भारतीय रेल का पूर्व विभागाध्यक्ष, अब साइकिल से चलता गाँव का निवासी। गंगा किनारे रहते हुए जीवन को नये नज़रिये से देखता हूँ। सत्तर की उम्र में भी सीखने और साझा करने की यात्रा जारी है।
पप्पू का परिचय मैं दे चुका हूं पहले एक पोस्ट में पिछले महीने। वह विक्षिप्त व्यक्ति है। उस समय मन में विचार घर कर गया था कि कभी उससे बात कर देखा जाये।
उसे सामान्यत: सड़क पर चहलकदमी करते या किसी ठेले पर आराम करते देखा है। भरे बाजार में। आज वह एक किनारे की सुनसान बंद/खाली गुमटी के सामने अधलेटा था। उसे देख कर मैं आगे बढ़ गया पर लगा कि उससे अगर बातचीत करनी है तो यह सही अवसर है। मैंने अपनी साइकिल मोड़ी और उसके पास गया। उससे पास जा कर पूछा – आज यहां लेटे हैं आप?
वह एक किनारे की सुनसान बंद/खाली गुमटी के सामने अधलेटा था।
उसने मेरी ओर देखा और कुछ बुदबुदाया। आवाज स्पष्ट नहीं थी। केवल होंठ हिलते लग रहे थे। मुझे बताया गया था कि वह अंग्रेजी अच्छी बोला करता था। सो बातचीत करने के ध्येय से मैंने फिर कहा – लुकिंग रिलेक्स्ड टुडे!
वह बुदबुदाता ही रहा। मेरी ओर मात्र एक नजर निहारा था। उसके बाद ऊपर की ओर तिरछे मुंह कर कुछ अस्पष्ट कहता रहा। मैंने उसके मुंह के पास अपना कान लगा कर सुनने का प्रयास किया। पर आवाज साफ नहीं थी। यह जरूर लगा कि वह हिंदी में कुछ कह रहा था। उसने उठने, बैठने या मुझसे बात करने का कोई संकेत नहीं दिया। वह अपने आप में रमा हुआ था।
मैंने पुन: एक प्रयास किया – चलिये आराम करिये।
इस पर भी उसने मेरी ओर देखने कहने की कोई प्रतिक्रिया नहीं की। वह अपने में ही मगन रहा। टीशर्ट और हाफ पैण्ट पहने था वह। सामान्यत: वह एक लोअर पहने दीखता था। उसके कपड़े आज साफ थे पर शरीर बिना नहाया। शरीर पर कुछ तरल पदार्थ बहने के निशान भी थे। इकहरा शरीर, कार्ल मार्क्स वाली दाढ़ी, बिना किसी इच्छा के, बिना भाव के निहारती आंखें – मुझे उसके बारे में दुख और निराशा दोनो हुये। पर मेरे दुख और निराशा से उसे कोई लेना देना नहीं था। भावशून्य!
उसके कपड़े आज साफ थे पर शरीर बिना नहाया। शरीर पर कुछ तरल पदार्थ बहने के निशान भी थे। इकहरा शरीर, कार्ल मार्क्स वाली दाढ़ी, बिना किसी इच्छा के, बिना भाव के निहारती आंखें – मुझे उसके बारे में दुख और निराशा दोनो हुये।
मेरी दशा अलेक्षेद्र – अलेकजेण्डर जैसी थी जो किसी हिंदू साधू से मिला था और साधू ने केवल यही इच्छा व्यक्त की थी कि वह उसके धूप को छेंक कर खड़ा होना बंद कर दे! पप्पू भी शायद यही चाहता था कि मैं उसके पास से चला जाऊं जिससे वह अपने में मगन रह सके। उसके पास मैं सतर्क भाव से गया था कि कहीं वह हिंसात्मक व्यवहार न करे। पर फिर उसके मुंह के पास कान लगा कर सुनने का भी प्रयास किया मैंने। अगर वह कुछ बातचीत करता तो मैं उसके साथ एक चाय की दुकान पर जा कर उसे नाश्ता कराने की भी सोच रहा था। पर पप्पू ने मुझे कोई भाव न दिया।
मूर्ख हो तुम जीडी! आत्मन्येवात्मनातुष्ट: व्यक्ति की मेधा को भेदना चाहते हो। वैसे ही मूर्ख हो जैसे विश्वविजय की चाह करने वाला अलेकजेण्डर था।
कुछ दिन पहले उपेंद्र कुमार सिंह जी का फोन था। उनका कहना है कि जब किसी की याद आये तो फोन कर ही देना चाहिये। कोरोना काल में बहुत विकटें डाउन हुई हैं। कोई चांस नहीं लेना चाहिये। लाइफ का क्या?
