विस्थापित – न घर के न घाट के


अपने गांव के चमरऊट को मैं गरीब समझता था। पर इनकी दशा तो उनसे कहीं नीचे की है। उनके पास तो घर की जमीन है। सरकार से मिली बिजली, चांपाकल, सड़क और वोट बैंक की ठसक है। इन विस्थापितों के पास वह सब है? शायद नहीं।

फाउण्टेन पेन का मोह


कभी भी शहर जाता हूं तो स्टेशनरी/किताब की दुकान पर जरूर जाता हूं। मेरी पत्नीजी को वह पसंद नहीं है। पर मुझे भी उनका टेर्राकोटा या नर्सरी पर पैसे खर्च करना पसंद नहीं है। लिहाजा हम दोनो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में जीते हैं।

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free