गांव में आधा दर्जन लोग प्रधानी का चुनाव लड़ने का ताल ठोंक रहे हैं. पर इस क्राइसिस के अवसर पर उनकी आवाज सुनने में नहीं आती.
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लालती और पिताजी
यही कुछ क्षण हैं जो याद रहेंगे. अन्यथा वे कितना रिकवर करेंगे, कहा नहीं जा सकता.
कन्दमूल फल, चिलम और गांजा – 2012 की पोस्ट पर री विजिट
… लगता है कि (कम से कम ग्रामीण समाज में) गांजा को एक सीमा तक रिस्पेक्ट प्राप्त है, जो बीड़ी, खैनी या तंबाखू को नहीं…
