वाराणसी से जमानिया – विशुद्ध घुमक्कड़ी


3 मार्च 23

सवेरे छ बजे के बाद का चित्र है वाराणसी केंट के आनंद लॉज का, जिसमें वहां से रवाना होते समय प्रेमसागर की लोगों के साथ एक सेल्फी है। सो माना जा सकता है कि सवेरे सवा छ बजे तक उन्होने अपनी यात्रा प्रारम्भ कर दी थी। उन्होने बताया कि राजवाड़ी में सुधीर पाण्डेय जी के घर (?) तक चलेंगे आज। वहां उनके रात्रि विश्राम की व्यवस्था है। एक जगह उन्होने सड़क खराब होने का जिक्र किया। सड़क रेलवे की जमीन पर है और रेलवे को फिक्र नहींं सड़क ठीक करने की। उत्तर प्रदेश प्रशासन या राष्ट्रीय सड़क विकास निगम उस सड़क के सुधार पर हाथ नहीं लगाता। यह दो अलग व्यवस्थाओं के बीच फंसा मामला है। सड़कों के विकास में यह झोल मेरे घर के पास भी है, जहां रेलवे कटका स्टेशन के पास छ सौ मीटर की सड़क बना ही नहीं रही।

आनंद लॉज से निकलने के पहले सवेरे छ बजे का चित्र

प्रेमसागर को सीधे रजवाड़ी की ओर निकलना था पर दस बजे उनका फोन आया कि लोगों ने उन्हे शॉर्टकट बता दिया है। उन्होने बलुआघाट पर पुल से गंगा पार कर ली है। लोगों का कहना है कि वे सीधे चलते चले जायें। उन्हें कर्मनासा नहीं पार करनी होगी और वे सीधे बक्सर पंहुच सकते हैं। “भईया जरा नक्शा में देख लीजिये हम ठीक जा रहे हैं या नहीं?”

रेल की पटरी के समांतर रेल की जमीन पर सड़क की दुर्दशा।

यह विचित्र लगा मुझे। गांव के लोगों के कहने पर वे अपना रास्ता बदल चुके हैं। उन्हें बेसिक भूगोल मालुम होना चाहिये कि बक्सर के पहले कर्मनासा गंगाजी में मिलती हैं। अब वे बिना गंगा एक बार फिर पार कर उत्तरी भाग में गये बक्सर कैसे पंहुच सकते हैं कि कर्मनासा नदी को लांघ कर उनके सारे पुण्य नाश न हो जायें? मेरे स्वर में झुंझलाहट स्पष्ट थी। उनको कहा कि लोगों से पूछें कि आगे किस स्थान पर वे गंगा पुन: पार कर सकते हैं। ग्रामीण ने किसी स्थान का नाम बताया जिसे उन्होने मुझे दोहराया – “भईया जिगिना पर पीपा पुल से पार करने की बात कह रहे हैं.”

जिगिना तो प्रयाग-विंध्याचल के बीच है। ग्रामीण कुछ और बोल रहा था, प्रेमसागर कुछ और रजिस्टर कर रहे थे। उन्होने फोन उस ग्रामीण को दे दिया। ग्रामीण नगवाँ के पॉण्टून पुल की बात कर रहे थे। नगवाँ और जिगिना में बहुत अंतर होता है. मेरी झुंझलाहट और बढ़ गयी। मैंने नक्शे में देख प्रेमसागर को सुझाव दिया कि वे सीधे जमानिया-दिलदार नगर की ओर चलते रहें। आगे कहीं कोई पीपा का पुल मिले तो उससे कर्मनासा के गंगाजी में मिलने के पहले गंगा पार कर लें। दो तीन बार यह कहा पर मुझे लगा कि प्रेमसागर उसे ठीक से सुन नहीं रहे हैं। मैं उन्हें कुछ सुझा रहा था, ग्रामीण कुछ और सुझा रहे थे।

बलुआघाट पर गंगा पार की प्रेमसागर ने

प्रेमसागर की इस भारत दर्शन यात्रा के बहुत झोल हैं। कई हैण्डीकैप। वे नक्शा देखने में दक्ष नहीं हो पाये हैं। कोई भी व्यक्ति शॉर्टकट की बात कहता है तो उनका मन मयूर हो उठता है। यह शायद नेचुरल भी है। लम्बी यात्रा पर निकला आदमी एक एक इंच बचाना चाहता है। पर उसके साथ उनका नक्शा देखना और आगे की यात्रा का नियोजन उनका बहुत कमजोर पक्ष है। वे लोगों और स्थानों के नाम भी स्पष्टता से रजिस्टर नहीं करते। एक सज्जन ने ट्विटर पर टिप्पणी की थी कि प्रेमसागर आपके चांद पर लैण्डरोवर जैसे हैं। पर वैसा बिल्कुल नहीं है। वे मनमौजी ढंग से यात्रा मार्ग बदल लेते हैं और आगे के बारे में मुझसे कहते हैं – भईया जरा देख लीजिये कि रास्ता ठीक जा रहे हैं न?

