सतर्क रेल कर्मी, बसंत चाभीवाला

आठ किलोमीटर की पेट्रोलिंग करता है बसंत रोज। उसके कंधे पर जो औजार और फ्लैग पोस्ट होता है, उसका वजन आठ-दस किलो होता है। सवेरे सवेरे, भोर की वेला में सर्दी-गर्मी-बरसात झेलता उस वजन के साथ रेल पटरी-गिट्टी पर चलता है बसंत। निगाहें पटरी की दशा और चाभियों की कसावट पर रखनी होती है। … आजकल सेना के जवानों का प्रशस्ति गायन फैशन में हैं। पर बसंत चाभीवाले की नौकरी कौन कम साधुवाद की है?!


बसंत को मैंने कटका रेलवे स्टेशन के पास अपनी पोस्ट-रिटायरमेण्ट रिहायश बनाने के बाद सन 2016 के प्रारम्भ में पहली बार देखा था। सवेरे सवेरे वह कोहरे के मौसम में मफलर पहने चला जा रहा था अपने काम पर। इधर उधर ताकता-झांकता और ढीली पैण्डरोल क्लिप्स को अपने हथौड़े से कसता वह बढ़ रहा था। बहुत ही फोटोजीनिक दृष्य था वह। मैंने साइकिल खड़ी कर उसके कई चित्र, कई कोणों से लिये थे। उसका चित्र इतना पसंद आया था कि कई साल तक बसंत मेरे फेसबुक के कवर पर बना रहा। उसके मफलर पहने चित्र को देख कर बहुत सी टिप्पणियों में उसे अरविंद केजरीवाल कहा गया। यद्यपि बाद में लिये उसके चित्रों में वह मुझे नाना पाटेकर जैसा लगा! 😆

उस समय को बीते साढ़े चार साल हो गये। बीच में कई बार अपनी बीट में काम करता दिखा बसंत। हर बार मैंने एक दो चित्र लिये उसके। कालांतर में वह दिखना बंद हो गया। मैंने सोचा कि शायद कहीं तबादला हो गया हो उसका। पर हाल ही में वह पुन: दिखा। तेईस नम्बर रेल फाटक की गुमटी पर खड़ा था। बताया कि गेटमैन टॉयलेट में है। बाहर निकले तो उसके हस्ताक्षर अपनी डायरी में ले कर आगे बढ़े।

उसकी बीट कटका स्टेशन के पूरब में एक किलोमीटर पहले से प्रारम्भ हो कर पश्चिम में माधोसिंघ की ओर चार किलोमीटर जाती है। आठ किलोमीटर की पेट्रोलिंग करता है बसंत रोज। उसके कंधे पर जो औजार और फ्लैग पोस्ट होता है, उसका वजन आठ-दस किलो होता है। सवेरे सवेरे, भोर की वेला में सर्दी-गर्मी-बरसात झेलता उस वजन के साथ रेल पटरी-गिट्टी पर चलता है बसंत। निगाहें पटरी की दशा और चाभियों की कसावट पर रखनी होती है। … आजकल सेना के जवानों का प्रशस्ति गायन फैशन में हैं। पर बसंत चाभीवाले की नौकरी कौन कम साधुवाद की है?!

बसंत गेटमैन के इंतजार में रुका था और मैं बसंत से बात करने के लिये। उससे पूछने पर पता चला कि वह यहीं रहता रहा है सालों से। मुझे बीच में नहीं दिखा तो वह मात्र संयोग था। अकेला रहता है कटका स्टेशन पर बने क्वाटर में। रहने वाला रांची का है। मैने बात करने के लिहाज से उसे बताया कि मेरी बिटिया वहीं बोकारो में रहती है। उसने कहा – “बहुत अच्छा है झारखण्ड! यह तो यहां के लोग हैं जो जानते नहीं वहां के बारे में। कहते हैं कि पिछड़ा इलाका है, जंगल है। कभी इन लोगों ने देखा नहीं है।”

दो दिन बाद सवेरे छ बजे यूंही मुझे लगा कि साइकिल सैर के दौरान बसंत से मिला जाये। यह सोचा कि अपनी ड्यूटी पर वह निकलने वाला होगा। या शायद निकल गया हो। मैंने साइकिल कटका स्टेशन पर खड़ी की। स्टेशन मास्टर साहब से पूछा तो उन्होने बताया कि अभी वह स्टेशन पर तो नहीं आया। स्टेशन का सफाईवाला साथ में मुझे उसका घर दिखाने ले गया।

