ठिठकता मानसून


आज की बारिश के बाद सांप निकलेंगे। वैसे इतने सालों में यह तो पता चल गया है कि अधिकांशत: वे भले कोबरा जैसे दीखते हों पर हैं चूहे खाने वाले असाढ़िया सांप ही। फिर भी सावधान तो रहना ही होता है।

आज का आत्मबोध


वह तो भला हो कि ब्लॉग और सोशल मीडिया पर; आप कितना भी साधारण लिखें, लोग प्रशंसा कर देते हैं। थोड़ी बहुत ईगो मसाज हो जाता है। अन्यथा, गांवदेहात में, ससुराल में घर बना कर रहना वैसा ही है मानो बत्तीस दांतों के बीच फंसी निरीह जीभ होना।

मटकी पुर के अंजनी दुबे और चैटजीपीटी


ग्रामीण जीवन को – अगर लोग मेहनती हैं – एआई बेहतर ही बनायेगा। उनके काम को अपग्रेड करेगा और शहराती लोगों से कहीं बेहतर तरीके से वे जी सकेंगे। अंजनी कुमार का भविष्य बेहतर ही होगा।

Create your own website, free on WordPress.com.Create your own website.
Start free