मैंने कई बार उन्हें दिलदारनगर-गहमर की ओर बढ़ने को कहा। तब तक मैंने नेट पर छान लिया था कि गहमर के बाद बारा में पिछले साल पीपा का पुल बना है गंगा नदी पर। बारा उस स्थान से दो किमी पहले है जहां कर्मनासा गंगा में जा कर मिलती हैं। बारा में पीपा पुल पार कर वे कर्मनासा लांघने से बच जायेंगे। यह दो तीन बार बोलने पर प्रेमसागर नोट करने के लिये साथ के ग्रामीण से कागज कलम मांगने लगे। “भईया, मेरे पास डायरी थी बैग में पर रास्ते में वह रखे रखे खराब हो गयी है।”

प्रेमसागर की यात्रा बिना नोटबुक के और एक खराब मेमोरी के साथ हो रही है! मेरी झुंझलाहट पर वे सीधे प्रतिक्रिया नहीं करते पर कुछ देर बाद बोले – “अब भईया, निकल लिये हैं तो आगे महादेव जाने, माई जानें। वे ही कोई न कोई बेवस्था (व्यवस्था) करेंगे।”

और सभी हैण्डीकैप हैं प्रेमसागर के – विपन्न, साधन हीन, यात्रा नियोजन पक्ष की कमजोरी और नोटबुक-कलम जैसी बेसिक चीज का भी न होना! पर उनका एक सशक्त पक्ष है – ईश्वरीय सत्ता में अटूट विश्वास, आस्था और श्रद्धा! यही विश्वास, आस्था और श्रद्धा का फल है कि वे भारत दर्शन कर ले रहे हैं और मेरे जैसा व्यक्ति की-बोर्ड के सामने केवल खीझ रहा है!

शाम चार बजे मैंने उनकी लोकेशन देखी। वे किसी धनपुर के पास थे। आसपास कई मंदिर दीख रहे थे नक्शे में, गंगा किनारे। लगभग एक किमी पर एक मंदिर। मैंने प्रेमसागर को सुझाव दिया कि अब सांझ होने को है। अब वे किसी मंदिर या किसी और जगह अपने रात्रि विश्राम की जगह तलाशना शुरू कर दें। बेहतर हो ऐसी जगह तलाशें जो वीरान न हो। अब आगे यात्रा जारी रख कर जमानिया या दिलदार नगर नहीं पंहुचा जा सकता।

जमानियां में साढ़े पांच सौ किराये का कमरा, रात्रि विश्राम के लिये।

पर प्रेमसागर ने अपने हिसाब से किया। उन्होने जमानिया से सात किमी पहले अपनी यात्रा को आज का विराम दिया। एक वाहन से जमानिया पंहुच कर कोई लॉज/गेस्ट हाउस तलाशा और साढ़े पांच सौ में रुकने के लिये कमरा लिया। “सवेरे पांच बजे वापस उस जगह पर जा कर वहां से पदयात्रा शुरू कर दूंगा।” – प्रेमसागर का कहना था। उन्हें कमरा तो मिल गया पर भोजन का प्रबंध नहीं हो पाया। अपनी पोटली में जो रखा था उसी को खा कर पानी पी दिन पूरा हुआ।

जब ज्योतिर्लिंग यात्रा प्रारम्भ की थी तो प्रेमसागर कहा करते थे – “भईया किसी मंदिर के ओसारे में जमीन पर या किसी पीपल के नीचे भी रुकने में कोई दिक्कत नहीं है मुझे।” पर अब लगता है कि मंदिरों और पीपल के पेड़ के नीचे घोर असुविधा का अभ्यास नहीं रहा उनका। अपेक्षायें बढ़ गयी हैं। लोगों के सहयोग ने अपेक्षायें बढ़ाने में पर्याप्त योगदान किया है। महादेव और माई उनकी इन अपेक्षाओं को उचित ही मानते होंगे, जो वे इंतजाम किये जा रहे हैं।

