कुछ बच्चों के पुराने चित्र

साढ़े पांच साल हो गये। अचानक पुराने चित्र लैपटॉप की हार्ड डिस्क में नजर आ गये। धीरे चल रहा है तब का लिया लैपटॉप। उसे फेज आउट करने या री-फार्मेट कर एक बार फिर इस्तेमाल करने का उहापोह चल रहा है। उसी संदर्भ में टटोलते ये चित्र दिखे। आठ अगस्त 2015 की तारीख है जो उन चित्रों की ‘प्रॉपर्टीज’ खंगालने पर दिखी।

उस समय मैं अपने रिटायरमेण्ट की तैयारी कर रहा था। सात सप्ताह बाद रेल सेवा से निवृत्ति होनी थी। कटका रेलवे स्टेशन के पास घर बनवा रहा था। वहीं की ट्रिप पर था। रास्ते में कैथी (छोटी काशी; गोमती और गंगा के संगम के पास मारकण्डेय महादेव का स्थान) में यह भीख मांगता बालक दिखा था। देख कर लगता था मानो इथियोपिया या सोमालिया का दृश्य हो। बहुत उदास करने वाला सीन। मुझे याद नहीं आता कि मैंने उसे कुछ दिया था या नहीं।

कैथी (छोटी काशी; गोमती और गंगा के संगम के पास मारकण्डेय महादेव का स्थान) में यह भीख मांगता बालक

रिटायरमेण्ट के बाद में यहां गांवदेहात में रहते घूमते मैंने बहुत गरीबी देखी है और विपन्न बच्चे भी। पर इतना दारुण दृष्य नहीं देखा। यह बच्चा अपना चित्र खिंचवाने में झेंप रहा था। मैंने बहुत देर इंतजार किया कि वह अपना हाथ मुंह से हटाये। पर जब तक वहां रहा, वह मुंह ढ़ंके ही रहा।

उसी दिन गांव में, जहां मेरा घर बन रहा था; बहुत से बच्चे दिखे। खाकी रंग की स्कूल यूनीफार्म में। उस समय आधी छुट्टी हुई थी। उन्हें मिड डे मील मिला था। अपने अपने घर से लाये बर्तनों में भोजन ले कर मेरे साले साहब के परिसर में आ कर भोजन कर रहे थे। भोजन सादा ही था। चावल और दाल/सब्जी। मात्रा देख कर लगता था कि हर बच्चे का पेट तो भर ही जा रहा होगा।

एक चित्र में दो लड़कियां और एक लड़का है। यहींं गांव के बच्चे हैं। अब इस चित्र को खींचे छ साल होने को आये। ये बच्चे अगर पढ़ रहे होंगे तो अब प्राइमरी स्कूल में नहीं, मिडिल स्कूल में होंगे। चित्र नीचे है –

विकास, अंजलि और काजल – बांये से दायें।

इन बच्चों के बारे में पता किया। इनके नाम हैं – विकास, अंजलि और काजल।

विकास दलित बस्ती का बालक है। उसका पिता, देशराज महराजगंज से आसपास के गांवों में सगड़ी (ठेला) से सामान ढोता है। हाईवे के उस पार के स्कूल में एक दिन छोड़ एक दिन स्कूल लगता है। उसमें जाने लगा है। अन्यथा लॉकडाउन के दौरान, अन्य बच्चों की तरह वह भी यूं ही टहल ही रहा था।

अंजलि मेरे घर काम करने वाली कुसुम की बिटिया है। स्कूल में नाम लिखा है। पर स्कूल जाना उसे रुचता नहीं। घर का काम करती है। फसल कटाई में भी जाती है। इस मौसम में पचास किलो धान और पचास किलो गेंहू कमाया है उसने फसल कटाई में। पढ़ने में मन नहीं लगता पर अपना नाम ठीक से लिख लेती है। मेरी पत्नीजी ने उसे पढ़ाने की कोशिश की। डांट भी पड़ी तो रोने लगी और छोड़ छाड़ कर गयी तो उनके पास वापस नहीं आयी। उसने अपनी जिंदगी के स्वप्न और जीने का तौर तरीका तय कर लिया है। भविष्य में शादी होगी, घर बसायेगी और काम करेगी। जिंदगी चलती रहेगी!

तीसरी लड़की है काजल। उसने पढ़ाई छोड़ दी है। उसकी मां बाबूसराय जाती है कार्पेट सेण्टर में काती बनाने के काम के लिये। माँ काम करने जाती है तो काजल घर में रह कर अपने भाई बहनों की देखभाल करती है। घर का सारा काम करती है। उसकी जिंदगी भी तय हो गयी है।

कुल मिला कर लड़कियों की जिंदगी ढर्रे पर चल निकली है। वे घर संभालने लगी हैं। खेतों में कटाई के काम में जाने लगी हैं। कुछ टेम्पो में बैठ कर किरियात के कछार में आलू, मिर्च, मटर की सब्जी चुनने के काम में भी जाती हैं। उन्हें सौ रुपया रोज और कुछ सब्जी मिलती है। टेम्पो पर लदे गीत गाते जाते आते देखा है मैंने उनको।

लड़के अभी बगड्डा घूम रहे हैं, पर कुछ ही साल बाद मजदूरी, बेलदारी, मिस्त्रियाना काम में लग जायेंगे। उन सब के सपने सरल से हैं। जिंदगी सही सपाट है। कुल मिला कर उसमें गरीबी है, कष्ट है, पर सरलता और आनंद भी है। बड़े बड़े विद्वान ‘वर्तमान में जीना सीखो’ का फलसफा हमें सिखाने का भरसक प्रयास करते हैं। मोटे मोटे ग्रंथ लिखे हैं उसको ले कर। यहां ये बच्चे केवल और केवल वर्तमान में ही जीते हैं।

ये बच्चे केवल और केवल वर्तमान में ही जीते हैं।

गरीबी और अभाव वर्तमान में जीना सिखा ही देते हैं!

Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

4 thoughts on “कुछ बच्चों के पुराने चित्र

  1. महोदय, लिंक टूटा हुआ है।

    K.D.Sharma Ph : ——–

    On Wed, 24 Feb 2021, 11:01 am मानसिक हलचल : ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग, wrote:

    > Gyan Dutt Pandey posted: ” साढ़े पांच साल हो गये। अचानक पुराने चित्र लैपटॉप > की हार्ड डिस्क में नजर आ गये। धीरे चल रहा है तब का लिया लैपटॉप। उसे फेज आउट > करने या री-फार्मेट कर एक बार फिर इस्तेमाल करने का उहापोह चल रहा है। उसी > संदर्भ में टटोलते ये चित्र दिखे। आठ अगस्त 2015 की तारीख है” >

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    1. शर्मा जी, पोस्ट तो ठीक है। शायद आपके यहां इण्टरनेट की समस्या रही होगी। आपका मोबाइल नम्बर दर्शित हो रहा था, उसे मैंने आपकी प्राइवेसी के लिये टिप्पणी में एडिट कर दिया है।

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