शारदा परसाद बिंद – चकरी कूटने वाला


प्रयागराज के शिवकुटी वाले घर में अटाले में रखी चकरी मिली। उसके दोनो पल्ले थे पर बेंट नहीं था। मेरी अम्मा अरहर की दाल कहुलाती थीं और दलती थीं। अम्मा नहीं रहीं तो यह अनुष्ठान बंद हो गया। चकरी सहेज कर अटाले में रख दी गयी। इस बार जब उसे मेरी पत्नीजी ने देखा तो गांव पर उठा लाईं। यहां अरहर दलने के लिये आसपड़ोस से चकरी मांगनी पड़ती है। अब उसकी जगह अपनी चकरी इस्तेमाल होगी।

सुग्गी इस बारे में जानकार है और मेरी पत्नीजी की सलाहकार-इन-चीफ भी। उसने बताया कि चकरी काफी समय से यूंही पड़ी थी, तो उसके पल्ले कुंद हो गये होंगे और इस्तेमाल से पहले एक बार कुटवाने होंगे। गांव का ही एक आदमी चकरी, सिल, जांत आदि की कुटाई करता है। जांत तो अब कोई इस्तेमाल करता नहीं पार सिल और चकरी लोग कुटवाते हैं। उसको बुलाना होगा।

चकरी का पल्ला कूटते शारदा परसाद

आज वह आदमी आया। नाम है शारदा परसाद बिंद। उनसे बीस रुपया प्रति पल्ला, यानी कुल चालीस रुपये पर चकरी कुटवाना तय हुआ। पोर्टिको के बगल में उन्होने अपना तामझाम खोला। पानी और एक कपड़े की डिमाण्ड की। पानी से पहले कुल्ला कर मुंह में भरा ‘जोश’ (जर्दा युक्त गुटखा के पैकेट का ब्राण्ड) साफ किया। बैठ कार चुनौटी से चूना-तमाकू निकाल कर सुरती बनाई और सेवन किया। फिर काम पर लगे।

शारदा परसाद ने बैठ कार चुनौटी से चूना-तमाकू निकाल कर सुरती बनाई। सेवन किया। फिर चकरी कूटने में जुटे

उनके पास दो छैनी थीं। एक हथौड़ी। “दो छैनी काहे वास्ते?” पूछने पर उन्होने बताया कि एक स्पेयर है। छैनी की धार काम करते करते कुंद हो जाती है तो काम न रुके इसलिये दो ले कर चलते हैं। काम शुरू करने के पहले उन्होने छैनी को धार दी। धार देने के लिये चकरी के पत्थर को पानी से भिगो कार उसपर छैनी की नोक को घिसा।

छैनी की नोक पर धार देने का अनुष्ठान

कुल्हाड़ी से काम करने वाला हो, या छैनी से। बार बार धार देना आवश्यक होता है। इसी को देख कर स्टीफन कोवी ने इफेक्टिव लोगों की एक आदत “sharpen the saw” बताई है। आदमी की कुशलता समय निकाल कर औजार को धार देने में निहित होती है। अच्छे अच्छे लोग यह काम नहीं करते। :-(

धार देने के बाद चकरी के पल्ले पर पानी का लेप कर काम शुरू किया। टक टक की आवाज से वे सीधी रेखा में दांये हाथ से हथौड़ी चलाते और बांये से छैनी को बढ़ाते हुये समान दूरी पर पत्थर कूटते रहे। शारदा परसाद के सधे हाथ तालमेल से बड़ी तेजी से चलते रहे। करीब बारह मिनट में एक पल्ला पूरी तरह कूट लिया।

टक टक की आवाज से वे सीधी रेखा में दांये हाथ से हथौड़ी चलाते और बांये से छैनी को बढ़ाते हुये समान दूरी पर पत्थर कूटते रहे।