बसंत की कॉलोनी का रास्ता। एक बार लगा कि लौट चला जाये। कुछ उपेक्षित सा है यह इलाका।

क्वाटर पर लखंदर (सफाईवाला) ने आवाज लगाई पर बसंत का कोई उत्तर नहीं मिला। उसने अंदर जा कर बसंत को जगाया। बसंत का रेस्ट था और वह सो रहा था। थोड़ी देर में वह उनींदा सा बाहर आया। उसे यह अंदाज नहीं था कि कोई पुराना विभागाध्यक्ष उसे ढ़ूंढता उसके क्वार्टर पर आयेगा।

बसंत -थोड़ी देर में वह उनींदा सा बाहर आया।

जब आप किसी के बारे में लिखना चाहते हैं तो अपने रुतबे या ईगो को दरकिनार कर चलते हैं। मैं वही कर रहा था। वैसे भी रिटायरमेण्ट के बाद कर्मचारी और अधिकारी पासंग में होते हैं। कोई आपको इज्जत दे या लिहाज करे तो यह आपका सौभाग्य। अन्यथा, एक ब्लॉगर को उसकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिये।

मैंने बसंत का मोबाइल नम्बर लिया। उसपर घण्टी दी तो पता चला कि उसकी बैटरी डिस्चार्ज्ड है। एक की-मैन के लिये मोबाइल की अहमियत ऑफ ड्यूटी और रेस्ट पर होने के दौरान कुछ खास नहीं होती।

अगले दिन सवेरे उसके पेट्रोल ड्यूटी पर निकलते समय मैं कटका स्टेशन पर ही उससे मिला। वह वर्दी पहने अपने उपकरणों से लैस था। मैंने पूछा कि पटरियों की दशा कैसी है?

“ठीक ही है। पण्डराल (पैण्डरोल क्लिप – pandrol clips) कसने पड़ते हैं। वैसे पिछले दो तीन साल में दो बार मैंने टूटी पटरी देख गाड़ी रुकवाई है।” – बसंत ने जवाब दिया। उसने बताया कि वह म्यूचुअल ट्रांसफर की कोशिश कर रहा है रांची जाने के लिये। मुझसे अनुरोध किया कि मैं एडीईएन साहब को कह दूं कि उसका अप्रूवल दे दें। मैंने उसे अपने केस के कागज की प्रति ले कर घर पर अगले दिन मिलने को कहा। पर वह आया नहीं। शायद झिझक के कारण या शायद यह समझ कर कि कुछ करा पाना मेरे प्रभाव क्षेत्र में नहीं होगा। रिटायर्ड आदमी इस तरह के बहुत से “शायद” की कल्पना कर लेता है और उन्हे बुनता रहता है! 😆

वह रेल की पटरियां देखता आगे बढ़ने लगा। एक जगह तीन चार चाभियां कसीं। एक पैण्डरोल क्लिप छिटक कर गिरी हुई थी, उसे लगा कर हथौड़े से ठोंका। वहीं से मुझे बोला – यहां जर्क लगता है। पण्डराल बहुत ढीले होते हैं यहां।

एक कुशल चाभी वाला अपने ट्रेक के चप्पे चप्पे से परिचित होता है। कहां पैकिंग लूज है, कहां गिट्टी में मिट्टी ज्यादा है। कहां रेल में नुक्स है – विजुअल परीक्षण से उसे बहुत कुछ पता रहता है। बसंत वैसा ही रेल कर्मी लगा।

वह अपने पेट्रोलिंग में काम करता आगे बढ़ता गया। मैंने अपनी साइकिल संभाली गंगा किनारे जाने के लिये। यह सोचा था कि अगले दिन वह मुझसे मिलेगा तो उसके यहां अकेले रहने और झारखण्ड में उसके परिवार के बारे में पता करूंगा। पर वह आया नहीं। वैसे भी आगामी महीनों में उसका म्यूचुअल ट्रांसफर अगर हो गया तो वह चला ही जायेगा अपने देस।

इस सर्दी के मौसम में मैं रेलवे के कर्मियों से मिल कर उनके बारे में जानना/लिखना चाहता हूं। इससे मेरी पुरानी यादें भी उभर कर आयेंगी और रेल का सम्पर्क जो पिछले तीन साल से जो लगभग शून्य है; रिवाइव हो सकेगा। पर देखता हूं कि वह सब करने के लिये अपने अतीत के रुतबे के बहुत से मानसिक अवरोध साफ करने होंगे। किसी सामान्य ग्रामीण से मिलना, बोलना बतियाना और उसकी झोंपड़ी में उसकी खाट पर बैठना सरल है; रेल के किसी अमले से वैसी आत्मीयता सहज स्थापित करना कठिन है। बसंत के मामले में, बहुत प्रयास के बावजूद मैं आधा अधूरा ही सफल हो पाया।

पर यह सफलता भी बुरी नहीं! कोशिश करते रहो, जीडी!


