अचानक सड़क के किनारे सामान बेचने वाले से बहुत स्तर ऊपर उठकर मुझे वह संत-दार्शनिक लगने लगे। एक प्रच्छन्न दार्शनिक (दार्शनिक इन डिस्गाइज!)। आज भी वह वहीं था – नारायण आश्रम के पेवमेण्ट पर बेल के फल लिये। उनके आकार के अनुसार दो ढेरियों में बांट रखा था फलों को। दो पोस्टों में जिक्र करContinue reading “प्रच्छन्न दार्शनिक”
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बकरी के बच्चे
बड़े प्यारे बकरी के बच्चे (मेमने) दिखे। यूं तो बकरी क्या, सूअर के बच्चे भी प्यारे लगते हैं। पर बकरी में एक निरीहता होती है जो हमें मन और आत्मा से ट्यून करती है। बचपन में कहानी सुनते थे – बकरी और उसके तीन बच्चों की। बकरी बच्चों को अपने घर में टटरी (खपच्ची काContinue reading “बकरी के बच्चे”
वोटानुभव
मेरा वोटर कार्ड घर में आलमारी में बन्द था और चाभी पत्नीजी ले कर बोकारो गई थीं। लिहाजा मैने (अपने आलस्य को तार्किक रूप देते हुये) तय किया कि वोट डालने नहीं जाना है। यह तेईस अप्रेल की बात है। पर शाम को सवा चार बजे अचानक मन बना वोट डालने का। मैं दफ्तर काContinue reading “वोटानुभव”
