चार महीने पहले तक हम अर्थव्यवस्था की मजबूती की खुशफहमी में थे कि होरमुज़ की जंग ने सपना तोड़ दिया। डॉलर के मुकाबले रुपया गिर रहा था पर उसे हम अपने निर्यात के लिये अच्छा मान रहे थे। लेकिन जंग के कारण जब कच्चा तेल सौ डॉलर पार हुआ तो अर्थशास्त्रियों की चोटी खड़ी हो गई।
होरमुज़ की जंग और डॉलर के मुकाबले रुपये की तेजी से गिरती कीमत ने अखबार अर्थशास्त्रियों के आकलन से भर डाले — चालू खाता घाटा, तेल आयात, ब्याज दरें, विदेशी पूंजी। मुझे लगा कि यह सब सही है। पर अर्थशास्त्रियों के लेख शायद कहानी पूरी नहीं कहते।
मुद्रा केवल आर्थिक दस्तावेज नहीं, सामाजिक विश्वास-पत्र भी है। दुनिया यह देखती है कि यह समाज कितना भरोसेमंद, अनुशासित और उत्पादक है। भारत के बारे में वह सब दांव पर है। कठिन समय आ गया है।
भारत को महान बनाना केवल GDP बढ़ाने का प्रश्न नहीं है। यह रुपये की ताकत का भी प्रश्न है। और रुपया केवल रिज़र्व बैंक की तिजोरी में नहीं रहता; वह समाज की आदतों, निर्णयों और सार्वजनिक व्यवहार में भी रहता है।
जब एक इंजीनियर पुल बनाते समय मानक तोड़ता है, जब एक बाबू फाइल टालता है, जब अदालत वर्षों तक निर्णय नहीं देती, जब सार्वजनिक संपत्ति को “सरकारी माल” मान कर छेड़ा जाता है, तब उसका असर केवल सुविधा पर नहीं पड़ता। धीरे-धीरे पूरी अर्थव्यवस्था की कार्यक्षमता घटती है। लागत बढ़ती है। समय नष्ट होता है। ऊर्जा निरर्थक घर्षण में खर्च होती है। इसकी ओर कितने लोगों का ध्यान जा रहा है?
एक आदमी का पान थूकना रुपये को नहीं गिराता। पर करोड़ों लोगों की यह मानसिकता कि “यह सार्वजनिक जगह मेरी जिम्मेदारी नहीं” — किसी भी राष्ट्र को भीतर से हल्का बनाती है। यह थेथरई राष्ट्रीय चरित्र बन गई है। जब भी कोई गहरा संकट आता है, यह थेथरई उभर आती है। दृश्य में सब कुछ दिखता है, पर लोग उसकी ओर गौर नहीं करते।

वहीं दूसरी ओर जापान जैसे देश केवल तकनीक से मजबूत नहीं बने; उन्होंने सार्वजनिक अनुशासन को निजी आदत बनाया। हम यह देखने की बजाय आंकड़े देखना चाहते हैं — वह कम कड़वा होता है।
भारत की समस्या यह नहीं कि लोग मेहनत नहीं करते। गांव का किसान, शहर का ड्राइवर, रेलवे का गैंगमैन, छोटा दुकानदार — सब कठिन परिश्रम करते हैं। काम करते हैं तभी घर की रसोई चलती है और सुविधायें आती हैं।
समस्या शायद दूसरी है: हममें से बहुत लोग व्यवस्था से मूल्य बनाने की बजाय उससे अधिकतम निकाल लेने की मानसिकता में फँसे हैं। व्यवसाय सेवा कम, “व्यवस्था से ज्यादा से ज्यादा तेल निकालना” अधिक बन जाता है।
सरकारें भी इस कमजोरी को कुछ हद तक ढँक सकती हैं। राज्य का पहला स्वभाव संकट को ढंकना होता है, आमूल बदलाव नहीं। राशन, सब्सिडी, मुफ्त बिजली, नकद सहायता — ये सब झटकों को जब्त करने के औज़ार हैं। धीरे-धीरे समाज राहत को अधिकार और किफायत को मूर्खता मानने लगता है। इसलिए आम आदमी को रुपये की डॉलर के मुकाबले कमजोरी देर से महसूस होती है।
लेकिन अर्थव्यवस्था के मूल रोग केवल राहत से नहीं जाते। यदि उत्पादकता, संस्थागत भरोसा और सार्वजनिक चरित्र कमजोर हों तो मुद्रा अंततः दबाव में आती है। जब संकट आता है, जब कोई ब्लैक–स्वान घटना होती है — जैसे खाड़ी की लड़ाई — तब पर्दा तेजी से उधड़ जाता है।
इन झटकों से इम्यून बनने के लिये देश को अंदर से मजबूत बनाना होगा। मेक-इंडिया-ग्रेट-अगेन।
भारत को “ग्रेट” बनाने का अर्थ शायद यह नहीं कि हर घर में एसी हो। वह तो कर्ज और आयात से भी आ सकता है। असली प्रश्न (जो मेरे दिमाग में उठते हैं) यह है कि:
क्या ट्रेन समय पर चलती है?
क्या अदालत तारीख पर तारीख की बजाय त्वरित निर्णय देती है?
क्या गांव–नगर साफ रहते हैं?
क्या अफसर निर्णय लेने का साहस रखते हैं या मात्र फाइलें सरकाते हैं?
क्या नागरिक सार्वजनिक चीज़ को अपनी चीज़ मान उसकी देखभाल करते हैं?
क्या नेता दिन के अंत में यह आकलन करता है कि जितना समाज उसे दे रहा है उसने उससे ज्यादा पे-बैक किया?
रुपये की ताकत अंततः इन्हीं तरह की अदृश्य आदतों पर टिकी हो सकती है।
हो सकता है भविष्य की सबसे बड़ी आर्थिक नीति किसी वित्त मंत्री के भाषण से नहीं, बल्कि नागरिक व्यवहार के छोटे बदलावों से निकले — कम बर्बादी, अधिक जिम्मेदारी, बेहतर काम, समय का सम्मान, और सार्वजनिक जीवन में थोड़ी अधिक ईमानदारी।
क्योंकि मुद्रा का मूल्य केवल विदेशी बाजार तय नहीं करते। समाज भी तय करता है कि उसकी अपनी मुद्रा कितनी सम्मानित होगी।
शायद अगली बड़ी लड़ाई डॉलर से पहले आदतों की होगी।
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