श्री वी.के. पंजियार, मरेप्र, वाराणसी रेल मण्डल

लम्बे अर्से तक रेल से दूर रहा। पिछले तीन साल से मैंने कोई पास नहीं लिया, कोई रेल यात्रा नहीं की। पर पिछले सप्ताह वाराणसी के मण्डल रेल प्रबंधक श्री वी.के. पंजियार जी से मुलाकात हुई। मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे अगले छ महीने के दौरान (जब मौसम बाहर निकलने, मिलने जुलने के लिये मुफीद रहता है) मुझे 20-25 रेल कर्मियों से मिलने और उनपर ब्लॉग पोस्टें लिखने के लिये सामग्री एकत्र करने की सहायता करें। डीआरएम साहब ने उपयुक्त सहायता का आश्वासन दिया। आज एडीआरएम प्रवीण कुमार जी से भी सम्पर्क हुआ। अब लगता है रेल-कर्मियों पर नियमित ब्लॉग लिखना हो सकेगा। … रेल का सम्पर्क फिर जुड़ेगा। एक अलग प्रकार से!



काशीनाथ पाठक का मुरब्बा व्यवसाय – पुरानी पोस्ट

मेरे सामने ठोस और सफ़ल ग्रामीण उद्यमिता का उदाहरण उपस्थित था! इण्डिया अन-इन्कार्पोरेटेड! भारत की हजारों साल की रस्टिक उद्यमिता का प्रमाण। एक बेरोजगार व्यक्ति न केवल स्वयं की आजीविका कमा रहा है, वरन गांव की कई महिलाओं को रोजगार भी दे रहा है।



यह एक तीन साल पुरानी पोस्ट है। 27 मई 2017 को फेसबुक नोट्स के रूप में लिखी ।

आज काशीनाथ पाठक पुन: आये थे। आते ही रहते हैं; पर लॉकडाउन के समय नहीं आये या नहीं बुलाये गये।

काशीनाथ पूर्वांचल के ग्रामीण जीवन की सफल उद्यमिता के प्रमाण हैं। पूर्वांचल उत्तरप्रदेश का वह हिस्सा मान सकते हैं जहां शहर में कोई व्यवसाय करना कठिन है; गांव की कौन बिसात। पर काशीनाथ ने वह कर दिखाया है जो सबसे अनूठा है।

आज आने पर लॉकडाउन के दौरान चले अपने व्यवसाय के बारे में उन्होने बताया। उसका विवरण लिखने के लिये जरूरी है कि काशीनाथ का पुराना जुड़ाव आपको पता चले। इस लिये फेसबुक नोट्स से निकाल कर पुरानी पोस्ट पुन: प्रस्तुत है –


मई 27, 2017, विक्रमपुर, भदोही।

गुन्नीलाल पांडेय पानी पिलाने के साथ ऑफर करते हैं आंवले का लड्डू। या आंवले का मुरब्बा। बताते हैं कि एक सज्जन हैं कपसेटी के आगे के एक गांव से। वे अपनी मोटर साइकिल पर ले कर आते हैं ये उत्पाद।

काशीनाथ पाठक

उस दिन मैं अपनी पत्नीजी के साथ गुन्नीलाल जी के घर गया था शाम को तब ये सज्जन आये। नाम बताया – काशीनाथ पाठक। बताया कि एक शादी में जाना था पास के गांव में तो उस निमित्त आना था और साथ में अपने उत्पाद भी लेते आये। आंवले का लड्डू, मुरब्बा, करौंदे का मुरब्बा। इसके अलावा कई अन्य उत्पाद वे लाते हैं – आंवले का अचार, कैण्डी, बेल और आम के कई आईटम।

कहां से लाते हैं? प्रतापगढ़ से?