लेकिन, मैं सोचता हूं – महादेव और माई बहुत खेला करते हैं। बिना प्लानिंग के चलने की, बिना नोटबुक कलम के यात्रा करने की जो बेफिक्री प्रेमसागर में है; उसे झटका देने के लिये किसी भी दिन वे पीपल के पेड़ के नीचे यात्रा विश्राम को उतार सकते हैं उन्हें! :lol:

आगे कैसे और क्या होता है, देखना रोचक होगा। फिलहाल तो प्रेमसागर का कहना है – भईया एक बार बक्सर पंहुच जायें, फिर तो रास्ता भी जाना पहचाना है और लोग भी।

उनकी बक्सर की यात्रा अगले दो तीन दिन में होगी। इंतजार किया जाये। अभी तो, आप कृपया प्रेमसागर की साधन विपन्न घुमक्कड़ी के लिये उनके यूपीआई पते पर अंशदान करने की सोचें; महादेव और माता आपका भला करेंगे।

हर हर महादेव। ॐ मात्रे नम:।

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
प्रकाशित पोस्टों की सूची और लिंक के लिये पेज – शक्तिपीठ पदयात्रा देखें।
*****
प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
दिन – 103
कुल किलोमीटर – 3121
मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

वाराही, विशालाक्षी, विश्वनाथ और वाराणसी


2 मार्च 2023, वाराणसी –

मेरी पत्नीजी ने इंतजाम किया प्रेमसागर के वाराणसी ठहराव का। उनके भाई के आभा ट्रेवल्स के सामने है आनंद लॉज। आनंद लॉज में कमरा मिल गया। रात नौ बजे के आसपास पंहुचे होंगे प्रेमसागर लॉज में। मैंने पुस्तक में पढ़ा था कि वाराणसी में दो शक्तिपीठ हैं – मानमंदिर घाट पर वाराही माता और दुर्गाकुण्ड में विशालाक्षी देवी। ये दोनों और बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने थे प्रेमसागर को।

किसी ने उन्हें सूचना दी कि वाराही माता का मंदिर सवेरे तीन से पांच बजे ही खुलता है। सो प्रेमसागर लगता है सोये ही नहीं। दो बजे रात में उठ कर जब मंदिर पर पंहुचे तो पता चला कि मंदिर सवेरे साढ़े सात से साढ़े नौ बजे तक खुलता है। उनके पास समय था तो भोर में ही विश्वनाथ मंदिर में दर्शन कर लिये। वहां कोई भीड़ नहीं थी। उसके बाद आ कर वाराही माता जी के मंदिर के दर्शनार्थियों की लाइन में लग गये। लाइन में लगने वाले वे आठवें व्यक्ति थे। बाद में तो बहुत भीड़ लगने लगी।

वाराही माता के दर्शनार्थियों के चित्र भेजे हैं प्रेमसागर ने। वे जो लाइन में लगे प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके चेहरों से लगता है कि दक्षिण भारतीय अधिक हैं। शक्तिपीठ सही में राष्ट्रीय एकीकरण के बड़े कारक हैं। देश में जितने भक्त भगवान विष्णु या शिव के नहीं हैं, उनसे ज्यादा देवी के या हनुमान जी के हैं। व्यक्ति अपने को इनके ज्यादा करीब पाता है।

वाराही माता मंदिर (पंचसागर शक्तिपीठ) वह स्थान है जहां सती के नीचे के जबड़े गिरे थे। यहां के भैरव ‘महारुद्र’ हैं। वाराही माता का अर्थ है वे जिनका मुंह वाराह (जंगली सूअर) के जैसा है। यहां पूजा पद्यति अन्य शाक्तपीठों से कुछ अलग है। वाराही माता की पूजा यहाँ भगवान विष्णु के अधिक करीब लगती है बनिस्पत भगवान शिव के। पुराणों में भी वाराही देवी के मिथक भगवान विष्णु के अधिक करीब हैं। … हर एक शक्तिपीठ की अपनी अलग पहचान है और उस स्थान तथा उस जगह के लोगों के अनुसार पूजा पद्यति भी अलग है। … भगवान विष्णु का एक अवतार वाराह भी है।

