन मिर्जापुर के दक्षिण (पड़री) और झारखण्ड में हैं। अगस्त के महीने में शहद मक्का के पराग से बनता है। इन जगहों को चुनना और वहां कोई निजी जमीन तलाशना एक महत्वपूर्ण काम है विकास चन्द्र जी का। “बेहतर है किसी निजी जगह को चुनना। ग्रामसभा या सरकारी जमीन पर तो शहद के सभी मालिक बन जाते हैं।”


ब्राण्डेड शहद वाले किस स्तर की मिलावट कर रहे हैं और उससे मधुमक्खी पालकों तथा उपभोक्ता के स्वास्थ्य का कितना नुक्सान हो रहा है! 😦

“अलग अलग फ़ूलों के पराग से बने शहद का स्वाद, रंग और गाढ़ापन (श्यानता) अलग अलग होती है। ब्रांडेड शहद की तरह नहीं कि हर बार उनकी बोतल एक जैसी होती है। अगले महीने आप सरसों का शहद ले कर देखियेगा। वह ज्यादा गाढ़ा दिखेगा और उसके स्वाद में भी अन्तर होगा।” विकास जी ने कहा कि एक चम्मच उनका और एक चम्मच किसी प्रसिद्ध ब्राण्ड का शहद खा कर देखें तो अंतर पता चलेगा।

अलग अलग फ़ूलों के पराग से बने शहद का स्वाद, रंग और गाढ़ापन (श्यानता) अलग अलग होती है। ब्रांडेड शहद की तरह नहीं कि हर बार उनकी बोतल एक जैसी होती है।

विकास जी ने बताया कि ये सामान्य भारतीय मधुमक्खियां नहीं हैं। ये एपिस मेलीफेरा (Apis mellifera) प्रजाति की हैं। विलायती नस्ल। नेट पर मैंने सर्च किया तो पाया कि इस प्रजाति की मधुमक्खियां साल भर में एक छत्ते में 60 किलो शहद तैयार करती हैं जब कि एपिस इण्डिका प्रजाति की सामान्यत: पायी जाने वाली मधुमक्खियां 19-20 किलो तक ही दे पाती हैं। वे 36क्विण्टल शहद उत्पादन कर पाते हैं। इसमें से पांच छ क्विण्टल तो लोकल तरीके से विक्रय हो जाता है। शेष आगरा जाता है। वहां इसे फिल्टर कर बड़ी कम्पनियों को बेचा जाता है या (अधिकांशत:) निर्यात हो जाता है।

छत्तीस क्विण्टल शहद का उत्पाद। एक कच्ची गणना से मैं अनुमान लगा लेता हूं कि गांव के रहन सहन के हिसाब से यह सम्मानजनक मध्यवर्गीय व्यवसाय है। एक रुटीन नौकरी से कहीं अच्छा विकल्प। और भविष्य में वृद्धि की सम्भावनायें भी!

मेरे बगल में ही एक सज्जन इस तरह का अनूठा काम कर रहे हैं और मुझे जानकारी नहीं थी! वह तो भला हो सोशल मीडिया का, जिसके माध्यम से गांव-घर की आसपास की व्यवसायिक गतिविधि मुझे पता चली।

उमरहा गांव में विकास चंद्र पाण्डेय का घर।

अनेकानेक प्रश्न पूछने के कारण विकास जी ने अपनी जिज्ञासा व्यक्त की। “आप भी मधुमक्खी पालन करना चाहते हैं क्या?”

मैंने अपनी दिनचर्या उन्हें स्पष्ट की। अपने आसपास को निहारना-देखना और हो रहे परिवर्तनों को समझना मेरा काम रह गया है। उसमें जो अच्छा लगता है, उसके बारे में ब्लॉग पर लिख देना; यही मेरी दिनचर्या है। मैंने ऐसे ही एक घुमंतू मधुमक्खी पालक के बारे में लिखी अपनी ब्लॉग पोस्ट भी उन्हें दिखाई। शहद उत्पादन जैसा कोई व्यवसाय प्रारम्भ करने की तो सोची ही नहीं मैंने। 🙂

उन्होने बताया कि मधुमक्खियों का पालन करने वाले को स्थान बदलना होता है। मधुमक्खियां 3-5किमी के दायरे में फूलों से पराग इकठ्ठा करती हैं। अभी सरसों फूलने लगेगी, तब उसका शहद बनेगा। मार्च-अप्रेल में बबूल का शहद मिलेगा।…

विकास जी मधुमक्खी पालन स्थल से अपने घर ले कर गये। वहां उनसे सवा किलो शहद की एक बोतल खरीदी। घर पर लोगों ने उसे चखा तो उत्कृष्ट पाया। … अब लगता है विकास पाण्डेय जी के शहद का ही घर में प्रयोग होगा और शायद शहद की खपत बढ़ भी जाये। हर महीने डाबर का शहद ऑनलाइन मंगाने की गतिविधि भी समाप्त हो जायेगी।

विकास जी के यहां हमने जल पिया। शहद खरीदा और आगे मिलते रहने की बात कह उनसे विदा ली।

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मधुमक्खी का गड़रिया – शम्भू कुमार

जैसे गड़रिये, गाड्डुलिये लोहार, बतख का रेवड़ ले कर चलने वाले हैं। वैसे ही ये मधुमक्खी का रेवड़ ले कर घूमते फिरते हैं। हजारों हैं इस रोजगार में।


हफ्ता भर हो गया गांव में डेरा जमाये। उमेश दूबे के खेत में उन्होने करीब डेढ़ सौ मधुमक्खी के बक्से बिछा रखे हैं। लगभग दो हफ्ते भर और रहेंगे यहां। फिर उनकी मधुमक्खी पालक कम्पनी का मालिक जहां के लिये कहेगा, वहां के लिये रवाना हो जायेंगे।

खाली पड़े खेत में बिछाये मधुमक्खी के बक्से

वे तीन लोग हैं। कम्पनी के कर्मचारी। उनमें से एक – शम्भू कुमार से बातचीत हुई। शम्भू बीस-पच्चीस साल का नौजवान होगा। बिहार के मुजफ्फरपुर का है। कम्पनी भी वहीं की है। उसने बताया कि मुजफ्फरपुर लीची के लिये तो प्रसिद्ध है ही, मधुमक्खी पालन के लिये भी हो गया है। हजारों लोग वहां इस काम में लगे हैं। सामान्यत: वे पांच-छ के समूह में चलते हैं। यहां अभी तीन लोग हैं।

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