“नहीं। मेरे अपने घर में बनते हैं। घर और गांव की कई स्त्रियां इस काम में लगती हैं। … असल में पढ़ाई करने के बाद जब कोई आजीविका नहीं मिली तो मैने फूड प्रॉसेसिंग की ट्रेनिंग ली। उसके बाद अपने घर पर उत्पादन शुरू किया। दुकानदारों तक जब इस उत्पाद को पंहुचाया तो पता चला कि दुकानदार अपना बड़ा कमीशन मांगते हैं। मैने दुकानदारों का लिंक ही खत्म कर दिया। अपने ग्राहकों तक खुद ही उत्पाद पंहुचाता हूं। ग्राहकों को सस्ता मिलता है और मुझे उनसे सीधा संपर्क करने का मौका भी। मेहनत है, पर इस सब काम से मैं उतना कमा लेता हूं, जितना नौकरी कर कमाता।”

मेरे सामने ठोस और सफ़ल ग्रामीण उद्यमिता का उदाहरण उपस्थित था! इण्डिया अन-इन्कार्पोरेटेड! भारत की हजारों साल की रस्टिक उद्यमिता का प्रमाण। एक बेरोजगार व्यक्ति न केवल स्वयं की आजीविका कमा रहा है, वरन गांव की कई महिलाओं को रोजगार भी दे रहा है। कोई कार्पोरेट बैकिंग, कोई बैंक फिनांसिंग, कोई ब्राण्डिंग, कोई ऑर्गेनाइज्ड मार्केट सर्वे, कोई सम्पन्न कस्टमर बेस नहीं। पूर्वी उत्तर प्रदेश (बीमारू प्रान्त के बीमारुतम हिस्से) की उद्यमिता! जय हो!

आंवला कहां से लेते हैं?

“आंवला तो एक ठाकुर साहब के बगीचे से लेता हूं। कुल 35 पेड़ हैं उनके पास आंवला के। करौंदा, बेल आदि तो आसपास की जगहों से तलाशता-लेता हूं।”

“मुझे असली सफलता की खुशी किसी को अपना उत्पाद बेच कर नहीं होती। असली सफ़लता तब महसूस होती है, जब वे दूसरी बार मुझे बुलाते हैं मेरे उत्पादों को खरीदने के लिये।”

काशी नाथ पाठक का मोबाइल नम्बर मैने लिया। लगभग 500 रुपये का उनका उत्पाद खरीदा। खा कर देखा – वास्तव में उत्तम क्वालिटी का।

यह तय है कि काशीनाथ पाठक को मैं दूसरी बार आने के लिये कहने जा रहा हूं। और बहुत जल्दी। उनका आंवले का लड्डू और करौंदे का मुरब्बा लाजवाब है। पैकेजिंग बहुत साधारण है – कोई ब्राण्ड नहीं। पर उत्पाद की गुणवत्ता आपको बांधती है।


काशीनाथ पाठक 2017 साल से अब तक बराबर आते रहे हैं हमारे घर। उनके उत्पाद हमारे घर में और जान पहचान वालों में बहुत से लोगों द्वारा पसंद किये जाते हैं। लॉकडाउन के दौरान कैसे चला उनका व्यवसाय और क्या रहे उनके अनुभव, उसपर आज शाम को ब्लॉग पर लिखूंगा।


अपने ब्लॉग, मानसिक हलचल, पर सोच विचार

वैसे मैं ब्लॉग पर ट्रैफिक के आंकड़े देखता हूं तो पाता हूँ कि हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वर्णिम (?) काल की बजाय आज उसपर आने वालों की संख्या दैनिक आधार पर तिगुनी है. लोग टिप्पणियाँ नहीं (या बहुत कम) कर रहे हैं, पर पढ़ने वाले पहले से ज्यादा हैं.



मेरा हिन्दी का ब्लॉग मानसिक हलचल (halchal.blog) मुख्यतः भारत, अमेरिका, सिंगापुर और कुछ यूरोपीय देशों में पढ़ा जाता है.
हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वर्णिम दौर में मैं छोटे ब्लॉगिंग दायरे में प्रसन्न था. बाद में मेरे कुछ ब्लॉग मित्र पुस्तक ठेलने में लग गए. मुझे भी बहुत से मित्रों ने कहा कि वह करूँ. अनूप शुक्ल जी तो बहुत कहते रहे, अभी भी कहते हैं, पर वह मैं कर नहीं पाया.

मानसिक हलचल पर पाठक यातायात. आंकड़ा wordpress के App का स्क्रीनशॉट है. जितना गाढ़ा लाल रंग, उतने अधिक पाठक.

