#200शब्द – कैलाश दुबे

मुझे यह लगा कि यूंही, कैलश जी के पास जाया और बैठा जा सकता है। धर्म और अर्थ को सरलता के मधु में जिस कुशलता से उन्होने साधा है, वह अभूतपूर्व है।


वे इस गांव के सम्भवत: सज्जनतम व्यक्ति हैं। सवेरे उठ कर शौच-स्नान के बाद एक डेढ़ घण्टा ईश्वर पूजन में लगाते हैं। उनके पास धर्म ग्रंथ न केवल हैं, वरन उनका अध्ययन भी करते हैं। नियमित अध्ययन अनुशासन की स्निग्धता उनमें प्रचुर है। उनकी ही जमीन पर हनुमान जी का एक मंदिर है, जिसकी प्रतिमा जमीन में मिली थी। उन्होने प्रतिमा की पुनर्स्थापना की है और वार्षिक भण्डरा भी होता है वहां।

मैंने उन्हे गांव के पंच-प्रपंच में उलझते नहीं पाया। व्यवहार में सरल हैं। कभी किसी से अपशब्द बोलते नहीं देखा।

मेरी तरह उन्हे भी ऑस्टियोअर्थराइटिस है और वे भी पैदल की बजाय साइकिल से चलते हैं!

मैं यक्ष-प्रश्न के संदर्भ में महाभारत का अरण्यपर्व देखने उनके यहां गया था। पर जैसा सामान्यत: होता है; लोग महाभारत घर में रखते नहीं। उनके पास भागवत पुराण था, पर उसमें यक्ष संदर्भ नहीं मिला।

सवेरे सवेरे जितने प्रेम से उन्होने मुझे बिठाया और मनोयोग से भागवत के दोनो खण्ड खंगालने का कार्य किया, वह बहुत अच्छा लगा।

मुझे यह लगा कि यूंही, कैलश जी के पास जाया और बैठा जा सकता है। धर्म और अर्थ को सरलता के मधु में जिस कुशलता से उन्होने साधा है, वह अभूतपूर्व है।

kailash dubey
कैलाश दुबे जी, विक्रमपुर

पहले का ग्रामीण रहन सहन और प्रसन्नता

लोग सामान्यत: कहते हैं कि पहले गरीबी थी, पैसा कम था, मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी, पर लोग ज्यादा सुखी थे। आपस में मेलजोल ज्यादा था। हंसी-खुशी ज्यादा थी। ईर्ष्या द्वेष कम था।


गांवदेहात में घूमते हुये जब मुझे अपनी या उससे अधिक उम्र के लोग मिलते हैं तो उनसे बातचीत करने में मेरा एक प्रमुख विषय होता है कि उनके बचपन से अब में ग्रामीण रहन सहन में कितना और कैसा परिवर्तन हुआ है। अलग अलग लोग अलग अलग प्रतिक्रिया करते हैं। मुख्यत: दलित बस्ती के लोगों की प्रतिक्रिया होती है कि पहले से अब उनकी दशा में बहुत सुधार हुआ है।

अन्य वर्गों के लोग सामान्यत: कहते हैं कि पहले गरीबी थी, पैसा कम था, मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी, पर लोग ज्यादा सुखी थे। आपस में मेलजोल ज्यादा था। हंसी-खुशी ज्यादा थी। ईर्ष्या द्वेष कम था।

कल अगियाबीर में गुन्नीलाल पाण्डेय जी से मुलाकात हुई। उनके साथ रिटायर्ड प्रिंसिपल साहब – प्रेमनारायण पाण्डेय जी भी थे। दोनो सज्जन सत्तर के आरपार हैं। दोनो के पास पुराने और नये जमाने की तुलना करने के लिये पर्याप्त अनुभव-आयुध है।

प्रेम नारायण मिश्र (बायें) और गुन्नीलाल पाण्डेय

गुन्नी पांंड़े ने मेरे अनुरोध पर अपनी छत पर चढ़ी लौकी से तीन लौकियां मुझे दी थीं। जब बात पुराने नये रहन सहन की चली तो गुन्नी बोले – “हेया देखअ; पहिले अनाज मोट रहा। बेर्रा, जवा, बजरी, सांवा मुख्य अनाज थे। गेंहू तो किसी अतिथि के आने पर या किसी भोज में मिलता था। पर उस भोजन में ताकत थी। लोग पचा लेते थे और काम भी खूब करते थे।