उन्होने बताया कि वे सपत्नीक बनारस जा रहे हैं। जाते समय तो सीधे निकल लेंगे, वापसी में चालीस मिनट का स्लॉट निकाल कर मिलेंगे हम लोगों से। वापसी रविवार को तय थी। मेरी पत्नीजी ने बताया कि रविवार को नाश्ते में इडली का टर्न होता है। वही चल जायेगा आतिथ्य में। मेरा सुझाव था कि चाय की चट्टी से कच्चे समोसे ले आये जायें और घर के तेल में छाने जायें। उपेंद्र कुमार सिंह जी और मुझमें एक कॉमन फैक्टर समोसे का भी है। प्रयाग के सुबेदारगंज रेल मुख्यालय में हम लोगों की दोपहर की चाय के समय छोटेलाल समोसा लाया करता था। अब छोटेलाल तो है नहीं। हम ही छोटेलाल का रोल अदा करते हैं!
दुकान की गद्दी पर विनोद और कच्चे समोसे
पत्नीजी को भी सुझाव पसंद आया। शनिवार की सुबह मैं चाय की चट्टी पर सहेजने गया। दुकान की गद्दी पर विनोद बैठा था। मैंने विनोद और मनोज से कहा – “मेरे मित्र आ रहे हैं। वैसे वो तो मेरी तरह के ही हैं। हो सकता है साइकिल भी चलाते हों मेरी तरह। पर असल बात है कि उनकी पत्नीजी राजर्षि टण्डन मुक्त विश्वविद्यालय की वाइस चांसलर हैं। इसलिये, जरा ठीक से बनाना कच्चे समोसे।” मैंने ‘वाइस चांसलर (कुलपति)’ पर जोर दिया और दो तीन बार दोहराया। मुझे संदेह था कि वाइस चांसलर जैसे बड़े ओहदे के बारे में विनोद को पुख्ता जानकारी है या मुझे कुलपति जैसे ओहदे वाले व्यक्ति के पासंग में समझता भी है या नहीं। वह तो इण्टर पास कर सीआरपीएफ में भरती के जुगाड़ में ही है। … और गांवदेहात के बहुत से लोग मुझे रेलवे का बड़ा बाबू जैसा कुछ मानते हैं! … खैर रविवार की सुबह जब यूके सिंह जी का बनारस से रवाना होते समय फोन आ रहा था, मैं विनोद की चाय की दुकान से कच्चे समोसे खरीद रहा था।
घण्टे भर बाद सिंह दम्पति मेरे घर पर थे। भला हो ह्वाट्सएप्प पर लोकेशन शेयर करने का, उन्हें मेरा घर तलाशने मेंं कोई दिक्कत नहीं हुई। केवल घर के सामने पंहुच कर उनका फोन आया – “तुलसीपुर स्कूल के सामने खड़े हैं। आपका घर दांई ओर है कि बांई ओर।”
उपेंद्र कुमार सिंह और श्रीमती सीमा सिंह
उपेंद्र कुमार सिंह जी मुझसे साल भर बड़े होंगे। वे मेरे बॉस थे। उसके बाद हम आसपास के जोनल रेलवे के मुख्य परिचालन प्रबंधक भी रहे। कॉलेज में जैसे सीनियर-कम-फ्रेण्ड का भाव होता है, वैसा ही हम में था और है। यह अलग बात है कि रिटायरमेण्ट के बाद हम लोग एक दो बार ही मिले हैं। पर यह जरूर लगता है कि “जब किसी की याद आये तो फोन कर ही देना चाहिये” वाले उनके कथन पर अमल होना चाहिये। :-)
घर आने के बाद – चालीस मिनट के स्लॉट की बजाय – हमने एक सवा घण्टे साथ गुजारे। दो इडली, एक समोसा और एक कप चाय भर चली बीच में। बाकी केवल बातें ही हुईं। मेरी पत्नीजी ने उनको रुकने और दोपहर के भोजन की बात की। पर उनका कहना था – किसी रेस्तराँ में पहली बार उसका का स्टैण्डर्ड देखने जाया जाता है। वहां बैठने की जगह कैसी है। सर्विस कैसी है। चाय की क्वालिटी कैसी है। स्नेक्स ठीक और साफ सुथरे हैं या नहीं? तसल्ली हो जाने पर अगली विजिट में भोजन की सोची जाती है। अभी तो यह पहली विजिट है। इतना तय हो गया है कि इलाहाबाद-बनारस के बीच कम्यूट करते यहां आया जा सकता है। भोजन की बात अगली बार के लिये छोड़ी जाये।” :lol:
उपेंद्र जी की वाकपटुता और प्रगल्भता का एकनॉलेजमेण्ट उनकी पत्नीजी – श्रीमती सीमा सिंह भी हल्की मुस्कान के साथ करती हैं। प्रोफेसर (और अब वाइस चांसलर) सीमा जी हैं। पर बोलने का काम उपेंद्र कुमार सिंह जी करते हैं। हमारे घर भी ज्यादा बातचीत उपेंद्र कुमार जी ने की। एक सवा घण्टे की बातचीत को बांटा जाये तो साठ परसेण्ट यूके जी के, बीस परसेण्ट मेरे और दस दस परसेण्ट सीमा जी और मेरी पत्नीजी के खाते जायेगा।
किन्ही कॉमन मित्रों/परिचितों की बात चली। वे योग आसन करते हैं – दो घण्टा सवेरे और दो घण्टा शाम को। क्रियायोगी हो गये हैं वे लोग, यूके जी बताते हैं। फिर जोड़ते हैं – “वैसे योग हम भी उतना ही करते हैं रोजाना। उनसे शायद ज्यादा ही। हम आराम योगी हैं। इस उम्र में वही सबसे सरल योग है। अपना इनवेस्टमेण्ट पोर्टफोलियो देखते देखते कब आरामयोग की मुद्रा लग जाती है; कहना कठिन है।… वैसे भी काहे के लिये संग्रह करना!”
