गिरीश ने कहा – संघ के सामाजिक लपेटक तलाशेंगे मेरे लिये


उम्र बढ़ने के साथ साथ दीर्घ और स्वस्थ्य जीवन के बारे में आकांक्षा स्वाभाविक रूपसे बढ़ती जाती है।

ब्ल्यू जोंस की साइट पर मैं अपनी और अपनी पत्नीजी के दीर्घ जीवन की क्विज के परिणाम में पाते हैं कि हमारा और सब तो ठीक ठाक है, पर अपना लाइफ स्पॉन (और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, अपना हेल्थ स्पॉन) लम्बा करने के लिये हमें सामाजिक रूप से लोगों/समूहों/धार्मिक संगठनों से और जुड़ना चाहिये।

आप अपने लिये इस क्विज को भरना और परिणाम जानना चाहते हैं तो इस लिंक पर जा सकते हैं।

ब्ल्यू जोंस के डान बटनर ने विश्व भर के दीर्घ जीवी लोगों के समूहों और उनके स्थानों का अध्ययन किया है। यह नेशनल ज्योग्राफिक वाली संस्था के साथ है। उनकी दीर्घ और प्रसन्नता युक्त जीवन विषयक पुस्तकें तथा पठनीय सामग्री रोचक भी है और काम की भी। यह विशेषत: जीवन के दूसरे पारी के लोगों के लिये महत्वपूर्ण है।


कल गिरीश सिंह जी हमारे घर पर थे एक घण्टे के लिये। वे अपने गांव आये हुये हैं। नवरात्रि के दौरान उनका मन बना विध्यवासिनी देवी के दर्शन करने का। सो वे मोटर साइकिल पर अपने गांव से निकल लिये। करीब पचास किमी यात्रा कर उन्होने विंध्याचल में दर्शन किया। वहीं एक पूरी कचौरी वाली दुकान पर नाश्ता किया और लौट लिये। वापसी में जब वे मेरे गांव के समीप पंहुचे तो फोन पर मेरी उपस्थिति टटोली। यह जान कर कि मैं घर पर ही हूं, वे मिलने चले आये। … बहुत अच्छा रहा उनसे मिलना। मेरी पत्नी जी और मैं गिरीश से मिलने पर हमेशा आत्मीय प्रसन्नता से सराबोर होते रहे हैं। इस बार भी हुये।

घर के पोर्टिको में श्री गिरीश सिंह

गिरीश ने बताया कि वे पचपन के हो रहे हैं। अपना कारोबार अगली पीढ़ी को लगभग थमा दिया है। वे तभी उसमें ध्यान देते हैं, जब बेटा उनसे देखने को या सलाह देने को कहता है। अन्यथा वे अपने समय को अपने अनुसार व्यतीत कर रहे हैं। घूम रहे हैं, लोगों से मिल रहे हैं और संघ का काम कर रहे हैं। संघ अर्थात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ।

गिरीश की बातों से लगा कि संघ के लोग बहुत मिलनसार, मितव्ययी, लोगों को देखने परखने और उनकी संघ के लिये उपयोगिता तोलने में दक्ष हैं। ऐसे लोग अगर मिलते हैं तो उनसे जुड़ाव का वे एक कदम आगे बढ़ कर प्रयास करते हैं। और वे लोग, जो जुड़ना चाहते हैं पर जिनमें अपने आप को दिखाने की, अपनी राजनैतिक आकंक्षा की राजसिक वृत्ति का लेश भी होता है, उसे वे अगला दरवाजा टटोलने को इंगित करते हैं।

अरविंद आश्रम के आदरणीय माहेश्वरी जी ने एक बार एक सत्संग में कहा था कि आश्रम के लोग आपको देख परख कर अगर आपकी चोटी पकड़ लेते हैं और आजीवन आपकी चोटी छोड़ते नहीं। उनसे जुड़ाव उस स्तर का प्रगाढ़ होता है। गिरीश की बातों से लगा कि संघ के लोग भी चोटी पकड़ने पर छोड़ते नहीं! :lol:

गिरीश का कार्यक्षेत्र मुम्बई और महाराष्ट्र का है। वहां के कई संघ से जुड़े लोगों के बारे में उन्होने चर्चा की। वे लोग जीवन के अनेक क्षेत्रों में – वैज्ञानिक, लेखक, व्यवसायी, शिक्षक आदि – उत्कृष्टतम लोग हैं। वे लोग सरल हैं और अपनी उपलब्धि की डींग नहीं हाँकते। वे बड़ी सहजता से मिलते हैं। उनका हास्य भी निश्छल और संक्रामक होता है। “हहाई क मिलथीं भईया ओ पचे! ( पूरी तरह अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते मिलते हैं वे भईया)” – गिरीश ने उनमें से एक दो सज्जनों के बारे में बताया।

गिरीश सिंह जी

संघ के लोगों, प्रचारकों की जैसी बात गिरीश ने की, उससे लगा कि उस प्रकार के लोगों से नियमित सम्पर्क मेरे “दीर्घ जीवन की साधना” के प्रॉजेक्ट के कमजोर सामाजिक पक्ष का सुधार सकता है; जिसकी बात ब्ल्यू जोंस के डॉन बटनर जी वाली क्विज करती है।

गिरीश के पूर्वांचल के इस इलाके के सम्पर्क सूत्र उतने सघन नहीं हैं, पर उनके अनुज हरीश – हरिशंकर सिंह – अपने गांव में रहते हुये कृषि के अपने प्रयोगों के साथ संघ की वाराणसी के आसपास की गतिविधियों से गहन जुड़े हैं। हरीश के सम्पर्क सूत्रों को टटोल कर गिरीश मेरी सामाजिकता का दायरा बनाने के लिये लोगों को तलाशने का यत्न करेंगे – ऐसा गिरीश जी ने मुझे आश्वासन दिया।

“मैं बहुत सक्रिय नहीं हो सकता। वे लोग अगर अपेक्षा अधिक करेंगे तो जमेगा नहीं।” – मैंने अपनी शंका व्यक्त की। जीवन के इस दौर में कोई मुझे सामाजिकता में बहुत ‘पेरना’ चाहे तो मेरे अंदर रस नहीं, मात्र खुज्झा ही मिलेगा। मैंने गिरीश को अपनी अंतर्मुखी प्रवृत्ति स्पष्ट की। गिरीश ने बताया – भईया, आप निश्चिंत रहें। वे लोग आपमें आपके जुड़ाव लायक चीज तलाश ही लेंगे।


संघ कितना दक्षिण पंथी है और मुझसे कितनी दांई ओर है उसकी विचारधारा – यह प्रश्न मेरे मन में विश्वविद्यालय के दिनों से उठता रहा है। पिलानी में एक साल मुझसे सीनियर काबरा जी ने मुझे संघ में कुछ ज्यादा ही लपेटने की कोशिश की थी, तो मैं अपनी लाठी, गणावेश खरीदने के बावजूद भी छिटक गया था। तब से अब तक संघ को हाशिये से ही देखता रहा हूं। अब – चार पांच दशक बाद – सामाजिकता की जरूरत महसूस होने के साथ संघ की याद आ रही है। अब गिरीश जी ने आश्वासन दिया है कि वे मेरे लिये संघ के एक ऐसे सामाजिक लपेटक की तलाश करेंगे जो मेरी वृत्ति के साथ तालमेल कर सकें। देखते हैं, क्या होता है!