“आजकल सब्जी भाजी रोज बनती है। तब यह यदा कदा मिलने वाली चीज थी। बाजार से सब्जी तो कभी आती नहीं थी। घर के आसपास जो मिल जाये, वही शाक मिलता था। और तब ही नहीं, युधिष्ठिर ने भी यक्ष-संवाद में कहा है कि पांचवे छठे दिन सब्जी बना करती थी।”

मेरे लिये यह एक नयी बात थी। मैंने पूछा – “अच्छा? युधिष्ठिर ने क्या कहा?”

यक्ष – युधिष्ठिर संवाद

गुन्नीलाल जी ने महाभारत का एक श्लोक सुनाया। उन्होने बताया कि अरण्य पर्व में यक्ष-युधिष्ठिर सम्वाद है। उसमें यक्ष का एक प्रश्न है –

यक्ष उवाच – को मोदते?

युधिष्ठिर उवाच – पंचमेSहनि षष्ठे वा, शाकम पचति स्वे गृहे। अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते॥

इसका हिंदी अनुवाद मैंने अंतरजाल से उतारा –

यक्ष प्रश्न : कौन व्यक्ति आनंदित या सुखी है?

युधिष्ठिर उत्तरः हे जलचर (जलाशय में निवास करने वाले यक्ष), जो व्यक्ति पांचवें-छठे दिन ही सही, अपने घर में शाक (सब्जी) पकाकर खाता है, जिस पर किसी का ऋण नहीं है और जिसे परदेस में नहीं रहना पड़ता है, वही मुदित-सुखी है।

गुन्नीलाल जी ने अपने शब्दों में स्पष्ट किया कि शाक-सब्जी रोज बनने की चीज नहीं थी; महाभारत काल में भी नहीं। सम्पन्नता आज के अर्थों में नहीं थी। पैसा नहीं था। लोग अपनी आवश्यकतायें भी कम रखते थे। इसलिये उनपर कर्जा भी नहीं हुआ करता था। गांगेय क्षेत्र में लोग बहुत यात्रा भी नहीं करते थे। परदेस में जाने रहने की न प्रथा थी, न आवश्यकता। इस प्रकार लोग आज की अपेक्षा अधिक आनंदित और सुखी थे।

राजबली विश्वकर्मा

लगभग ऐसी ही बात मुझे राजबली विश्वकर्मा ने भी बताई थी। उन्होने तो बारह किलोमीटर दूर अपनी किराना की दुकान खोली थी, जिसे उनके बाबा बंद करा कर उन्हें गांव वापस ले आये थे। उनके अनुसार भी खाने को मोटा अन्न ही मिलता था, जिसमें आज की बजाय ज्यादा ताकत थी। “आज अनाज उगने में पहले से आधा समय लेता है। इस लिये उसमें स्वाद भी नहीं होता और ताकत भी आधा ही होती है उसमें।”

राजबली के अनुसार भी उस समय लोग ज्यादा प्रसन्न रहा करते थे। “अब तो मोबाइल में ही लगे रहते हैं। दो घर आगे वाले से महीनों बीत जाते हैं, बात ही नहीं होती।”

अपने बचपन की याद कर राजबली बताते हैं कि उन्हें कोई कपड़ा छ साल की उम्र तक नहीं सिलाया गया। पुरानी धोती आधी फाड़ कर उसी की भगई बनाई जाती थी उनके लिये। वही पहने रहते थे। ऊपर बदन उघार ही रहता था। सर्दी में पुआल और एक लोई-दुशाला में दुबके रह कर गुजार देते थे।

ये साठ की उम्र पार सज्जन जो बताते हैं; उसके अनुसार पहले पैसा नहीं था, चीजें नहीं थीं। अभाव बहुत ही ज्यादा था; पर प्रसन्नता बहुत थी।

पता नहीं आज लोग इससे सहमत होंगे या नहीं होंगे; पर इन सीनियर सिटिजन लोगों ने जो बताया, वह तो यही है।