वाराही माता के दर्शन के बाद प्रेमसागर ने वाराणसी के घाटों पर चहलकदमी की। उसके कई मनमोहक चित्र भेजे हैं। पर बनारस के घाटों के चित्रों से तो इण्टर्नेट भरा पड़ा है। उन्हें यहां प्रस्तुत करने की आवश्यकता अधिक नहीं है।

दोपहर तक प्रेमसागर विशालाक्षी मंदिर का दर्शन भी कर चुके थे। विशालाक्षी अर्थात बड़े नयनों वाली। तीन महादेवियों की परिकल्पना है नयन को ले कर शाक्त परम्परा में – मीनाक्षी, कमलाक्षी और विशालाक्षी। वाराणसी का विशालाक्षी मंदिर उन 18 महाशक्तिपीठों में से है जिनका उल्लेख आदिशंकर विरचित अष्टादश महाशक्तिपीठ स्तोत्र में है। यहां के भैरव कालभैरव हैं।

इस मंदिर के दर्शन के बाद इन अठारह महाशक्तिपीठों में से दो का दर्शन प्रेमसागर सम्पन्न कर चुके हैं।

प्रेमसागर ने अब तक सात देवी मंदिरों का दर्शन सम्पन्न कर लिया है। अभी वे नंगे पांव चल रहे थे, अब अपने लिये एक चप्पल खरीदी है। इसके बिना उनके पैर में एक जगह कांच भी गड़ चुका है।

शाम के समय प्रेमसागर ने आराम ही किया। अगले दिन उन्हें गाजीपुर-बक्सर के रास्ते गया के लिये निकलना है। वे सीधे रास्ते, बनारस के राजघाट पर गंगा नदी पार कर डेहरी और सासाराम के रास्ते गया की ओर नहीं चलेंगे। “भईया उस रास्ते में कर्मनासा पार करनी होती है, न?” – प्रेमसागर का कहना है। कर्मनासा हमारे मिथकों में अशुभ नदी हैं। सभी शुभाशुभ कर्मों का नाश करने वाली। उसे पार कर प्रेमसागर अपने पुण्य नहीं गंवाना चाहते।

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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प्रेमसागर के लिये यात्रा सहयोग करने हेतु उनका यूपीआई एड्रेस – prem12shiv@sbi
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शक्तिपीठ पदयात्रा

शक्तिपीठ पदयात्रा में प्रयाग-विंध्याचल-वाराणसी


26 फरवरी 2023 से 1 मार्च 2023

गुड्डू मिश्र जी के यहां रहे प्रेमसागर 25-26 फरवरी की रात में। गुड्डू मिश्र नैनी में रहते हैं। शाक्त हैं और कई शक्तिपीठों की यात्रा भी कर चुके हैं। मातृश्रद्धा से संतृप्त व्यक्ति। उनके यहां आराम से रहे प्रेमसागर।

छब्बीस फरवरी को दोपहर डेढ़ बजे मिश्र जी के यहां से प्रेमसागर आगे की यात्रा पर रवाना हुये। उस दिन ज्यादा चल नहीं पाये। नैनी से मेजारोड तक ही चलना हुआ। गर्मी बढ़ गयी है। दोपहर में और भी उष्णता थी। उसके अलावा शाम चार बजे के आसपास उनके पैर में एक कांच गड़ गया। कांच निकाल कर सरसों का तेल लगाया पैर में। आराम कर धीरे धीरे मेजारोड तक पंहुचे।

मेजारोड में किन्हीं हरिशंकर शुक्ल जी के यहां रात गुजारने के लिये आश्रय मिला उन्हें। हरिशंकर शुक्ल जी का घरेलू नाम गुरू शुक्ल है। वे गुड्डू मिश्र जी के सम्बंधी हैं और गुड्डू जी माध्यम से ही यहां रहने का इंतजाम हुआ। हरिशंकर जी के भाई कृपाशंकर डीआरएम ऑफिस, प्रयागराज में कार्यरत है। उनसे मेरी बात कराई प्रेमसागर ने। रेलवे के सम्बंध के अलावा कुछ विशेष बात करने को था नहीं मेरे पास। कृपाशंकर जी ने बड़े आदर से मुझसे बात की। हम लोग पहले मिले नहीं थे – यद्यपि मैं प्रयागराज में छ-सात साल पदस्थ रहा। पर कृपाशंकर कुछ लोगों को जानते हैं जो मेरे सम्पर्क में थे।