दूसरे पल्ले पर, जो ऊपर वाला पल्ला था, जिसमें दाल डालने का अर्ध चंद्राकार छेद भी बना था; पहले पानी से धोया, फिर छैनी के नोक पर पुन: धार दी और तब उसकी कुटाई प्रारम्भ की। मैं बीच बीच में शारदा से प्रश्न भी पूछता जा रहा था। उसका उत्तर देने के लिये वह रुकते और फिर काम शुरू कर देते।

दूसरे पल्ले की कुटाई

शारदा ने बताया कि उसके दो बच्चे हैं। लड़के। आठ और चार साल के। वह कह नहीं सकता कि आगे यही कारीगरी करेंगे या नहीं। सिल, चकरी का प्रचलन अब कम होता जा रहा है। आगे यह काम शायद खतम हो जाये।

इसके अलावा वह टीन और लोहे का काम भी करता है। कनस्तर से डिब्बे, सूप, झरनी, छन्नी आदि बनाता है। पुरानी लोहे की बालटी में अगर पानी चूता हो तो वह भी सुधार देता है। जीविका के लिये मूलत: यही काम वह करता है। सिल-चकरी कूटने का काम नहीं। एक बार आंख में छैनी से छिटक कर पत्थर उसकी आंख में चला गया था, तब से पत्थर कूटने का काम बंद कर दिया है। गांव भर का किसी का कुटाई का काम हो तो कर देता है। अन्यथा नहीं।

वह लकड़ी का काम भी जानता है। फरसा, खुरपी का बेंट बना देता है। चारपाई का ढांचा बना सकता है। तख्त भी बना सकता है पर औजार नहीं हैं। उस सब को खरीदने के लिये तीन हजार चाहिंये, उसका इंतजाम नहीं हो पा रहा।

पैसे की तंगी है। अभी एक हजार रुपये जमा किये थे कथा सुनने के लिये, पर बच्चे बीमार हुये और सारा खर्च हो गया उनके इलाज और दवाई में।

वह चाकू, हंसिया, खुरपी आदि फरगाने (सान देने, धार तेज करने) का काम भी करता था, पर बच्चों ने उसकी मशीन में ढेले डाल दिये। ध्यान नहीं दिया और चालू की मशीन तो उसका पंखा टूट गया। उसको बनवाने के पैसे नहीं हैं।

बताया कि उसका दिल कमजोर है। एक बार पेशाब करने गया था, तब चक्कर आया और बेहोश हो गया। डाक्टर ने बताया कि दिल की बीमारी है। “मैं शायद ज्यादा न चलूं।” – शारदा आशंका व्यक्त करता है। पर उसकी बातों से यह नहीं लगता था कि किसी योग्य डाक्टर ने उसे देखा है। शरीर से वह ठीक ही लगता था। पार यदि दिल कमजोर है तो उसे सुरती-चूना और ‘जोश’ नहीं खाना चाहिये। यह किसी ने सलाह नहीं दी होगी उसे। और शायद यह सलाह वह माने भी नहीं। उसके किसी और नशे के बारे में मैंने पूछा नहीं।

गरीब आदमी शारदा। उसके हाथों में कारीगरी है, हुनर है। शायद उसे आठ दस हजार का माइक्रो फाइनांस मिले तो वह उपयुक्त औजार खरीद कर अपनी आमदनी बढ़ा सके। पर कोई भी कर्ज किसी काम के लिये लिया जाये, बिना संकल्प शक्ति के वह किसी न किसी और मद में खर्च हो जाता है। खर्च की तात्कालिक अर्जेंसी वास्तविक जरूरत पर हावी हो जाती है। यही एक मुख्य कारण है गांवदेहात के लोगों की विपन्नता का। शारदा भी शायद उसी आदत से ग्रसित हो। कह नहीं सकते।

शारदा ने आधे घण्टे में काम खत्म कर लिया। चकरी के ऊपर के पल्ले के ऊपरी हिस्से में फूलपत्ती के डिजाइन बने थे। मैंने कहा कि उनपर भी एक बार कुटाई कर दे जिससे उनका डिजाइन उभर कर सामने आ सके। पर शारदा परसाद ने वह करने से मना कर दिया और न करने के पीछे एक धार्मिक तर्क दिया। उनके अनुसार चकरी बनाने वाला पूजन कर काम शुरू करते समय यह डिजाइन उकेरता है। उसपर एक ही बार छैनी चलती है। दूसरी बार चलाने वाले को पाप लगता है। इसलिये उसको कभी फिर से उकेरा नहीं जाता।

भारत के हर काम में धर्म, पूजा, कर्मकाण्ड निहित है। कहां आप उसका उल्लंघन करने का जोखिम ले रहे हैं, ध्यान रखना होता है!

