प्रमोद शुक्ल और गड़ौली धाम की गायें


वे गौ पालन में किसी तरह के शॉर्ट-कट के पक्ष में नहीं नजर आये। “गांव वाला आदमी चारे में कॉम्प्रोमाइज कर दस रुपया बचाता है पर उससे वह 100 रुपया खो देता है। मैं वैसा काम कत्तई नहीं करूंगा।” – प्रमोद शुक्ल ने कहा।

रविवार के लोग


रविवार की यह क्रियायें हम लोगों के जीवन में उत्सव की तरह बनती जा रही हैं। साप्ताहिक उत्सव। इनके लिये शुरू में अहसास नहीं हुआ; पर अब धीरे धीरे कण्डीशनिंग हो गयी है। हम दम्पति को रविवार की प्रतीक्षा रहती है।

वे गांव में बसने आये नहीं; और सम्भावना भी नहीं है।


कोरोना काल में और उसके अलावा गांव में सड़क बिजली पानी और इण्टरनेट का अभाव जो था, वह कम हुआ होगा पर वाराणसी और प्रयागराज के शहरी विकास की तुलना में वह असमानता (Inequality) बढ़ी ही होगी।

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