समय, वर्ग, वर्ण और मैं


गांव में आने पर; उत्तर प्रदेश के सामन्ती अतीत की बदौलत; आसपास जातिगत विभाजन जबरदस्त दिखता है।

ताक्लामाकन का रेगिस्तान,अमेजन और पुस्तक


मैने करीब दो दशक पहले रीडर्स डाइजेस्ट में पुस्तक संक्षेप के रूप में ताक्लामाकन रेगिस्तान की पश्चिम से पूर्व का सबसे दुरुह यात्रा वृतान्त पढा था। मुझे यह भी याद नहीं रहा कि यात्री कौन था – कोई अंगरेज, और पुस्तक किसने लिखी थी। पुस्तक फर्स्ट-पर्सन में लिखी गयी थी; सो बहुत सम्भव है कि यात्रीContinue reading “ताक्लामाकन का रेगिस्तान,अमेजन और पुस्तक”

मानिक सेठ और कस्बे में कैशलेस


मानिक सेठ की महराजगंज, जिला भदोही में किराने की दुकान है। नोटबन्दी के बाद उनकी पहली दुकान थी, जहां मैने कैशलेस ट्रांजेक्शन का विकल्प पाया। पच्चीस नवम्बर की शाम थी। नोटबन्दी की हाय हाय का पीक समय। वे पेटीएम के जरीये पेमेण्ट लेने को तैयार थे। मैने अपने मोबाइल से पेमेण्ट करना चाहा पर इण्टरनेटContinue reading “मानिक सेठ और कस्बे में कैशलेस”

गांव का पता और ऑनलाइन जरूरतें


ऑनलाइन युग गांव के मेरे पते को उपयुक्त नहीं पाता। शायद इण्डिया, भारत को न पहचानने की जिद सी करता है। शुरुआत “आधार” से हुई। गांव में शिफ़्ट होने पर मैने अपना पता आधार की साइट पर जा कर बदलने का यत्न किया। अपना पिन कोड भरने पर उसने पते में गांव, पोस्ट, और तहसील लेने केContinue reading “गांव का पता और ऑनलाइन जरूरतें”

खुले में शौच


सन 1987 में मैने अपने बाबा का दाह संस्कार किया था। गांव में लगभग दो सप्ताह रहा उनके क्रिया-कर्म सम्पादित करने के लिये। दस दिन तक अछूत था मैं। अपना भोजन नहीं बनाता था। घर में एक बुआ जी बना देती थीं और भोजन की पत्तल मेरी तरफ़ सरका देती थीं। अगर रोटी अतिरिक्त देनीContinue reading “खुले में शौच”

अरहर के पौधे


उन्हे पौधे कहना एक अण्डर स्टेटमेण्ट होगा। आठ दस फुट के हो गये हैं, पेड़ जैसे हैं। फूल लगे हैं। यूं कहें कि फूलों से लदे हैं। करीब दो दर्जन होंगे। गांव के मेरे घर में अनाधिकार आये और साधिकार रह रहे हैं। पिछले सीजन में जो थोड़ी बहुत अरहर हुई थी खेत में; फसलContinue reading “अरहर के पौधे”