कालीन मजदूरों की वापसी – भदोही से लातेहार


जाते जाते देखा; उनमें से एक पोलियोग्रस्त पैर वाला भी था। बैसाखी लिये। बेचारे मजदूर। एक साइकिल पर दो लोग चलने वाले। कैरियर पर बैठ कर। हर एक के पास एक साइकिल भी नहीं थी। उन्हे देख मुझे सरकार पर क्रोध भी हुआ। पर उस क्रोध का क्या जो कोई समाधान न दे सके!

माणिक सेठ कहते हैं जिंदगी गोलों में बंध गयी है


“अब बस यही गोले हैं, और गोलों में खड़े ग्राहक। जिंदगी गोलों में बंध गयी है। पता नहीं कितने दिन चलेगा। शायद लम्बा ही चलेगा!” – माणिक कहते हैं।

लॉकडाउन 3.0 में #गांवदेहात का माहौल


अब बशीर बद्र की पंक्तियाँ, संशोधन कर, गांव के लिये भी लागू हो रही हैं – कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से। ये कोरोना काल का गांव है; ज़रा फ़ासले से मिला करो।

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