अपनी विचारधारा का दक्खिन-वाम तौलना मेरा एक मानसिक व्यायाम रहा है। बहुत कुछ वैसे ही जैसे हम अपनी नेट-वर्थ की गणना हर साल या कुछ महीने में हम करते हैं; उसी तरह वाम-दक्षिण के स्केल पर अपनी स्थिति तलाशता रहता हूं। अपने आप को क्या समझता हूं, मैं ठीक ठीक पिनप्वाइण्ट नहीं कर सका। अपने आसपास गरीबी-विपन्नता और शोषण देख कर कभी कभी साम्यवादी सोच मन में जोर मारती है। पर फिर यह भी लगता है कि वे लोग अगर कुछ कर रहे होते तो विश्व की विपन्नता कम हो गयी होती। उनके उदग्र-नक्सली तौर तरीके तो कभी भाये नहीं। धुर दक्षिणपंथ से भी भय लगता है। शायद कभी थ्रू एण्ड थ्रू सोचा नहीं समाज की सोशियो-इकनॉमिक समस्याओं पर। … और साम्य-समाजवाद के वे आइकॉन – लेनिन, माओ, ग्वेवेरा, कास्त्रो आदि कभी मुझे भाये नहीं। उनकी बजाय राजा राम का आदर्शवाद और उस समय का समाजवाद ज्यादा मनमाफिक लगता है।

ऐसे मुझ जैसे व्यक्ति को संघ वाले बुद्धिजीवी कितना लपेट पायेंगे? कितना काम का समझेंगे मुझे?


संघियों को तोलने का भी मन है। कहीं पढ़ा, या सुना है कि संघी अब वाया भाजपा सत्ता मिलने के कारण वे तपस्वी संघी नहीं रहे। भाजपा का शीर्ष नेतृत्त्व भी राजसत्ता का ग्लैमर दिखा कर, उन्हें प्रोटोकॉल की, सुविधाओं की रेवड़ी बांट कर उनके बड़े काडर को हड़प रहा है। अब संघ के लोग सरसंघचालक के प्रभुत्व में कम, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के प्रभाव में ज्यादा हो रहे हैं। … इस बात को भी तोलने का मन है।


गिरीश उस दिन घण्टा भर मिलने के बाद चले गये। उनसे बिछुड़ने का मन तो नहीं हो रहा था, पर जाना तो था ही उन्हें। हां, अब गिरीश के फोन की प्रतीक्षा है – मेरे लिये वे कोई संघी लपेटक तलाश पाये या नहीं! :lol:

घर से विदा होते समय गिरीश जी।

गिरीश जी और उनके भाई हरिशंकर सिंह के ट्विटर हेण्डल आप देख सकते हैं।


कैस्टर और मस्टर्ड


पता नहीं आजकल बिट्स, पिलानी में विभिन्न सोशियो-इकनॉमिक बैकग्राउण्ड के विद्यार्थियों के वर्गों के लिये कोई संज्ञायें हैं या नहीं या हैं तो कौन सी है? मेरे जमाने में – सत्तर-अस्सी के दशक में – कैस्टर और मस्टर्ड हुआ करते थे। कैस्टर (अरण्डी) अंग्रेजीदाँ विद्यार्थी थे। स्कूली शिक्षा उनकी बड़े शहरों में हुई होती थी। अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा पाये वे फार्वर्ड माने जाते थे। लड़कियों के हॉस्टल, मीरा भवन, की छात्रायें सामान्यत: उन्ही केस्टरों के साथ मिला करती थीं। पहले दूसरे वर्ष में कक्षाओं में प्रश्न पूछने और प्रोफेसरों से बोलने बतियाने में वे ही आगे हुआ करते थे। मैं केस्टरों में नहीं था।

मस्टर्ड (सरसों) उन छात्रों को कहा जाता था, जो हिंदी माध्यम से पढ़े, छोटे शहरों या कस्बों के होते थे। उनकी पृष्ठभूमि निम्न मध्यवर्ग की होती थी। अंग्रेजी में बोलना उन्हें नहीं आता था। मैं राजस्थान के एक कस्बे – नसीराबाद (अजमेर) – से आया था और मेरा बैकग्राउण्ड लोअर मिडिल क्लास से मिडिल क्लास के बीच में कहीं था। हिंदी माध्यम से पढ़ा था। गरभ – गणित-रसायन-भौतिकी – के अंक बहुत अच्छे थे पर उन्हें पढ़ा हिंदी माध्यम से ही था। सो अंगरेजी में हाथ बहुत ही तंग था। लड़कियों से बोलने बतियाने की कोई आदत नहीं थी। मैं मस्टर्ड था। खांटी सरसों!

