क्रिश्चियन हेगियोग्राफी के बारे में मुझे खास जानकारी नहीं, पर आज की पुस्तकों में हेगियोग्राफी (hagiography – प्रशंसात्मक बायोग्राफी) बहुत देखने को मिलती है। प्रायोजित बायोग्राफी अनेक हैं। सब कुछ अच्छा अच्छा जानने को मिलता है। ग्लॉसी पन्नों की कॉफी टेबल पुस्तकें जिनमें राजनेता या उद्योगपति लार्जर-देन-लाइफ नजर आता है; बहुतायत से दिखती हैं। धीरेContinue reading “जूतमपैजारीयता बनाम हेगियोग्राफी”
Category Archives: आत्मविकास
कहां गयी जीवन की प्रचुरता?
मेरे ही बचपन मेँ हवा शुद्ध थी। गंगा में बहुत पानी था – छोटे-मोटे जहाज चल सकते थे। गांव में खेत बारी तालाब में लोगों के घर अतिक्रमण नहीं कर रहे थे। बिसलरी की पानी की बोतल नहीं बिकती थी। डस्ट-एलर्जी से बचने को मास्क लगाने की तलब नहीं महसूस होती थी। बाल्टी भर आमContinue reading “कहां गयी जीवन की प्रचुरता?”
रट्टाफिकेशन
रट्टाफिकेशन या रोट लर्निंग (rote learning) का इस्तेमाल काफी किया है मैने। और शायद आज की कट-थ्रोट स्पर्धा के जमाने में, जहां एक दो नम्बर से वारे न्यारे हो जाते हैं, यह उत्तरोत्तर बढ़ता गया है। याद रखने के लिये मेमोरी स्ट्रिंग्स बनाने और नेमोनिक्स (mnemonics) का प्रयोग बहुत किया है। नॉलेज (knowledge) की स्पैलिंगContinue reading “रट्टाफिकेशन”
