बिसखोपड़ा


शिवकुटी जैसी गँहरी (गँवई + शहरी) बस्ती में घुस आया तो वह बिसखोपड़ा था। नहीं तो सुसंस्कृत विषखोपड़ा होता या फिर अपने किसी अंग्रेजी या बायोलॉजिकल नाम से जाना जाता। मेरी पत्नीजी वाशिंग मशीन से कपड़े धो रही थीं तो परनाले की पाइप से एक पूंछ सा कुछ हिलता देखा उन्होने। सोचा कि सांप आContinue reading “बिसखोपड़ा”

बत्तीस साल पहले की याद।


मेरे इन्स्पेक्टर श्री एस पी सिंह मेरे साथ थे और दिल्ली में मेरे पास डेढ़ घण्टे का खाली समय था। उनके साथ मैं निर्माण भवन के आसपास टहलने निकल गया। रेल भवन के पास ट्रेफिक पुलीस वाले की अन-सिविल भाषा में सलाह मिली कि हम लोग सीधे न जा कर मौलाना आजाद मार्ग से जायें।Continue reading “बत्तीस साल पहले की याद।”

उठो; चलो भाई!


अनूप शुक्ला जब भी बतियाते हैं (आजकल कम ही बतियाते हैं, सुना है बड़े अफसर जो हो गये हैं) तो कहते हैं नरमदामाई के साइकल-वेगड़ बनना चाहते हैं। अमृतलाल वेगड़ जी ने नर्मदा की पैदल परिक्रमा कर तीन अनूठी पुस्तकें – सौन्दर्य की नदी नर्मदा, अमृतस्य नर्मदा और तीरे तीरे नर्मदा लिखी हैं। साइकल-वेगड़ जीContinue reading “उठो; चलो भाई!”

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