मैं भी सोचता था कि ब्लॉग की पुरानी पोस्टों में ही इतना कन्टेन्ट है कि एक दो पूरे आकार की पुस्तकें उसमें से मूर्त रूप ले सकती हैं. कई बार गंभीरता से सोचा भी. पर कुल मिला कर अपने को ब्लॉगर से पुस्तक लेखक के रुप में रूपांतरित नहीं कर पाया. शायद पुस्तक लिखने के बाद उसका प्रकाशक तलाशने और उसकी बिक्री की जद्दोजहद करने का मुझमें माद्दा नहीं था/है. या फिर यह शुद्ध आलस्य ही है.

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हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 4)

भारत के उज्वल भविष्य की हमारी आशायें किसी अनिश्चय या भय से कुन्द नहीं हुई थीं। हम यकीन करते थे कि आम आदमी की जिन्दगी आने वाले समय में बेहतर होने वाली है।


यह हेमेंद्र सक्सेना जी की इलाहाबाद के संस्मरण विषयक अतिथि ब्लॉग पोस्टों का चौथा और अंतिम भाग हैैै।

भाग 3 से आगे –

कॉफी हाउस नियमित जाने वाले लोग वेटरों को उनके नाम से जानते और सम्बोधित करते थे। वेटर बड़ी स्मार्ट वर्दी – झक साफ सफ़ेद पतलून, लम्बे कोट और माड़ी लगी पगड़ी – में रहते थे। हेड वेटर के कमर में लाल और सुनहरी पट्टी हुआ करती थी जबकि अन्य वेटर हरी पट्टी वाले होते थे।

वे अधिकतर केरळ और तमिलनाडु के होते थे और इसके कारण इलाहाबाद का कॉस्मोपॉलिटन चरित्र और पुख्ता होता था। अधिकांश व्यवसायी पारसी या गुजराती थे -जैसे पटेल, गुज्डर (Guzder) या गांधी।

दो चाइनीज स्टोर और एक बंगाली मिठाई की दुकान भी हुआ करती थी। देश विभाजन के बाद कुछ पंजाबी भी आये। मुझे अच्छी तरह याद है मिस्टर खन्ना की लॉ की पुस्तकों की दुकान। खन्ना जी अपने छात्र दिनों के गवर्नमेण्ट कॉलेज लाहौर की यादों की बातें किया करते थे।

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हेमेन्द्र सक्सेना, रिटायर्ड अंग्रेजी प्रोफेसर, उम्र 91, फेसबुक पर सक्रिय माइक्रोब्लॉगर : मुलाकात

हेमेन्द्र जी ने अपने संस्मरण टुकड़ा टुकड़ा लिखे हैं. उनके लगभग 14 पन्ने के हस्त लिखित दस्तावेज की फोटो कॉपी मेरे पास भी है. कभी बैठ कर उसका हिन्दी अनुवाद कर ब्लॉग पर प्रस्तुत करूंगा.


वे इलाहाबाद (प्रयागराज) विश्विद्यालय के अंग्रेजी के प्रोफेसर रह चुके हैं. फेसबुक में उनकी प्रोफाइल पर उनका जन्मदिन दर्ज है – 29 मार्च 1928. मैं गौरवान्वित होता हूँ कि वे मेरे फेसबुक मित्र हैं. पिछले दिनों में उनसे मिलने गया था मैं.

हेमेन्द्र सक्सेना जी, रमेश कुमार और गौरी सक्सेना. हेमेन्द्र जी के बैठक कक्ष में

हेमेन्द्र सक्सेना जी 91 वर्ष के होने के बावजूद भी शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत चुस्त दुरुस्त हैं. उनके घर हम लगभग दो घंटे रहे और बातचीत का सिलसिला हमने नहीं, उन्होने ही तय किया. पूरे दौरान वे ही वक्ता थे. हम श्रोता और वह भी मंत्र मुग्ध श्रोता.

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जोगी बाबा – सिद्धिनाथ मन्दिर का साधू और अनाथ गौवंश को पालनेवाला

पिछले दो साल से इस इलाके में साइकिल से घूम रहा हूं मैं, पर राजकुमारनाथ (जोगी बाबा) जैसा विलक्षण व्यक्ति नहीं पाया मैने।


नाम है राजकुमारनाथ योगी। लोग जोगी बाबा कहते हैं। कुछ वैसा ही जैसे मुख्य मन्त्री जी हैं आदित्यनाथ योगी।

आदित्यनाथ की तरह राजकुमार नाथ भी नाथपन्थी साधू है। सारंगी बजा कर भिक्षा मांगने वाला।

आदित्यनाथ की तरह यह साधू भी लगभग 45-46 साल का है।

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