ईंटवाँ के बऊ यादव


आज के चरित्र थे बऊ यादव। पास के गांव इंटवाँ के हैं। साथ में पांच छ डिब्बे, प्लास्टिक के बर्तन आदि ले कर आये थे।
गांव का आदमी बऊ! एक छोटी सी वार्ता में मुझे कई शब्द सिखा दिये – मरता, निछौंछे, अरररर!

कालीन की फिनिशिंग


उल्टी कालीन को सीधा कर एक व्यक्ति – अजय – ने मुझे दिखाया। उसने कहा कि उन्हें तो अपने काम की मजूरी मिलती है। मजूरी यानी रोजी रोटी का जरीया। बाकी, असल में कमाई तो मालिक या एक्स्पोर्टक की होती है।

रमाशंकर जी के घर, दक्षिणेश्वर काली मंदिर के समीप


रमाशंकर जी ने अपने घर में अलग से एक कमरा प्रेमसागर को दे दिया है। सभी सुविधा है। कल प्रेमसागर भीड़ द्वारा भगाये जा रहे थे, आज रमाशंकर जी ने सम्पूर्ण स्नेह उंडेल कर उनका स्वागत किया है!

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