पहले वर्ष की कक्षायें मेरे लिये टॉर्चर ही थीं। बिट्स में हिंदी की बहुत कद्र नहीं थी। पढ़ाया गया ज्यादा समझ नहीं आता था। प्रोफेसर जो पढ़ाते थे, उसका पहले मन में हिंदी अनुवाद करता था। एक दो महीने बाद कक्षा में एक दो सवाल अंग्रेजी में पूछने का यत्न करता था, पर कई बार अंग्रेजी बोलने में गड़बड़ा जाता था। उसने अच्छा खासा इनफीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स दिया। पर हम मस्टरों की संख्या पिलानी के हिंदी पट्टी में होने के कारण, अच्छी खासी थी। हम लोग स्कूली शिक्षा में अद्वितीय होने के कारण ही बिट्स में प्रवेश पाये थे, सो जद्दोजहद करने की इच्छा अदम्य थी। दो तीन सेमेस्टर लगे मुझे अपनी अंग्रेजी सुधारने मेंं। तब कक्षा में पर्याप्त पार्टीसिपेटिव बन पाया। फिर भी रहा रहा मस्टर्ड का मस्टर्ड ही। आज भी वही हूं। अपने काले पंख रंग कर हंसों की जमात में शामिल हो कर दोयम दर्जे का केस्टर बनने की कोशिश नहीं की। हां, कुछ मस्टर्ड स्यूडो केस्टर जरूर बन गये। … धुर दक्षिणपंथी मस्टर्ड होने के कारण मैं अपने जुनून को पालता गया और आज अपने वानप्रस्थ आश्रम में इस गांव में रहता, साइकिल चला रहा हूं। परदेस या किसी मेट्रो में नहीं बसा।

केस्टर -अरण्डी

दो ग्रेफिटी वाली पत्रिकायें छात्र निकालते थे। हिंदी वाली ‘रचना’ कही जाती थी। अंग्रेजी वाली का नाम मुझे अब याद नहीं है। मैं हिंदी वाली वाल-मैगजीन का सम्पादक था। साठ सत्तर प्रतिशत लेखन भी मुझे करना होता था। उसकी हिंदी आज मेरे ब्लॉग की हिंदी से अलग प्रकार की थी। उस समय हिंदी की पत्रिका ‘दिनमान’ छपा करती थी। उसकी भाषा और रघुवीर सहाय के लेख/सम्पादकीय का मेरे ऊपर प्रभाव था। हिंदी के अखबारों, धर्मयुग और दिनमान की नकल करने का प्रयास करता था और वह बहुत अच्छा प्रयास नहीं था। फिर भी मस्टर्डों में वह पत्रिका – वाल मैगजीन – ठीकठाक पैठ रखती थी।

हम वह पत्रिका हाथ से एक मेटल स्टाइलस से लिखा करते थे। नीले रंग के मोमिया स्टेंसिल पर लिख कर उसकी साइक्लोस्टाइलिंग मशीन से करीब सौ प्रतियां निकाली जाती थीं। चार से आठ पन्ने की पत्रिका हम प्रत्येक हॉस्टल के और बिट्स के सभी नोटिस बोर्डों पर पिन कर टांगा करते थे। अधिकांश छात्र वहीं खड़े खड़े पढ़ा करते थे। कुछ प्रतियां हम सहेज कर रखने और बांटने के लिये भी बनाते थे। एक दो साल मैंने वह पत्रिका निकालने का काम किया।