मेरी पत्नीजी ने उसे नीम की लकड़ी दी मुठिया और बेंट बनाने के लिये। उसने कहा कि एक दो दिन में बना कर दे जायेगा। बाकी, बकौल उसके, हमारी चकरी का पत्थर अच्छा है। “ऐसी चकरी लेने जायें तो छ सौ से कम में नहीं मिलेगी। अब उसकी कुटाई होने पर सही हो गयी है। पांच छ साल के पहले फिर से कुटाई की जरूरत नहीं होगी। ” – उसने कहा।

उसने हमें हिदायत दी कि एक पाव कोई खराब अनाज चकरी में दल कर उसे फैंक दें और फिर चकरी अच्छी तरह साफ कर इस्तेमाल करें। बढ़िया चलेगी।

चकरी, कुटाई के बाद

शारदा परसाद के जाने के बाद मैं सोचने लगा कि गांवदेहात में न बसा होता तो शारदा जैसे चरित्र से कभी मिला न होता। मैं ही नहीं, भारत/इण्डिया के अनेकानेक लोग शारदा जैसे चरित्र से परिचित नहीं होंगे। जांत खत्म हो गये, सिल-बट्टा भी कोई इस्तेमाल नहीं करता शहरों-कस्बों में। दाल दाल मिल से आती है। दलने के लिये चकरी कौन रखता है। घर घर में मिक्सर-ग्राइण्डर का चलन हो गया है। लड़की को विवाह में भी ह्वाइट गुड्स में लोग वही देते हैं। चकरी जांत, सिल-बट्टा तो शादी में मण्डप में शगुन के लिये रखने का काम भी मुश्किल से हो पाता है। वह भी शायद शादी कराने वाले पण्डिज्जी अपने पैकेज में ले कर आते हों और शादी करा कर समेट कर ले जाते हों।

बेंट बनाने के लिये लकड़ी ले कर जाता शारदा परसाद

शारदा परसाद वर्तमान में है, पर अतीत होता जीव है। उसके बारे में जो कुछ है, वह लिख कर या वीडियो बना कर संजो लेना चाहिये। एक दशक बाद शायद वह कार्य विलुप्त हो जाये।


गांव की सड़क पर बारिश के मौसम की शाम


बारिश लम्बे अर्से से रुकी थी। तीन चार दिन से उमस बहुत थी। उमस के कारण घर से निकलना नहीं हो सका था। न निकलने से शरीर अकड़ सा जाता है। आलस्य भी बना रहता है।

उस दिन शाम को हवा चलने लगी। कुछ ठंडक भी थी उसमें। कहीं बारिश हुई होगी। मौसम में सुधार को देखते हुये मैं साइकिल के साथ घर से निकल लिया। मेरे पास करीब 50 मिनट का समय था सूर्यास्त तक घूम कर घर लौटने का।

सांझ होने के साथ गांव देहात की आंखें मुंदने लगती हैं। सूर्यास्त के दो घण्टे में तो सन्नाटा हो जाता है। अगर मैं साइकिल ले कर निकला होऊँ, तो पूरी कोशिश रहती है कि सूर्य की आखिरी किरण तक घर की सरहद में पंहुच जाऊं। यद्यपि गांव गांव में बिजली आ गयी है और सोलर लाइटें भी लग गयी हैं; पर भरोसा नहीं कि रात में बिजली रहेगी या सोलर लाइट काम करेगी। अधिकांश सोलर ट्रीट लाइटें (लगभग नब्बे फीसदी) तो दो तीन साल पहले ही या तो चोरी चली गयी हैं, या उनकी बैटरी बैठ गयी है।