अगले दिन, सताईस फरवरी को, मेजारोड से जल्दी ही प्रस्थान हुआ प्रेमसागर का। साढ़े छ बजे। रात में सरसों का तेल गर्म कर तीन बार लगाने से पैर में कांच गड़ने का जख्म ठीक हो गया था। यात्रा में अभी प्रेमसागर ने जूते नहीं पहने हैं। “भईया पांच सात शक्तिपीठ दर्शन होने के बाद एक कपड़े का जूता खरीदूंगा। गर्मी बढ़ गयी है तो एक पाउडर का डिब्बा भी खरीदना है। पसीना हो जा रहा है और रगड़ खाने से जांघ में दर्द बढ़ रहा है।”

गर्मी जल्दी ही आ गयी है। समय से पहले ही प्रेमसागर को गर्मियों का इंतजाम करना होगा।

विंध्याचल पहाड़ के पहले जिगिना मार्केट में वे पानी पीने रुके। दुकानदार से पानी का बोतल लिया। दुकानदार ने पैसा कम लिया। आगे एक उत्तर प्रदेश पुलीस के सिपाही जी मिले। उन्होने भी आदर सत्कार किया। उनका फोटो लेना चाहते थे प्रेमसागर पर सिपाही जी ने मना किया – प्रशासन का आदेश है कि इस तरह फोटो नहीं खिंचाना है। लोग उसका मिसयूज कर सकते हैं।

अष्टभुजा की पहाड़ी के पहले एक पतली नदी है – शायद कर्णावती। बहुत सुंदर लगती है पहाड़ की तलहटी से लिपटी वह नदी। उसी नदी के पहले ही मिले थे वे पुलीस वाले सज्जन। नदी इतनी सुंदर लगती है कि वहीं रुक जाने का मन करता है। मुझे यह लगता था कि अगर प्रेमसागर में कुछ सौंदर्यबोध है तो वे उस नदी के चित्र जरूर लेंगे। और प्रेमसागर ने मुझे निराश नहीं किया। :-)

रात आठ बजे प्रेमसागर ने मुझसे बात की। वे अष्टभुजा माई का दर्शन कर चुके थे। वहां यह जान कर कि वे सभी शक्तिपीठों की पदयात्रा पर निकले हैं, मंदिर के लोगों ने उनका चुनरी उढ़ा कर सम्मान किया। गुड्डू मिश्र जी के सम्पर्क से भानू पण्डा जी मिले हैं यहां विंध्याचल में। उनका गेस्ट हाउस है। वहीं उनके रहने का इंतजाम है। भानू पण्डा जी ने उन्हें आगे काली खोह का और विंध्यवासिनी देवी का दर्शन कराया।

अष्टभुजा मंदिर के लोगों ने उन्हें शक्तिपीठ पदयात्री जान कर उनका चुनरी उढ़ा सम्मान किया।

इस पहाड़ पर मातृशक्ति के तीन रूप हैं; मुख्यत:। अष्टभुजा देवी का मिथक महाभारत कालीन है। कंस ने देवकी की सभी संतानों का जन्मते ही वध करने का निश्चय कर रखा था। पर देवकी-वसुदेव की पुत्री उसके हांथ से छिटक कर अंतर्ध्यान हो गयी और यहां अष्टभुजा के रूप में पहाड़ी पर स्थापित हुईं। इस पहाड़ी से दो किमी आगे है काली खोह। वहां माता काली का स्थान है। उसके आगे विंध्यवासिनी माता का स्थान है। अष्टभुजा अगर सृजन की देवी हैं – माता सरस्वती; तो कालीखोह संहारकारिणी शक्ति हैं और विंध्यवासिनी जगदम्बा हैं – पालन करने वाली। ये तीनों देवी स्थान उन शक्ति पीठों में से नहीं हैं जहां सती की देह का कोई अंग गिरा था। पर शाक्त सम्प्रदाय में इन स्थलों की महत्ता किसी भी शक्तिपीठ से कमतर नहीं आंकी जाती।