मैं जन्मजात मस्टर्ड; हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से फिर हिंदी में आया हूं। उसका असर यह है कि न हिंदी अच्छी बनी और न अंग्रेजी। दुविधा में दोनू गये, माया मिली न राम।
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मैं रहा रहा मस्टर्ड का मस्टर्ड ही। आज भी वही हूं। अपने काले पंख रंग कर हंसों की जमात में शामिल हो कर दोयम दर्जे का केस्टर बनने की कोशिश नहीं की। हां, कुछ मस्टर्ड स्यूडो केस्टर जरूर बन गये।

कालांतर में; चूंकि सारी पढ़ाई अंग्रेजी में होती थी; मेरा सोचना और अभिव्यक्त करना अंग्रेजी में होने लगा। मेरी हिंदी खुरदरी और अंग्रेजी के शब्दों से भरी होने लगी। तकनीकी शब्दों और कहावतों का हिंदी तर्जुमा मिलता नहीं था। इसलिये, भले ही प्रवृत्ति में मैं मस्टर्ड ही रहा, मेरी हिंदी लंगड़ी होती गयी। पिलानी से निकलने के बाद लगभग तीन दशकों तक हिंदी में अभिव्यक्ति का यत्न बहुत कम रहा।

सन 2007 में अचानक रवि रतलामी के ब्लॉग पर नजर पड़ी और मुझे समझ आया कि हिंदी में लिखने और ब्लॉगिंग का भी एक संसार विकसित हो रहा है। मेरी मस्टर्डीयता ने जोर मारा। मैंने हिंदी में ब्लॉग बनाया। शुरुआती हिंदी अटपटी रही ब्लॉग पर। करीब रुपया में सात आठ आना भर अंग्रेजी के शब्द, देवनागरी में लिखे होते थे उसमें। अब भी हैं। अब 7-8 आना से कम हो कर एक दो आने पर आ गये हैं। हिंदी में हाथ तंग है, पर फिर भी हिंदी पट्टी के पाठकों ने मुझे स्वीकार कर लिया है। शायद!

मैं जन्मजात मस्टर्ड; हिंदी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से फिर हिंदी में आया हूं। उसका असर यह है कि न हिंदी अच्छी बनी और न अंग्रेजी। दुविधा में दोनू गये, माया मिली न राम। मैं स्वांत: सुखाय लिखता जाता हूं। सोच में मैं खांटी मस्टर्ड हूं। महिलाओं के साथ बोलते बतियाते अभी भी झिझक होती है मुझे। हमेशा आशंका रहती है कि मैंने कुछ ऐसा तो नहीं कहा-लिखा जो फीमेल जेण्डर को रिडीक्युलस लगे। केस्टरों के प्रति, अंग्रेजी गानोंं, फिल्मों और स्यूडो-मॉर्डेनिटी के प्रति वह भाव है जो उन्हें अपने डोमेन में स्वीकार नहीं करना चाहता। सड़सठ साल की उम्र तक जब अरण्डी (केस्टर) नहीं बना तो अब क्या बनूंगा।

सीनियर सिटिजन बनने के बावजूद भी मेरी आंतों में अच्छे बेक्टीरिया अभी भी ठीक ठाक हैं। कब्ज की शिकायत मुझे नहीं होती है। यदाकदा पूड़ी-कचौडी खा भी लिया तो ईसबगोल सेवन से काम चल जाता है। अगले दिन निपटान ठीक ही होता है – बिना प्रयास किये। इसलिये मुझे अरण्डी के तेल की या केस्टर पन्थ में दीक्षा लेने की जरूरत नहीं पड़ी। उसके उलट, डालडा, रिफाइण्ड तेलों को लांघते हुये अब हम सरसों के तेल का सेवन करने लगे हैं। घर में अब कच्ची घानी का सरसों का तेल ही आता है। अभी तो मन हो रहा है कि एक किचन एक्स्पेलर खरीद कर घर में ही सरसों का तेल निकाला जाये अपने इस्तेमाल के लिये। सो मैं और मेरा परिवार मस्टर्डपंथी ही है। :lol:

सरसों। मस्टर्ड

सर्दियां आने को हैं। गेंहू के साथ सरसों की बुआई होगी। सरसों के फूल मुझे प्रिय हैं। उनका इंतजार है। आखिर हूं तो मस्टर्ड ही न मैं! :lol:


सपने में सिर काटई कोई


तीन बज रहे होंगे। अर्धनिद्रा में मैंने सपना देखा कि यात्रा कर रहा हूं और मेरा बैग-सूटकेस गायब हो गया है। सब कुछ उसी में है। मेरा आईडेण्टिटी, पैसा, सब कुछ। सपने में ही तुलसीदास जी का स्मरण हो रहा है – सपने में सिर काटई कोई, बिनु जागे दुख दूर न होई। … बालकाण्ड में शिव-पार्वती संवाद।

नींद में ही नींद खुल जाती है। स्मरण होता है कि मैं तो घर पर बिस्तर पर हूं। आश्वस्त हो कर नींद पुन: आ जाती है और एक घण्टा और सोता हूं।

विचित्र सा स्वप्न है – जाग्रत भी है और स्वप्न भी। सभी कुछ खो जाने का स्वप्न शायद एक तरह की असुरक्षा की भावना है। पर स्वप्न में ही यह भान कि स्वप्न मुझे मूर्ख बना रहा है – वह अटपटा है।

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यात्रा करता नहीं आजकल। रेलवे का फ्री पास लिये भी तीन-चार साल हो गये। उतना ही समय ट्रेन में कदम रखे हो गया। उसके पहले भी, जब रेल का अधिकारी था, तब भी कई दशकों से ऐसी नौबत नहीं आई कि अकेले यात्रा करनी पड़े। अधिकांशत: रेल के सैलून में चलना होता था, या ट्रेन में चलने पर भी साथ में दो-चार लोग तो होते ही थे। यात्रा में मेरा सामान कभी खोया नहीं। खोने की सम्भावना भी नहीं होती थी।

सामान ही नहीं, कभी भीड़ में किसी उचक्के ने जेब से पर्स या पैसे भी नहीं उड़ाये कई दशकों से। मुझे याद आता है कि आई आई टी गेट के पास कटवारिया सराय से पैदल आ कर मैं डीटीसी की बस पकड़ रहा था। बस में चढ़ते समय एक व्यक्ति ने मेरी जेब से बीस रुपये निकाल लिये थे। पीछे मुड़ कर मैंने उसे भागते भी देखा था। उसके बाद इस तरह की कोई घटना नहीं हुई।

रेल परिचालन की नौकरी ने मुझे निर्मम टाइप बना दिया था। सम्वेदनशील बनने और दिखाने के लिये मुझे अतिरिक्त मेहनत और मानसिक कवायद करनी होती थी।… और अब, सपने में ही सही, अपने असबाब को खोने का भय हो रहा है! शायद उम्र के बढ़ने के साथ इस तरह के असुरक्षा के भय बढ़ें; इस तरह के सपने और आने लगें।

वह भी दिन थे। सन 1980 की बात होगी। मैं दिल्ली में कटवारिया सराय में एक कमरा किराये पर ले कर रहता था। सरकार का राजपत्रित अधिकारी हो गया था। पर दिल्ली में सरकारी मकान मिलना सम्भव नहीं था। निर्माण भवन में दफ्तर था और आने जाने के लिये डीटीसी बस का उपयोग होता था। मैं आईआईटी में पार्ट-टाइम स्टूडेण्ट भी था। उसका सबसे बड़ा लाभ था कि साढ़े बारह रुपये का महीने भर का स्टूडेण्ट-पास बन जाता था। सो वैसे दिन कट रहे थे। उस समय बीस रुपये बड़ी चीज थी। खोने पर दुख तो था, पर इतना बड़ा दुख नहीं जितना आज सपने में सामान खो जाने का हो रहा था।