सूर्यास्त होने को था।

मैंने साइकिल से द्वारिकापुर का गंगा तट छू लिया था। भ्रमण की लौटानी में था। सूर्यास्त होने को था। अभी 10-15 मिनट शेष थे। उतने में तो घर पंहुच ही जाऊंगा – मैंने हिसाब लगा लिया था। इतने में द्वारिकापुर और कोलाहलपुर के बीच पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर कई लोग सुस्ताते दिखे। शाम के सिंदूरी नेपथ्य में वह चबूतरा बड़ा आकर्षक दृष्य उपस्थित कर करा था। स्वत: मेरी साइकिल के ब्रेक लग गये।

मुझे चित्र लेते देख चबूतरे पर बैठी एक महिला उठ कर उल्टी तरफ मुंह कर खड़ी हो गयी। चबूतरे के सामने तीन लोग बैठे थे। पीछे कुछ नौजवान शायद पचीसा खेल रहे थे। एक आदमी खेत से सड़क पार कर शायद चबूतरे पर बैठने आ रहा था। पास में ही बांयी ओर खेत में ट्रेक्टर चल रहा था।

चित्र लेते देख एक सज्जन बोले – “आइये, आप भी कुछ देर बैठिये।”

मैंने उन्हें बताया कि सांझ होने तक घर पंहुचना है। सो बैठना नहीं हो पायेगा। वर्ना वहां बैठ कर थोड़ी देर सुस्ताना कौन न चाहेगा?

वे सज्जन वाक-पटु थे। उनसे मेरा कोई पूर्व परिचय नहीं था, फिर भी उन्होने अपने से पहल कर बात की। बताया कि घर से पूरी दोपहार यहां अरहर की बुआई कराने के लिये बैठे हैं। जैसा खेत है, उसमें अरहर ही बोई जा सकती है। धान नहीं लग सकता। पानी खेत में रुकता नहीं है। पास में (गंगा) नदी है तो बह जाता है। मिट्टी भी कंकरीली है। पानी सोख लेती है। ऊपर रहता नहीं।

दोनो गांवों की संधि पर यह सड़क किनारे चबूतरा मुझे बरबस हजारों साल पहले के अतीत में ले जा रहा था।

सवर्णों का गांव है द्वारिकापुर। वहीं के लग रहे थे वे। दूसरी ओर, पश्चिम की ओर है कोलाहलपुर। जिसमें एक घर को छोड़ सभी दलित हैं। दोनो गांव तारी हैं। गंगा तट वाले। दोनो आदि काल से रहे होंगे। पुरातत्वविद रविशंकर जी ने बताया था कि द्वारिकापुर का उल्लेख तो कुलाल जातक में भी है। बुद्ध का एक जन्म द्वारग्राम (द्वारिकापुर) में कुम्हारों की बस्ती में हुआ था। कोलाहलपुर भी इसी तरह कुछ रहा होगा।

दोनो गांवों की संधि पर यह सड़क किनारे चबूतरा मुझे बरबस हजारों साल पहले के अतीत में ले जा रहा था। यह सड़क भी गंगा नदी के समांतर चलती प्राचीन काल का उत्तरापथ रही होगी। मगध-काशी को पेशावर से जोड़ती। तब भी यहां खेत रहे होंगे। ट्रेक्टर की बजाय हल बैल से खेती होती रही होगी और अरहर की बुआई कर सांझ मे किसान यहीं उत्तरापथ के किनारे सुस्ताते, बोलते बतियाते रहे होंगे। गंगा यूं ही पास में बहती रही होंगी। सूर्यास्त भी ऐसे ही होता रहा होगा। मेरे जैसा आदमी भी सांझ की सैर को निकलता रहा होगा! …

