गांव में बिजली समस्या का निदान – सोलर ऊर्जा की शरण से


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छत पर लगे 250वाट के आठ सोलर पैनल। पहले चार दो साल पहले लगवाये थे। बाकी अब के हैं।

गांव में शिफ़्ट होते ही मैने 2016 के प्रारम्भ में घर में 1 केवीए का सोलर पैनल लगवा लिया था। पर उसको लगाने के समय यह आकलन किया था कि उस सिस्टम से एक किलोवाट पावर आउटपुट बैटरी को मिलेगा और बैटरी लगभग उतना ही मुझे मेरे काम चलाने के लिये देगी। ऐसा हुआ नहीं। बाद में पता चला कि 250वाट के चार पैनल करीब 600वाट की शक्ति बैटरी को देते हैं। बैटरी लगभग 80% स्टोर की हुई ऊर्जा इनवर्टर के माध्यम से घरेलू उपकरणों को देती है। सो, पैनल लगाने के बाद भी हमारी ग्रामीण विद्युत सप्लाई पर निर्भरता बनी रही।

जब लगभग 10-12 घण्टे बिजली की सप्लाई आती थी, तब पैनल और सप्लाई दोनों को मिला कर सतत बिजली उपलब्धता की जरूरत पूरी कर देते थे। पर गांव में जर्जर सप्लाई नेटवर्क के कारण साल में 10-12 मौके आये जब कई दिनों तक बिजली नहीं आती थी।

एक बार तो बिना बिजली के पूरा हफ़्ता गुजर गया था।

कई दिनों बिजली न आने दशा में सोलर पैनल जरूरी पंखे और लाइट लगभग 18-20 घण्टे ही चला पाते थे। फ्रिज चालू करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। मुझे याद है कि एक बार हमें एण्टी-रेबीज इन्जेक्शन फ़्रीजर में रखने थे और फ़्रिज चालू न होने के कारण आईस बॉक्स का इन्तजाम करना पड़ा था। उसके लिये बर्फ़ का इन्तजाम करना भी एक कठिन काम था। सब्जियां और भोजन अधिक बन जाने और उसके स्टोर न कर पाने को ले कर परिवार में कई बार चिक चिक हुई।

हमारा यह गांव सांसद महोदय ने गोद लिया हुआ है। तथाकथित आदर्श गांव होने के बावजूद भी बिजली की सप्लाई अनियमित है। इसमें बिजली कर्मी भी बहुत कुछ नहीं कर पाते। उनके पास लाइनमैन स्तर के कर्मियों की बहुत किल्लत है और दशकों की रूरल नेटवर्क के प्रति उपेक्षा के कारण हल्के आंधी और बयार से भी सप्लाई अवरोधित हो जाती है। एक बार अवरोधित हुई तो ठीक होने में दिनों लग जाते हैं। प्रान्त में नई सरकार आने के बाद स्थिति कुछ बेहतर हुई, पर अब लगता है कर्मचारी शुरुआती दौर की कर्मठता से उबर चुके हैं। अब वे समझ गये हैं कि नई सरकार में भी कमोबेश उसी “आनन्दमय” दशा में स्थितप्रज्ञ रहा जा सकता है, जिसमें वे पहले जी रहे थे। आखिर कब तक वे कमर कस कर जियें?

अकेले मोदी (या योगी) कितनी तलवार भांजेंगे?! उन्हें कई शॉक ट्रीटमेण्ट करने चाहियें गांव के स्तर पर। बिजली की वायदे अनुसार उपलब्धता एक प्रमुख बिन्दु है।

सभी घटकों पर विचार कर, कुल मिला कर, मुझे बहुत आशा नजर नहीं आई कि अगली गरमी में पर्याप्त बिजली सप्लाई मिलेगी। अंत: मैने घर में एक ऐसा बिजली उपलब्धता का तन्त्र बनाने की सोची जिसमें अनवरत बिजली सप्लाई बाधित होने के दशा में घर के एलईडी के बल्ब, पंखे, वाईफाई, आरओ मशीन, मोबाइल चार्जिंग, लैपटॉप और फ़्रिज सुविधाजनक रूप से चल सकें। केवल गीजर, वाशिंग मशीन और पानी छत की टंकी पर चढ़ाने के लिये बिजली सप्लाई/जेनरेटर की जरूरत हो।

अन्य बड़े खर्चों पर वरीयता देकर हमने दो हफ्ते पहले 250 वाट के चार सोलर पैनल, सोलर पावर चेंजओवर यूनिट और दो बैटरियों का एक सेट और लगवा लिया। इसके लगवाने में दो साल पहले की बजाय कम खर्च हुआ। पैनल की कीमत करीब 25-30% घट गयी है।

इस प्रकार मेरे पास 1-1 किलोवाट के दो सिस्टम हो गये – एक दिन की जरूरतों के लिये और दूसरा रात के लिये। इस सिस्टम की हॉट लाइन चेकिंग भी हो गयी। कल लगभग 30-32 घण्टे तक बिजली की सप्लाई नहीं थी। उस दौरान सभी पंखे और अन्य उपकरण सुचारु रूप से चल गये सोलर सिस्टम पर।