बड़ी संख्या में श्रद्धालु इन स्थलों पर लगभग नियमित आते हैं। नवरात्रि पर्व में तो यहां भीड़ अभूतपूर्व होती है। कोरोना काल में जब आवागमन पर रोक थी, तब कम आये होंगे लोग पर इस साल तो संख्या बहुत बढ़ने की सम्भावना है। इस क्षेत्र का पुन: निर्माण और सौंदर्यीकरण उसी तर्ज पर हो रहा है जैसे काशी विश्वनाथ धाम का हुआ है। उस कार्य से पर्यटन व्यवसाय से जुड़े लोगों को असुविधा भले हो, भविष्य में धार्मिक पर्यटन और सुगम होगा। लोगों के आने में कई गुणा वृद्धि होगी।

सताईस फरवरी की देर रात तक प्रेमसागर ने इन तीनों देवी-स्थानों का दर्शन कर लिया था। रात में भानू पण्डाजी के गेस्ट हाउस में विश्राम करने के बाद अट्ठाईस फरवरी को, सवेरे एक बार फिर उन्होने विंध्यवासिनी धाम का दर्शन किया। उसके बाद वे आगे बढ़े।

विंन्ध्याचल/मिर्जापुर के बाद शास्त्री पुल से गंगाजी पार कर प्रेमसागर को मेरे घर आना था। उनको मैंने अपने घर का लोकेशन भेज दिया था। प्रेमसागर पहले भी मेरे घर आ चुके हैं। इसलिये आने में विशेष दिक्कत नहीं हुई।

अठाईस फरवरी की दोपहर के भोजन के समय प्रेमसागर, थोड़ा देर से ही सही, मेरे घर पर थे।


अट्ठाईस फरवरी की दोपहर से एक मार्च की सुबह 9 बजे तक प्रेमसागर मेरे घर पर थे। उनका वजन पहले से कम हुआ है। शरीर पर अतिरिक्त मांस नजर नहीं आता। स्वस्थ्य और फुर्तीले लगे प्रेमसागर। आगे की लम्बी यात्रा के लिये तैयार लगता है उनका शरीर। मेरे पूछने पर बताया कि पिछली द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा करने से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। एक बहुत लम्बी पदयात्रा की समस्याओं, महत्व और लाभ का अंदाज उन्हें बखूबी हो गया है।

प्रेमसागर ने अपने अनुभव मुझे बताये। उनके नेटवर्क, सहायता करने वाले लोग और उनकी अपनी भौगोलिक जानकारी में बहुत विस्तार हुआ है। फोटो खींचने और उसकी बेसिक एडिटिंग वे बखूबी समझ गये हैं। पारम्परिक चिकित्सा के टिप्स अब वे खूब देने लगे हैं। जो लोग उनके पास अपनी समस्याओं के निदान की आशा से आते होंगे (और भारतीय मानस वैसा ही है, अमूमन) उन्हें ये टिप्स बहुत भाते होंगे। उन्होने मुझे महुआ का तेल दिया मेरे जोड़ों के दर्द के लिये। सवेरे घर के पास घूमते हुये मदार की टहनी भी तोड़ लाये। कहा – भईया इसकी पत्तियां रात में तवे पर गरम कर घुटनों में बांध लिया करें। जल्दी आराम मिलने लगेगा।

अपनी उत्तराखण्ड की यात्राओं में वहां की देसी गायों का घी लिया था। एक शीशी घी मुझे भी दिया। “वे गायें भईया जंगल में चरती हैं। घास के साथ जो जंगली बूटियां वे खाती हैं, उससे बनने वाला घी बहुत गुणकारी होता है।” – प्रेमसागर ने मुझे बताया।

प्रेमसागर का बैग मैंने उठा कर देखा – चार किलो से कम ही वजन होगा। वे वास्तव में कम से कम ले कर चलने लगे हैं – ट्रेवल लाइट नारे का प्रयोग करने वाले। पीछे कांधे पर लेने वाला यह पिट्ठू बैग और एक दहिमन की लकड़ी की डण्डी – यही उनका सामान है। कपड़े न्यूनतम हैं। अपनी पोटली में उन्होने सोठउरा, तिल, गुड़ और गोंद का लड्डू और कुछ सूखे मेवे रखे थे। वह मुझे दिखाये भी और चखाये भी। कभी मुझे अगर यात्रा का कीड़ा काटेगा (कम ही सम्भावना है) तो मैं इस तरह की चीजों को लेकर चलूंगा।