मैं देर तक रुका नहीं; यद्यपि सांझ के गोल्डन ऑवर की सूरज की किरणों में वह जगह बहुत आकर्षित कर रही थी। मैंने अपने को दो – ढाई हजार साल के अतीत के टाइम फ्रेम से अपने को वर्तमान में धकेला और घर के लिये रवाना हो गया।

शाम को यूंही उस चबूतरे पर बैठ कुछ सोचना और बस समय गुजारते जाना – यह कभी करूंगा। रिटायरमेण्ट के बाद इस तरह का काम तो कर ही सकता हूं! :-)


बहुत बसें रुकती हैं राघवेंद्र के भोलेनाथ फूड प्लाजा पर


भोलेनाथ फूड प्लाजा को आते जाते देखता था। आज करीने से कुल्हड़ जमाते एक कर्मचारी को देख कर मन हो आया कि चाय के बारे में पूछा जाये। कुल्हड़ का साइज ठीक लगा। यह तो था कि वह “चुकुई” जैसे कुल्हड़ में दो घूंट वाली चाय तो नहीं ही देगा। उस माईक्रो-कुल्हड़ में तो चाय पीने का कभी मन नहीं होता।

मुझे कर्मचारी ने बताया कि दस रुपये की चाय है।

बिना चीनी वाली मिलेगी?

बगल में मालिक जैसे कोई व्यक्ति बैठे थे। बोले – जरूर। आप आईये, बैठिये।

मैं साइकिल पर बैठे बैठे चाय पीने के मूड में था, पर उनके आग्रह पर उतरा। उन्होने मुझे अपने काउण्टर के पीछे कुर्सी दे कर बैठने के लिये आमंत्रित किया। चाय आयी। मैंने उसके साथ एक समोसा भी लिया। समोसे का साइज भी आम गुमटियों पर मिलने वाले “समोसी” के साइज से बड़ा था और उसके अंदर मसाला भी कम तीखा। कुछ मूंगफली के दाने भी उसमें लगे। कुल मिला कर चाय और समोसे की क्वालिटी स्तरीय कही जा सकती है। मनमाफिक।

राघवेंद्र मिश्र और (पीछे) उनका बेटा नमन

मालिक थे राघवेंद्र मिश्र। वे अपना परिचय वे देने लगे। यहीं महराजगंज कस्बे के पास गांव अदनपुर के रहने वाले हैं। पहले प्रयागराज में थे। उनकी बसें चलती थीं। अब भी चलती हैं। बसें चलाने से उन्हें रोड ट्रांसपोर्ट महकमे के लोगों से परिचय था। एक समय आया जब उन्होने अपना वह कारोबार होल्ड पर रख कर हाईवे पर फूड प्लाजा खोलने की सोची। उस समय यह परिचय उनके काम का साबित हुआ।

सन 2018 में अक्तूबर महीने में नवरात्रि के दौरान इस “भोलानाथ फूड प्लाजा” का उद्घाटन हुआ। पूजा पाठ के साथ शुभ समय में। तब का हाल राघवेंद्र बताते हैं कि उस समय प्रयाग में उन्ही के प्रबंधन में बारह बसें थीं, जो यहां चाय-नाश्ते के लिये रुकने लगीं। सवेरे पांच बजे वे यह आउटलेट खोलते थे और रात 10-11 बजे तक भी प्रतीक्षा करते कि ऐसा न हो कोई बस आ कर रुके और वे उसको सर्विस न दे पायें।

यह फूड प्लाजा खुलने के बाद ठीकठाक प्रगति हुई; पर दो बार (2020 और 2021) के लॉकडाउन में इसे बंद रखना पड़ा। उससे व्यवसाय को बहुत धक्का लगा। अब सब पटरी पर आ गया है।

