मुझे कोई इस तरह की घरेलू बात कहे, सुनाये – यह कुछ अटपटा लगा। और वह भी एक महिला? शायद बाढ़ की विभीषिका अपने घर के आगे देख कर व्यक्ति सन्न हो जाता है और एक अपरिचित से भी मुखर हो जाता है अपना दुख सुख बताने के लिये।
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“जिल्ला टाप” नचवैय्या रहे नगीना
बात करने के लिये मैंने उनसे पूछा – कुछ लहा (कुछ हाथ लगा?)
नगीना ने जवाब दिया – “अबहीं का? अबहीं तो आ के बैठे हैं। घण्टा डेढ़ घण्टा बैठेगे। तब पता चलेगा। कौनो पक्का थोड़े है। लहा लहा नाहीं त दुलहा!”
मटर और महुआ उबाल कर खाते रहे हैं अतीत में – सत्ती उवाच
पहले के खाने के बारे में बताती है। दो जून खाना तो बनता ही नहीं था। मटर की दाल के साथ महुआ उबालते थे। वही खाते थे। मौसम में 2-2 बोरा महुआ बीन कर इकठ्ठा किया जाता था। उसी से काम चलता था।