हंसी ठिठोली की बात करते करते यूके बड़े काम की बात कर जाते हैं; वह भी बड़े सहज ढंग से। “आपने घर बिल्कुल सही बनाया है रिटायरमेण्ट का आनंद लेने के लिये। लाइफ का सही मायने यहां दिखता है – लाइफ माने लिविंग इन फ्री एनवायरमेण्ट। उन्मुक्त प्रकृति के बीच रहना!”
समोसे वाली चाय की चट्टी की बात सुन कर यूके कहते हैं – “आप हमारे साथ जो वाइसचांसलर का अर्दली साथ चल रहा है न, उसका चित्र जरूर लीजियेगा। और विश्वविद्यालय का जो रथ साथ आया है – रथ ही तो है; कार पर झण्डा जो लगा है – उसका चित्र ले कर चाय की दुकान वाले को जरूर दिखाइयेगा। आखिर आपके कहे की क्रेडिबिलिटी का सवाल जो है!” :lol:
गांवदेहात में अर्दली, चोबदार, बड़ी कार या रथ – इन्ही का रुआब है। साइकिल सवार की क्या बिसात! :-)
चलते समय जब ड्राइंगरूम से उठा जाता है तब बड़े सहज भाव से सीमा जी कहती हैं – मैं जल्दी जल्दी कर रही हूं। मुझे मालुम है अभी रवाना होने में आधा घण्टा लगने वाला है। घर के बाहर फोटो खींचते, बोलते बतियाते आधा घण्टा लग ही जाता है। ग्रुप फोटो लेने के लिये अर्दली साहब को बुलाया जाता है। फुल ड्रेस में पगड़ी पहने है वह अर्दली। मैं उनकी कमीज पर लिखा नाम पढ़ता हूं – कुश प्रकाश पाल। पर वे नाम बुलाते हैं – गोरे। शायद गोरे उनका उपनाम है।
बांये से – उपेंद्र कुमार सिंह, ज्ञानदत्त, रीता पाण्डेय और श्रीमती सीमा सिंह
हम दोनो के मोबाइल और गोरे के मोबाइल को मिला कर वहां घर के अंदर बाहर के कुल तीन दर्जन चित्र मेरे मोबाइल में सिमट आते हैं। तीन दर्जन चित्र, समोसा चर्चा, लाइफ का फुल फार्म, क्रियायोग और आरामयोग का तुलनात्मक अध्ययन के अलावा और भी बहुत कुछ होता है उस दो दम्पतियों की बैठक में। हम लोग लम्बे अर्से बाद मिल रहे होते हैं, पर पूरी समग्रता में; उनके जाने के बाद; मेरी पत्नीजी मुझसे कहती हैं – “आज जो मुलाकात हुई उससे तुम्हारा दिन जरूर बन गया होगा? नहीं?”