यात्री उतर उतर कर काउण्टर पर भोज्य पदार्थों का कूपन भुगतान कर लेने लगे

एक बस सामने आ कर रुकी और यात्री उतर उतर कर काउण्टर पर भोज्य पदार्थों का कूपन पैसा भुगतान कर लेने लगे थे। राघवेंद्र मुझे अपने कामधाम के बारे में बताते भी जा रहे थे और ग्राहकों से पैसा ले कर कूपन भी देते जा रहे थे। यह कूपन सिस्टम पूरी व्यवस्था को सुचारू बनाने के लिये अच्छा ‘टूल’ लगा मुझे। एक साथ ढेर सारे ग्राहकों को टेकल करना इस कूपन से सरल होता प्रतीत हो रहा था। अन्यथा काउण्टर पर पैसा लेने और उसका ऑर्डर कर्मचारी तक रिले करने की ऊर्जा व्यथ खर्च होती। इसके अलावा, कूपन शायद खाद्य सामग्री का सही सही हिसाब रखने और बिक्री का आकलन करने में भी सहायक होता हो।

इस समय कितनी बसें यहां रुकती होंगी?

राघवेंद्र ने बताया कि करीब 60-70 रुकती हैं। सवेरे छ बजे से शाम 6-7 बजे तक वे यह प्लाजा खोल कर रखते हैं। परिवार के दो-तीन लोग लगे हैं इसके प्रबंधन में। आजकल उन्हे ही अधिकांश काम देखना होता है। वे ही मुख्य कर्ताधर्ता हैं; इसलिये और ज्यादा देर तक खोल कर बैठना सम्भव नहीं हो पाता।

साठ सत्तर बसों के यात्रियों का ट्रेफिक बारह घण्टे में डील करना – यह बड़ा हेक्टिक काम है। दिन भर कैश काउण्टर, फूड प्रेपरेशन और सर्विस का कुशल प्रबंधन करना सरसरी निगाह से देखने वाले को सरल लग सकता है; पर एक जटिल प्रक्रिया है। प्रक्रिया की किसी भी कड़ी में गफलत उपक्रम की साख तोड़ सकती है। वह तब जब आस पास उभरते प्रतियोगी अपनी अपनी दुकान सेट अप करने लगे हों।

मेरा आकलन है कि राघवेंद्र कस कर मेहनत करते होंगे। और बारह-चौदह घण्टे के इस थकाऊ काम के बाद (आशा करता हूं) उन्हें अच्छे से नींद आती होगी।

राघवेंद्र का आउटलेट। बांई ओर कैश काउण्टर है और दांयी ओर नाश्ते की सामग्री का काउण्टर

राघवेंद्र ने अपने लड़के नमन से परिचय कराया। नमन अभी पढ़ाई कर रहे हैं। आजकल शिक्षण संस्थान बंद हैं तो कुछ समय यहां फूड प्लाजा पर भी दे लेते हैं। अन्यथा कामधाम देखने का जिम्मा राघवेंद्र का ही है। उन्होने मेरे ससुराल पक्ष के और अपने परिवार के मेलजोल की भी बात की। बताया कि मेरे स्वसुर जी और उनके चचेरे बाबा पण्डित चंद्रिका प्रसाद शास्त्री मेंं घनिष्ट मित्रता थी।

मैंने सवेरे मौज मौज में चाय समोसा सेवन कर लिया था। घर ले जाने के लिये भी आधा दर्जन समोसा खरीदा। चलते समय एक दो चित्र राघवेंद्र के फूड प्लाजा के लिये।

राघवेंद्र जी का “भोलेनाथ फूड प्लाजा” नाम में थोड़ा आधुनिक लगे पर बना पूरी तरह किफायत और ‘मिनिमलिज्म’ के सिद्धांत पर है। उनके फर्नीचर और काउण्टर में व्यर्थ की तड़क भड़क नहीं है। फूड आईटम में भी दुनिया भर की अजीबोगरीब डिशेज के नाम नहीं हैं। देसी यात्री जो समोसा, कचौरी, भजिया, ब्रेड पकौड़ा खाता है; वही है। इस लिये उन्हें इन्ही चीजों को बनाने के कारीगर रखने की दरकार है। उनके कैश काउण्टर के साथ दो डीप फ्रीजर जैसे बक्से थे। शायद कोल्ड ड्रिंक आदि के लिये। फूड प्रेपरेशन जिस प्रकार से हो रही थी, वह देख कर गांव या कस्बे के यात्री को तो कुछ भी अटपटा नहीं लगता होगा, पर कोई महराजगंज-बाबूसराय के बीच मेकडॉनल्ड या के.एफ.सी. जैसी फ्रेंचाइजी की अपेक्षा करे, तो वह तो नहीं ही है।

