सवेरे के सपने 

धूमिल यादें

प्रोस्टेट की दवाई अब अपने हिसाब से काम करने लगी है। रात में दो-तीन बार उठना होता है, कभी-कभी चार बार भी। किताबों में और यूट्यूब वाले बताते हैं कि शाम छह बजे के बाद पानी न पिया जाए, तो बेहतर रहता है। पर वह सब किताबी बातें हैं।

रात तीन बजे नींद खुल गई। आधा-पौना घंटा इधर-उधर करने के बाद फिर नींद आई—पर सपनों वाली।

नींद में भी मैं जानता हूं कि मैं रिटायर हो गया हूं। पर बंगला रेलवे का है, फोन रेलवे का है, तामझाम रेलवे का है। मुझे बताया जाता है कि पूना के पास कोई रेल दुर्घटना हो गई है। कंट्रोलर अनुरोध-सा करता है—“सर, आप चले जाएं साइट पर।”

नींद में भी मैं जानता हूं कि अब वह मेरा काम नहीं है। पर एक चाहत बची है—एक्सीडेंट साइट की अनिश्चितता को मैनेज करने की चाहत। अनहोनी को हेड-ऑन झेलने या संभालने की चाहत।

जिंदगी भर वह अनहोनी, वह सरप्राइज एलिमेंट हमेशा रहा है। रेल परिचालन सामान्य भी चले, तब भी वह आकस्मिक घटनाओं से भरा रहता है। उसे झेलने-निपटाने के लिए हर तरह के कर्मचारी होते हैं। पर सबको शीर्ष पर बैठे एक अफसर की जरूरत होती है—एक खूंटी की, जिस पर सारी जिम्मेदारी टांग कर निश्चिंत हो काम किया जा सके।

वह खूंटी रहा हूं पूरी नौकरी भर। जूनियर पद पर था तो छोटी खूंटी था। शीर्ष पर आया तो खूंटी बड़ी हो गई। उस पर ढेर सारी जिम्मेदारियां लाद दी जाती थीं। वह खूंटी ज्यादा ऑर्नामेंटल थी, ज्यादा चमकदार—पर थी तो खूंटी ही।

रिटायरमेंट के बाद वह खूंटी नहीं रही। पर सपनों में, यदा-कदा, मैं खूंटी बन ही जाता हूं। आज भी बना।

मैंने कंट्रोलर से कहा—नींद में—“शुक्ला जी, अब तो नए अफसर को कहिए। मैं तो रिटायर हो गया हूं।”
पर शुक्ला का कहना था—“सर, आपके बिना गए काम नहीं चलेगा।”

मन में अभी भी कोई एषणा है जो ‘सेंस ऑफ इम्पॉर्टेंस’ तलाशती है। मुझे अच्छा लगता है शुक्ला जी का यह कहना। स्वप्न में मैं तैयार होता हूं एक्सीडेंट साइट पर जाने के लिए। एक फोन कर कंट्रोलर से पूछ भी लेता हूं—“मेरा कैरिज तैयार है? मेरे इंस्पेक्टर और चपरासी को बुला दिया है?”

और तभी साढ़े छह बज जाते हैं। पत्नीजी की आवाज आती है—“उठना नहीं है? सवेरे बदाम छीलना और चाय बनाना आपका काम है। आज करोगे या मैं करूं?”

अनमने भाव से मैं उठता हूं। योगेश्वर कृष्ण और मां गायत्री के चित्रों को प्रणाम करता हूं, धरती को हाथ लगाता हूं। नया दिन प्रारम्भ हो गया है—रिटायर्ड जिंदगी का एक और दिन…

— ज्ञानदत्त पाण्डेय
विक्रमपुर, भदोही
12 अप्रेल 2026 

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Published by Gyan Dutt Pandey

Exploring rural India with a curious lens and a calm heart. Once managed Indian Railways operations — now I study the rhythm of a village by the Ganges. Reverse-migrated to Vikrampur (Katka), Bhadohi, Uttar Pradesh. Writing at - gyandutt.com — reflections from a life “Beyond Seventy”. FB / Instagram / X : @gyandutt | FB Page : @gyanfb

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