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पहले (दायें) और अब के (बांये) बैटरी/इनवर्टर/पी.सी.यू. सेट। नये सिस्टम में 1कि.वाट के सोलर पैनल और जोड़ने की गुंजाईश है। 

अब लगता है इस साल गर्मी और बरसात के महीनों में बिजली सप्लाई को ले कर हाय हाय नहीं रहेगी। हां, गांव वाले अपने मोबाईल चार्ज करवाने आते रहेंगे। (वैसे गांव में इतनी सोलर लाइट बंट गई हैं कि उसमें जुगाड लगा कर लोग अपने मोबाइल चार्ज करने में दक्ष होते जा रहे हैं।)

देर सबेर सौर ऊर्जा ही शरण देगी गांव देहात को।


 

डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी गांव की सड़क


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डेढ़ी पर आती (शायद गंगा किनारे से) दो महिलायें। 

वह व्यक्ति नहीं है, गाय गोरू भी नहीं है। वह गांव की सड़क है। उसके एक ओर रेलवे लाइन है। अगर लाइन का अवरोध न होता तो वह नेशनल हाईवे-19 तक जाती। दूसरी ओर द्वारिकापुर गांव है जो गंगा नदी के तीर पर है। कुल मिला कर यह सड़क, डेढ़ी, रेलवे लाइन और गंगा नदी को जोड़ती है। कहा जाये तो रेलवे लाइन और गंगा नदी देश की धमनियां हैं। दो धमनियों को जोड़ने वाला मानव निर्मित शण्ट या बाईपास है डेढ़ी। इसके अलावा यह सड़क पूर्वांचल के दो जिलों – मिर्जापुर और भदोही की सीमा पर है। इसके पूर्वी ओर करहर है – जो मिर्जापुर जिले में है और पश्चिमी तरफ़ भगवानपुर है, भदोही जिले में।

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डेढ़ी पर गंगा-स्नान कर लौटते साइकिल सवार।

डेढ़ी कुल डेढ़ किलोमीटर लम्बी है। लम्बाई नापने के लिये मैने गूगल मैप का सहारा नहीं लिया। यह और इसके जैसी अन्य कई गंवई सड़कें जो प्रधानी के फ़ण्ड में बनती हैं, उनका गूगल मैप पर अस्तित्व नहीं है। इन्हे कैसे जोड़ा जा सकता है – मुझे नहीं मालूम। अन्यथा करीब एक दर्जन सड़कों को डिजिटल सभ्यता में खींच लाता मैं। इसकी लम्बाई मैने साइकिल के पैडल गिन कर की। गांव देहात में दूरी नापने के लिये मैं वही गिनता हूं। एक किलोमीटर में 204 पैडल के हिसाब से गिनती को दूरी में परिवर्तित करता हूं। यह बहुत खुरदरा तरीका है। मुझे साइकिल में एक स्पीडोमीटर लगवा लेना चाहिये, पर वह टलता जा रहा है।

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यह महिला सिर पर क्या लिये चली जा रही है परात में? यह आपके लिये भी कौतूहल है और मेरे लिये भी!

डेढ किलोमीटर की पतली सड़क – जिसके किनारे बहुत कम लोग रहते हैं; ज्यादा तक गंगा के डूब में आने वाला सिवान है; का भी अपना एक व्यक्तित्व हो सकता है? मुझे यह बेकार सी सड़क लगती थी। पर कुछ दिन इसपर साइकिल चलाई तो इससे मोह हो गया है। इनफ़ैचुयेशन। बुढापे का प्रेम।

अब यह मेरे लिये चुनौती है कि इस पर मैं एक दो दर्जन ब्लॉग पोस्टें लिख सकूं! ध्यान से देखता हूं तो लगता है डेढ़ किलोमीटर की इस सड़क के दोनो ओर बहुत कुछ है जो मुझे (और पढ़ने वालों को भी) रोचक लग सकता है। इसके किनारे के खेत, पेड़, घास-फूस, बस्ती और उसके बाशिन्दे, सड़क पर चलते लोग और वाहन … सब मिला कर एक रोचक केनवास है।

अपना जूम वाला ब्रिज पॉइण्ट-एण्ड-शूट कैमरे की धूल पोंछ लो और बैटरी री-चार्ज कर लो, जीडी। वह सब दर्ज करो चित्रों में जो डेढ़ी के साइकिल भ्रमण में आंखों से देखते और मन में सोचते हो। अपने विपन्न शब्द भण्डार को भी मांज लो। तुम अज्ञेय सा तो नहीं लिख सकते, पर जैसा तुम लिखते थे, वैसा तो लिख सको अपनी पोस्टों में!

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डेढ़ी के उत्तरी ओर सिवान खत्म होता है। कुछ वृक्ष हैं। यहां आधा दर्जन मोर दिखते हैं। चित्र में महिला अरहर की फसल काट कर गठ्ठर बनाती हुई।

  अगला महीना, दो महीना डेढ़ी के इर्दगिर्द रहेगा!