राघवेंद्र जी का “भोलेनाथ फूड प्लाजा” नाम में थोड़ा आधुनिक लगे पर बना पूरी तरह किफायत और ‘मिनिमलिज्म’ के सिद्धांत पर है

वैसे मुझे कोई महिला यात्री तो बस से उतर कर काउण्टर पर आती नजर नहीं आयी; पर अगर होती हों तो राघवेंद्र जी को उनके लिये महिला सुविधाओं की ओर जरूर सोचना चाहिये। वे अभी बसों की ग्राहकी से संतृप्त महसूस कर सकते हैं, पर कालांतर में बढ़ते कम्पीटीशन को देखते हुये उन्हें लम्बी दूरी के कारों में यात्रा करने वाले लोगों को भी आकर्षित करने की भी सोच बनानी होगी… और शायद यह सब उनके कुशल बिजनेस माइण्ड में हो भी।

फिलहाल, पंद्रह मिनट के वहां के ठहराव में सरसरी निगाह से जो देखा उसमें कुछ चीजें मुझे अपील कर गयीं। राघवेंद्र ने व्यर्थ के सामान-सजावट में पैसा बर्बाद नहीं किया है। उन्होने सघन ग्राहकी की आमद साध ली है – उसके लिये बस कर्मियों से जो भी तालमेल बैठाया हो, वह उनकी प्रबंधन कुशलता ही कही जायेगी।

इसके अलावा त्वरित सर्विस कर एक साथ दो तीन बसों के यात्रियों को संतुष्ट करने का जो सिस्टम बनाया है, वह आकर्षित करता है। व्यर्थ की वेटर-ऑर्डर-सर्विस की चेन कायम नहीं की। सेल्फ सर्विस मॉडल है, जो काफी सही है। लोग बस से उतरते हैं। कैश काउण्टर पर आ कर पैसा दे कर कूपन लेते हैं और कूपन से फूड काउण्टर वाले नाश्ते का सामान देते हैं। सामान ले कर पास लगी कुर्सी-मेजों पर या खड़े खड़े भी खा कर रवाना होते हैं।

राघवेंद्र नाश्ते के सामान, चाय आदि की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं। ग्राहक को इंतजार नहीं करना पड़ता।

मुझे राघवेंद्र जी के यहां पंद्रह मिनट व्यतीत करना अच्छा लगा। मैं एक ऐसे ‘अड्डे’ की तलाश में हूं जहां आधा पौना घण्टा बैठ कर लोगों को देखना-बोलना-बतियाना हो सके। एक छोटी सी मेज भी हो जिसपर जेबी नोटबुक रख कर नोट्स लिये जा सकें। अगर वैसा कुछ जमा तो भोलेनाथ फूड प्लाजा को महीने के हिसाब से पेमेण्ट कर एक कोने की सीट पर नियमित अड्डा जमाना चाहूंगा! उनकी चाय और समोसे की क्वालिटी मुझे भा गयी है! मेरी पत्नीजी ने भी कहा है कि आसपास के सभी जगहों के समोसों की बजाय यहाँ का समोसा बेहतर है।

शायद वहां रोज आधा घण्टा व्यतीत करने से मेरे ब्लॉग की आगामी दस बीस पोस्टें जन्म ले सकें। शायद मुझे वह अनुभव नियमित ब्लॉगिंग को प्रेरित करे। वह क्रियेटिव ‘अड्डा’ साबित हो! :-)

भोलेनाथ फूड प्लाजा की रेट लिस्ट भी इसी फ्लैक्सी शीट पर है। किसी मेंन्यू कार्ड का कोई झंझट नहीं।

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