जेबकतराई, छिनैती, ट्रेन में सामान की उचक्कई या जहरखुरानी से व्यक्तिगत रूप से सन 1980 के बाद कोई पाला नहीं पड़ा। रेल की नौकरी के शुरुआती वर्षों में यात्रा करते समय एक चेन और ताले के साथ यात्रा करता था। ट्रेन की सीट से अटैची-ब्रीफकेस बांध कर ताला लगाने की आदत थी। पर रेलवे का पैराफर्नेलिया मिलने पर वह आदत जाती रही। किसी समारोह आदि में भीड़ में कभी कभी धक्के खाने पड़ते थे। रेल मंत्री जी का कार्यक्रम होने पर मजबूरन उसमें सम्मिलित होना पड़ता था। पर भीड़ में मैं अपना एक हाथ जेब में पर्स पर रखता था। भले ही मेरे पास ज्यादा पैसे न हों (सौ दो सौ से ज्यादा नहीं), पर पर्स का जाना पसंद नहीं था – आखिर किसे हो सकता है! :-D

मुझे याद है कि इंदौर रेलवे स्टेशन पर रेलमंत्री किसी नयी ट्रेन को झण्डी दिखा रहे थे। जलसे में मण्डल रेल प्रबंधक महोदय रेल मंत्रीजी को सी-ऑफ करने गये तो भीड़ में किसी ने उनका पर्स उड़ा दिया था। उनके आसपास रेलवे प्रोटेक्शन फोर्स और जीआरपी वाले भी रहे ही थे, पर फिर भी जेबकतरा अपनी कलाकारी दिखा गया। … यह रेल नौकरी के दौरान इक्का दुक्का घटनाओं(दुर्घटनाओं) में से है। सामान्यत: रेल अधिकारी सुरक्षित ही रहे पाये मैंने। उस हिसाब से आज का सपना अजीब सा है।

ऐसा नहीं कि चोरी-उचक्कई-जहरखुरानी आदि होती नहीं हैं। पर उनके प्रति मुझमें सेंसिटिविटी का अभाव जरूर था। मुझे याद है कि रेलवे में हो रही जहरखुरानी पर मीटिंगों में चर्चा के दौरान जब बाकी सभी अधिकारी तत्मयता से उसमें भाग लेते थे; मैं उबासी लिया करता था। उस समय मेरे मन में यही चलता था कि वैगनों का लदान कैसे बढ़ाया जाये या मेरे सिस्टम पर ट्रेन-स्टॉक/वैगनों की भीड़ किस तरह सिस्टम के बाहर ठेली जाये। रेल परिचालन की नौकरी ने मुझे निर्मम टाइप बना दिया था। मेरी भाषा भी पुलीस वाले थानेदार की तरह उज्जड्ड और लठ्ठमार हो गयी थी। सम्वेदनशील बनने और दिखाने के लिये मुझे अतिरिक्त मेहनत और मानसिक कवायद करनी होती थी।… और अब, सपने में ही सही, अपने असबाब को खोने का भय हो रहा है! शायद उम्र के बढ़ने के साथ इस तरह के असुरक्षा के भय बढ़ें; इस तरह के सपने और आने लगें।

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मेरी पत्नीजी को फ्लैश-बैक में जाना और अपने पुराने संस्मरण लिखना पसंद नहीं। उनके अनुसार वह लिखते समय मैं जानबूझ कर अपने आप को दयनीय, विपन्न और निरीह दिखाता हूं। मुझे अपने को अतिसामान्य दिखाने का जो भाव है, वह किसी तरह अपने को औरों से अलग दिखाने की प्रवृत्ति का ही प्रदर्शन है। “और सपने तो आते रहते हैं, उनको लेकर लिख डालना – यह भी कोई बात हुई?!”

पर पत्नीजी मुझे चमकाने, ‘साहब’ बनाने में लगी रहेंगी और मैं अपनी मनमौजियत में निरीह भाव से (?) लिखता रहूंगा! :lol:


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