दिन तो वास्तव में बहुत सुखद बना! जाने के बाद यूके जी ने मैसेज में सहेजा – अर्दली वाला और रथ वाला चित्र चाय की चट्टी वाले को दिखा दीजियेगा। आपकी क्रेडिबिलिटी का मामला है! :lol:
अर्दली साहब और रथ के चित्र – मेरी क्रेडिबिलिटी का मामला है। :-D
Life is Living In Free Environment. यह सुनना अच्छा लगा। रामसेवक – हमारे गार्डनर जी – को आगे और कहा जायेगा कि एनवायरमेण्ट जरा और चमकायें। यूके जी को नया रेस्तराँ पसंद तो आ गया है। अगली बार लंच का ठहराव मान कर चला जाये। पर घर का रखरखाव चकाचक बने यह जरूरी है। आखिर हमारी क्रेडिबिलिटी का मामला जो है! :lol:
प्रेमसागर ने गंगोत्री से फोन किया – “भईया, आपको और भाभी जी को चरनस्पर्श प्रनाम। गंगोत्री पंहुच गया हूं। बड़ी ठण्डी है। उंगलियाँ सुन्न हो रही हैं। यहां दो तीन दिन रहूंगा। उसके बाद यहाँ से जल ले कर केदारनाथ को रवाना हूँगा। साथ में और भी लोग होंगे। केदारनाथ में तो देवघर वाले कांवर बंधु भी जुड़ जायेंगे। केदार से देवघर की यात्रा में तो करीब पच्चीस लोग साथ होंगे। … मैं आपको गंगोत्री की गंगाजी और बर्फ से ढंके पहाड़ दिखाता हूं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में।”
गंगोत्री में प्रेमसागर
प्रेमसागर को मैंने गुजरात के नागेश्वर तीर्थ में छोड़ा था। उसके बाद प्रत्येक ज्योतिर्लिंग दर्शन की सूचना वे मुझे फोन कर देते रहे हैं। नित्य की यात्रा गतिविधि नहीं मिली और मैंने पूछी भी नहीं पर मोटे तौर पर यात्रा का प्रवाह पता चलता रहा। प्रेमसागर के साथ लोग जुड़ गये थे जो उनकी हर जरूरत के काम आ रहे थे। तो उन्हें ट्रेवलॉग लेखन की आवश्यकता नहीं थी। उनका ध्येय यात्रा करना था, जो वे सरलता से कर ले रहे थे। ट्रेवलॉग मेरा ध्येय था जो डिसकनेक्ट हो गया था।
प्रेमसागर महाराष्ट्र और दक्षिण के ज्योतिर्लिंगों की यात्रा सम्पन्न कर वापस वाराणसी लौटे। वहां से वे मुझसे मिलने मेरे घर भी आये। फिर वे रवाना हुये और कानपुर होते हुये मथुरा भी गये। बनारस में और मथुरा में अपने सम्बंधियों से भी मिले। मथुरा में उनके पिताजी भी मिले – ऐसा उन्होने बताया। उसके बाद कल शाम उन्होने सूचना दी कि वे गंगोत्री पंहुच गये हैं। मई में केदार के पट खुलेंगे और तब वे गंगोत्री का जल ले कर सात आठ लोगों की टोली में, केदार में होंगे।
मैं वीडियो चैट के दो चार स्क्रीनशॉट लेता हूं। प्रसन्न लग रहे हैं प्रेमसागर, बावजूद इसके कि सर्दी की शिकायत कर रहे हैं। उसके बाद वे गंगोत्री के और हिमाअच्छादित प्रस्तरखण्डों के चित्र भी भेजते हैं।
मैं वीडियो चैट के दो चार स्क्रीनशॉट लेता हूं। प्रसन्न लग रहे हैं प्रेमसागर, बावजूद इसके कि सर्दी की शिकायत कर रहे हैं।
प्रेमसागर की भलमनसाहत है कि वे फोन कर मुझे जानकारी दे रहे हैं। अब उनके पास लोगों का सपोर्ट सिस्टम है और यात्रा हेतु प्रचुर सहयोग भी। पर मेरा मन करता है उनकी यात्रा – गंगोत्री से केदार तक की पदयात्रा का विवरण जानने का। मुझे यह भी मालुम है कि यह यात्रा आदिकाल के विकट चारधाम मार्ग से नहीं होने वाली। उसके अलावा अब जमाना पाण्डवों की हिमालय यात्रा के युग से बहुत बदल चुका है। अब स्टीफन एल्टर की पुस्तक – Becoming a mountain : Himalayan journeys in search of the sacred and the sublime – की चारधाम मार्ग को खोजने की यात्रा से भी कहीं अलग प्रकार की यात्रा होगी प्रेमसागर की। पर फिर भी हिमालय और पदयात्रा होगी ही! मुझे पक्का नहीं पता कि मैं पुन: प्रेमसागर से कनेक्ट कर पाऊंगा कि नहीं; पर मेरा ट्रेवलॉगप्रेमी मन एक बार फिर जोर मार रहा है। इसबार अगर हुआ तो यह आठ-दस दिन का कमिटमेण्ट होगा यात्रा से डिजिटल जुड़ाव का। पर वह किस रूप में होगा, या होगा भी नहीं, कहा नहीं जा सकता। फिलहाल मुझे हिमाच्छादित पर्वत और गंगोत्री का बहता पानी – जो प्रेमसागर के भेजे चित्रों में दीखते हैं – लुभा, ललचा रहे हैं। :-)
प्रसन्न लग रहे हैं प्रेमसागर, बावजूद इसके कि सर्दी की शिकायत कर रहे हैं। उसके बाद वे गंगोत्री के और हिम आच्छादित प्रस्तरखण्डों के चित्र भी भेजते हैं।