संतोष सवेरे चार बजे उठते हैं। अपने घर के गाय गोरू की देखभाल करते और दुधारू पशुओं को दुहने के बाद अपने गांव के करीब 35-40 भैंसों-गायों को दुहते हैं।
[…] दुहने में लगी मेहनत से उनकी उंगलियों की बनावट ही बदल गयी है।
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श्री बहुला शक्तिपीठ, केतुग्राम
“अट्टहास” का शक्तिपीठ ज्यादा व्यवस्थित था और बड़े क्षेत्र में। वहां की जगह देख कर लगता था कि यह कोई अहम मंदिर है। इसके विपरीत श्री बहुला मंदिर सामान्य सा था। लगता नहीं था कि कोई बड़ा मंदिर है। वहां व्यवस्था भी सामान्य थी।
वाराणसी से जमानिया – विशुद्ध घुमक्कड़ी
प्रेमसागर की यात्रा बिना नोटबुक के और एक खराब मेमोरी के साथ हो रही है! मेरी झुंझलाहट पर वे सीधे प्रतिक्रिया नहीं करते पर कुछ देर बाद बोले – “अब भईया, निकल लिये हैं तो आगे महादेव जाने, माई जानें। वे ही कोई न कोई बेवस्था (व्यवस्था) करेंगे।”