प्रेमसागर के कमरे में बिजली के प्वाइण्ट का तार इनवर्टर से जुड़ा नहीं था। उन्होने पेंचकस मांगा और खुद ही उसे इनवर्टर से जोड़ लिया। बिजली की ट्रबलशूटिंग में महारत दिखा दी उन्होने। मैं तो अपनी बिजली के इंजीनियर की डिग्री होने के बावजूद वह करने के लिये इलेक्ट्रीशियन का इंतजार करता रहा कई महीने से। गांव देहात में कारीगर मिलते भी मुश्किल से हैं।

एक मार्च को सवेरे हमने प्रेमसागर को नाश्ता कराया और मेरी पत्नीजी ने रास्ते के लिये उन्हें परांठा-सब्जी का टिफन बांध कर दिया। कुछ उसी तरह जैसे घर के आदमी को रास्ते के खाने के लिये दिया जाता है। प्रेमसागर की पानी की बोतल टूट गयी थी तो पत्नीजी ने उन्हें अपनी स्टील की बोतल में पानी दिया। हम प्रेमसागर पर खीझ भी उतारते हैं, व्यंग भी करते हैं; पर उन सरल जीव पर मोह-ममता भी बहुत है। फिर, विदा होते समय यह तो लग ही रहा था कि अकेला, बिना साधन के यह व्यक्ति कितने बड़े मिशन पर निकल लिया है।

सवेरे नौ बजे हमारे वाहन चालक वाहन से उन्हें हाईवे पर छोड़ कर आये। वहां से उन्होने बनारस की पदयात्रा प्रारम्भ की।

शाम सात बजे वे बनारस में थे। उनके रहने, रात गुजारने का इंतजाम नहीं हो पाया था। मुझे बताया कि वे किसी लॉज की तलाश में हैं। वहां रुक कर अगले दिन वे बनारस में पड़ने वाले दो शक्तिपीठ और बाबा विश्वनाथ का दर्शन करेंगे। उसके अगले दिन सवेरे आगे गाजीपुर के लिये निकल लेंगे।

मेरी पत्नीजी के भाइयों का ट्रेवल ऑफिस बनारस में है और उस ऑफिस के सामने एक लॉज है – आनंद लॉज। पत्नीजी ने अपने भाई से बात की और आनंद लॉज में प्रेमसागर के रुकने का इंतजाम कराया।

अगले दिन (दो मार्च को) भोर में उन्हें वाराही माता का दर्शन करना है। वाराही माता का मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां सती का नीचे का जबड़ा धरती पर गिरा था। मानमंदिर घाट पर यह मंदिर सवेरे मात्र 2 घण्टे के लिये खुलता है। उस समय बहुत भीड़ होती है वहां। प्रेमसागर को तड़के ही जाना है दर्शन के लिये।

यह यात्रा विवरण मैं कई दिनों के बाद लिख रहा हूं। मेरा स्वास्थ्य बहुत अच्छा नहीं था। लिखने पढ़ने का मन नहीं हो रहा था। आगे प्रेमसागर की यात्रा के साथ साथ लेखन चल पाये, उसका प्रयास होगा।

आगे की यात्रा के लिये अगली पोस्ट! हां, मेरा सोचना है कि प्रेमसागर को आर्थिक सहयोग मिलना चाहिये। पाठकगण, आप जो दे सकते हों, कृपया उनके यूपीआई एड्रेस पर उन्हें देने का कष्ट करें।

हर हर महादेव! ॐ मात्रे नम:!

प्रेमसागर की शक्तिपीठ पदयात्रा
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मैहर। प्रयागराज। विंध्याचल। वाराणसी। देवघर। नंदिकेश्वरी शक्तिपीठ। दक्षिणेश्वर-कोलकाता। विभाषा (तामलुक)। सुल्तानगंज। नवगछिया। अमरदीप जी के घर। पूर्णिया। अलीगंज। भगबती। फुलबारी। जलपाईगुड़ी। कोकराझार। जोगीघोपा। गुवाहाटी। भगबती। दूसरा चरण – सहारनपुर से यमुना नगर। बापा। कुरुक्षेत्र। जालंधर। होशियारपुर। चिंतपूर्णी। ज्वाला जी। बज्रेश्वरी देवी, कांगड़ा। तीसरा चरण – वृन्दावन। डीग। बृजनगर। विराट नगर के आगे। श्री अम्बिका शक्तिपीठ। भामोद। यात्रा विराम। मामटोरीखुर्द। चोमू। फुलेरा। साम्भर किनारे। पुष्कर। प्रयाग। लोहगरा। छिवलहा। राम कोल।
शक्तिपीठ पदयात्रा

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