डोमिनगढ़


किसी स्थान के बारे में मैं अगर सोचूं कि अनूठे कोण से लिख सकता हूं, तो वह गंगा के कछार के अलावा सम्भव नहीं। वहां मेरे साथ कोई सरकारी अमला नहीं होता था। ज्यादातर मैं कुरता पायजामा में होता था। या फ़िर जींस का पैण्ट। वहां के केवट, सब्जी उगाने वाले, मछेरे, ऊंट वाले याContinue reading “डोमिनगढ़”

जात हई, कछार। जात हई गंगामाई!


जात हई, कछार। जात हई गंगामाई। जा रहा हूं कछार। जा रहा हूं गंगामाई! आज स्थानान्तरण पर जाने के पहले अन्तिम दिन था सवेरे गंगा किनारे जाने का। रात में निकलूंगा चौरी चौरा एक्स्प्रेस से गोरखपुर के लिये। अकेला ही सैर पर गया था – पत्नीजी घर के काम में व्यस्त थीं। कछार वैसे हीContinue reading “जात हई, कछार। जात हई गंगामाई!”

हिन्दू धर्म की फूहड़ श्रद्धा


नवरात्रि के बाद यहां इलाहाबाद में संगम पर मूर्ति विसर्जन में रोक थी। काफी असमंजस का माहौल था। अन्तत: शायद विसर्जन हुआ। हमारे धर्मावलम्बी मुसलमानों को दकियानूसी होने, कुराअन और हदीज़ का भाव वर्तमान समाज के परिप्रेक्ष्य में न लेने आदि के आक्षेप लगाने में नहीं चूकते। पर अपने धर्म में भी बदलते समय केContinue reading “हिन्दू धर्म की फूहड़ श्रद्धा”

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