बचपन में गांव का इँदारा (कुआँ) जीवन का केन्द्र होता था. खुरखुन्दे (असली नाम मातादीन) कँहार जब पानी निकालता था तब गडारी पर नीचे-ऊपर आती-जाती रस्सी (लजुरी) संगीत पैदा करती थी. धारी दार नेकर भर पहने उसका गबरू शरीर अब भी मुझे याद है. पता नहीं उसने इँदारे से पानी निकालना कब बंद किया.
इँदारा अब इस्तेमाल नही होता.
गांव में पहले चाँपाकल (हैण्ड पम्प) आया. अब बम्बे (पाइप वाला नल) से पानी आता है. बारिश के मौसम में लोग ढेंकी भी नहीं चलाते – टुल्लू या डीजल से चलने वाला पम्प इस्तेमाल करते हैं. गाँव जाने का अब मन ही नहीं करता. जिस गाँव के साथ यादें जुडी़ हैं, वह गाँव तो है ही नहीं.
खुरखुन्दे अब बुढा़पे की दहलीज पर है. एक शादी के मौके पर मिला था. अब वह एक ठेली चलाता है. लोगों का सामान ढोता है. पालकी का चलन तो उसके बचपन में ही खतम हो गया था. उसके पिता पालकी ले चलते रहे होंगे. वह ठेली ले कर चलता है. यह काम तो पुश्तैनी सा है, पर पानी खींचना बन्द हो गया. इँदारा जो मर गया.
चीन की लडाई के समय से गाँव छूटा है. उस समय सात साल का रहा होऊंगा. इँदारे में पोटैशियम
परमैगनेट मिलाने पर लाल हुये पानी को लेकर हवा उडी़ थी कि चीनियों ने पानी में जहर मिला दिया है. चीनियों को जैसे हमारा गाँव ही टार्गेट लगा हो! पानी फिर भी इँदारे का ही पिया गया था. तब इँदारा जीवन का प्रतीक था. अब वह कोई प्रतीक नहीं है.
अब वह उपेक्षित है.
आज, अपने घर के पास मैने एक इँदारा देखा. दौड़ कर मोबाइल के कैमरे से उसके चित्र ले लिये. यह इँदारा भी
इस्तेमाल नहीं होता. इसकी गडारी गायब थी. चबूतरा सलामत था. इसके खम्भे पर इसके निर्माण हेतु दान दाताओं के नाम थे. खम्भे की लिखावट का फोन्ट बताता था कि काफी पुराना होगा. कमसे कम ५-६ दशक पुराना. कभी यह भी जीवन का केन्द्र रहा होगा. अब यह सडक पर जाती मोटर साइकलों, ठेलेवालों, इलाहाबाद में कमरा किराये पर लेकर पढने वाले जवान लड़कों, हैलोजन लैम्प की रोशनी, कचरा खलियाते सूअरों और नाई की दुकान का मूक दर्शक भर है. राह चलते लोगों से पूछें कि कोई कुआँ देखा क्या? तो अधिकांश कहेंगे – नहीं तो.
इँदारा पुरातत्व की चीज भी शायद नहीं है. उसमें कुछ लोगों की रुचि होती है. इँदारा बस उपेक्षित भर है.

ऐसे उपेक्षित इंदारा (इनार) खूब देखने को मिलते हैं… हमारे गाँव के स्टेशन से घर पहुचने में ही ४. हैण्ड पम्प के आने से ही ये सब रिप्लेस हो गए. एक तो हमारा भी उपेक्षित पड़ा है… ठीक ४० साल पहले का निर्मित.
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post ka title padhen main confusion ho gaya tha laga likha hai “indra (gandhi) kab upexit hui”aur laga ki koi rajnitik vishleshen karne wala lekh hoga :ppar meri niji rai hai ki purani cheezein jaati hain to hi nayi cheezein aati hain…..ek taraf to hum kehte hai ki vikas nahi ho raha aur ek taraf ye “nostalgia”.Ye sadev yaad hona chahiye ki:”kabhi kisi ko mukamill jahan nahi milta…”ya to vikas hi hoga ya purani cheezein hi bani raheingi…….wo to bharat main phir bhi vikas aur sanskar saath saath chal rahein hai (at least ab tak to)
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कुएँ को इँदारा कहते हैं? हमारे लिए नयी जानकारी है। हम सोच रहे हैं इंदिरा गाँधी का नाम क्या इँदारा से आया है तो क्या मतलब रहा होगा उनके नाम का, कुएँ वाली
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तीनों ही पोस्ट बहुत अछे लगे. इन्द्र कि बात आई तो हमें खेत के किनारे बने कुंवे दिखने लगे जिससे सिंचाई के लिए दो बैलों को एक ढलान में ले जाते थे. इसके कारण बड़े चमड़े की थैली में पानी भर कर ऊपर लाया जाता और खेतों की ओर पानी प्रवाहित होता. इस प्रक्रिका में पुनः उस थैले को कुँवें के अन्दर पहुँचाने के लिए बैलों को पीछे चलना पड़ता था. यह जरूर उनके लिए कष्ट दायक रहता रहा होगा.
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कुँआ हमारे घर पर भी था ,पहले पानी रस्सी से खिचता रहा बाद मे उसी मे हैंडपंप लगा दिया गया और एक दिन आया उसे पटवा दिया , आज नामोनिशान नहीं .सच मे कुँआ पूजन अब बाल्टी रख कर होने लगा है .
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अब हर जगह उपेक्षित ही है यह … अभी तक सुरक्षित है … यही बडी बात है।
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उपेक्षित इंदारा को दिखाने के लिये शुक्रिया!
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